मेरा ऐसा मानना है कि गलतियों से ही सीखने की शुरुआत होती है। जब छात्र कठिन समस्याओं को स्वयं हल करने की कोशिश करते है तब वह कार्य को करते समय जो गलतियां होती है असली मे वही सीखने की शुरुआत होती है हर कक्षा में कुछ छात्र ऐसे होते हैं जिन्हें “असफल” या “लास्ट रैंकर्स” कहा जाता है। लेकिन वास्तव में कोई भी छात्र असफल नहीं होता, बल्कि उसकी सीखने की क्षमता और तरीका अलग होता है छात्रों को किसी भी प्रश्न का उत्तर बताने के बजाय उन्हें स्वयं से उत्तर खोजने के लिए कहना चाहिए। जब बच्चा स्वयं से एक्सपेरिमेंट करता है तो वह उसे जीवन भर के लिए यादगार हो जाता है ।
परंपरागत शिक्षा प्रणाली में शिक्षक केवल अंकों (marks) और अनुशासन पर ध्यान देते हैं, जिससे कमजोर छात्र और निराश हो जाते हैं। लेकिन जब शिक्षक छात्रों को समझते हैं, उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार पढ़ाते हैं, तब वही छात्र धीरे-धीरे उत्पादक (productive) बन जाते है और उनके अंदर सभी स्किल भी डेवलपमेट होते है जो आगे चलकर करियर के चुनाव में भी सहायक होता है।छात्रों को कभी भी जज नहीं करना चाहिए। उन्हें फेल कहकर लेबल नहीं करना चाहिए।
हर बच्चे में कोई न कोई खास प्रतिभा होती है। रुचि के अनुसार पढ़ाई, बच्चे की पसंद (जैसे खेल, चित्रकारी, संगीत) को पढ़ाई से जोड़ना चाहिए। इससे पढ़ाई रोचक बनती है । इससे छात्र को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। अच्छा शिक्षक-छात्र संबंध
डर के बजाय दोस्ती और सहयोग पर आधारित होना चाहिए, तभी छात्र खुलकर सीख पाता है। इस विषय से मुझे यह समझ आया कि असफलता छात्र की कमजोरी नहीं है।
अगर शिक्षक और अभिभावक धैर्य और समझदारी से काम लें, तो हर छात्र आगे बढ़ सकता है। हमें केवल टॉपर छात्रों पर नहीं, बल्कि हर छात्र पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि आज का लास्ट रैंकर्स कल का सफल व्यक्ति बन सकता है।एपीजे अब्दुल कलाम का वह सुविचार की गलतियां और असफलताएं ही सीखने की पहली सीढ़ी है हमे अत्यंत प्रभावित करता है और बार -बार अभ्यास करने से असफल भी सफल बन सकता है।जैसे कि ये दोहा कहता है-
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत-जात तें, सिल पर परत निसान।।
मंजुला सागर
सनबीम ग्रामीण स्कूल

