Thursday, November 5, 2026

किताबें और संवेदनाएँ: पढ़ने से स्वयं को जानने तक - सुनीता त्रिपाठी

किताबों के पन्नों में खोती हमारी संवेदनाएँ

इस विषय को पढ़कर मेरे मन में एक विचार आया कि आज हम सभी हर चीज़ जल्दी पाने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें समय देकर ही समझा जा सकता है। किताबें भी उनमें से एक हैं। किसी किताब को पढ़ना केवल उसके शब्दों को जानना नहीं, बल्कि दूसरों के अनुभवों, संघर्षों और विचारों को अपने जीवन से जोड़ना भी है।

मैं सोचती हूँ कि यदि हर घर में माता-पिता बच्चों को प्रतिदिन कुछ समय निकालकर किताबें पढ़कर सुनाएँ, तो बच्चों में केवल पढ़ने की आदत ही नहीं, बल्कि सुनने, समझने और सवाल पूछने की क्षमता भी विकसित होगी। हमें बच्चों को केवल तकनीक का इस्तेमाल करना ही नहीं, बल्कि उसका सही उपयोग करना भी सिखाना होगा।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हमारे पास कितनी किताबें हैं, बल्कि इस बात की है कि हमने कितनी किताबें पढ़कर अपने विचारों में बदलाव लाया है।

मेरी सीख है कि मोबाइल हमें दुनिया से जोड़ता है, लेकिन किताबें हमें स्वयं से जोड़ती हैं। इसलिए जीवन में नई तकनीक को अपनाएँ, लेकिन पढ़ने की पुरानी और अनमोल आदत को कभी न खोएँ।

सुनीता त्रिपाठी
सनबीम ग्रामीण स्कूल

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