At the Learning Forward India Foundation, and the Good Schools Alliance (GSA), we
are dedicated to the transformative power of education by empowering teachers. #HappyTeachers
The session highlighted the importance of digital, media, and AI literacies in preparing learners for the future. Educators were encouraged to embrace innovative teaching practices that foster curiosity, creativity, adaptability, and responsible citizenship.
The session reminded us that emerging literacies are no longer optional; they are essential for shaping confident, capable, and future-ready learners.
The session provided a thought-provoking opportunity to reflect on the evolving meaning of literacy in today’s rapidly changing world. Sandeep Dutt Sir emphasised that educators need to move beyond traditional notions of literacy and embrace digital, media, and AI-driven competencies to equip learners for an increasingly dynamic future.
The discussion encouraged educators to reflect on their teaching practices, explore new pedagogies, and create learning environments that foster curiosity, creativity, critical thinking, and responsible citizenship. It highlighted the important role teachers play in helping students navigate emerging technologies thoughtfully and responsibly.
The session reminded us that emerging literacies are no longer optional; they are essential for nurturing confident, capable, adaptable, and future-ready learners.
In this session, Sandeep Dutt discussed how learning must evolve to meet the demands of today’s world. Reading and writing are no longer enough; students also need to learn how to use digital tools, media, and AI safely, responsibly, and effectively.
He encouraged teachers to explore new teaching approaches that nurture curiosity, creativity, critical thinking, and responsible use of technology among students.
The key message of the session was that equipping students with these essential skills is no longer optional—it is necessary to prepare them confidently for the future.
Shalini Goel Delhi Public School, Sector 45, Gurugram
Saturday sessions are dedicated to continuous professional learning and development, creating a space for educators to learn, reflect, collaborate, and grow. Through engaging discussions, practical strategies, peer learning, and sharing of experiences, teachers explore new approaches to teaching and leadership. These sessions encourage educators to reflect on their practices, strengthen their professional skills, and bring meaningful improvements to the learning environment.
प्रत्येक बच्चे का पारिवारिक और सामाजिक वातावरण उसके व्यक्तित्व, सोच और सीखने की क्षमता को गहराई से प्रभावित करता है। एक शिक्षक के रूप में हमें यह समझना चाहिए कि सभी बच्चे समान परिस्थितियों से विद्यालय नहीं आते। कुछ बच्चों को घर से पर्याप्त शैक्षिक सहयोग मिलता है, जबकि कुछ बच्चे अनेक सीमाओं और चुनौतियों के बीच सीखने का प्रयास करते हैं।
तारा वेस्टओवर के जीवन से मुझे यह सीख मिलती है कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से सोचने, और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। इसलिए शिक्षक का दायित्व केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में जिज्ञासा, आत्मविश्वास और सही दृष्टिकोण विकसित करना भी है।
मैं अपने विद्यार्थियों की व्यक्तिगत परिस्थितियों को समझते हुए उन्हें बिना किसी भेदभाव के सीखने के अवसर देने और उनकी क्षमताओं को पहचानकर प्रोत्साहित करने का प्रयास करूँगा।
तारा वेस्टओवर के जीवन का वह सबसे कठिन और क्रांतिकारी मोड़ है, जहाँ उन्हें अपनी पहचान और अपने परिवार में से किसी एक को चुनना था। एक तरफ उनका वह परिवार था जिससे वह बेहद प्यार करती थीं, लेकिन जो बदले में उनसे अपनी बुद्धि, मानसिक शांति और सच्चाई की आहुति मांग रहा था। दूसरी तरफ शिक्षा, स्वतंत्रता और एक ऐसा बेहतर जीवन था, जिसकी राह अकेलेपन और अपनों के बिछोह से होकर गुजरती थी।तारा के लिए इस 'अच्छे' को चुनने का फैसला कोई आसान सौदा नहीं था। इसका मतलब था उस कबाड़खाने और उन कट्टर मान्यताओं को पीछे छोड़ना, जिन्होंने बचपन से उनकी दुनिया को घेरा हुआ था। जब उन्होंने अपने भाई के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और अपने माता-पिता के अंधविश्वासों को मानने से इनकार कर दिया, तो उन्हें पूरे परिवार द्वारा झूठा और मानसिक रूप से बीमार घोषित कर दिया गया।
ऐसे चौराहे पर खड़े होकर, समाज अक्सर परिवार के प्रति अंध-वफादारी को 'अच्छा' मानता है, भले ही वह व्यक्ति को अंदर से खोखला कर दे। लेकिन तारा ने सच्ची शिक्षा के सार को समझा। उन्होंने जाना कि असली अच्छाई खुद के प्रति वफादार रहने और अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करने में है।इस चुनाव की कीमत बहुत भारी थी—उन्हें अपने माता-पिता और कई भाई-बहनों से हमेशा के लिए नाता तोड़ना पड़ा। लेकिन इस गहरे दर्द के बदले उन्हें जो मिला, वह था उनका अपना अस्तित्व। यह रिफ्लेक्शन हमें सिखाता है कि हम यह तय नहीं कर सकते कि हम कहाँ पैदा हुए हैं, लेकिन हम यह जरूर चुन सकते हैं कि हम किस ढर्रे पर जिएंगे। "Choose the Good" का यही संदेश है: चाहे अतीत कितना भी अंधकारमय क्यों न हो, सही रास्ते पर चलने का साहस हमेशा हमारे भीतर ही होता है।का यही संदेश है: चाहे अतीत कितना भी अंधकारमय क्यों न हो, सही रास्ते पर चलने का साहस हमेशा हमारे भीतर ही होता है।
इस अंश को पढ़कर मुझे यह समझने का अवसर मिला कि शिक्षा केवल स्कूल जाने या किताबें पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे सोचने, समझने और अपने भविष्य को बेहतर बनाने की क्षमता देती है। लेखिका का बचपन सामान्य बच्चों से बहुत अलग था। उनके परिवार में बच्चों का स्कूल जाना, डॉक्टर के पास जाना और सरकारी व्यवस्था से जुड़ना भी नहीं होता था। इसके बावजूद लेखिका अपने आसपास की परिस्थितियों को समझने और अपने परिवार के जीवन को ध्यान से देखने का प्रयास करती थी।
इस अंश से मुझे यह भी सीख मिली कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सीखने की इच्छा व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। शिक्षा हमें अपने अधिकारों और दुनिया के बारे में जागरूक बनाती है। एक शिक्षक के रूप में मुझे महसूस हुआ कि प्रत्येक बच्चे को सीखने का अवसर मिलना चाहिए, क्योंकि शिक्षा उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
मेरे विचार से जीवन में परिस्थिति कैसी भी हो, शिक्षा का महत्व कभी कम नहीं होता। कठिन समय में भी शिक्षा हमें सही रास्ता चुनने और समस्याओं का सामना करने की हिम्मत देती है। कई बार परिस्थितियाँ हमारे सामने ऐसी चुनौतियाँ खड़ी कर देती हैं, जिनके कारण पढ़ाई करना मुश्किल लगता है, लेकिन ऐसे समय में शिक्षा को जारी रखना और भी जरूरी हो जाता है।
शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन को समझने, सही और गलत में अंतर करने तथा अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता देती है। कठिन परिस्थितियों में शिक्षा ही हमारे अंदर आत्मविश्वास और उम्मीद बनाए रखती है।
इसलिए मेरा मानना है कि चाहे परिस्थिति सामान्य हो या कठिन, शिक्षा को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। शिक्षा एक ऐसा साधन है जो हमें वर्तमान परिस्थितियों से बाहर निकलने और अपने भविष्य को बेहतर बनाने में मदद करती हैl
आज के सेशन से मेरे मन में एक विचार गहराई से आया—“जीवन हमें हर दिन दो रास्ते देता है, लेकिन हमारी पहचान इस बात से बनती है कि हम कौन-सा रास्ता चुनते हैं।”कई बार परिस्थितियाँ हमारे हाथ में नहीं होतीं, परिवार का वातावरण हमारे अनुकूल नहीं होता और संसाधनों की कमी हमारे सपनों के रास्ते में खड़ी होती है। लेकिन अपना चुनाव करना हमारे हाथ में होता है। इसका जीवंत उदाहरण स्वयं मेरी अपनी पर्सनल लाइफ से जुड़ी हुई है। मैं एक गाँव के एक ऐसे परिवार से हूं जहां मेरे घर में कोई भी पढ़ा लिखा नहीं था इसके बावजूद मेरे पिताजी का यह मानना था कि नहीं पढ़ने से जो परेशानी में झेल रहा हूं वह मेरे बच्चे न झेले , मगर वहीं दूसरी तरफ गांव वाले मेरे पिताजी को भड़कते थे कि “लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने की जरूरत नहीं है।” घर का काम ही उसके लिए पर्याप्त है। मेरे पिताजी गांव वालों की बात को अनसुना कर दिए और हम चार बहन में सभी को पढ़ाया। उनका यह मानना था कि अगर वे अपने भविष्य को बदलने के लिए पढ़ सकती हैं, तो मैं क्यों उनके सपनों को पूरा नहीं कर सकता?”वे विरोधियों की बातों को नजरअंदाज करते हुए हम सभी को पढ़ाने का निर्णय लिये ।अपने पिताजी के निर्णय को देखकर हम सभी बहनें धीरे-धीरे कठिनाइयों के बावजूद मन लगाकर पढ़ाई करने लगें ।यहाँ हमारी कोई सबसे बड़ी जीत कोई परीक्षा पास करना नहीं था बल्कि अपने पिता जी के विश्वास पर खरा उतरना था। हमारी सबसे बड़ी जीत थी परिस्थितियों के बजाय अपने भविष्य का चुनाव।
एक शिक्षक के रूप में मेरी सीख- इस अध्याय ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि कक्षा में बैठा हर बच्चा समान परिस्थितियों से नहीं आता। कोई आर्थिक कठिनाई से जूझ रहा हो सकता है, कोई पारिवारिक दबाव से, तो कोई आत्मविश्वास की कमी से।ऐसे में एक शिक्षक के रूप में मेरा काम केवल पाठ पढ़ाना नहीं है।कभी-कभी बच्चे के भीतर वह विश्वास जगाना पड़ता है, जो उसे अपने आसपास से नहीं मिल पाता।हो सकता है किसी बच्चे की कॉपी अधूरी हो, लेकिन उसका सपना बहुत बड़ा हो।हो सकता है वह कक्षा में चुप रहता हो, लेकिन उसके मन में बहुत सारे प्रश्न हों।इसलिए अब मैं केवल यह नहीं देखना चाहूँगी कि “बच्चे ने क्या नहीं किया?”बल्कि यह भी देखना चाहूँगा कि “बच्चा किन परिस्थितियों के बावजूद क्या करने की कोशिश कर रहा है?Choose the Good” मेरे लिए केवल एक अध्याय का शीर्षक नहीं, बल्कि जीवन का मंत्र भी है।हर परिस्थिति में हमारे सामने विकल्प होते हैं—हार मानना या प्रयास करना,
शिकायत करना या समाधान खोजना,डर के साथ रुक जाना या विश्वास के साथ आगे बढ़ना।कभी-कभी जीवन हमें अच्छा रास्ता आसानी से नहीं देता।हमें स्वयं अच्छे रास्ते का चुनाव करना पड़ता है, और शायद शिक्षा की सबसे बड़ी शक्ति भी यही है—वह बच्चे को केवल पढ़ना नहीं सिखाती, बल्कि अपने जीवन के लिए सही चुनाव करना सिखाती है।
“परिस्थितियाँ हमारे हाथ में नहीं होती,लेकिन उन परिस्थितियों में हमारा चुनाव हमारे हाथ में होता है।एक सही चुना पूरी जिंदगी की दिशा बदल देता है।”
इस सत्र में लेखिका द्वारा प्रस्तुत प्रसंग को पढ़कर मैंने अपने बारे में यह महसूस किया कि एक शिक्षिका के रूप में मुझे बच्चों की परिस्थितियों को केवल उनके व्यवहार या पढ़ाई के परिणामों से नहीं समझना चाहिए। प्रत्येक बच्चे के पीछे उसका परिवार, उसकी मान्यताएँ, परंपराएँ, सामाजिक वातावरण और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएँ होती हैं।
लेखिका ने परिवार और बच्चे के बीच बदलती परिस्थितियों को जिस तरह प्रस्तुत किया है, उससे मुझे यह सोचने का अवसर मिला कि यदि कोई बच्चा पारिवारिक मान्यताओं और आधुनिक शिक्षा के बीच उलझन महसूस करता है, तो शिक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चे को सही-गलत बताने से पहले उसकी बात धैर्य से सुननी चाहिए और उसके अनुभव को समझना चाहिए।
स पाठ से यह भी सीख मिली कि शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान देना नहीं है। शिक्षा बच्चे में सोचने, प्रश्न करने, परिस्थितियों को समझने, आत्मविश्वास विकसित करने और सुरक्षित निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है। इसलिए कक्षा का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ बच्चा बिना डर के अपनी बात रख सके।
भविष्य में यदि किसी बच्चे के व्यवहार में तनाव, डर या असमंजस दिखाई दे, तो उसे केवल अनुशासन की समस्या न मानकर उसके कारण को समझने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही, परिवार की परंपराओं और मान्यताओं का सम्मान करते हुए बच्चे की शिक्षा, सुरक्षा और सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देना चाहिए।
मेरे लिए इस लेखिका का यह प्रसंग एक सीख है कि एक संवेदनशील शिक्षिका वही है जो बच्चे को केवल पढ़ाती नहीं, बल्कि उसकी परिस्थितियों को समझकर उसे सुरक्षित और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने का अवसर देती है।
इस कहानी ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि हर बच्चा केवल किताबों से नहीं, बल्कि अपने आसपास की सोचनेऔर परिस्थितियों से भी सीखता है। तारा की कहानी में सबसे गहरी बाद मुझे यह लगी कि जब किसी बच्चे के सामने सीखने के रास्ते सीमित कर दिए जाते हैं,। तब भी उसके भीतर आगे बढ़ाने की इच्छा एक नई राह खोज सकती है।
इससे मुझे महसूस हुआ की शिक्षा केवल पढ़ना लिखना सीखने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने लिए सोने और सही गलत की समझने की आजादी भी है। कई बार बच्चे अपनी परिस्थितियों के कारण वह नहीं देख पाते जो उनके लिए संभव है। ऐसे में किसी व्यक्ति का विश्वास, एक अवसर या एक छोटा सा प्रोत्साहन उनके जीवन की दिशा बदल सकता है।
तारा की कहानी ने मुझे यह भी सिखाया कि बदलाव हमेशा बाहर की दुनिया बदलने से नहीं आता, कभी-कभी शुरुआत अपने भीतर सवाल पूछने सेहोती है। यही इस अध्याय की बात मुझे सबसे अधिक छू गई।
Reflection Chapter 1 ( Choose the Good ) को पढ़ते समय मुझे सबसे पहले Tara Westover का बचपन बहुत अलग और असामान्य लगा। वह Idaho के पहाड़ी इलाके में अपने परिवार के साथ रहती थीं, जहाँ उनका परिवार बाहरी समाज से काफी अलग जीवन जीता था। उनके पिता का सरकार और बाहरी संस्थाओं पर विश्वास नहीं था। इसलिए Tara और उनके भाई-बहनों का स्कूल जाना और अस्पताल जैसी सामान्य सुविधाओं का उपयोग करना उनके जीवन का हिस्सा नहीं था।
इस अध्याय की घटनाओं को पढ़कर मुझे सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात पर हुआ कि Tara के लिए ऐसी जिंदगी सामान्य थी। जिस तरह हम स्कूल जाने, डॉक्टर के पास जाने और सुरक्षित वातावरण में रहने को अपने जीवन का सामान्य हिस्सा मानते हैं, Tara के बचपन में ये चीजें बहुत अलग थीं। इससे मुझे महसूस हुआ कि हम जिस वातावरण में बड़े होते हैं, उसे ही अक्सर अपनी पूरी दुनिया समझने लगते हैं। Tara और उनके भाई-बहनों का कम उम्र में ही परिवार के कामों में शामिल होना भी मुझे बहुत प्रभावित करता है। पहाड़ों पर काम करना और घर की जिम्मेदारियों में हाथ बँटाना उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा था। इसे पढ़ते हुए मुझे लगा कि बच्चों के जीवन में शिक्षा और अपने आसपास की दुनिया को जानने का अवसर कितना महत्वपूर्ण है।
स्कूल जाना, किताबें पढ़ना और अलग-अलग लोगों से विचार साझा करना मेरे लिए सामान्य बातें हैं, लेकिन Tara की कहानी ने मुझे समझाया कि ये अवसर हर बच्चे को समान रूप से नहीं मिलते।
मेरे लिए इस अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि हमारी परिस्थितियाँ हमारी सोच को प्रभावित करती हैं, लेकिन नई चीजें सीखने और अलग दृष्टिकोण समझने से हमारी सोच का विस्तार हो सकता है। Tara की कहानी ने मुझे दूसरों को उनके अनुभवों के आधार पर समझने और बिना तुरंत निर्णय लिए उनकी परिस्थितियों को देखने की सीख दी। किसी व्यक्ति की सोच उसके वातावरण से बनती है, लेकिन सीखने और नई चीजों को समझने का अवसर मिलने पर वह अपनी सोच को बदल भी सकता है।
आज की कक्षा मेरे लिए केवल एक कहानी देखने का अनुभव नहीं थी, बल्कि बच्चों के जीवन, उनकी आवश्यकताओं और उनके अधिकारों को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी थी। कक्षा में दिखाई गई 7 वर्ष की बच्ची की कहानी ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया। बच्ची अभी विद्यालय नहीं जाती थी और अपने सभी भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। उसके मन में यह चिंता थी कि जब उसके पास जन्म प्रमाण पत्र या कोई अन्य प्रमाण पत्र नहीं है, तो उसका विद्यालय में प्रवेश कैसे होगा। इस प्रसंग ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि एक छोटे बच्चे के लिए एक आवश्यक दस्तावेज का न होना भी कितनी बड़ी चिंता का विषय बन सकता है।
कक्षा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष बच्ची का प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति आकर्षण था। वह पहाड़ियों, झरनों, पेड़-पौधों और बहती हुई हवाओं को देखकर अपने मन में अनेक विचार और कल्पनाएँ करती है। वह प्रकृति की सुंदरता में अपने माता-पिता को भी जोड़कर देखती है। इस दृश्य ने मुझे यह अनुभव कराया कि प्रकृति बच्चों के लिए केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि सीखने, सोचने और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का एक सुंदर माध्यम भी है।
एक अच्छा शिक्षक वही है जो बच्चों की आवश्यकताओं को समझे, उनकी भावनाओं का सम्मान करे और उन्हें सीखने के लिए ऐसा वातावरण प्रदान करे, जहाँ वे सुरक्षित महसूस करें, प्रश्न पूछ सकें और अपनी कल्पनाओं को व्यक्त कर सकें। साथ ही, हमें बच्चों में प्रकृति के प्रति प्रेम और उसके संरक्षण की भावना भी विकसित करनी चाहिए।
आज की क्लास में यह दिखाया गया कि एक 7 वर्ष की बच्ची, जो अभी विद्यालय नहीं जाती है, अपने सभी भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। बच्ची को डर लगता था कि मेरे पास मेरे जन्म का न तो कोई जन्म प्रमाण पत्र है, न ही किसी प्रकार का कोई सर्टिफिकेट। मेरा किसी विद्यालय में एडमिशन कैसे होगा?
इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि जन्म प्रमाण पत्र बच्चों के लिए कितना जरूरी होता है। वह बच्ची प्राकृतिक दृश्यों को देखती है और उसके बारे में तरह-तरह के विचार सोचती है। पहाड़ियों, झरनों, पेड़-पौधों और बहती हुई हवाओं आदि प्राकृतिक पर्यावरण की खुशियों का वर्णन दिखाया गया है और वह बच्ची इस पर्यावरण में अपने माता-पिता को भी जोड़ी हुई है।
अर्थात् आज की क्लास में प्राकृतिक दृश्यों का काफी वर्णन किया गया है।
Chapter 2 “Midwife” पर चर्चा करते हुए मुझे यह समझने का अवसर मिला कि शिक्षा केवल ज्ञान देने का नाम नहीं है, बल्कि किसी के भीतर छिपी क्षमता को बाहर लाने की प्रक्रिया भी है। जैसे एक दाई बच्चे को जन्म देने में सहायता करती है, वैसे ही एक शिक्षक बच्चों के विचारों, आत्मविश्वास और प्रतिभा को जन्म लेने में सहयोग करता है।
इस अध्याय से मैंने सीखा कि शिक्षक को बच्चों के लिए हर उत्तर तैयार करके देने के बजाय उन्हें सोचने, समझने और स्वयं आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए। एक अच्छे शिक्षक की भूमिका केवल पढ़ाने की नहीं, बल्कि सही समय पर सही दिशा देने की होती है।
मेरे लिए सबसे बड़ी सीख यह रही कि शिक्षक बच्चे को बदलता नहीं, बल्कि उसके अंदर छिपे बेहतर रूप को सामने आने में मदद करता है। सुनीता त्रिपाठी
शिक्षा केवल किताबों और कक्षा की चारदीवारी में नहीं, बल्कि जीवन के साक्षात्कार और अनुभवों से भी मिलती है।
Educated पुस्तक का यह पाठ हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि शिक्षा का अर्थ केवल किताबों के पन्ने पढ़ लेना या परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर लेना नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है, जो हमें जीवन को समझना, प्रश्न करना और सही निर्णय लेना सिखाए। तारा के जीवन की कल्पना कीजिए—एक ऐसा बच्चा जिसे विद्यालय से दूर रखा गया, लेकिन जीवन ने उसे हर दिन एक नया पाठ पढ़ाया। परिस्थितियाँ उसकी किताब थीं, संघर्ष उसका शिक्षक था और उसके अनुभव ही उसकी पाठशाला। उसने जाना कि दुनिया को समझने के लिए केवल दूसरों की कही बात मान लेना पर्याप्त नहीं; कभी-कभी हमें स्वयं प्रश्न करना पड़ता है, स्वयं देखना पड़ता है और स्वयं अनुभव करना पड़ता है।
एक शिक्षक के रूप में इस विचार ने मुझे भीतर तक छुआ। मैंने महसूस किया कि जब बच्चा केवल मेरी बात सुनता है, तो वह शायद उसे याद रखता है; लेकिन जब वह किसी बात को स्वयं अनुभव करता है, तो वह उसे जीवनभर अपने साथ लेकर चलता है। ऐसा मेरा स्वयं का प्रत्यक्ष अनुभव भी है। मैं जिस चीज से मोटिवेट होकर उसे लगन से करने का प्रयास करती थी, वे बचपन की यादें आज भी मुझे याद हैं। कभी-कभी मैं कक्षा में भी बच्चों के समक्ष इन प्रयासों को बताती हूँ, ताकि जो बच्चे हतोत्साहित एवं निराश लगते हैं, उनके चेहरे पर भी प्रसन्नता दिखाई दे और वे भी पूरी लगन एवं मेहनत के साथ काम करने की कोशिश करें।
किसी भी चीज को बच्चा किताब में पढ़कर भूल सकता है। लेकिन यदि इस चीज को वह स्वयं करके सीखता है, तो उस काम को करने के लिए वह स्वयं को जिम्मेदार मानता है और उसे पूरी लगन के साथ भी करता है। ऐसा करके उसे स्वयं भी यह एहसास होता है कि सीखना केवल पाठ का विषय नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है।
यहीं से मेरी सोच बदलती है—मुझे बच्चों को केवल पढ़ाना नहीं है, मुझे उन्हें सीखने के अवसर देने हैं। जैसे—कक्षा में कभी-कभी प्रश्न पूछकर बच्चे को स्वयं उत्तर खोजने देना।
तारा का संघर्ष हमें यही संदेश देता है कि शिक्षा मनुष्य को केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि अपनी सोच बनाने की स्वतंत्रता देती है। आज एक शिक्षक के रूप में मेरा संकल्प है कि मैं बच्चों को केवल यह नहीं बताऊँगी कि क्या सही है, बल्कि उन्हें यह समझने का अवसर भी दूँगी कि क्यों सही है और वे इसे अपने जीवन में कैसे देख सकते हैं।
क्योंकि—किताबें हमें ज्ञान देती हैं, लेकिन जीवन उस ज्ञान को अर्थ देता है। शिक्षक रास्ता दिखा सकता है, पर अनुभव बच्चे को उस रास्ते पर चलना सिखाता है। यही Educated से मिली सबसे खूबसूरत सीख है—शिक्षा वह नहीं जो केवल दिमाग में जमा हो जाए; शिक्षा वह है जो सोच बदल दे, दृष्टिकोण बदल दे और अंततः जीवन बदल दे। गुलाबी
तारा के जीवन के बारे में पढ़ते हुए मैंने महसूस किया कि सीखना केवल विद्यालय जाने और किताबें पढ़ने तक सीमित नहीं है। व्यक्ति अपने परिवार, वातावरण, परिस्थितियों और जीवन में मिलने वाले अनुभवों से भी बहुत कुछ सीखता है। तारा के जीवन में औपचारिक शिक्षा का अभाव था, लेकिन उसके आसपास के अनुभवों ने उसमें समझ, जिज्ञासा और सीखने की इच्छा विकसित की।
तारा के अनुभवों ने मुझे अपने जीवन और अपने शिक्षण अनुभवों की ओर देखने के लिए प्रेरित किया। एक शिक्षिका के रूप में मैंने भी महसूस किया है कि बच्चे केवल पाठ्यपुस्तक से नहीं सीखते। वे अपने घर, परिवार, मित्रों, खेल, गतिविधियों और आसपास के वातावरण से लगातार कुछ न कुछ सीखते रहते हैं।
मेरे अनुभव में कुछ बच्चे किताबों में जल्दी उत्तर नहीं दे पाते, लेकिन जब वही बात किसी गतिविधि, कहानी या उनके अपने जीवन के उदाहरण से समझाई जाती है, तो वे बहुत आसानी से उसे समझ लेते हैं। इससे यह समझ विकसित होती है कि बच्चे की क्षमता को केवल उसके लिखित उत्तर से नहीं आँकना चाहिए, बल्कि उसके अनुभव और सोच को भी समझना चाहिए।
यदि वास्तव में देखा जाए, तो परिस्थितियाँ हमेशा हमारे अनुकूल नहीं होतीं, लेकिन अनुभव हमें आगे बढ़ने की दिशा दे सकते हैं। इसलिए विद्यार्थियों को केवल सही उत्तर देने के लिए प्रेरित नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें प्रश्न पूछने, सोचने, अपने अनुभव साझा करने और स्वयं सीखने के अवसर देना चाहिए।
तारा के अनुभवों से यह सीख मिलती है कि जीवन स्वयं एक विद्यालय है और हर अनुभव एक शिक्षक। एक शिक्षक की जिम्मेदारी केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों के अनुभवों को पहचानकर उन्हें सीखने की शक्ति में बदलना भी है। यही मेरे लिए शिक्षा का वास्तविक अर्थ है।
तारा वेस्टओवर की किताब का यह अंश दो बेहद अलग महिलाओं—लेखिका की माँ और दाई—के चरित्र और उनके समाज में स्थान को खूबसूरती से दर्शाता है। पहली नज़र में यह दृश्य जड़ी-बूटियों के लेन-देन का लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी समाज में महिलाओं की आंतरिक असुरक्षा और ताकत के टकराव को दिखाता है।
एक तरफ दाई का किरदार है, जिसके पास कोई औपचारिक डिग्री या लाइसेंस नहीं है, फिर भी वह पूरे आत्मविश्वास से भरी है। उसके भारी शरीर, बेतरतीब बाल और बिना मेकअप वाले चेहरे से उसका समाज की परवाह न करने वाला बेबाकपन झलकता है। वह अपने ‘रसूख’ और हुनर के दम पर खुद को साबित करती है।
दूसरी तरफ लेखिका की माँ हैं, जो पारंपरिक रूप से सुंदर हैं, हर सुबह सजती-संवरती हैं, लेकिन भीतर से घबराहट और असुरक्षा से भरी हैं। वे दाई के सामने खुद को छोटा महसूस करती हैं और अनजाने में ही सही, हर बात के लिए माफी माँगती हैं। यह दिखाता है कि कैसे समाज महिलाओं को हमेशा ‘परफेक्ट’ और दूसरों को खुश रखने के साँचे में ढाल देता है।
अंश का अंत तारा के अकेलेपन को उजागर करता है, जो स्कूल न जाने के कारण अपनी जैसी सहेलियों के लिए तरसती है। यह पूरा प्रसंग शिक्षा, पहचान और आत्मविश्वास के बीच के जटिल रिश्ते को बहुत ही मार्मिक ढंग से बयाँ करता है।
Educated पुस्तक से मुझे यह सीख मिली कि शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ना और अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं है। सच्ची शिक्षा हमें प्रश्न करना, स्वयं सोचना और सही निर्णय लेना सिखाती है।
तारा के जीवन से यह समझ आता है कि कठिन परिस्थितियाँ भी हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। उसके संघर्ष और अनुभव ही उसकी पाठशाला बने।
एक शिक्षक के रूप में मैंने महसूस किया कि बच्चे किसी बात को केवल सुनकर जल्दी भूल सकते हैं, लेकिन जब वे स्वयं करके सीखते हैं, तो वह सीख लंबे समय तक याद रहती है। इसलिए मैं बच्चों को प्रश्न पूछने, उत्तर खोजने और अपने अनुभवों से सीखने के अवसर देने का प्रयास करता हूँ। अपने जीवन के अनुभव भी मैं बच्चों से साझा करता हूँ, ताकि उनमें आत्मविश्वास और मेहनत की भावना बढ़े।
Educated ने मुझे यह समझाया कि शिक्षक का काम केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों में सोचने और सीखने की क्षमता विकसित करना भी है। किताबें ज्ञान देती हैं, लेकिन अनुभव उस ज्ञान को जीवन से जोड़ता है।
इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी नए कार्य को सीखने के लिए आत्मविश्वास, धैर्य और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। तारा की माँ शुरू में दाई का कार्य करने को लेकर झिझक और घबराहट महसूस करती हैं, लेकिन धीरे-धीरे अनुभव प्राप्त करती हैं। इससे मुझे यह समझने की प्रेरणा मिलती है कि विद्यार्थियों को भी किसी नए कार्य या विषय को सीखते समय तुरंत परिणाम की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
एक शिक्षक के रूप में हमारा यह दायित्व है कि हम अपने विद्यार्थियों की झिझक और भय को समझकर उन्हें प्रोत्साहित करें तथा सीखने के लिए सुरक्षित और सहयोगपूर्ण वातावरण प्रदान करें। साथ ही, यह अध्याय हमें यह भी सिखाता है कि आत्मनिर्भरता अच्छी बात है, लेकिन आवश्यक ज्ञान और उचित मार्गदर्शन के महत्व को भी समझना चाहिए।
आज की कहानी में यह दिखाया गया कि एक बच्चा परिवार, समाज, हर जगह शिक्षा एवं ज्ञान प्राप्त करता है। जरूरी नहीं है कि वह विद्यालय में ही सब कुछ सीखे। एक बच्चे की कहानी है, जिसमें वह बच्ची पढ़ी-लिखी नहीं है, लेकिन वह अपने माता-पिता के बीच रहकर अपने माता-पिता से सब कुछ सीखती है कि कैसे उसके माता-पिता संघर्ष कर रहे हैं। इस कहानी में एक दाई से लेकर एक सिपाही तक की कहानी दिखाई गई है कि उसके सामने ही उसके माता-पिता एवं भाई पर जो संकट आता है, वह खुद उसको देखती है।
इस कहानी में व्यक्ति के जीवन के अलग-अलग कामों को दर्शाया गया है कि हर व्यक्ति का जीवन कितना संघर्षमय रहता है। हर व्यक्ति अपने जीवन में आए संघर्षों को झेलते हुए सभी समस्याओं को दूर करते हुए आगे बढ़ता है।
Thank you so much for inviting us to Dehradun and making our training such a meaningful and enriching experience. We truly appreciate that, despite not being well, you still managed to take the training for us and gave us your valuable time and guidance.
A special thanks to Neenu Ma’am as well for taking the time to come and meet us and for joining us for lunch—it was such a warm and thoughtful gesture. We are taking back many valuable learnings from this experience and will definitely carry them back to our school, share them with our colleagues, and pass them on to our students. We are truly grateful for your warmth, hospitality, and support, and hope to meet you all again soon. Thank you once again from Team VIDYA.
We would also like to sincerely thank Kunal Sir for coordinating everything so beautifully and for taking care of all the arrangements throughout the training.
Thank you🙏
Best Regards,
Team VIDYA India Priyanka, Neha & Mahima Yashik & Ekta
Check out what we take away from this wonderful experience!
To read and discuss Yuval Noah Harari’s “21 Lessons for the 21st Century.”
Key Takeaways
Nationalism lacks a global plan: Nationalism works for managing a single nation but offers no viable solution to global challenges like nuclear war, ecological collapse, and technological disruption.
Three global threats demand cooperation: Nuclear war, ecological collapse (e.g., climate change), and technological disruption (e.g., AI, bioengineering) are existential threats that transcend national borders and require unified global action.
Nationalism hinders progress: Nationalist self-interest and short-term thinking often block global solutions, as seen in the US solar panel tariff (2018) and climate change denial.
The next session is on Sunday, October 11, at 12:30 PM. It was rescheduled because of a conflicting event.
Topics
The Problem: Nationalism as a “Network of Fortresses”
Harari’s 2016 text describes a world where nations act as “friendly fortresses,” prioritising national identity over global cooperation.
This vision is flawed because:
Fortresses are rarely friendly: They foster competition and distrust.
Isolationism is economically unviable: It would collapse global trade, causing widespread inflation and food shortages.
Nationalist leaders engage in global trade out of necessity, not ideology, proving the world’s inherent interconnectedness.
The Solution: Global Cooperation for Three Existential Threats
Three challenges demand global cooperation, making nationalism an inadequate framework.
1. Nuclear Challenge
The threat of nuclear war has historically forced cooperation, preventing major conflicts since 1945.
This achievement is now taken for granted, leading to a new arms race and a return to dangerous nationalist power politics.
Key Insight: Nuclear weapons have fundamentally changed war; survival now depends on prioritising global prevention over national interests.
2. Ecological Challenge
Ecological collapse is a present reality, driven by human activities like industrial farming and fossil fuel use.
Example: Producing 1 kg of beef requires ~15,000 litres of water, compared to 287 litres for potatoes.
Climate change is the most urgent threat, with a 2°C global temperature rise projected within 20 years if emissions aren’t cut.
Nationalist responses are ineffective because:
Ecological sovereignty is an illusion: A nation can be submerged by rising seas even with zero emissions.
Impacts are uneven: Some nations (e.g., Russia) may benefit from climate change, creating conflicting interests.
Short-term thinking prevails: Nationalists often prioritise immediate economic gains over long-term environmental protection.
3. Technological Disruption
The merger of infotech and biotech creates existential risks like digital dictatorships and a “useless class.”
National borders are irrelevant to R&D; if one country pursues a high-risk tech path, others must follow to remain competitive.
Key Insight: Nationalism is ill-equipped to address these cosmic-scale changes (e.g., the rise of cyborgs), as it focuses on territorial conflicts instead of the future of life itself.
Good Schools Alliance & Learning Forward Retreat
The Good Schools Alliance fosters collaboration over competition through shared reading and reflection.
The Learning Forward Retreat uses a “digital detox” and a flip-chart exercise to promote deep, creative engagement with books.
Core Philosophy: Holistic development, a spirit of service (seva), and special projects that build long-term partnerships.
Next Steps
All Participants:
Vote in the WhatsApp poll to confirm attendance for the rescheduled session.
Submit written reflections to Manisha Khanna (Word format) with school name and a relevant image (e.g., a flip-chart page).
Sandeep Dutt:
Reschedule the next session to Sunday, October 11, at 12:30 PM.
“The Midwife” अध्याय ने मुझे बहुत कुछ सोचने और समझने का अवसर दिया। तारा की माँ ने अपने अनुभवों, निरंतर सीखने और आत्मविश्वास के माध्यम से एक ऐसा कार्य सीखा, जिसे शुरुआत में करना उनके लिए आसान नहीं था। इससे मुझे महसूस हुआ कि सीखने के लिए केवल किताबों और औपचारिक शिक्षा पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं है।
एक शिक्षिका के रूप में मैं मानती हूँ कि हर बच्चा अपने अनुभवों और अपनी गति से सीखता है। जब हम बच्चों को अवसर देते हैं, उन्हें ध्यान से सुनते हैं और उनकी छोटी-छोटी कोशिशों को महत्व देते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास विकसित होता है। इस अध्याय ने मुझे यह भी सिखाया कि शिक्षक को स्वयं भी हमेशा सीखते रहना चाहिए। कई बार बच्चों के प्रश्न, उनकी जिज्ञासा और उनके अनुभव हमें ऐसी बातें सिखाते हैं, जो किसी किताब में नहीं मिलतीं।
मेरे लिए इस अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण सीख है -सीखना एक निरंतर प्रक्रिया है और जीवन स्वयं हमारा सबसे बड़ा शिक्षक है। एक अच्छा शिक्षक केवल बच्चों को शिक्षित नहीं करता, बल्कि बच्चों के साथ-साथ स्वयं भी सीखता और विकसित होता रहता है। यही सीख शिक्षण को और अधिक संवेदनशील, धैर्यपूर्ण और अनुभव-आधारित बनाने के लिए प्रेरित करती है।
यह अंश पारिवारिक इतिहास, व्यक्तिगत बदलाव और स्मृतियों के धुंधलेपन की एक बेहद मार्मिक और जटिल तस्वीर प्रस्तुत करता है। लेखिका तारा वेस्टओवर जब अपनी माँ की शादी की पुरानी तस्वीर और अपने पिता के अतीत को देखती हैं, तो वह केवल एक कहानी नहीं बता रही हैं, बल्कि पहचान के उस गहरे अंतर को तलाश रही हैं, जो समय के साथ उनके परिवार में आया।
इस अंश से जुड़े कुछ मुख्य विचारणीय बिंदु इस प्रकार हैं:
1. दो अलग-अलग दुनिया का टकराव
अंश की शुरुआत में ही माँ के मायके (शहर की सुसंस्कृत और आधुनिक दुनिया) और पिता की दुनिया (पहाड़ की धार्मिक और रूढ़िवादी दुनिया) के बीच का गहरा तनाव साफ दिखाई देता है। लेखिका की मौसी ‘लिन’ का माँ को शहर की दुनिया (गैबार्डिन के कपड़े, क्रीम जूते) में बनाए रखने का प्रयास और पिता का हमेशा शहर के लोगों से रूखा व्यवहार यह दिखाता है कि यह शादी केवल दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों का टकराव थी।
लेखिका का यह वाक्य बेहद गहरा है: “माँ की शादी का मतलब हमारे परिवार का विघटन था... कोई एक ही उसे अपने पास रख सकता था।” यह दर्शाता है कि कैसे एक महिला को अपनी शादी के लिए अपनी पुरानी पहचान को पूरी तरह छोड़ना पड़ा।
2. समय और परिस्थितियों का क्रूर बदलाव
इस अंश का सबसे भावुक और गहरा हिस्सा वह है, जहाँ लेखिका अपने माता-पिता की शादी की एकमात्र तस्वीर का वर्णन करती हैं। तस्वीर में दिखने वाला युवक खुश, बेपरवाह और बड़ी-सी मुस्कान वाला है। लेकिन लेखिका के लिए इस सच को स्वीकार करना असंभव-सा है, क्योंकि उन्होंने जिस पिता को देखा है, वे हमेशा डरे हुए, चिंतित और दुनिया के अंत की तैयारी में खाना और बारूद जमा करने वाले व्यक्ति रहे हैं।
यह विरोधाभास हमें सोचने पर मजबूर करता है कि समय, मानसिक स्थिति और कट्टर धार्मिक विचारों ने एक हँसते-खेलते युवक को इतने शंकालु और गंभीर व्यक्ति में कैसे बदल दिया।
3. स्मृतियों की अविश्वसनीयता
तारा वेस्टओवर स्वीकार करती हैं कि पिता के अतीत के बारे में वह जो कुछ भी जानती हैं, वह केवल “टुकड़ों-टुकड़ों में मिली कहानियाँ” हैं। वह कहती हैं, “मैं उस व्यक्ति को नहीं जानती जिसे मेरी माँ जानती थीं।” यह पंक्ति यह दर्शाती है कि बच्चे अक्सर अपने माता-पिता के उस रूप से कभी नहीं मिल पाते, जो वे शादी या बच्चों के जन्म से पहले थे।
हमारे माता-पिता का एक अतीत ऐसा भी था, जहाँ वे आज से बिल्कुल अलग और आज़ाद थे, जो बच्चों की पहुँच से परे होता है।
4. बदलाव के शुरुआती संकेत
अंश के अंत में लेखिका पिता के व्यवहार में आए शुरुआती बदलावों को टटोलने की कोशिश करती हैं। वह सवाल उठाती हैं कि क्या अस्पताल के बजाय घर पर दाई से डिलीवरी कराने की ज़िद सिर्फ एक “सनक” थी या फिर समाज और व्यवस्था से अलग होने की उनकी सनक की शुरुआत? यह दिखाता है कि कैसे धीरे-धीरे उनका परिवार आधुनिक दुनिया और चिकित्सा सुविधाओं से कटकर पूरी तरह पिता के कड़े नियमों के अधीन होता चला गया।
निष्कर्ष
यह अंश हमें यह सिखाता है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से कट्टर या अलग-थलग नहीं होता; परिस्थितियाँ और विचार इंसान को धीरे-धीरे बदलते हैं। यह इस बात का भी एक सुंदर उदाहरण है कि कैसे पुरानी तस्वीरें हमें इतिहास के उस सच से रूबरू कराती हैं, जो आज के वर्तमान से बिल्कुल अलग हो चुका है। तारा का यह लेखन पारिवारिक रिश्तों की गहराई और उनकी कड़वी सच्चाइयों को बहुत ही ईमानदारी से सामने लाता है।
आज के सत्र ने हमें बहुत प्रभावित किया। हमने यह सीखा कि हम अपने परिवार और आसपास के लोगों को हमेशा पूरी तरह से समझ नहीं पाते। बचपन में हमें जो बातें सामान्य लगती हैं, बड़े होने पर उनका अर्थ अलग दिखाई दे सकता है।
इस पाठ की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह रही कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें धैर्य, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच बनाए रखनी चाहिए। जीवन में सफलता प्राप्त करने के साथ-साथ अपने रिश्तों, संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं को सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है।
यह पाठ केवल अतीत की स्मृतियों का वर्णन नहीं करता, बल्कि हमें वर्तमान जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा भी देता है। इसने मुझे पारिवारिक संबंधों के प्रति अधिक संवेदनशील बनने, अपने बड़े-बुजुर्गों के संघर्षों का सम्मान करने तथा जीवन में प्रेम, सहयोग, सादगी और दृढ़ संकल्प जैसे मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
मुझे यह भी समझ आया कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद इंसान आगे बढ़ सकता है। तारा के जीवन में परिवार, परंपराएँ और कठिनाइयाँ बहुत प्रभावशाली थीं, लेकिन शिक्षा ने उसे अपने विचार स्वयं बनाने और दुनिया को अलग नजरिए से देखने का अवसर दिया। किसी व्यक्ति के व्यवहार को समझने के लिए उसके अनुभवों और परिस्थितियों को समझना जरूरी है। साथ ही, परिवार का महत्व, अपनी पहचान को समझना और शिक्षा के माध्यम से अपने विचार विकसित करना बहुत महत्वपूर्ण है।
तारा का जीवन बड़ी मुश्किलों और कठिनाइयों के साथ बीता। वातावरण अनुकूल नहीं था, फिर भी उन्होंने बड़े हिम्मत और साहस के साथ उन परिस्थितियों का सामना किया, आगे बढ़ीं और अपना लक्ष्य हासिल किया। उनके इस संघर्षपूर्ण जीवन ने हमें अत्यंत प्रभावित किया और यह सीख दी कि हिम्मत, साहस और मेहनत के जरिए व्यक्ति बहुत कुछ हासिल कर सकता है। परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों, शिक्षा केवल किताबों का ज्ञान नहीं देती, बल्कि हमें अपने जीवन, परिवार और दुनिया को एक नए नजरिए से समझने की क्षमता भी देती है।
इन दोनों अध्यायों को पढ़कर मुझे लगा कि शिक्षा केवल किताबों और स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती, बल्कि जीवन के अनुभव भी हमें बहुत कुछ सिखाते हैं। “The Midwife” में तारा अपनी माँ के जीवन में आए बदलाव को देखती है। शुरुआत में माँ संकोच और डर में रहती हैं, लेकिन धीरे-धीरे जिम्मेदारी निभाते हुए उनमें आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।
वहीं, “Cream Shoes” में तारा अपनी माँ के बचपन और उनके परिवार की सोच को समझने की कोशिश करती है। माँ ने एक ओर सामाजिक अपेक्षाओं से भरी परवरिश देखी और दूसरी ओर उससे बिल्कुल अलग जीवन चुना। इससे मुझे यह सीख मिली कि हर व्यक्ति के वर्तमान व्यवहार के पीछे उसका अतीत, उसके अनुभव और उसकी परिस्थितियाँ होती हैं।
एक शिक्षक के रूप में, इन अध्यायों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि हर बच्चे को केवल उसके व्यवहार से नहीं, बल्कि उसकी पूरी कहानी और परिस्थितियों को समझकर देखना चाहिए। जिस तरह तारा ने समय के साथ अपनी माँ और परिवार को नए दृष्टिकोण से समझा, उसी तरह हमें भी बच्चों को समझने के लिए केवल उनकी गलतियाँ नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी भावनाओं और अनुभवों को देखना चाहिए।
मेरे लिए इन अध्यायों की सबसे बड़ी सीख यह है—किसी व्यक्ति को समझने से पहले उसकी कहानी समझना जरूरी है।
आज के सत्र में “Childhood Memories and Father’s Warning” तथा “The Midwife” जैसे भावपूर्ण अंशों को सुनने और समझने का अवसर मिला। इन अंशों के माध्यम से बचपन की यादों, परिवार के साथ बिताए पलों, माता-पिता के स्नेह और जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों को समझने का अवसर मिला। कहानी में पिता की चेतावनी और उनके अनुभवों से यह महसूस हुआ कि माता-पिता द्वारा दी गई सीख के पीछे हमेशा बच्चों की सुरक्षा और भलाई की भावना होती है।
“The Midwife” के प्रसंग ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया। इसमें कठिन परिस्थिति के बीच एक माँ और उसके परिवार की भावनाओं तथा एक मिडवाइफ की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता को दर्शाया गया है। इससे यह सीख मिली कि विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय धैर्य, समझदारी और जिम्मेदारी के साथ कार्य करना चाहिए।
इस सत्र से मुझे यह भी समझ आया कि बचपन की घटनाएँ हमारे व्यक्तित्व और सोच पर गहरा प्रभाव डालती हैं। परिवार से मिले संस्कार, माता-पिता की सीख और जीवन के अनुभव हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। एक शिक्षक के रूप में मुझे यह सीख मिली कि बच्चों की भावनाओं और उनके पारिवारिक अनुभवों को समझना भी उतना ही आवश्यक है, जितना उन्हें केवल पाठ पढ़ाना।
कुल मिलाकर, यह सत्र मेरे लिए भावनात्मक और सीख से भरपूर रहा। इससे मुझे परिवार के महत्व, संवेदनशीलता, धैर्य और जिम्मेदारी का महत्व समझने का अवसर मिला।
कहा जाता है—“बच्चा वही नहीं बनता जो हम उसे सिखाते हैं, बल्कि वह भी बनता है जो वह अपने आसपास देखता है।”
"Educated" के इस अध्याय ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि परिवार बच्चे के जीवन की पहली पाठशाला है। परिवार का वातावरण उसके विचारों, व्यवहार और सपनों पर गहरी छाप छोड़ता है। लेकिन जब परिवार की परिस्थितियाँ कठिन हों, तब शिक्षा उस बच्चे के जीवन में उम्मीद की एक किरण बन सकती है।
एक बच्चा प्रतिदिन विद्यालय आता था, लेकिन हमेशा शांत रहता था। गृहकार्य अधूरा रहता, कक्षा में ध्यान नहीं देता और छोटी-सी बात पर चिड़चिड़ा हो जाता। कुछ लोगों ने उसे “लापरवाह बच्चा” मान लिया। एक दिन उसे डाँटने के बजाय उसके पास बैठकर मैंने केवल इतना पूछा—“तुम आज इतने चुप क्यों हो?”
बच्चे ने धीरे से कहा, “मैम, घर में रोज झगड़ा होता है। मैं रात को ठीक से सो नहीं पाता, इसलिए पढ़ाई में मन नहीं लगता।”
उसकी समस्या का समाधान अपने हाथ में लेने का दावा मैंने नहीं किया। मैं बस उसे सुनने लगी, उसकी छोटी-छोटी सफलताओं की सराहना की और उसे यह विश्वास दिलाया कि “तुम्हारी परिस्थितियाँ तुम्हारी पहचान नहीं हैं।”
कुछ समय बाद वही बच्चा कक्षा की गतिविधियों में भाग लेने लगा। उसके अंकों से भी अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह था कि अब वह अपने भविष्य के बारे में बात करने लगा था।
इस अनुभव से मुझे समझ आया कि हर कमजोर दिखाई देने वाला बच्चा कमजोर नहीं होता। कभी-कभी वह परिस्थितियों से संघर्ष करता है। ऐसे समय में शिक्षक का एक संवेदनशील व्यवहार बच्चे के भीतर छिपी संभावनाओं को बाहर ला सकता है। ऐसा मेरा स्वयं का अनुभव है।
परिवार की छाया चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो, शिक्षा की रोशनी बच्चे को अपना रास्ता खोजने का साहस दे सकती है। इसलिए शिक्षक का कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना ही नहीं है, बल्कि बच्चों के भीतर विश्वास जगाना भी है, जिससे जीवन में आगे बढ़ने की संभावना हमेशा बनी रहे।
इससे सबसे बड़ी सीख मुझे यह मिलती है कि हम हर बच्चे की परिस्थितियाँ नहीं बदल सकते, मगर अपने व्यवहार से उसके भविष्य की दिशा जरूर बदल सकते हैं।
इस अध्याय “The Midwife” को पढ़ते हुए मुझे यह महसूस हुआ कि शिक्षा केवल किताबों और स्कूलों से मिलने वाली जानकारी का नाम नहीं है, बल्कि हमारे आसपास का वातावरण और हमारी परिस्थितियाँ हमें वह शिक्षा दे जाती हैं, जो हमें किताबों या स्कूल में नहीं मिलती। जीवन के अनुभवों से सीखना और सही समय पर सही निर्णय लेने की समझ भी शिक्षा का ही हिस्सा है। तारा का बचपन ऐसे वातावरण में बीत रहा था, जहाँ परिवार अपने विश्वासों और अनुभवों को डॉक्टरों तथा आधुनिक चिकित्सा से अधिक महत्व देता था। माँ का बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के बच्चों की डिलीवरी में सहायता करना और तारा का छोटी उम्र में इन परिस्थितियों को देखना मेरे लिए बहुत सोचने वाली बात है।
इस अध्याय में तारा का डर, जिज्ञासा और धीरे-धीरे जिम्मेदारी को समझना मुझे बहुत प्रभावित करते हैं। खासकर जब कठिन परिस्थितियों में भी वह अपनी माँ के साथ बनी रहती है, तब लगता है कि बचपन के अनुभव व्यक्ति के मन और सोच पर कितना गहरा प्रभाव डालते हैं।
एक शिक्षक के रूप में मुझे यह अध्याय यह सोचने पर मजबूर करता है कि हर बच्चे की सीखने की यात्रा अलग होती है। बच्चों को केवल यह नहीं सिखाना चाहिए कि क्या सही है, बल्कि उन्हें प्रश्न पूछने, परिस्थितियों को समझने और अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता भी देनी चाहिए। तारा के जीवन में शिक्षा धीरे-धीरे उसके लिए अपने अनुभवों को नए दृष्टिकोण से देखने का माध्यम बनती है।
परंपराओं और विश्वासों का सम्मान करते हुए भी तर्क, ज्ञान और सही जानकारी के लिए अपने मन को खुला रखना जरूरी है, इसलिए सीखना कभी बंद नहीं करना चाहिए। हमें कभी भी, कहीं भी निरंतर सीखने का प्रयास करते रहना चाहिए और अपने कौशल का विकास करते रहना चाहिए। अपने जीवन के अनुभव से मैं यह महसूस करती हूँ कि जब हम किसी काम को स्वयं करते हैं, तो उसे अच्छी तरह समझ पाते हैं। उदाहरण के लिए, जब मैं बच्चों को पढ़ाते हुए केवल उन्हें समझाने के बजाय किसी गतिविधि में उन्हें स्वयं करके दिखाती हूँ, तब बच्चों ने उस बात को अधिक आसानी से और रुचि के साथ सीखा। इससे मुझे समझ में आया कि स्वयं करके सीखना बच्चों के लिए अधिक यादगार और अनुभवात्मक बन जाता है।
आज के सेशन से मैंने यह सीखा कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि हर काम अपने आप में महत्वपूर्ण और आवश्यक होता है। मेरे विचार से जीवन में किसी काम का छोटा या बड़ा होना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह अधिक महत्वपूर्ण है कि वह काम सही है या गलत।
हर व्यक्ति अपने जीवन में अलग-अलग प्रकार के कार्य करता है। कोई काम देखने में छोटा हो सकता है, लेकिन यदि उसे ईमानदारी और जिम्मेदारी से किया जाए, तो उसका महत्व बहुत बढ़ जाता है।
कई बार हम किसी काम को छोटा समझकर उसे करने में संकोच करते हैं या आसान रास्ता अपनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि हमें काम के स्तर को नहीं, बल्कि उसके प्रति अपनी ईमानदारी को महत्व देना चाहिए। यदि हम सही रास्ते पर चलते हुए मेहनत और सच्चाई से अपना काम करते हैं, तो हमें आत्मसंतुष्टि मिलती है और दूसरों का विश्वास भी हम पर बढ़ता है।
इससे मुझे यह सीख मिली कि परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, हमें गलत तरीके से सफलता प्राप्त करने के बजाय सही काम करने का प्रयास करना चाहिए। ईमानदारी और सही रास्ते पर चलना कभी-कभी कठिन जरूर लग सकता है, लेकिन यही आदत हमारे व्यक्तित्व को मजबूत बनाती है।
इसलिए हमें हर काम को सम्मान देते हुए पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ करना चाहिए।
आज की कक्षा में काम के महत्व पर चर्चा की गई। इसमें बताया गया कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता; यह केवल हमारी सोच और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। जो व्यक्ति यह कहता है कि कोई काम छोटा है और वह उसे नहीं करेगा, वास्तव में वह उस काम के महत्व को नहीं समझता। दुनिया उस व्यक्ति को सम्मान देती है, जो छोटे से छोटे काम को भी पूरी ईमानदारी और लगन से करता है, क्योंकि हर बड़ी सफलता की शुरुआत छोटे-छोटे प्रयासों से ही होती है।
उदाहरण के लिए, यदि आज कोई बच्चा पहाड़ा बोलने में शर्म महसूस करता है, तो संभव है कि वह गणित में अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन न कर पाए। इसी प्रकार, किसी दुकान पर झाड़ू लगाने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत, लगन और अनुभव के बल पर भविष्य में उसी दुकान का मालिक भी बन सकता है।
आज की कक्षा से मुझे यह सीख मिली कि हमें दूसरों की बातों में आकर अपने काम से पीछे नहीं हटना चाहिए। हमें काम को छोटा-बड़ा या अच्छा-बुरा समझने में उलझने के बजाय उसे पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी से करना चाहिए, क्योंकि काम व्यक्ति को सम्मान दिलाता है, उससे सम्मान छीनता नहीं है।
Educated के दूसरे अध्याय को पढ़ते हुए मुझे यह महसूस हुआ कि सीखना केवल किताबों या विद्यालय तक सीमित नहीं होता। जीवन में मिलने वाले अनुभव भी हमें बहुत कुछ सिखाते हैं। तारा की माँ ने अपने अनुभवों के माध्यम से एक नई जिम्मेदारी को समझा और धीरे-धीरे उसमें आत्मविश्वास विकसित किया। इस बात ने मुझे अपने शिक्षक जीवन के अनुभवों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया।
एक शिक्षिका के रूप में मैंने महसूस किया है कि जब मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था, तब मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि प्रत्येक बच्चा अलग-अलग तरीके से सीखता है। कुछ बच्चे जल्दी समझ जाते हैं, कुछ को बार-बार समझाना पड़ता है और कुछ बच्चे बोलने या अपनी बात रखने में झिझकते हैं। पहले मैं कभी-कभी सोचती थी कि सभी बच्चों को एक ही तरीके से समझाया जाए, लेकिन धीरे-धीरे अपने अनुभवों से मैंने सीखा कि हर बच्चे तक पहुँचने का तरीका अलग हो सकता है।
मैंने बच्चों को केवल पढ़ाना ही नहीं, बल्कि उन्हें ध्यान से देखना और समझना भी शुरू किया। मैंने उनकी छोटी-छोटी प्रगति को पहचानना सीखा। किसी बच्चे का पहली बार कक्षा में उत्तर देना, किसी गतिविधि में उत्साह से भाग लेना या पहले से बेहतर प्रदर्शन करना मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि बन गया।
इस अनुभव से मैंने महसूस किया कि एक शिक्षक भी हर दिन सीखता है। बच्चों को समझने की प्रक्रिया ने मेरे अंदर धैर्य बढ़ाया और मुझे अपनी शिक्षण-पद्धति में बदलाव करने का साहस दिया। पहले जहाँ मैं किसी कठिन परिस्थिति को समस्या मानती थी, वहीं अब उसे सीखने और स्वयं को बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखने लगी हूँ।
इस अध्याय ने मुझे यह समझाया कि आत्मविश्वास एक दिन में नहीं आता। वह छोटे-छोटे अनुभवों, गलतियों, प्रयासों और उनसे मिलने वाली सीख से विकसित होता है।
इस पाठ से मुझे यह सीख मिलती है कि आत्मनिर्भरता, साहस, जिम्मेदारी और दृढ़ निश्चय जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। माँ ने अपने परिवार की जरूरतों को समझते हुए स्वयं निर्णय लिए और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास किया। उन्होंने एक मिडवाइफ के रूप में अपने काम को बेहतर करने के लिए नई चीजें सीखीं और आवश्यक साधन जुटाए।
इससे मुझे प्रेरणा मिलती है कि हमें समस्याओं से घबराने के बजाय उनका समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए। यदि हमारे अंदर सीखने की इच्छा, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प हो, तो हम कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
Educated के "Midwife" अध्याय को पढ़ते हुए मुझे तारा की कहानी केवल एक परिवार की कहानी नहीं लगी, बल्कि यह समझने का अवसर मिला कि ज्ञान और आत्मनिर्भरता किस तरह किसी व्यक्ति की पूरी पहचान बदल सकते हैं। तारा की माँ का मिडवाइफ के रूप में काम करना उनके लिए केवल रोजगार का साधन नहीं था। यह वह रास्ता था, जिसके माध्यम से उन्होंने अपने भीतर के आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और स्वतंत्र पहचान को पहचाना।
तारा के जीवन में परिवार की सोच, समाज की मान्यताएँ और सरकारी व्यवस्था के प्रति अविश्वास एक अलग तरह का संघर्ष पैदा करते हैं। ऐसे वातावरण में अपनी पहचान बनाना आसान नहीं था। फिर भी, माँ का अपने काम और अनुभव पर भरोसा रखना यह दिखाता है कि कभी-कभी हमारा हुनर ही हमें वह आवाज़ देता है, जिसे परिस्थितियाँ दबाने की कोशिश करती हैं।
इस अध्याय से मुझे एक शिक्षक के रूप में सबसे बड़ी सीख यह मिली कि हर बच्चे की कहानी उसके घर और परिस्थितियों से शुरू होती है, लेकिन उसकी मंजिल वहीं तय नहीं होनी चाहिए। हमें बच्चों को केवल किताबों का ज्ञान नहीं देना चाहिए, बल्कि उन्हें प्रश्न पूछने, अपनी पहचान समझने और अपने अनुभवों से सीखने के अवसर भी देने चाहिए।
तारा की कहानी मुझे यह सोचने पर मजबूर करती है कि शिक्षा का असली अर्थ केवल "जानना" नहीं, बल्कि अपने जीवन को समझने और अपनी राह चुनने का साहस प्राप्त करना है।
आज के सेशन का मूल भाव शिक्षा, आत्मनिर्भरता, पहचान और अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता से जुड़ा था।
शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि अपनी पहचान स्वयं बनाने का साहस है। Educated की चर्चा ने मेरे मन में एक बहुत गहरी बात छोड़ी। शिक्षा हमें केवल यह नहीं सिखाती कि दुनिया कैसी है, बल्कि यह साहस भी देती है कि हम अपने लिए दुनिया को नए दृष्टिकोण से देख सकें।
तारा वेस्टओवर के जीवन में शिक्षा एक ऐसी खिड़की बनकर आती है, जिससे वह अपने सीमित अनुभवों से बाहर की दुनिया को देख पाती है। जिस परिवार में सरकारी व्यवस्था और बाहरी दुनिया के प्रति अविश्वास था, वहाँ शिक्षा के माध्यम से उसके सामने नए प्रश्न, नए विचार और अपनी पहचान को समझने की नई संभावनाएँ खुलती हैं।
उनकी माँ का मिडवाइफ के रूप में आत्मनिर्भर बनना भी मुझे बहुत प्रेरित करता है। एक ऐसा काम सीखकर उन्होंने न केवल दूसरों की सहायता की, बल्कि अपने भीतर आत्मविश्वास और स्वतंत्रता भी विकसित की। इससे मुझे महसूस हुआ कि किसी व्यक्ति को सशक्त बनाने के लिए हमेशा बड़ी-बड़ी सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती; सही ज्ञान और उस ज्ञान को उपयोग में लाने का अवसर भी जीवन बदल सकता है।
मुझे एक ऐसे विद्यार्थी की याद आती है, जो पढ़ाई में बहुत पीछे रहता था। वह अक्सर कहता था, "मैम, मुझसे नहीं होगा।" उसके लिए किताब खोलना भी एक चुनौती थी। हमने उसके सामने केवल अच्छे अंक लाने का लक्ष्य नहीं रखा, बल्कि उसे छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ दीं, जैसे कक्षा की पुस्तकें व्यवस्थित करना, कहानी पढ़कर दो वाक्य सुनाना और किसी साथी की मदद करना।
कुछ समय बाद वही बच्चा दूसरों को कहानी सुनाने लगा। उसके अंक शायद तुरंत बहुत अधिक नहीं बदले, लेकिन उसके शब्द ज़रूर बदल गए। अब वह कहता था, "मैम, मैं कोशिश करूँगा।" यही शिक्षा की असली परिवर्तनकारी शक्ति है, जब "मुझसे नहीं होगा" बदलकर "मैं कोशिश करूँगा" बन जाता है।
एक शिक्षक के रूप में इस चर्चा ने हमें यह सोचने पर मजबूर किया कि हमारा कार्य केवल पाठ्यपुस्तक पूरी करना नहीं है। हमें बच्चों को प्रश्न पूछने, स्वयं सोचने, अपनी क्षमता पहचानने और जीवन में सही निर्णय लेने का साहस भी देना चाहिए। कभी-कभी एक शिक्षक की कही हुई छोटी-सी बात किसी बच्चे के जीवन में वही भूमिका निभा सकती है, जो तारा के जीवन में शिक्षा ने निभाई—एक बंद दुनिया में खुलती हुई खिड़की की तरह। इस प्रकार, आज के सेशन से हमने यह सीखा कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और स्वतंत्र पहचान विकसित करने का साधन भी है।
"शिक्षा वह प्रकाश नहीं, जो केवल रास्ता दिखाता है; शिक्षा वह साहस है, जिससे इंसान अपना रास्ता चुनना सीखता है।"
Educated के इस रीडिंग सेशन ने मुझे केवल किताब के पात्रों और घटनाओं के बारे में सोचने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपने जीवन में शिक्षा, पहचान और स्वतंत्रता के अर्थ पर भी पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया। चर्चा के दौरान मुझे महसूस हुआ कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ केवल डिग्री या जानकारी प्राप्त करना नहीं है। कई बार शिक्षा हमें उन बातों पर प्रश्न करना सिखाती है, जिन्हें हम बचपन से बिना प्रश्न किए सच मानते आए हैं।
सर्वाइवलिस्ट परवरिश और आत्मनिर्भरता की चर्चा ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि जब किसी व्यक्ति को बाहरी दुनिया और संस्थाओं पर भरोसा करना नहीं सिखाया जाता, तो उसकी सोच और निर्णय लेने की क्षमता किस तरह प्रभावित हो सकती है। इसके बावजूद, अपने लिए एक अलग रास्ता बनाना आसान नहीं होता। मुझे तारा की माँ का अपने पेशे के माध्यम से स्वतंत्रता हासिल करना इसलिए महत्वपूर्ण लगा, क्योंकि उन्होंने केवल काम नहीं चुना, बल्कि उस काम के माध्यम से अपनी एक अलग पहचान भी बनाई।
मिडवाइफरी की चर्चा से मुझे यह भी महसूस हुआ कि किसी व्यक्ति का पेशा केवल उसकी आजीविका का साधन नहीं होता, बल्कि वह समाज में उसके योगदान और उसकी पहचान का माध्यम भी बन सकता है। दूसरों की मदद करने की क्षमता व्यक्ति को भीतर से आत्मविश्वास और अपने अस्तित्व का अर्थ प्रदान कर सकती है।
पहचान और दस्तावेजीकरण पर हुई चर्चा मेरे लिए विशेष रूप से विचारणीय रही। मैंने महसूस किया कि कागजों पर दर्ज पहचान और व्यक्ति की वास्तविक पहचान हमेशा एक जैसी नहीं होती। समाज जिस पहचान को मान्यता देता है और व्यक्ति अपने भीतर जिस पहचान को महसूस करता है, उनके बीच कभी-कभी बहुत गहरी दूरी हो सकती है। इसी तरह, सामाजिक सम्मान और निजी विद्रोह के बीच का अंतर भी मुझे महत्वपूर्ण लगा। हर विरोध दिखाई देने वाला या आक्रामक नहीं होता; कभी-कभी अपने लिए एक अलग जीवन चुनना ही सबसे बड़ा प्रतिरोध होता है।
इस चर्चा के बाद मेरे लिए आत्मनिर्भरता का अर्थ भी थोड़ा बदल गया है। अब मैं इसे केवल आर्थिक स्वतंत्रता के रूप में नहीं देखती, बल्कि अपने अनुभवों को समझने, सवाल पूछने, अपनी पहचान स्वीकार करने और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लेने की क्षमता के रूप में भी देखती हूँ।
Educated ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि शिक्षा तब सबसे अधिक अर्थपूर्ण होती है, जब वह हमें अपने जीवन को अपनी दृष्टि से देखने और अपने निर्णय स्वयं लेने का साहस देती है।
आज की कक्षा ने मुझे एक ऐसी सरल, लेकिन गहरी सीख दी कि जीवन में कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता; हमारी सोच ही उसे छोटा या बड़ा बनाती है। अक्सर हम काम को उसके स्वरूप, पद या उससे मिलने वाले सम्मान के आधार पर देखते हैं, जबकि वास्तविक सम्मान उस काम को करने वाले व्यक्ति की नीयत, मेहनत और ईमानदारी से मिलता है।
एक शिक्षक के रूप में मैंने महसूस किया कि यह बात बच्चों को केवल समझाने से ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से भी सिखानी चाहिए। यदि कोई बच्चा पहाड़ा बोलने में झिझकता है या गलती होने के डर से प्रयास नहीं करता, तो हमें उसके छोटे-छोटे प्रयासों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए, क्योंकि आज का छोटा प्रयास ही कल के आत्मविश्वास और सफलता की नींव बन सकता है।
कक्षा में दिया गया यह उदाहरण भी बहुत प्रभावशाली लगा कि कोई व्यक्ति आज किसी दुकान में सफाई का काम कर रहा हो, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी मंजिल वहीं तक सीमित है। मेहनत, सीखने की इच्छा और निरंतर प्रयास उसे भविष्य में उसी दुकान का मालिक भी बना सकते हैं। व्यक्ति का वर्तमान काम उसकी अंतिम पहचान नहीं होता।
आज मैंने यह भी महसूस किया कि हमें दूसरों की बातों से प्रभावित होकर किसी काम को छोटा नहीं समझना चाहिए। हर काम अपने साथ एक अनुभव, एक सीख और आगे बढ़ने का अवसर लेकर आता है। इसलिए हमें काम को छोटा-बड़ा या ऊँचा-नीचा समझने के बजाय उसे जिम्मेदारी और सम्मान के साथ करना चाहिए।
इस चिंतन ने मुझे अपने शिक्षक जीवन के बारे में भी सोचने का अवसर दिया। बच्चों को केवल विषय का ज्ञान देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके अंदर मेहनत, आत्मसम्मान, जिम्मेदारी और हर कार्य के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
अंततः, आज की कक्षा से मेरी सबसे बड़ी सीख यही है कि काम कभी इंसान को छोटा नहीं करता; काम के प्रति हमारी सोच और हमारा व्यवहार ही हमारे व्यक्तित्व को बड़ा बनाते हैं। इसलिए चाहे कोई कार्य कितना भी छोटा क्यों न दिखाई दे, यदि उसे ईमानदारी और पूरी लगन से किया जाए, तो वही कार्य व्यक्ति के जीवन में बड़ी सफलता का रास्ता खोल सकता है।
इस पाठ को पढ़ने से मुझे यह समझने का अवसर मिला कि हमारे जीवन में जन्म प्रमाणपत्र जैसे आवश्यक दस्तावेज़ों का कितना महत्व है। कहानी में माँ अपने बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए बहुत प्रयास करती है। उन्हें पुराने दस्तावेज़ नहीं मिलते और कई बच्चों की जन्मतिथि को लेकर भी असमंजस है। इसके बावजूद वे हार नहीं मानतीं और चर्च के कार्यालय से आवश्यक प्रमाणपत्रों की प्रतियाँ प्राप्त करती हैं।
इस पाठ से मुझे दृढ़ निश्चय, जिम्मेदारी और समस्या का समाधान खोजने की भावना सीखने को मिली। यह भी समझ आया कि किसी भी कार्य को पूरा करने में कभी-कभी कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन धैर्य और निरंतर प्रयास से उनका समाधान निकाला जा सकता है। साथ ही, पाठ यह सोचने पर मजबूर करता है कि बच्चों की पहचान और भविष्य के लिए आवश्यक दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखना कितना जरूरी है।
मेरी सीख: कठिन परिस्थितियों में भी हमें घबराने के बजाय धैर्यपूर्वक प्रयास करते रहना चाहिए और अपने तथा अपने परिवार के आवश्यक दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखना चाहिए।
“The prospect of going to DPS Abu Road for the Literacy Project on behalf of GSA had somehow excited me from day one. I understood why when I finally arrived on campus. It is hard to believe that a school that has existed for barely three years can execute an event with such precision.
Unlike the Literacy Project events in other schools, this one spanned two days: 22 & 23 September’26. On the first day, the sessions were introductory reading sessions to give students and staff a clear idea of what GSA stands for. With the students, I led a reading session on “The School Bell” from My Good School. The enthusiastic participation of the students and their attempts at reflection on the school bell were genuinely rewarding.
The teachers joined a discussion on the value of reading, and we introduced them to a sample of Educated by Dr Tara Westover from The Teachers Academy. They understood the significance of writing a reflection and maintaining a journal.
The Literacy Project was then held on the 23rd at two different venues, simultaneously. We saw teamwork and coordination between staff and students come alive. The inauguration, showcasing the students’ talents in the performing arts, went off without a hitch.
Mr Abhishek Gupta from FSSAI ignited young minds about food safety and the need to stay alert as consumers. Questions from students in classes V and VI showed their understanding of the topic.
Mr Vivek Shringli, from AMFI India, spoke to a mixed audience of students and teachers about the dire need to understand finances and the importance of starting to save at a young age. As expected, the teachers received this session well, as they had an opportunity to learn more about mutual funds and clarify other related doubts.
At the end, the session for all educators led them through the GSA journey and highlighted our endeavour to change students’ and teachers’ lives through reading. I read excerpts from My Good School by Sandeep Dutt. Reflecting, attendees shared their excitement and their idea of the difference between reflecting and making notes. The enthusiastic response makes me optimistic that we have influenced educators’ minds. Kudos to the Principal, Mr Rajan Sethi, and his team at DPS, and to Kunal Rajpurohit, for all the support and hard work put into making this sixth edition of the Literacy Project for Educators a grand success!”
Principal Mr Rajan Sethi received the Proud Member Plaque from Ms Brinda Ghosh.