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Saturday, July 25, 2026

मुस्कान, संवेदनशीलता और संतुलित शिक्षण की प्रेरक सीख - सनबीम ग्रामीण स्कूल

मुस्कान की शक्ति

हँसना कितना ज़रूरी है, इस पर सब कुछ निर्भर नहीं है, लेकिन इस अध्याय से यह सीखने को मिला कि एक सच्ची मुस्कान केवल चेहरे की सुंदरता नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत होती है। रोमा ने हर परिस्थिति में धैर्य, विनम्रता और सकारात्मक व्यवहार बनाए रखा। रात की कठिन ड्यूटी और थकान के बावजूद उसने अपने कर्तव्य का पालन पूरी ईमानदारी और सम्मान के साथ किया।

एक शिक्षक के रूप में यह कहानी हमें प्रेरित करती है कि हमारी मुस्कान, मधुर वाणी और सकारात्मक व्यवहार विद्यार्थियों के मन में विश्वास और अपनापन पैदा करते हैं। पढ़ाई केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि हमारे व्यवहार और संस्कार भी बच्चों के जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

इस अध्याय ने मुझे यह महसूस कराया कि सफलता केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि अच्छे व्यवहार, धैर्य, सहानुभूति और सेवा-भाव से भी प्राप्त होती है। यदि हम हर व्यक्ति के साथ सम्मानपूर्वक और मुस्कुराकर बात करें, तो कठिन परिस्थितियाँ भी सरल बन सकती हैं। यही गुण एक श्रेष्ठ शिक्षक और एक अच्छे इंसान की पहचान है।

सुनीता त्रिपाठी

SMILES vs FROWNS

"एक मुस्कान वहाँ रोशनी कर देती है, जहाँ हजारों शब्द भी असर नहीं कर पाते।"

जीवन में हर व्यक्ति कठिनाइयों से गुजरता है। कुछ लोग उन कठिनाइयों के बीच भी मुस्कुराना चुनते हैं, जबकि कुछ छोटी-छोटी बातों पर उदास होकर अपना और दूसरों का दिन भी भारी बना देते हैं। मुस्कान केवल चेहरे की सुंदरता नहीं, बल्कि मन की शक्ति और सकारात्मक सोच का परिचय है।

जब हम किसी को सच्चे मन से मुस्कुराकर देखते हैं, तो वह मुस्कान सामने वाले के दिल तक पहुँचती है। यह बिना कुछ कहे अपनापन, विश्वास और प्रेम का संदेश देती है।

ऐसा हमने कई बार अपनी कक्षा में महसूस किया है। जब बच्चों को कोई भी टॉपिक अच्छे से समझ में आता है, तो वे प्रश्नों का उत्तर खुशी से देते हैं। वहीं दूसरी तरफ, जब कोई ऐसा टॉपिक आ जाता है, जिसे बच्चों को समझने में कठिनाई होती है, तो वे उत्तर देने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। नाम लेकर बुलाने पर भी वे उत्तर नहीं देते और स्वयं को दुखी महसूस करने लगते हैं।

उस समय बच्चों के उदास चेहरे देखकर हम कई बार अपना विषय या पूछा गया प्रश्न बदल देते हैं, ताकि बच्चा उत्तर दे और स्वयं को प्रसन्न महसूस करे। क्योंकि एक शिक्षक की मुस्कान बच्चों में आत्मविश्वास जगाती है, माता-पिता की मुस्कान बच्चों को सुरक्षा का एहसास कराती है, और एक मित्र की मुस्कान कठिन समय में भी उम्मीद की किरण बन जाती है।

इसलिए हमें यह याद रखना चाहिए कि मुस्कान कोई खर्च नहीं माँगती, लेकिन इसका मूल्य अनमोल होता है। आइए, हम अपने जीवन में मुस्कान को आदत बनाएँ, क्योंकि—

"मुस्कान बाँटने से कभी कम नहीं होती, बल्कि हर चेहरे पर खुशियों की नई किरण जगा देती है।"
गुलाबी
                                                            एक संवेदनशील, धैर्यवान शिक्षक

आज के सेशन में यह बताया गया कि एक प्रभावी शिक्षक वही होता है, जो विद्यार्थियों के साथ विश्वास, सम्मान और अपनत्व का संबंध स्थापित करता है। जब शिक्षक बच्चों की भावनाओं को समझते हैं, उनकी बात ध्यान से सुनते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं, तब सीखना अधिक सहज और आनंददायक बन जाता है।

सकारात्मक विचार, व्यवहार और भावनात्मक जुड़ाव विद्यार्थियों के आत्मविश्वास, सीखने की रुचि तथा समग्र विकास को बढ़ाते हैं। प्रत्येक बच्चा अपनी क्षमता और विशेषताओं के साथ अद्वितीय होता है। एक शिक्षक का दायित्व केवल पढ़ाना ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की भावनाओं, रुचियों और आवश्यकताओं को समझकर उनसे आत्मीय संबंध स्थापित करना भी है।

जब शिक्षक बच्चों का उत्साहवर्धन करते हैं, उनकी बात ध्यान से सुनते हैं और उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करते हैं, तब उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

यह सेशन हमें यह याद दिलाता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व का समग्र विकास करना भी है।
सनबीम ग्रामीण स्कूल
ममता

आज के अध्याय Heart VS Mind (हृदय बनाम मस्तिष्क) से हमने यह सीखा कि एक शिक्षक का कार्य केवल विद्यार्थियों को विषय का ज्ञान देना नहीं, बल्कि उनकी भावनाओं, आवश्यकताओं और मानसिक स्थिति को समझना भी है।

किशोरावस्था के विद्यार्थियों के साथ संवेदनशील, धैर्यपूर्ण और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना अत्यंत आवश्यक है। एक प्रभावी शिक्षक वह है, जो हृदय और मस्तिष्क दोनों के बीच संतुलन बनाए रखता है तथा सही निर्णय लेने के साथ-साथ विद्यार्थियों के प्रति प्रेम, सम्मान और विश्वास का भाव भी बनाए रखता है।

इससे विद्यार्थियों में आत्मसम्मान बढ़ता है और वे खुलकर अपनी बात करने के लिए प्रेरित होते हैं। एक शिक्षक के रूप में हमारी यह जिम्मेदारी होती है कि हम कक्षा में सकारात्मक, सुरक्षित और सहयोगात्मक वातावरण बनाने का प्रयास करें।
मनोज कुमार
सनबीम ग्रामीण स्कूल


Sunday, July 5, 2026

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य - सुनीता त्रिपाठी


 जय हिंद सभी को।

आज का संदेश हमें यह समझाता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे की छिपी हुई प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारना है। हर बच्चा अपने भीतर कोई-न-कोई विशेष गुण लेकर आता है। एक शिक्षक का कर्तव्य है कि वह बच्चों को ऐसा सकारात्मक और प्रेरणादायक वातावरण दे, जहाँ वे बिना किसी डर के अपनी प्रतिभा, विचारों और रचनात्मकता को खुलकर व्यक्त कर सकें।

जब बच्चों को विश्वास, प्रोत्साहन और अपनी क्षमता दिखाने के अवसर मिलते हैं, तब उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे नई ऊँचाइयों को छूने का साहस करते हैं। शिक्षक का एक उत्साहवर्धक शब्द भी किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदल सकता है।

आज के इस प्रेरणादायक संदेश से मुझे यह सीख मिली कि एक सच्चा शिक्षक वही है, जो हर बच्चे में छिपे हुए हीरे को पहचानकर उसे तराशे, उसकी प्रतिभा को मंच दे, उसके आत्मविश्वास को मजबूत करे तथा उसे बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने के लिए प्रेरित करे।

धन्यवाद।

सनबीम ग्रामीण स्कूल
सुनीता त्रिपाठी

Sunday, May 24, 2026

सकारात्मक सोच और सही निर्णय- सुनीता त्रिपाठी

सोच ही सब कुछ है, यह अध्याय हमें सिखाता है कि शिक्षक का व्यवहार ही कक्षा का माहौल तय करता है। इसलिए, एक अच्छे शिक्षक की सबसे बड़ी पूंजी विश्वास और अपनी सोच है।

रोमा ने भी यही किया। उन्होंने माता-पिता को बताया, पर बात केवल काउंसलर और अभिभावक तक ही सीमित रखी। रोमा की यह सोच थी कि किसी को शर्मिंदा न किया जाए। उन बच्चियों ने स्वीकार किया कि गलती हुई है। रोमा को लगा कि गलतियों को स्वीकार करना व्यक्तिगत विकास और सफलता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर व्यक्ति गलती करता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम उन गलतियों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। अपनी कमियों को स्वीकार करना ईमानदारी और आत्म-जागरूकता को भी बढ़ाता है।

इस अध्याय में मैंने सीखा कि असफलता और गलतियां जीवन का अंत नहीं होतीं, बल्कि हमें आगे बढ़ने की सीख देती हैं। हर व्यक्ति से गलती होती है, लेकिन सफल वही बनता है जो हार मानने के बजाय दोबारा प्रयास करता है। हमारी सोच ही तय करती है कि हम जीवन और स्वयं को किस प्रकार देखते हैं। जब हमें विश्वास होता है कि हम सीख सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं, तब हम अधिक मेहनत करते हैं और आसानी से हार नहीं मानते। अच्छी सोच वाले लोग गलतियों को सीख के रूप में देखते हैं। हम जानते हैं कि असफलता अंत नहीं, बल्कि सुधार करने का एक अवसर है। रोमा ने भी इसी तरह गोपनीयता रखते हुए, अपनी सोच को दर्शाते हुए सही फैसला लिया।

सुनीता त्रिपाठी, सनबीम ग्रामीण स्कूल


Friday, May 15, 2026

किशोरावस्था की चुनौतियां: सनबीम ग्रामीण स्कूल

किशोरावस्था जीवन का एक ऐसा चरण है जिसमें व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कई बदलावों से गुजरता है। इस अवस्था में विद्यार्थियों को पढ़ाई का दबाव, करियर की चिंता, दोस्तों का प्रभाव और अपनी पहचान बनाने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे तनाव और उलझन महसूस होती है। ऐसी स्थिति में, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन और सहयोग न मिले, तो वे गलत दिशा में भी जा सकते हैं।

मेरा मानना है कि किशोरावस्था वाले विद्यार्थियों के साथ धैर्य और प्रेम पूर्ण व्यवहार करना बहुत आवश्यक है। उनसे खुलकर उनकी पसंद और नापसंद के बारे में बातचीत करना और अपना सहयोग देना भी जरूरी है, इससे उनमें आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का विकास हो सकता है जो उन्हें सही मार्गदर्शन की ओर अग्रसर कर सकता है।

सरोज पटेल

किशोरावस्था की गलतियों पर जो पाठ हम लोगों ने पढ़ा इस अंश को पढ़ने के   बाद मुझे अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आया। किशोरावस्था के बच्चों में साथियों के प्रभाव को बहुत जल्दी देखा जा सकता है। एक बार कक्षा के कुछ बच्चे आपस में मजाक करते-करते एक दूसरे की नकल उड़ानें लगे। धीरे धीरे यह आदत पूरी कक्षा में फैलने लगी और कुछ बच्चे मानसिक रूप से दुखी रहने लगे। 

शुरुआत में मुझे लगा कि केवल डांट देने से समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन बाद में मैंने बच्चों से शांतिपूर्वक बात चीत की। मैंने उन्हें समझाया कि मजाक और अपमान में बहुत अंतर होता है। मैंने पूरी कक्षा के साथ एक चर्चा करवाई, जिसमें बच्चों ने अपने मन की बात की। जब बच्चों को यह महसूस हुआ कि उनके शब्द किसी को चोट पहुंचा सकते हैं, तब उन्होंने अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया। कौन है यह धीरे-धीरे बात कर रहा है इसके बाद मैं कक्षा में एक दूसरे का सम्मान विषय पर समूह गतिविधियां करवाई। बच्चों को सकारात्मक शब्द बोलने और अपने मित्रों की अच्छाइयां बताने के लिए प्रेरित किया गया। कुछ ही दिनों में कक्षा का वातावरण पहले से अधिक शांत और सहयोगपूर्ण हो गया। 

इस अनुभव से मुझे यह सीख मिली कि किशोरावस्था में बच्चे कई बार बिना सोचे-समझे गलतियाँ कर बैठते हैं। ऐसे समय में शिक्षक का धैर्य, सही संवाद और सकारात्मक मार्गदर्शन बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि बच्चों को सही समय पर समझाया जाए, तो उनकी ग गलतियां भी उनके लिए एक अच्छी सीख बन सकती है 
सुनीता त्रिपाठी

Saturday, April 4, 2026

गलतियाँ नहीं, सुधार के अवसर - सुनीता त्रिपाठी

बच्चों की गलतियों पर चर्चा करें या ना करें — इस संदर्भ में एक छोटा सा लेख

बच्चों की गलतियों पर चर्चा तभी सही है जब उसका उद्देश्य सुधार और मार्गदर्शन हो। यह विचार एक शिक्षक के वास्तविक कर्तव्य को दर्शाता है। एक शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व को संवारने वाला मार्गदर्शक होता है। इसलिए जब भी बच्चे से कोई गलती होती है, तो उसे एक अवसर की तरह देखना चाहिए, न कि दोष के रूप में।

मुझे ऐसा लगता है कि शिक्षक संवेदनशीलता और गोपनीयता बनाए रखते हुए बच्चे को समझाएँ। इससे उसके अंदर सुधार की इच्छा आती है और वह बिना डर के अपनी कमियों को स्वीकार कर पाता है। इसके विपरीत, यदि उसकी गलती को सार्वजनिक रूप से उजागर किया जाए, तो उसके मन में डर, संकोच और हीन भावना उत्पन्न हो सकती है।

सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने वाला शिक्षक बच्चों के मन में विश्वास और अपनापन पैदा करता है। यही विश्वास बच्चों को आगे बढ़ने और सीखने के लिए प्रेरित करता है। एक बच्चा स्कूल में शिक्षक पर विश्वास करता है। एक शिक्षक वही है, जो बच्चे की गलतियों को छुपाकर नहीं, बल्कि समझदारी और संवेदनशीलता के साथ सुधारने का प्रयास करता है, ताकि बच्चा एक अच्छा और आत्मविश्वासी इंसान बन सके।

सनबीम ग्रामीण स्कूल
सुनीता त्रिपाठी

Friday, March 20, 2026

कक्षा का वातावरण: War और Peace - मंजुला सागर

इस अध्याय से हमें यह समझ में आता है कि कक्षा का वातावरण दो प्रकार का हो सकता है – War (युद्ध जैसा माहौल) और Peace (शांतिपूर्ण माहौल)।

War जैसी कक्षा में शिक्षक बहुत सख्त होते हैं, बच्चों को डाँटते हैं, डर का माहौल बनाते हैं और उन्हें अपनी बात कहने का अवसर नहीं देते। ऐसे माहौल में बच्चे डरते हैं, पढ़ाई में उनकी रुचि कम हो जाती है और वे खुलकर सीख नहीं पाते।

इसके विपरीत Peaceful कक्षा में शिक्षक बच्चों के साथ प्रेम, सहानुभूति और समझदारी से व्यवहार करते हैं। यहाँ बच्चे बिना डर के सवाल पूछते हैं, अपनी राय व्यक्त करते हैं और सीखने में आनंद महसूस करते हैं। एक अच्छे शिक्षक को कक्षा में शांति, सहयोग और सम्मान का वातावरण बनाना चाहिए। जब कक्षा का माहौल शांत और मित्रतापूर्ण होता है, तब बच्चे बेहतर तरीके से सीखते हैं, उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें पढ़ाई में आनंद आता है।

लेकिन इसके लिए सबसे पहले शिक्षक को कक्षा के वातावरण को शांतिपूर्ण बनाना पड़ता है। यदि शिक्षक के कक्षा में प्रवेश करने के बाद वहाँ युद्ध जैसा माहौल हो, तो सबसे पहले उस माहौल को सामान्य बनाना आवश्यक होता है, न कि चिल्लाना। शिक्षक कुछ रोचक गतिविधियाँ जैसे—कहानी, कविता, गहरी साँस लेना, गीत या बोर्ड पर कुछ प्रश्न—करवाकर बच्चों का ध्यान अपनी ओर केंद्रित कर सकता है। इससे बच्चे शिक्षक की बात सुनने के लिए तैयार होते हैं। इसके बाद शिक्षक उनकी समस्याएँ समझकर उनका समाधान कर सकता है, जिससे कक्षा को नियंत्रण में लिया जा सके और शिक्षक एवं छात्रों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित हो सके।

इस अध्याय से यह निष्कर्ष निकलता है कि कक्षा में युद्ध जैसा माहौल नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण और सकारात्मक वातावरण होना चाहिए, क्योंकि यही बच्चों के सीखने और समग्र विकास के लिए सबसे उपयुक्त होता है।

मंजुला सागर
सनबीम ग्रामीण स्कूल

Monday, July 12, 2021

विचारों की आजादी ही सच्ची आजादी है: उर्मिला राठौड़

"हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊँ। परन्तु विचार प्रकट करने के पके अधिकार की रक्षा करूँगा।" - वाल्टेयर, एक प्रसिद्ध फ़्रांसीसी दार्शनिक। 

इससे मुझे आत्मविश्वास की अनुभूति होती है कि हाँ हम तार्किक या अतार्किक कोई भी बात कहे, जो किसी को पसंआए आए परन्तु हमें अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी है

कहा जाता है कि पराधीनता सबसे बड़ा दुःख है जबकि स्वाधीनता अर्थात खुद के अधीन होना सबसे बड़ा सुख है। इस धरा पर सभी प्राणी सुखी होने के लिए आजाद रहना चाहते हैआज़ादी का अर्थ है कि हम स्वतंत्र रहकर काम कर सके, बोसके। स्वाधीनता मानव की ही नहीं बल्कि हर प्राणी मात्र की सहज प्रवृत्ति है। किसी पक्षी को सोने के पिंजरे में भी बंद किया जाए तो वह छटपटाने लगता है जबकि खुले आसमान में रह कर वह प्रसन्न रहता है। 

पराधीन व्यक्ति हमेशा काम करने के लिए दूसरे का मुँह ताकता रहता है, दूसरा जैसा कहे उसी के अनुसार अपना जीवन धकेलने के मजबूहोता है। उसमें तो आत्मसम्मान होता है ही स्वाभिमान, हर वक्त लटका चेहरा, दूसरों के सामने गिड़गिड़ाने जैसे भाव बने रहते हैअब प्रश्न यह है कि जाद देश का निवासी होने से क्या कोई जाद कहलाता है या जादी के सही मायने कुछ और है। यह सत्य है कि जाद देश का वासी होना बड़े गौरव की बाहै पर गौरवान्वित महसूस करने के लिए स्वयं को भी जाद होना जरूरी है। युगों - युगों से अनेक जड़ परम्पराओं का दास बना मानव दासता की उन कड़ी बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, अज्ञानता के घने अंधकार में कैद है और बंधनों की चादर कुछ इस प्रकार ओढ़ ली है कि जाद देश का वासी होकर भी सही मायने में आजाद नहीं है। 

संकीर्ण और दकियानूसी सोच के कारण मानव जब तक पुरानी सोच के अनुसार जीवन यापन करता रहता है, वह जाद नहीं कहा जा सकता कहीं कुछ ग़लत होता देखकर उसका विरोध न करें, किसी सामाजिक समस्याओं के खिलाफ अपने भाव व विचार प्रकट न करें तो वह जाद देश में रहकर भी परतंत्र और गुलाम है। विचार जाद होंगे तभी मानव आजाद होगा और विचारों की जादी के लिए प्रयास स्वयं करना होगा।

Urmila Rathore  
The Fabindia School
ure@fabindiaschools.in

Thursday, March 4, 2021

प्रशंसा - सुरेश सिंह नेगी

"प्रशंसा" शब्द बाहर से छोटा दिखता है, लेकिन अगर इसे ठीक से इस्तेमाल किया जाए तो यह कुछ भी हासिल करने में मदद कर सकता है। यह शब्द किसी को प्रेरित करने के लिए सबसे शक्तिशाली शब्द है। अगर किसी को किसी निश्चित कार्य के लिए प्रशंसा मिलती है तो वह व्यक्ति हमेशा आगे के सभी कार्यों को पूरे मन से करने की कोशिश करता है। यह शब्द नकारात्मक विचारों को सकारात्मक में बदल सकता है। इस दुनिया में हर कोई अपने कार्यों के लिए प्रशंसा प्राप्त करना पसंद करता है। 

"प्रशंसा" केवल कार्यस्थलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका उपयोग कहीं भी किया जा सकता है। अगर आपके घर में भी कोई व्यक्ति अच्छा कार्य करता है तो निश्चित रूप से उस व्यक्ति की प्रशंसा होनी चाहिए। 

इसलिए जब भी संभव हो किसी भी व्यक्ति की प्रशंसा करते रहना चाहिए, क्योंकि यह चीजों को आसान और सरल बनाने में मदद करता है। प्रशंसा केवल उसे पाने वाले पर ही नहीं, बल्कि उसे देने वाले पर भी अच्छा–खासा प्रभाव छोड़ती है। जब आप किसी की प्रशंसा करते हैं, तो आप सकारात्मक सोच रख सकते हैं, और आप अधिक से अधिक तालमेल बना सकते हैं। प्रशंसा लोगों को खुशी और आनन्द देती है। इसलिए, प्रशंसा करने में कंजूस बनने का कोई कारण नहीं है। किसी की प्रशंसा करने में समय बहुत जरूरी होता है। जैसे कि कहावत भी है कि, “लोहा गर्म है, तब मारो हथौड़ा,” जब कोई व्यक्ति प्रशंसा पाने के योग्य काम करता है, तो उसी समय और उसी जगह ही उसकी प्रशंसा करना सही है।

एक अच्छी प्रशंसा आत्मविश्वास और हिम्मत देती है। आइए हम एक दूसरे की प्रशंसा करके एक अच्छे समाज का निर्माण करें।

सुरेश सिंह नेगी
The Fabindia School
sni@fabindiaschools.in

Monday, September 14, 2020

हमारी हिंदी: कृष्ण गोपाल

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

संविधान सभा में निर्णय लिया गया कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी और लिपि देवनागरी, प्रयोग में आने वाले अंको का रूप अंतरराष्ट्रीय होगा। गांधीजी के अनुसार हिंदी जनमानस की भाषा है। हिंदी में कई भाषाओं का समावेश है, कई बोलियों का समावेश है। और यही वजह है कि हिंदी भाषा में पूरे देश की संस्कृति की झलक दिखाई देती है।

संस्कृत से तो हिंदी का जुड़ाव विशेष है। हिंदी को कई कवियों और लेखकों ने संजोया है। भारतेंदुजी ने इसके खड़ी बोली के रूप का प्रचार किया तो जयशंकर प्रसाद ने कामायनी से परिचय करवाया। हरिऔंध जी ने प्रियप्रवास, दिनकर जी ने रश्मिरथी, बच्चनजी ने निशा निमंत्रण तो मैथिलीशरण जी ने साकेत जैसी रचनाओं से हिंदी विशिष्ठता प्रतिपादित की। वैसे तो ये सूचि बहुत छोटी है, ऐसा कह सकते है, ये तो एक झाँकी है। अपार साहित्य सृजन हो चुका है और होता जा रहा है। इन रचनाकारों ने हिंदी को समृद्ध किया। 

तुलसी का रामचरितमानस हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत करता है। पिता के साथ, माता के साथ, भाई के साथ, मित्र के साथ यहाँ तक कि शत्रु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए यह राम के चरित्र से ज्ञात हो जाता है। विनम्रता, सहयोग, आत्मविश्वास, साहस, संकल्प, क्षमा और भी कई जीवन मूल्यों का परिचय करवाया गया है।

यदि हम बात करें कबीरदास जी की तो उन्होंने सर्वधर्म समभाव की रूपरेखा समाज को दी। उनके अनुसार व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से होती है, ऊँचे कुल से नहीं। जो व्यक्ति विनम्र होता है सही अर्थों में वही ज्ञानी होता है। ईश्वर एक है और आडम्बर से प्राप्त नहीं होंगे, इसके लिए सत्कर्म कीजिए। इस प्रकार कई महान विभूतियों ने समाज का मार्गदर्शन किया, जीवन का उद्देश्य सबके समक्ष रखा। भगवद्गीता में भी कर्म करने की बात कही, यदि कर्म निष्ठा पूर्वक किया जाएगा तो परिणाम भी अनुकूल ही होगा, इसलिए फल की चिंता न करने की बात कही गई।

उपर्युक्त तथ्य केवल उदाहरणार्थ लिखे गए है, ऐसे साहित्यों की कतई कमी नहीं हैं जो हमें जीवन का पाठ पढ़ाए। आधुनिकता की दौड़ में हम कहीं यह न भूल जाएँ कि हमारा अपना साहित्य, संस्कृति और भाषा कितनी प्रगाढ़ है। सीखना सब चाहिए पर अपना भूल जाएँ यह तो उचित नहीं। विदेशी भाषाओं के प्रयोग पर गर्वान्वित महसूस न करें। गर्व अपनी चीजों का होना चाहिए। धोती-कुरता पहनने वाले को कमतर समझ लिया जाता है जो उचित नहीं है। पढ़ा-लिखा ज्ञानी होना केवल विदेशी पौशाक से ही प्रदर्शित होता है क्या ?

गर्व से हिंदी बोलिए, यह हमारी भाषा है, हमारी भाषा में हमारी संस्कृति है, हमारी पहचान है। अपनी पहचान और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए हिंदी का सम्मान कीजिए, प्रयोग कीजिए।
Krishan Gopal
The Fabindia School

Saturday, May 30, 2020

जिम्मेदारी और संगठन: कुसुम डांगी


जिम्मेदारी का अर्थ है जबाव देही और इसका दूसरा नाम है, कर्तव्य। किसी भी इंसान या वस्तु के  लिए हमारी जो जबाव देही होती है। वो ही हमारी जिम्मेदारी होती है। जीवन में जिम्मेदारियों का  होना बहुत आवश्यक है। उससे भी जरूरी है, उनको सही से निभाना प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर  जिम्मेदारी स्वीकार करने की भावना होनी चाहिए। कुछ लोग अधिक जिम्मेदारियों से परेशान हो जाते हैं। उन लोगों को खुश होना चाहिए, क्योंकि ज्यादा जिम्मेदारियाँ उसी को मिलती है। जो उसे  सही से निभा सकता है।

  "जिम्मेदारियाँ उस इंसान की तरफ खिंची चली जाती है जो उन्हें कंधे पर उठा सकता है"
संगठन एक ऐसा संग्रह जिनकी गतिविधियाँ समान होती है, और विभिन्न संबंधों में इस प्रकार बँधे है कि एक व्यक्ति अपना लक्ष्य तभी प्राप्त कर सकता है, जब सब मिलकर काम करें। 

विद्यार्थियों की विद्यालय के प्रति जिम्मेदारियाँ -
कक्षा में हमेशा समय पर उपस्थित होना, अपना गृहकार्य समय पर पूरा करना, अपने समय का सदुपयोग करना और अपने से छोटे व बड़ों का सम्मान करना तथा अपने सहपाठियों के साथ अच्छा व्यवहार करना और सब एक साथ मिलकर कार्य करे तो कोई भी कार्य सरलता से किया जा सकता है और वो कार्य कम समय में पूरा हो जाता है। 

शिक्षकों के प्रति विद्यार्थियों का कर्तव्य है कि वह सभी का आदर करे तथा उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनें वह अपने विद्यालय को उन्नत बनाने में योगदान करें तथा विद्यालय को स्वच्छ रखने में मदद करें और अन्य सहपाठियों को भी इसके लिए प्रेरित करें।

युवाओं की देश के प्रति भी जिम्मेदारी है कि कहीं कुछ गलत हो तो उसके खिलाफ आवाज़ उठाएँ। 
छात्रों को आगे बढ़कर जिम्मेदारियाँ लेनी चाहिए जिससें समझदारी बढ़ती है और उसे सही और गलत का ज्ञान होता है। जीवन में सफलता मिलती है, शुरुआत में कभी असफल हो भी जाओ तो निरंतर प्रयास से सफलता प्राप्त की जा सकती है। 
इससे इंसान का आंतरिक और बाहरी दोनों तरह का विकास होता है तथा आत्मविश्वास बढ़ता है।
Kusum Dangi
The Fabindia School, Bali


Wednesday, May 20, 2020

ऊँची सोच: उषा पंवार


ऊँची सोच आत्मविश्वास को जागृत करती है। ऊँचे कद से नहीं ऊँची सोच से सफलता  मिलती है। व्यक्ति के विचार कमजोर नहीं होने चाहिए । शरीर से चाहे कमजोर दुबले पतले रहे लेकिन मन से कमजोर नहीं होना चाहिए। हम सभी को सफलता के लिए मेहनत से घबराना नहीं चाहिए ,कहते हैं---"-जैसी दृष्टि वैसी सोच ,,
इस सोच को मै छोटी सी कहानी के जरिए बताना चाहती हूँ --
"एक बार एक गरीब फटे हाल बच्चा बड़ी उत्सुकता से महंगी कार को निहार रहा था, गरीब बच्चे पर तरस खाकर कार वाले आदमी ने उसे अपनी कार में बैठा कर घुमाने ले गया।
लड़के ने कहा-साहेब आपकी कार बहुत अच्छी है बहुत महंगी होगी ना...
अमीर आदमी ने गर्व से कहा -हाँ, यह लाखों रुपए की है। गरीब लड़का बोला- इसे खरीदने के लिए तो आपने बहुत मेहनत की होगी? अमीर आदमी हँसकर बोला-यह कार मुझे मेरे भाई ने उपहार में दी है
गरीब लड़के ने सोचते हुए कहा -वाह आपके भाई कितने अच्छे हैं ?
अमीर आदमी ने कहा मुझे पता है कि तुम सोच रहे होंगे कि काश तुम्हारा भी कोई ऐसा भाई होता जो इतनी कीमती कार तुम्हें उपहार में देता।
गरीब लड़के की आँखों में अनोखी चमक थी , उसने कहा- नहीं साहेब.. "मै तो आपके भाई की तरह बनना चाहता  हूँ।"
अतः अपनी सोच हमेशा ऊँची रखो दूसरों की अपेक्षाओं से कहीं अधिक ऊँचीतो तुम्हें बडा बनने से कोई रोक नहीं सकता।
Usha Panwar
The Fabindia School

Wednesday, May 6, 2020

ईमानदारी और सम्मान: कृष्ण गोपाल


जीवन में मूल्यों की अधिक आवश्यकता रहती है।  यदि हम विद्यार्थियों की बात करें तो उनके लिए मूल्यों का होना अत्यावश्यक है। इस पर भी उपर्युक्त मूल्यों से विद्यार्थी जीवन लक्ष्य को प्राप्त करेगा ही।  ईमानदारी और सम्मान दोनों ऐसे मूल्य है जो हर स्थान पर चाहिए ही। 

परन्तु खेल के मैदान में इसकी अधिक आवश्यकता जान पड़ती है। एक खिलाडी को खेल और दूसरे खिलाड़ियों के प्रति ईमानदारी रखनी पड़ती है साथ ही दोनों के प्रति सम्मान का भाव भी हो। एक खिलाडी इन मूल्यों को दूसरों में जाग्रत कर सकता है।  मैदान में खेलते हुए कई लोग उसे देखते है, वह ईमानदारी और सम्मान का परिचय दर्शकों को देता है, दर्शकों में से कई उसका अनुकरण करते है। वैसे भी बेईमानी से कभी-कभी लाभ मिल सकता है परन्तु लंबे समय तक नहीं।

परीक्षा में या कहीं और स्थान पर हमें नैतिक मूल्यों को सजीव रखने की आवश्यकता है। ये दौर प्रतियोगिता का है अतः सर्वप्रथम स्वयं के प्रति ईमानदार बने। एक शिक्षक के रूप में भी अपनी गलतियाँ स्वीकार करें और बच्चों को भी प्रेरित करें।  बच्चों के समक्ष सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करें।  काम में कभी बेईमानी करें, सम्मान दें। जिस बात की हम अपेक्षा रखते है, वह पहले देनी भी तो पड़ेगी।

ये मूल्य व्यक्ति में आत्मविश्वास जगाते है और मानसिक तनाव को कम करने में सहायक है। ऐसे लोग अपने समाज में प्रतिष्ठा पाते हैं। यदि ह्रदय से सम्मान पाने की लालसा मन में है तो ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कीजिए। 
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali

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