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Monday, November 29, 2021

संकल्प: कृष्ण गोपाल

किसी बात का मन में निश्चय कर देना कि यह काम में करके ही रहूँगा, संकल्प कहलाता है।सदियों से यह प्रथा चली आ रही है कि हाथ में जल लेकर या अग्नि को साक्षी मानकर किसी बात का संकल्प लिया जाता है। जल और अग्नि यह केवल एक निमित्त मात्र हैं किंतु मनुष्य का दृढ़ निश्चय, काम करने का प्रयत्न ही उसके लिए संकल्प है। यदि दृढ़ निश्चय मन में है तो किसी प्रकार के जल और अग्नि की साक्षी आवश्यक नहीं है।

कई सारे ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिनको देखकर अन्य व्यक्ति भी दृढ़ संकल्प से भर जाता है। दृढ़ संकल्प से कई रुके हुए काम बन जाते हैं तथा असंभव से दिखते कार्य भी पूर्ण हो जाते हैं। अपने मन में आए हुए विचारों को धरातल पर उतारने के लिए दृढ़ निश्चय होना आवश्यक है।


एक बार मैंने भी मन ही मन वैदिक संस्कृत की पुस्तकों को पढ़ने का निश्चय किया। ग्रंथों को पढ़ने से पहले संस्कृत का ज्ञान परम आवश्यक था क्योंकि भाषा के शब्द-कोश को जाने बिना या उसकी व्याकरण को जाने बिना उसके ग्रंथों को पढ़ना निरर्थक था। संस्कृत से मेरा ज्यादा लंबा संबंध नहीं था। दसवीं कक्षा तक संस्कृत का अध्ययन अवश्य किया था, इससे अधिक कुछ भी नहीं था। दसवीं कक्षा पास किए हुए भी एक लंबा अरसा हो गया था।


अब अपने संकल्प को पूरा करने के लिए सर्वप्रथम मैंने व्याकरण की कई पुस्तकें खरीदी तथा स्वाध्याय करते हुए ही व्याकरण का ज्ञान अर्जित किया। संस्कृत के विभिन्न सूत्रों के अर्थ जाने तथा उनके प्रयोग के बारे में जानकारी की। हर छोटी-छोटी बातों को भी मैंने सम्मिलित किया। संपूर्ण रूप से मैं पुस्तकों पर ही निर्भर था, मार्गदर्शन के लिए किसी भी व्यक्ति का सहारा नहीं था इसलिए इस काम में थोड़ा समय जरूर लगा किंतु जो कुछ भी सीखा वह स्थायी हो गया।


इन सब के पश्चात मैंने संस्कृत के उन ग्रंथों को पढ़ा जिनको पढ़ने की इच्छा मेरे मन में जागृत हुई थी। पुस्तकों की कमी नहीं इसी कारण यह क्रम आज भी चल रहा है। हाँ, अवश्य ही इन पुस्तकों के पठन की गति में कमी आई है परंतु पठन की यह धारा अविरल बह रही है।


परिश्रम और दृढ़ निश्चय से मैंने अपना यह संकल्प पूरा किया और इसे आगे भी ले जा रहा हूँ। कुछ कठिनाइयाँ भी अवश्य आई परंतु आनंद की अनुभूति भी कुछ कम नहीं थी। अतः अपने संकल्प को पूरा करने के लिए स्वयं ही निश्चय करें। 


Krishan Gopal 

The Fabindia School 

kde@fabindiaschools.in 

Thursday, September 23, 2021

दूसरों को खुश रखना : आयशा टॉक

हम दूसरों को खुश रखने की कोशिश करते हैं। क्योंकि इससे हमें आत्म संतुष्टि मिलती हैं। यह हमें अपने बारे में अच्छा महसूस कराता है या हमारे जीवन को अर्थ देता है। अगर आप दूसरों को खुश रखना चाहते है तो सर्वप्रथम आपकी खुद की खुशी बहुत जरुरी है। कहने का मतलब यह है कि यदि आप दुखी  है तो आप किसी को खुश नहीं कर सकते है। प्यार किसी भी रूप में हमारे जीवन में खुशियाँ लाता है।

दोस्तों, परिवार और अन्य लोगों के साथ आपके स्वस्थ संबंध आपके जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर सकते है और जीवन में खुशियाँ ला सकते हैं। जैसे कि हमारी जिंदगी में एक ऐसा पल जरूर आता है कि हमारी वजह से किसी को खुशी जरूर मिलती है। मेरे जीवन का एक ऐसा ही पल मैं आपके साथ में साझा कर रही हूँ।

हमारे मोहल्ले में एक बहुत ही गरीब परिवार रहता था। उनके पास में कमाई का कोई भी जरिया नहीं था। सभी लोग उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते थे। कोई भी उनकी मदद नहीं करना चाहता था। परन्तु मुझे उस गरीब परिवार पर बहुत दया आती थी।

एक दिन मैंने उनकी सहायता करने की सोची और उनके लिए कुछ कपड़े और कुछ खाने का सामान खरीद कर उनके घर गई। जब मैंने उनको वो सामान दिया तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा और वो लोग बस मुझे दुआएँ देते नहीं थक रहे थे। उस दिन उन लोगों को इतना खुश देखकर मुझे उनसे भी ज्यादा खुशी का अनुभव हो रहा था। सच में दूसरों को खुशी देने से एक अलग ही प्रकार के सुख की अनुभूति होती है।

Ayasha Tak
The Fabindia School, Bali
atk@fabindiaschools.in

Monday, July 12, 2021

विचारों की आजादी ही सच्ची आजादी है: उर्मिला राठौड़

"हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊँ। परन्तु विचार प्रकट करने के पके अधिकार की रक्षा करूँगा।" - वाल्टेयर, एक प्रसिद्ध फ़्रांसीसी दार्शनिक। 

इससे मुझे आत्मविश्वास की अनुभूति होती है कि हाँ हम तार्किक या अतार्किक कोई भी बात कहे, जो किसी को पसंआए आए परन्तु हमें अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी है

कहा जाता है कि पराधीनता सबसे बड़ा दुःख है जबकि स्वाधीनता अर्थात खुद के अधीन होना सबसे बड़ा सुख है। इस धरा पर सभी प्राणी सुखी होने के लिए आजाद रहना चाहते हैआज़ादी का अर्थ है कि हम स्वतंत्र रहकर काम कर सके, बोसके। स्वाधीनता मानव की ही नहीं बल्कि हर प्राणी मात्र की सहज प्रवृत्ति है। किसी पक्षी को सोने के पिंजरे में भी बंद किया जाए तो वह छटपटाने लगता है जबकि खुले आसमान में रह कर वह प्रसन्न रहता है। 

पराधीन व्यक्ति हमेशा काम करने के लिए दूसरे का मुँह ताकता रहता है, दूसरा जैसा कहे उसी के अनुसार अपना जीवन धकेलने के मजबूहोता है। उसमें तो आत्मसम्मान होता है ही स्वाभिमान, हर वक्त लटका चेहरा, दूसरों के सामने गिड़गिड़ाने जैसे भाव बने रहते हैअब प्रश्न यह है कि जाद देश का निवासी होने से क्या कोई जाद कहलाता है या जादी के सही मायने कुछ और है। यह सत्य है कि जाद देश का वासी होना बड़े गौरव की बाहै पर गौरवान्वित महसूस करने के लिए स्वयं को भी जाद होना जरूरी है। युगों - युगों से अनेक जड़ परम्पराओं का दास बना मानव दासता की उन कड़ी बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, अज्ञानता के घने अंधकार में कैद है और बंधनों की चादर कुछ इस प्रकार ओढ़ ली है कि जाद देश का वासी होकर भी सही मायने में आजाद नहीं है। 

संकीर्ण और दकियानूसी सोच के कारण मानव जब तक पुरानी सोच के अनुसार जीवन यापन करता रहता है, वह जाद नहीं कहा जा सकता कहीं कुछ ग़लत होता देखकर उसका विरोध न करें, किसी सामाजिक समस्याओं के खिलाफ अपने भाव व विचार प्रकट न करें तो वह जाद देश में रहकर भी परतंत्र और गुलाम है। विचार जाद होंगे तभी मानव आजाद होगा और विचारों की जादी के लिए प्रयास स्वयं करना होगा।

Urmila Rathore  
The Fabindia School
ure@fabindiaschools.in

Wednesday, April 29, 2020

आनंद और सहनशीलता: राजेश्वरी राठौड़


आनंद एक ऐसा भाव है जो किसी भी व्यक्ति के अंतर्मन को प्रकाशित कर देता है यह एक ऐसा भाव है जिसमें अन्य भाव भी समाहित होते हैं जैसे कि सकारात्मकता, स्वतंत्रता का भाव और आध्यात्मिकता। छोटी से छोटी घटनाओं से भी आनंद की अनुभूति ली जा सकती है

जब कभी हम किसी कारण से अप्रसन्न हो या किसी व्यक्ति से खिन्न हो तो  हमें किसी  विद्वान व्यक्ति से  परामर्श लेना चाहिए अथवा किसी सकारात्मक विचारों वाले व्यक्ति से अपनी समस्या को साझा करना चाहिए जिससे कि समस्या का समाधान हो सके। यह छात्रों के लिए सर्वथा उचित है वे जब भी कक्षा कक्ष में होते हैं तब सीखने की उद्दीपन अनुक्रिया को तीव्र करने हेतु कक्षा कक्ष के वातावरण को रुचिकर आनंदमय बनाना चाहिए जिससे कि उनकी स्मरण शक्ति तीव्र हो और वे विषय को आत्मसात कर सके।

सहनशीलता एक ऐसा  भाव है जिसमें व्यक्ति स्वयं से भिन्न विचार वाले व्यक्ति के तर्क, कार्य को धैर्य पूर्वक सुनता है और निष्कर्ष निकालता है प्रत्येक व्यक्ति के लिए सहनशील होना अति-आवश्यक होता है जैसा कि फ्रांस के एक विद्वान  ने लिखा  है कि  " हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत ना हो पाऊँ परंतु आपकी वैचारिक स्वतंत्रता का सम्मान करना मेरा कर्तव्य है। अर्थात् सहनशील होना एक विद्वान व्यक्ति का प्रमुख गुण होता है एक शिक्षक के रूप में सहनशीलता का अनिवार्य गुण होना अति-आवश्यक है क्योंकि बालकों की बात को धैर्य पूर्वक सुनकर ही सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है और इस प्रक्रिया से उनके मानसिक विकास में भी सहायता प्राप्त होती है और वह अपनी बात को व्यक्त करना सीख जाते हैं।
Rajeshwari Ratore
The Fabindia School, Bali

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