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Wednesday, July 28, 2021

पर-चिंतापूर्ण, सावधानीपूर्ण, संवेदना से भरा व्यवहार - किरण जयाल

मनुष्य निरंतर सीखता रहता है, अपने उत्थान के लिए हमेशा प्रयासरत रहता है और इस सफर में thoughtfulness, पर-चिंता एक मुकुट मणि की भांति है.

Thoughtfulness यानि कि पर-चिंतापूर्ण, सावधानीपूर्ण, संवेदना से भरा व्यवहार.  जितना ज्यादा हम संवेदनशील रहते हैं,  हमारा ध्यान स्वयं से हटकर 'हम' पर चला जाता है. यही भाव हमें पूरी सृष्टि के साथ एक कर देता है.

एक बच्चा  बाल्यावस्था में स्कूल में प्रवेश करता है और किशोरावस्था आने तक यह संबंध बना रहता है .यही उपयुक्त समय है जब thoughtfulness, पर-चिंतापूर्णता के नैतिक मूल्य का बीज उसके अंतर्मन में रोपा जा सकता है .पर यह कैसे किया जाए - विशेष तौर पर किशोरावस्था में जब एक बच्चा जहां ऊर्जा का भंडार है, वही अपनी पहचान बनाने बनाने में पूरी तरह अग्रसर. . . चलिए समझते हैं . . .

स्कूल में रंग-जाति, सामाजिक भेदो और मुखौटो का कोई काम नहीं . फिर भी  ज्येष्ठ छात्रों द्वारा अन्य छात्रों को डराना, धमकाना ,धौंस दिखाना कोई नई बात नहीं . अगर कारण बच्चे हैं तो निदान भी बच्चे ही हैं . यहीं पर संवेदना पूर्वक पर-चिंतापूर्णता को बच्चों को सिखाया जा सकता है.

हम में से कई लोगों ने नानी- दादी के मुख से महापुरुषों के जीवन और चरित्र के बारे में जाना है . उन्होंने ही प्रथम बार इनसे हमारा परिचय कराया था. यही कार्य आज का किशोर भी कर सकता है. माननीय मूल्यों के बारे में समझ कर, औरों को ललित कलाओं का उपयोग कर ,समझाता है, तो वह केवल thoughtfulness की तरफ डग भरता है अपितु अपनी क्षमताओं का संवर्धन भी कर सकता है.

किशोरावस्था में बच्चे आपस में क्लब बनाकर, कुछ स्थानीय मुद्दों को उठाकर उन पर काम कर सकते हैं जिससे कि वे मुख्यधारा में खुद से जोड़ सकें.  यह चाहे नेचर क्लब हो या पशु प्राणी की सहायतार्थ कुछ कार्य . जो भी हो वह ज्वलंत मुद्दों को उठाकर उनका निदान सुझाकर अपनी भागीदारी दर्शा सकता है. ऐसा करने पर वह स्वतः ही पर-चिंतापूर्ण अपना व्यवहार प्रदर्शित करता है

इन सभी पक्षों के पीछे संवेदना पूर्ण समझदारी है . यह नैतिक मूल्य हमारी बुद्धि को बहुआयामी रूप से प्रभावित करता है और  पर-चिंता भी इससे अछूती नहीं रहती.

 एक मुद्दा भी विज्ञापन के द्वारा कैसे समझदारी और पर चिंता को श्रेष्ठतम रूप से दिखा सकता है,  यह जानने के लिए साथ में दिए लिंक पर क्लिक कीजिए

https://youtu.be/baV1MI0u34A

https://youtu.be/UF7oU_YSbBQ

 -किरण जयाल 
The Doon Girls' School, Dehradun

Wednesday, April 29, 2020

आनंद और सहनशीलता: राजेश्वरी राठौड़


आनंद एक ऐसा भाव है जो किसी भी व्यक्ति के अंतर्मन को प्रकाशित कर देता है यह एक ऐसा भाव है जिसमें अन्य भाव भी समाहित होते हैं जैसे कि सकारात्मकता, स्वतंत्रता का भाव और आध्यात्मिकता। छोटी से छोटी घटनाओं से भी आनंद की अनुभूति ली जा सकती है

जब कभी हम किसी कारण से अप्रसन्न हो या किसी व्यक्ति से खिन्न हो तो  हमें किसी  विद्वान व्यक्ति से  परामर्श लेना चाहिए अथवा किसी सकारात्मक विचारों वाले व्यक्ति से अपनी समस्या को साझा करना चाहिए जिससे कि समस्या का समाधान हो सके। यह छात्रों के लिए सर्वथा उचित है वे जब भी कक्षा कक्ष में होते हैं तब सीखने की उद्दीपन अनुक्रिया को तीव्र करने हेतु कक्षा कक्ष के वातावरण को रुचिकर आनंदमय बनाना चाहिए जिससे कि उनकी स्मरण शक्ति तीव्र हो और वे विषय को आत्मसात कर सके।

सहनशीलता एक ऐसा  भाव है जिसमें व्यक्ति स्वयं से भिन्न विचार वाले व्यक्ति के तर्क, कार्य को धैर्य पूर्वक सुनता है और निष्कर्ष निकालता है प्रत्येक व्यक्ति के लिए सहनशील होना अति-आवश्यक होता है जैसा कि फ्रांस के एक विद्वान  ने लिखा  है कि  " हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत ना हो पाऊँ परंतु आपकी वैचारिक स्वतंत्रता का सम्मान करना मेरा कर्तव्य है। अर्थात् सहनशील होना एक विद्वान व्यक्ति का प्रमुख गुण होता है एक शिक्षक के रूप में सहनशीलता का अनिवार्य गुण होना अति-आवश्यक है क्योंकि बालकों की बात को धैर्य पूर्वक सुनकर ही सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है और इस प्रक्रिया से उनके मानसिक विकास में भी सहायता प्राप्त होती है और वह अपनी बात को व्यक्त करना सीख जाते हैं।
Rajeshwari Ratore
The Fabindia School, Bali

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