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Friday, July 17, 2026

संवेदनशील शिक्षक: शिक्षा से पहले समझ - सुनीता त्रिपाठी

जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं जब दिल कुछ और कहता है और दिमाग कुछ और। दिल भावनाओं, प्रेम, करुणा और रिश्तो की और खींचता है, जबकि दिमाग में सोच समझ कर सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है। 

सच्ची सफलता तभी मिलती है जब दिल की संवेदनशीलता और दिमाग की समझ साथ चले। केवल भावनाओं में बह जाना या केवल तर्क पर चलना, दोनों ही हमें अधूरा बना सकते हैं। 

कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां दिल रिश्तो को बचाना चाहता है और दिमाग सही निर्णय लेने की सलाह देता है। उस पल का संघर्ष हमें भीतर से बहुत कुछ सिखाता है। जीवन की असली सुंदरता तब है, जब दिमाग सही दिशा दिखाएं और दिल उसे राह पर इंसानियत, करुणा और प्रेम के साथ चलना सिखाए। 

दिल से जुड़े रहिए लेकिन निर्णय विवेक से लीजिए। क्योंकि सही निर्णय वही होता है, जिसमें दिमाग की समझ और दिल की संवेदना दोनों शामिल हों। यही संतुलन हमारे व्यक्तित्व को सुंदर बनाता है और हमारे जीवन को सार्थक।

आज की चर्चा ने मुझे यह एहसास कराया कि हर बच्चे की कहानी उसकी पढ़ाई से कहीं बड़ी होती है। कई बार जो व्यवहार हमें अनुशासनहीनता लगता है, उसके पीछे भावनात्मक उलझन, असमंजस या  सही मार्गदर्शन की कमी छिपी होती है। एक शिक्षक का दायित्व केवल नियमों का पालन करवाना नहीं, बल्कि बच्चों को समझना, आवश्यक है। जब शिक्षक विश्वास, धैर्य और संवेदनशीलता के साथ बच्चों का साथ देते हैं, तब वे न केवल एक अच्छे विद्यार्थी बल्कि एक अच्छे इंसान भी बनाते हैं। 

यह चर्चा मेरे लिए आत्म मंथन का अवसर रही। अब मैं अपने विद्यार्थियों को केवल उनकी उपस्थितियों या गलतियों से नहीं, बल्कि उनकी परिस्थितियों और संभावनाओं के आधार पर समझने का प्रयास करूंगी। मेरा विश्वास और भी मजबूत हुआ है कि एक शिक्षक का सबसे बड़ा गुण बच्चों के मन तक पहुंचाना है, क्योंकि वही से वास्तविक शिक्षा की शुरुआत होती है ।

सुनीता त्रिपाठी, सनबीम ग्रामीण स्कूल

 

Friday, May 15, 2026

किशोरावस्था की चुनौतियां: सनबीम ग्रामीण स्कूल

किशोरावस्था जीवन का एक ऐसा चरण है जिसमें व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कई बदलावों से गुजरता है। इस अवस्था में विद्यार्थियों को पढ़ाई का दबाव, करियर की चिंता, दोस्तों का प्रभाव और अपनी पहचान बनाने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे तनाव और उलझन महसूस होती है। ऐसी स्थिति में, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन और सहयोग न मिले, तो वे गलत दिशा में भी जा सकते हैं।

मेरा मानना है कि किशोरावस्था वाले विद्यार्थियों के साथ धैर्य और प्रेम पूर्ण व्यवहार करना बहुत आवश्यक है। उनसे खुलकर उनकी पसंद और नापसंद के बारे में बातचीत करना और अपना सहयोग देना भी जरूरी है, इससे उनमें आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का विकास हो सकता है जो उन्हें सही मार्गदर्शन की ओर अग्रसर कर सकता है।

सरोज पटेल

किशोरावस्था की गलतियों पर जो पाठ हम लोगों ने पढ़ा इस अंश को पढ़ने के   बाद मुझे अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आया। किशोरावस्था के बच्चों में साथियों के प्रभाव को बहुत जल्दी देखा जा सकता है। एक बार कक्षा के कुछ बच्चे आपस में मजाक करते-करते एक दूसरे की नकल उड़ानें लगे। धीरे धीरे यह आदत पूरी कक्षा में फैलने लगी और कुछ बच्चे मानसिक रूप से दुखी रहने लगे। 

शुरुआत में मुझे लगा कि केवल डांट देने से समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन बाद में मैंने बच्चों से शांतिपूर्वक बात चीत की। मैंने उन्हें समझाया कि मजाक और अपमान में बहुत अंतर होता है। मैंने पूरी कक्षा के साथ एक चर्चा करवाई, जिसमें बच्चों ने अपने मन की बात की। जब बच्चों को यह महसूस हुआ कि उनके शब्द किसी को चोट पहुंचा सकते हैं, तब उन्होंने अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया। कौन है यह धीरे-धीरे बात कर रहा है इसके बाद मैं कक्षा में एक दूसरे का सम्मान विषय पर समूह गतिविधियां करवाई। बच्चों को सकारात्मक शब्द बोलने और अपने मित्रों की अच्छाइयां बताने के लिए प्रेरित किया गया। कुछ ही दिनों में कक्षा का वातावरण पहले से अधिक शांत और सहयोगपूर्ण हो गया। 

इस अनुभव से मुझे यह सीख मिली कि किशोरावस्था में बच्चे कई बार बिना सोचे-समझे गलतियाँ कर बैठते हैं। ऐसे समय में शिक्षक का धैर्य, सही संवाद और सकारात्मक मार्गदर्शन बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि बच्चों को सही समय पर समझाया जाए, तो उनकी ग गलतियां भी उनके लिए एक अच्छी सीख बन सकती है 
सुनीता त्रिपाठी

Sunday, May 10, 2026

किशोर मन को समझने की सीख - गुलाबी

आज विद्यालय में हमने सभी शिक्षकों के साथ आयोजित बैठक में “किशोरों को समझना एवं उनका मार्गदर्शन करना” विषय पर चर्चा की। इस चर्चा ने मुझे एक शिक्षक के रूप में अपने दृष्टिकोण, व्यवहार और कार्यप्रणाली पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया।

किशोरावस्था एक ऐसी संवेदनशील अवस्था है, जिसमें बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर तेजी से परिवर्तन होते हैं। बैठक के दौरान मुझे अलग-अलग शिक्षकों की राय जानने एवं समझने का मौका मिला। कई बार हम शिक्षक विद्यार्थियों के व्यवहार को अनुशासनहीनता या अवज्ञा के रूप में देख लेते हैं, जबकि वास्तव में वह उनके अंदर चल रहे द्वंद्व, असुरक्षा या पहचान की खोज का परिणाम होता है। इसलिए, सबसे पहले हमें उनके व्यवहार के पीछे के कारणों को समझना आवश्यक है।

इस चर्चा के दौरान हमें यह भी पता चला कि किशोरों के साथ कठोरता की बजाय सहानुभूति, संवाद और विश्वास का संबंध बनाना अधिक प्रभावी होता है। यदि छात्र अपने शिक्षक को एक मार्गदर्शक और मित्र के रूप में देखते हैं, तो वे अपनी समस्याएँ खुलकर साझा करते हैं। इससे उनके अंदर का तनाव कम होता है और वे सही दिशा में आगे बढ़ पाते हैं।

इस बातचीत के दौरान एक महत्वपूर्ण बिंदु यह सामने आया कि आज के किशोर सोशल मीडिया, पारिवारिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की चिंता जैसी कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में शिक्षक की भूमिका केवल विषय पढ़ाने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें एक सलाहकार (counsellor) की भूमिका भी निभानी चाहिए।

एक शिक्षक ने बताया कि हमें विद्यार्थियों के साथ सकारात्मक और सहायक वातावरण बनाना चाहिए। नियमित संवाद, प्रेरणा और प्रोत्साहन के माध्यम से हम उन्हें सही दिशा दिखा सकते हैं। हर विद्यार्थी अलग होता है, इसलिए उनके अनुसार मार्गदर्शन देना जरूरी है।

सभी शिक्षकों से बातचीत के दौरान हमें यह महसूस हुआ कि एक सफल शिक्षक वही है, जो केवल ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि अपने विद्यार्थियों के जीवन को सही दिशा देने में भी सहायक होता है। यह बैठक मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक रही और मैं भविष्य में अपने शिक्षण कार्य में इन विचारों को अवश्य लागू करने का प्रयास करूँगी।

गुलाबी, सनबीम ग्रामीण स्कूल

Saturday, April 4, 2026

गलतियाँ नहीं, सुधार के अवसर - सुनीता त्रिपाठी

बच्चों की गलतियों पर चर्चा करें या ना करें — इस संदर्भ में एक छोटा सा लेख

बच्चों की गलतियों पर चर्चा तभी सही है जब उसका उद्देश्य सुधार और मार्गदर्शन हो। यह विचार एक शिक्षक के वास्तविक कर्तव्य को दर्शाता है। एक शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व को संवारने वाला मार्गदर्शक होता है। इसलिए जब भी बच्चे से कोई गलती होती है, तो उसे एक अवसर की तरह देखना चाहिए, न कि दोष के रूप में।

मुझे ऐसा लगता है कि शिक्षक संवेदनशीलता और गोपनीयता बनाए रखते हुए बच्चे को समझाएँ। इससे उसके अंदर सुधार की इच्छा आती है और वह बिना डर के अपनी कमियों को स्वीकार कर पाता है। इसके विपरीत, यदि उसकी गलती को सार्वजनिक रूप से उजागर किया जाए, तो उसके मन में डर, संकोच और हीन भावना उत्पन्न हो सकती है।

सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने वाला शिक्षक बच्चों के मन में विश्वास और अपनापन पैदा करता है। यही विश्वास बच्चों को आगे बढ़ने और सीखने के लिए प्रेरित करता है। एक बच्चा स्कूल में शिक्षक पर विश्वास करता है। एक शिक्षक वही है, जो बच्चे की गलतियों को छुपाकर नहीं, बल्कि समझदारी और संवेदनशीलता के साथ सुधारने का प्रयास करता है, ताकि बच्चा एक अच्छा और आत्मविश्वासी इंसान बन सके।

सनबीम ग्रामीण स्कूल
सुनीता त्रिपाठी

Friday, March 20, 2026

कक्षा में बच्चों के अनुशासनहीन या उद्दंड व्यवहार पर शिक्षक की भूमिका - गुलाबी

"कक्षा में बच्चों के अनुशासनहीन या उद्दंड व्यवहार पर शिक्षक की भूमिका"

कक्षा में बच्चों का अनुशासनहीन या उद्दंड व्यवहार होना एक सामान्य स्थिति है। एक प्रभावी शिक्षक वही होता है, जो बच्चों के उद्दंड व्यवहार को समस्या नहीं, बल्कि उन्हें समझने और सुधारने का अवसर मानता है।

एक शिक्षक के रूप में हमारी भूमिका केवल दंड देने की नहीं होती, बल्कि बच्चों को समझने, मार्गदर्शन देने और सही दिशा में प्रेरित करने की होती है।

एक शिक्षक के रूप में सबसे पहले हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं। कई बार बच्चे ध्यान आकर्षित करने, किसी समस्या या तनाव के कारण, या फिर पढ़ाई में रुचि न होने के कारण अनुशासनहीन हो जाते हैं। इसलिए सबसे पहले हमें उनकी बातों को धैर्य और सहानुभूति के साथ सुनना चाहिए।

कक्षा को सही ढंग से संभालने के लिए बच्चों को रोचक गतिविधियों और समूह कार्यों में शामिल करना चाहिए। अच्छे व्यवहार के लिए बच्चों की प्रशंसा करनी चाहिए।

शिक्षक का उद्देश्य बच्चों को डरा कर अनुशासन में लाना नहीं, बल्कि उनमें आत्म-अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना होना चाहिए।

गुलाबी, सनबीम ग्रामीण स्कूल

Monday, November 29, 2021

संकल्पशीलता: सुरेश सिंह नेगी

संकल्पशील होना आज के दौर में बहुत जरूरी है क्योंकि संकल्पशील होकर ही आप अपने लक्ष्य  को प्राप्त कर सकते हैं। विजेता कभी हार नहीं मानते और हार मानने वाले कभी नहीं जीतते। चाहे आप इसे दृढ़ संकल्प कहें, धैर्य कहें या मेहनत, चलते रहने की इच्छा सफलता का एक महत्वपूर्ण घटक है। वास्तव में संकल्पशील होना स्मार्ट होने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बुद्धि और प्रतिभा स्वाभाविक रूप से निष्क्रिय गुण है, लेकिन दृढ़ संकल्प सक्रिय है। इसका मतलब है कि जन्मजात प्रतिभाएँ अवसर पैदा कर सकती हैं, लेकिन उन अवसरों को साकार करने के लिए वास्तविक कार्य करना होगा। कड़ी मेहनत इतनी महत्वपूर्ण है कि, भले ही आपके पास औसत स्तर की प्रतिभा हो, फिर भी आपके  पास जो कुछ भी है उसे सफलता में बदलने के लिए दृढ़ संकल्प का होना अति आवश्यक है।

दृढ़ संकल्प एक लक्ष्य पर केंद्रित रहने के बारे में है। और जब तक आपके पास एक लक्ष्य है, आप उस लक्ष्य के लिए रास्ता बना सकते हैं, जो आप चाहते हैं।

इसके के लिए आपको छोटे-छोटे लक्ष्यों को लेकर संकल्प लेना चाहिए क्योंकि बड़े से बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर बूँद-बूँद करके ही घड़ा भरता है, एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाने के लिए भी एक बच्चे को कई छोटी-छोटी परीक्षाएँ देनी पड़ती हैं। संकल्पशील होने के लिए मन की शक्ति का होना बहुत जरूरी है। मन एक चलायमान है क्योंकि पूरी दुनिया में मन से तेज कोई भी चीज नहीं दौड़ती है। इसलिए मन को एक जगह पर एकाग्र करना चाहिए और अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

अतः अपना ध्यान भविष्य पर केंद्रित करें, अतीत को आपका मार्गदर्शन करने दें।

कल की गलतियाँ आपके लिए सबक होनी चाहिए, निराशा की वजह नहीं। अपने आप पर यकीन रखें क्योंकि आप ही हैं जो अपने जीवन को नियंत्रित कर सकते हैं। सबसे कठिन क्षणों में भी, आपको ही तय करना है कि आपको आगे क्या करना है। अपने लक्ष्यों तक पहुँचने की अपनी क्षमता पर विश्वास करें। लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। यदि आप संकल्पशील और सकारात्मक रहते हैं, तो आप भी अपना मुकाम हासिल कर सकते हैं।

Suresh Singh Negi
The Fabindia School
sni@fabindiaschools.in

Tuesday, June 1, 2021

गुरु का जीवन मे महत्व: ज्योति सैन

गुरु: ब्रह्मा गुरु: विष्णु, गुरु:.देवो महेश्वर:
 गुरु:.साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः”।

यह गुरु ब्रह्मा विष्णु और महेश की तरह होते हैं गुरु ईश्वर का दिया वह उपहार है जो बिना स्वार्थ के मार्गदर्शन करता है। गुरु का जीवन में होना विशेष मायने रखता है गुरु हमारे दुर्गुणों को हटाता है गुरु के बिना हमारा जीवन अंधकारमय होता है अंधेरे में जैसे हम कोई चीज टटोलते हैं, और नहीं मिलती है वैसे गुरु के बिना जिंदगी अंधकारमय बन जाती है। जहाँ ज्ञान व संस्कार कुछ भी सीखने व पाने जैसा नहीं होता है।

गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। माता-पिता हम सभी के प्रथम गुरु होते हैं परंतु एक आध्यात्मिक गुरु का होना जीवन का मार्ग बदलने की तरह होता है। गुरु इस संसार का सबसे शक्तिशाली उपहार होता है। हम कोई भी विद्या बिना गुरु अर्जित नही कर सकते है। विभिन्न क्रिया-कौशल सीखने के लिए अलग-अलग गुण के गुरु की आवश्यकता होती है।

 गुरु शिष्य की परंपरा सदियों से चली आ रही है इस परंपरा का पालन करने वाला ही सच्चा गुरु व शिष्य कहलाएगा तथा तभी उसका जीवन सार्थक वह गौरवशाली बन पाएगा। गुरु को अपनी मर्यादा पालते हुए आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करनी चाहिए और अगर शिष्य गुरु के प्रति समर्पित होकर शिक्षा लेता है तो कोई बाधाएँ उन्हें रोक नहीं सकती और वह एक महान लक्ष्य को हासिल करता है।

Jyoti Sain 
The Fabindia School, Bali 

Friday, September 11, 2020

स्नेह और गुणवत्ता: कृष्ण गोपाल


वर्तमान युग में गुणवत्ता का विशेष महत्व है क्योंकि हर व्यक्ति यह सोचता है कि गुणवत्ता युक्त वस्तुओं का सेवाओं का उपभोग किया जाए। स्वयं के लिए निश्चित रूप से गुणवत्ता युक्त वस्तुओं का चुनाव करेंगे। यहाँ एक कारण है जिससे गुणवत्ता युक्त वस्तुओं की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। ऐसा किसी एक क्षेत्र विशेष में नहीं बल्कि हर क्षेत्र में देखी जा सकती है।

व्यक्ति गुणवत्ता युक्त वस्तुओं का उपभोग करने में संतुष्टि का एहसास करता है। ऐसी वस्तुओं और बनाने वाली कंपनियों के प्रति लोगों को विश्वास होता है। इन वस्तुओं को क्रय करने में आर्थिक क्षति अवश्य हो सकती है किंतु वस्तु गुणवत्ता युक्त होगी, यह बात संतुष्टि का एहसास कराती है।

इसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में भी गुणवत्ता युक्त शिक्षा का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। शिक्षा के मायने बदलते जा रहे हैं। प्रयास किया जा रहा है कि शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात बेरोजगारी की समस्या पैदा ना हो।  हमारी शिक्षा प्रणाली में ऐसी व्यवस्था हो जिससे कि बालक अपने रूचि के क्षेत्र में जाए और अपना सृजनात्मक कौशल प्रकट करें। उसका मार्गदर्शन करने वाले भी ऐसे ही उत्कृष्ट हो जो उसकी रुचि को रोजगार में बदलने में सहायक हो।

हर बच्चे को सीखने के पर्याप्त अवसर मिले। किसी भी तरह का भेदभाव न करते हुए हर बच्चे को समान अवसर दिए जाए। सभी बालकों के स्तर समान नहीं होते हैं इसलिए अलग-अलग युक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अध्यापन करवाया जाना चाहिए। कोई भी बालक पिछड़ न जाये इसका विशेष ख्याल रखा जाए। ऐसे अवसर भी प्रदान किए जाएँ जिसमें बच्चे स्वयं करके सीखने का प्रयास करें। बच्चों को अपनी अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है तथा वे भावनात्मक रूप से स्वयं को सुरक्षित महसूस करें। इन सभी से बच्चों को सीखने के लिए एक साफ सुथरा माहौल मिलेगा जो बहुत आवश्यक है।

जहाँ स्नेह मिलता है, वहाँ बालक का मन रम जाता है। स्नेह प्रकट करने वालों के प्रति विश्वसनीय भावना जागृत हो जाती है। स्नेह पूर्ण वातावरण में बालक प्रसन्नता पूर्वक सीखने का प्रयास करता है। बालक के लिए स्नेह प्रकट करना एक औषधि की तरह है। सामान्य तौर पर ऐसा हर किसी के साथ हो सकता है-जहाँ प्रेम या स्नेह मिले वहाँ वातावरण खुशनुमा हो जाता है, ऐसे माहौल में सीखने की प्रक्रिया विशेष बलवती हो जाती है। अतः यह जरूरी हो जाता है कि शिक्षक अपने छात्रों से स्नेह युक्त व्यवहार करें।

स्नेह और गुणवत्ता दोनों मूल्य जहाँ मिल जाते हैं वहाँ निश्चित रूप से सीखने की प्रक्रिया और वातावरण दोनों ही अनुकूल हो जाते हैं। यदि वास्तविकता में देखा जाए तो उपर्युक्त दोनों मूल्य एक शिक्षक में होने परम आवश्यक है।  जिन शिक्षकों के पास यह दोनों मूल्य मिल जाते हैं वह बालकों के कोमल मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाने में कामयाब होते हैं। अतः अपने कार्य में गुणवत्ता लाकर तथा बच्चों को स्नेह देकर अध्यापन के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया जा सकता है।
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali 

Saturday, July 4, 2020

एकता और देखभाल: कृष्ण गोपाल


एकता में बहुत शक्ति होती है। एकता, सामूहिक कार्यों को बढ़ावा देती है, लोगों में आत्मविश्वास उत्पन्न करती है और आगे की ओर बढ़ने के लिए प्रेरणा देती है तथा उनका मार्गदर्शन भी करती है। कई कार्यों में एकता की मिसाल देखी जाती है- वैसे एकता के लिए हमने बचपन में बहुत सारी कहानियाँ सुनी है। एक लकड़ी आसानी से टूट सकती है लेकिन लकड़ियों का बंडल नहीं टूट सकता। एकता के और भी उदाहरण देखने को मिलते हैं जैसे चीटियाँ, मधुमक्खियाँ आदि यह सब मिलकर अपना काम पूरा करती है।

स्वतंत्रता आंदोलन के वक्त भारतीय नेताओं ने यहाँ की जनता को भावनात्मक रूप से एक किया और उसी का यह परिणाम था कि हमें आजादी प्राप्त हुई इस तरह से विघटनकारी शक्तियों का विनाश हुआ। कुछ स्थानों पर देखते हैं कि भाषा, धर्म या जाति के आधार पर लोगों में एकजुटता नहीं रही है। लेकिन ऐसा सब जगह नहीं है, कई स्थानों पर हमें आज भी वही एकता-अखंडता देखने को मिलती है। वैसे भी भारत तो विभिन्नता में एकता वाला देश है। हमारे लिए एकता का स्रोत है, भारतीय साहित्य और दर्शन। ये कई भाषाओं में लिखे गए हैं। कोई भी काम धैर्य पूर्वक एकता पूर्वक करेंगे तो वह निश्चित रूप से सफल होगा।

विद्यार्थियों के लिए भी यह जरूरी है कि विद्यालय में कक्षा में एकता की भावना रखें। एकता की भावना सीखने का बच्चों के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन है, खेल। खेल में जिस तरह से वह टीम बनाकर सामने वाली टीम से मुकाबला करते हैं और विजय प्राप्त करते हैं। इससे बढ़कर और कोई उदाहरण नहीं हो सकता है। इसी तरह से किसी मकान का बनना या किसी आंदोलन का सफल होना या कोई और काम जो किसी अकेले द्वारा नहीं हो सकता, उनकी सफलता का मंत्र जो है वह एकता ही है। एकता से ही हम बहुत काम सिद्ध कर सकते हैं। हमारा कोई काम ना बिगड़े सही ढंग से होता रहे यदि हम एकता पूर्वक रहेंगे तो हमें कोई आँख नहीं दिखा सकता।

यह तो बात हो गई एकता की, लेकिन यदि हम एकता को लंबे समय तक बनाए रखना है तो जरूरी है कि जो टीम है या जो भी व्यक्ति है, वह एक दूसरे की देखभाल करें, एक दूसरे के विचारों से सहमत हो। यदि ना हो सहमत तो अपनी राय दे सकते हैं लेकिन वह भी विनम्रता पूर्वक। अगर हम एक दूसरे की देखभाल करेंगे तो एकता घनिष्ठ होगी और जब एकता घनिष्ठ होगी तो उसके परिणाम भी सकारात्मक होंगे यदि सदस्यों में आपसी फूट हो तो किसी प्रकार की कोई समस्या का निदान नहीं हो सकता।

माँ अपने बच्चों की देखभाल करती हैं, पिता करते हैं, ठीक उसी प्रकार हमें भी हमारे सहयोगी की देखभाल करनी चाहिए। उसके दुख में उसे सांत्वना दें, खुशी में स्वयं भी खुश हो। अगर कोई परेशानी हो तो उससे निजात दिलाने का प्रयत्न हमारे द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए। जब तक हम इस तरह अपनत्व का परिचय नहीं देंगे तब तक सामने वाले व्यक्ति के मन में एकता की भावना पैदा नहीं कर सकते। बहुत बड़े-बड़े संगठन हुए हैं, जो एकता के दम पर चल रहे हैं और उसमें यही महत्वपूर्ण है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की अच्छे से देखभाल करता है। इसलिए जरूरी है कि हम अपने संगठन या व्यक्ति का ध्यान रखें, उसकी देखभाल करें। आवश्यकता होने पर उसकी सहायता करें, उसका विश्वास प्राप्त करने की कोशिश करें। हो सकता है, कई बार इसमें नाकामयाब भी हो लेकिन प्रयत्न करना मनुष्य का कर्तव्य है बिना प्रयत्न के हार मान जाना मनुष्य का काम नहीं है।

हमें अपना कर्म करना है लोगों की देखभाल करते हुए उन को एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास करना है। यह आवश्यक है कि हम यह शुरुआत परिवार से करें। खुशी से रहिए, आनंद उठाइए एकता के सूत्र में रहिए और एक दूसरे की अच्छे से देखभाल करते रहिए। विद्यालयों में यह दायित्व एक अध्यापक का हो जाता है कि वह अपने बच्चों की देखभाल करें, उनको एक साथ एकता के सूत्र में बाँधने का काम करें। तभी उसका जीवन सार्थक है, उसके विद्यार्थी आपसी एकता रखेंगे।

Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali

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