Showing posts with label किशोरावस्था. Show all posts
Showing posts with label किशोरावस्था. Show all posts

Sunday, May 17, 2026

स्टाफ रूम का अनुभव एवं किशोरावस्था में छात्रों के प्रति शिक्षक के विचार : मंजुला सागर

मेरे अनुभव के अनुसार, स्टाफ रूम केवल शिक्षकों के बैठने का स्थान नहीं, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान का स्थान होता है। वहाँ शिक्षकों को बच्चों की समस्याओं, उनकी प्रगति और उनके व्यवहार पर सकारात्मक विचार करने की जगह होती है। जहाँ यदि शिक्षक केवल शिकायतें करते हैं, तो बच्चों के प्रति नकारात्मक सोच बन जाती है। लेकिन जब शिक्षक मिलकर बच्चों को बेहतर बनाने के उपाय सोचते हैं, तब विद्यालय का वातावरण अच्छा बनता है और बच्चों का संपूर्ण विकास भी होता है। स्टाफ रूम में सभी शिक्षकों के अपने अलग-अलग विचार होते हैं।

किशोरावस्था एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बच्चों के अंदर कई आंतरिक और हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसमें बच्चों के अंदर चिड़चिड़ापन, जिज्ञासा, सही-गलत की पहचान न होना इत्यादि बदलाव होते हैं, जिन्हें समझना, उनके साथ सहयोगपूर्ण एवं संवेदनशील बर्ताव करना, उनकी भावनाओं को समझना, उनका सम्मान करना, उनकी समस्याओं को हल करना इत्यादि बातें शामिल हैं।

इस पाठ से यह भी महसूस होता है कि कई बार बच्चों की पसंद और नापसंद को समझे बिना उन पर पढ़ाई का दबाव डाल दिया जाता है। इससे बच्चे पढ़ाई को बोझ समझने लगते हैं। यदि शिक्षक बच्चों की रुचि के अनुसार गतिविधियाँ कराएँ, उन्हें बोलने का अवसर दें और उनकी छोटी-छोटी सफलताओं की प्रशंसा करें, तो सीखना आनंददायक बन सकता है।

मंजुला सागर
सनबीम ग्रामीण स्कूल

Friday, May 15, 2026

किशोरावस्था की चुनौतियां: सनबीम ग्रामीण स्कूल

किशोरावस्था जीवन का एक ऐसा चरण है जिसमें व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कई बदलावों से गुजरता है। इस अवस्था में विद्यार्थियों को पढ़ाई का दबाव, करियर की चिंता, दोस्तों का प्रभाव और अपनी पहचान बनाने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे तनाव और उलझन महसूस होती है। ऐसी स्थिति में, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन और सहयोग न मिले, तो वे गलत दिशा में भी जा सकते हैं।

मेरा मानना है कि किशोरावस्था वाले विद्यार्थियों के साथ धैर्य और प्रेम पूर्ण व्यवहार करना बहुत आवश्यक है। उनसे खुलकर उनकी पसंद और नापसंद के बारे में बातचीत करना और अपना सहयोग देना भी जरूरी है, इससे उनमें आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का विकास हो सकता है जो उन्हें सही मार्गदर्शन की ओर अग्रसर कर सकता है।

सरोज पटेल

किशोरावस्था की गलतियों पर जो पाठ हम लोगों ने पढ़ा इस अंश को पढ़ने के   बाद मुझे अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आया। किशोरावस्था के बच्चों में साथियों के प्रभाव को बहुत जल्दी देखा जा सकता है। एक बार कक्षा के कुछ बच्चे आपस में मजाक करते-करते एक दूसरे की नकल उड़ानें लगे। धीरे धीरे यह आदत पूरी कक्षा में फैलने लगी और कुछ बच्चे मानसिक रूप से दुखी रहने लगे। 

शुरुआत में मुझे लगा कि केवल डांट देने से समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन बाद में मैंने बच्चों से शांतिपूर्वक बात चीत की। मैंने उन्हें समझाया कि मजाक और अपमान में बहुत अंतर होता है। मैंने पूरी कक्षा के साथ एक चर्चा करवाई, जिसमें बच्चों ने अपने मन की बात की। जब बच्चों को यह महसूस हुआ कि उनके शब्द किसी को चोट पहुंचा सकते हैं, तब उन्होंने अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया। कौन है यह धीरे-धीरे बात कर रहा है इसके बाद मैं कक्षा में एक दूसरे का सम्मान विषय पर समूह गतिविधियां करवाई। बच्चों को सकारात्मक शब्द बोलने और अपने मित्रों की अच्छाइयां बताने के लिए प्रेरित किया गया। कुछ ही दिनों में कक्षा का वातावरण पहले से अधिक शांत और सहयोगपूर्ण हो गया। 

इस अनुभव से मुझे यह सीख मिली कि किशोरावस्था में बच्चे कई बार बिना सोचे-समझे गलतियाँ कर बैठते हैं। ऐसे समय में शिक्षक का धैर्य, सही संवाद और सकारात्मक मार्गदर्शन बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि बच्चों को सही समय पर समझाया जाए, तो उनकी ग गलतियां भी उनके लिए एक अच्छी सीख बन सकती है 
सुनीता त्रिपाठी

Sunday, May 10, 2026

किशोर मन को समझने की सीख - गुलाबी

आज विद्यालय में हमने सभी शिक्षकों के साथ आयोजित बैठक में “किशोरों को समझना एवं उनका मार्गदर्शन करना” विषय पर चर्चा की। इस चर्चा ने मुझे एक शिक्षक के रूप में अपने दृष्टिकोण, व्यवहार और कार्यप्रणाली पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया।

किशोरावस्था एक ऐसी संवेदनशील अवस्था है, जिसमें बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर तेजी से परिवर्तन होते हैं। बैठक के दौरान मुझे अलग-अलग शिक्षकों की राय जानने एवं समझने का मौका मिला। कई बार हम शिक्षक विद्यार्थियों के व्यवहार को अनुशासनहीनता या अवज्ञा के रूप में देख लेते हैं, जबकि वास्तव में वह उनके अंदर चल रहे द्वंद्व, असुरक्षा या पहचान की खोज का परिणाम होता है। इसलिए, सबसे पहले हमें उनके व्यवहार के पीछे के कारणों को समझना आवश्यक है।

इस चर्चा के दौरान हमें यह भी पता चला कि किशोरों के साथ कठोरता की बजाय सहानुभूति, संवाद और विश्वास का संबंध बनाना अधिक प्रभावी होता है। यदि छात्र अपने शिक्षक को एक मार्गदर्शक और मित्र के रूप में देखते हैं, तो वे अपनी समस्याएँ खुलकर साझा करते हैं। इससे उनके अंदर का तनाव कम होता है और वे सही दिशा में आगे बढ़ पाते हैं।

इस बातचीत के दौरान एक महत्वपूर्ण बिंदु यह सामने आया कि आज के किशोर सोशल मीडिया, पारिवारिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की चिंता जैसी कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में शिक्षक की भूमिका केवल विषय पढ़ाने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें एक सलाहकार (counsellor) की भूमिका भी निभानी चाहिए।

एक शिक्षक ने बताया कि हमें विद्यार्थियों के साथ सकारात्मक और सहायक वातावरण बनाना चाहिए। नियमित संवाद, प्रेरणा और प्रोत्साहन के माध्यम से हम उन्हें सही दिशा दिखा सकते हैं। हर विद्यार्थी अलग होता है, इसलिए उनके अनुसार मार्गदर्शन देना जरूरी है।

सभी शिक्षकों से बातचीत के दौरान हमें यह महसूस हुआ कि एक सफल शिक्षक वही है, जो केवल ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि अपने विद्यार्थियों के जीवन को सही दिशा देने में भी सहायक होता है। यह बैठक मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक रही और मैं भविष्य में अपने शिक्षण कार्य में इन विचारों को अवश्य लागू करने का प्रयास करूँगी।

गुलाबी, सनबीम ग्रामीण स्कूल

Friday, August 2, 2024

Right vs Wrong - Shalini Tiwari

किशोरावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें बच्चों में बहुत सारे बदलाव आते हैं शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक बदलाव, जिसका प्रभाव उनके व्यवहार पर पड़ता है। उनके अंदर जोश उत्साह के साथ कई बार उदासीनता भी जाती है जिसे हम अभिभावक नहीं समझ पाते और बच्चों से कह देते हैं कि तुम्हारी संगत ठीक नहीं जबकि वास्तव में, बच्चे असमंजस में रहते हैं कि क्या सही है और क्या गलत ? उसके लिए भी कहीं--कहीं हम अभिभावक ही जिम्मेदार होते हैं क्योंकि कभी हम उन्हें वयस्कों की तरह बर्ताव करने को कहते और कभी उन्हें बच्चों में गिनती करते हैं |

कई बार इस उम्र में बच्चे अर्थपूर्ण बात नहीं करते हैं इसका कारण शारीरिक विकास, व्यवहारिक ज्ञान एवं दिमागी विकास एक साथ जुड़ ना पाना हैं क्योंकि मस्तिष्क का एक भाग अभी भी विकसित हो रहा होता है इसलिए किशोरावस्था में बच्चे इतने दूरदर्शी नहीं होते हैं , वे तो बस प्रयोग करते रहते हैं जिससे कई बार वे मुसीबत में भी फँस जाते हैं ऐसी स्थिति में इस उम्र के उतार-चढ़ाव को अभिभावक एवं अध्यापकों को समझना होगा।

जिस प्रकार अपने बच्चों के व्यवहार में जरा भी परिवर्तन दिखाई देने पर हमारे मन में संदेहास्पद स्थिति पैदा हो जाती है और हम सतर्क हो जाते है उसी प्रकार विद्यालय में भी एक अध्यापक को सतर्क रहना चाहिए। यदि छात्र में दैनिक व्यवहार से हटकर कुछ परिवर्तन महसूस हो तो हम बच्चे को विश्वास में लेकर उसकी मन: स्थिति को जानने का प्रयास करें , यह तभी संभव है जब आपके प्रति छात्र के मन में विश्वास हो जिससे कभी वह विद्रोह की भावना या सहपाठियों के दबाव से गलत संगत में जा भी रहा हो तो आप उसे बड़ी सफलता से उस स्थिति से उबार सकते है।

Shalini Tiwari 
Sunbeam school Indiranagar

Sunday, August 30, 2020

किशोरावस्था में बच्चों को समझाना और समझना - Kusum Dangi

किशोरावस्था  का  अर्थ हैं  बढ़ना  या  विकसित होना  इस अवस्था में अनेक परिवर्तन होते हैं जैसे - शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक इस  समय  में  अधिक  बदलाव  के कारण  बच्चों को  अनेक कठिनाइयों  का सामना  करना पड़ता  हैं। वे अचानक  से हूए  वह शारीरिक परिवर्तन   को अनुभव तो कर सकते हैं परंतु समझ नहीं पाते हैं वह इन  परिवर्तनों के विषय में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं इसके लिए या तो  सहकर्मी   आयु  की मदद लेते  है  या गुमराह करने वाले साहित्य पर निर्भर हो जाते हैं।  गलत  जानकारी  मिलने  से वे और भी  परेशान हो जाते हैं  इससे उनके मानसिक और शारिरिक  विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता हैं।  

इस दौरान परिवार की अहम  भूमिका होती है क्योंकि   इस समय  जरूरत होती हैं  उन्हें समझने की जैसे-जैसे  वे इस अवस्था  में प्रवेश करते हैं वे अपनी पहचान बनाना चाहते हैं इसलिए उनको अपने स्वयं के    निर्णय लेने  और अपने स्वयं के कार्य की जिम्मेदारी लेने के अवसरों को प्रदान करने  की जरूरत हैं  अगर वह कोई गलती करे  तो उनको समझाएं और  सही करने में सहयोग करें इस अवस्था में उनको समझाना बहुत आवश्यक हैं  इसके लिए माता -पिता को  पहले उनके अच्छे दोस्त बनने की आवश्यकता हैं  क्योंकि  इस दौरान उनको कोई समस्या आती हैं तो वे इस बारे में आपसे  बात करेंगे  उनके ऊपर विश्वास करे तथा उनको  जिम्मेदार बनाए इसके लिए उन्हें कोई भी जरूरी कार्य दे और करने के लिए कहे सबसे आवश्यक है वह कुछ भी बात करें या करें तो उन पर विश्वास करें।

Kusum Dangi
The Fabindia Schools
kdi@fabinndiaschools.in

Sunday, April 19, 2020

मझधार में ज़िन्दगी (जीवन धारा)

(मानव जीवन की कई अवस्थाएँ होती है, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था | वैसे तो बाल्यावस्था, किशोरावस्था और युवावस्था में जीवन सम्बन्धी धारणाये बिलकुल निराली होती है, यह अवस्था अल्हड़पन में ही गुजर जाता है, किन्तु प्रौढ़ावस्था तक पहुँचते-पहुँचते मानव यह सोचने लगता की उसने अपने जीवन में क्या पाया और क्या खोया| यह कविता जीवन दर्शन पर आधारित है |)

न जाने कब, किस करवट, किस और चल रही ज़िन्दगी |
स्वप्न पूरी करने, किस और मुड  चली  ज़िन्दगी |
अधूरे ख्वाब पूरी करने की, प्रयास में मुड़ चली ज़िन्दगी |
धैर्य, हौसला, उत्साह, हिम्मत को सजोने लगी ज़िन्दगी |
                                       
कितनी रातें, कितने दिन प्रयास में बीती ज़िन्दगी |
कुछ सफ़लता,  कुछ आशा, कुछ उम्मीद में कट रही ज़िन्दगी |
यही सोचते-सोचते न जाने कब, मझधार में आ फँसी ज़िन्दगी |
समय के तेज़ प्रवाह में किस ओर बह चली ज़िन्दगी |
नाव में सवार पथिक की तरह है यह ज़िन्दगी |
मझधार में बवण्डर और तूफानों से जूझ रही ज़िन्दगी |
भँवर में और तेज़, आँधी, तूफ़ान, बवण्डरों से लड़ रही ज़िन्दगी |
नाव में बैठे पथिक की तरह शंकातुर ज़िन्दगी.. . |
दिन के उजाले में भी  धूल, धूसड़, अँधियारे सी ज़िन्दगी |
अब,  ज़िन्दगी और मौत के ख़ौफ़ से बे ख़ौफ़ ज़िन्दगी |
अब, परिणाम की परवाह से, बेफिक्र ज़िन्दगी…. |
सिर्फ़ ज़िन्दगी या हो मौत, आलिंगन को बेताब ज़िन्दगी |
धर्मेन्द्र पोद्दार 
                                                                                               भाषा विभाग प्रमुख, सेक्रेड हार्ट स्कूल, सिलीगुड़ी

Blog Archive