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Friday, May 15, 2026

किशोरावस्था की चुनौतियां: सनबीम ग्रामीण स्कूल

किशोरावस्था जीवन का एक ऐसा चरण है जिसमें व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कई बदलावों से गुजरता है। इस अवस्था में विद्यार्थियों को पढ़ाई का दबाव, करियर की चिंता, दोस्तों का प्रभाव और अपनी पहचान बनाने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे तनाव और उलझन महसूस होती है। ऐसी स्थिति में, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन और सहयोग न मिले, तो वे गलत दिशा में भी जा सकते हैं।

मेरा मानना है कि किशोरावस्था वाले विद्यार्थियों के साथ धैर्य और प्रेम पूर्ण व्यवहार करना बहुत आवश्यक है। उनसे खुलकर उनकी पसंद और नापसंद के बारे में बातचीत करना और अपना सहयोग देना भी जरूरी है, इससे उनमें आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का विकास हो सकता है जो उन्हें सही मार्गदर्शन की ओर अग्रसर कर सकता है।

सरोज पटेल

किशोरावस्था की गलतियों पर जो पाठ हम लोगों ने पढ़ा इस अंश को पढ़ने के   बाद मुझे अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आया। किशोरावस्था के बच्चों में साथियों के प्रभाव को बहुत जल्दी देखा जा सकता है। एक बार कक्षा के कुछ बच्चे आपस में मजाक करते-करते एक दूसरे की नकल उड़ानें लगे। धीरे धीरे यह आदत पूरी कक्षा में फैलने लगी और कुछ बच्चे मानसिक रूप से दुखी रहने लगे। 

शुरुआत में मुझे लगा कि केवल डांट देने से समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन बाद में मैंने बच्चों से शांतिपूर्वक बात चीत की। मैंने उन्हें समझाया कि मजाक और अपमान में बहुत अंतर होता है। मैंने पूरी कक्षा के साथ एक चर्चा करवाई, जिसमें बच्चों ने अपने मन की बात की। जब बच्चों को यह महसूस हुआ कि उनके शब्द किसी को चोट पहुंचा सकते हैं, तब उन्होंने अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया। कौन है यह धीरे-धीरे बात कर रहा है इसके बाद मैं कक्षा में एक दूसरे का सम्मान विषय पर समूह गतिविधियां करवाई। बच्चों को सकारात्मक शब्द बोलने और अपने मित्रों की अच्छाइयां बताने के लिए प्रेरित किया गया। कुछ ही दिनों में कक्षा का वातावरण पहले से अधिक शांत और सहयोगपूर्ण हो गया। 

इस अनुभव से मुझे यह सीख मिली कि किशोरावस्था में बच्चे कई बार बिना सोचे-समझे गलतियाँ कर बैठते हैं। ऐसे समय में शिक्षक का धैर्य, सही संवाद और सकारात्मक मार्गदर्शन बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि बच्चों को सही समय पर समझाया जाए, तो उनकी ग गलतियां भी उनके लिए एक अच्छी सीख बन सकती है 
सुनीता त्रिपाठी

Sunday, September 28, 2025

उत्पादक विफलता का तीन-स्तरीय ढांचा - रवि प्रकाश

 उत्पादक विफलता के लिए तीन-स्तरीय ढांचा (कार्य, भागीदारी, सामाजिक परिवेश)

स्तर 1

  • सीखने वालों को विफलता के लिए तैयार करना: छात्रों को जोखिम लेने और विफलताओं को सीखने के अवसर के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित करना।

  • विकासशील मानसिकता का निर्माण: ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देना जो मानती है कि क्षमताएँ प्रयास और सीखने के माध्यम से विकसित की जा सकती हैं।

स्तर 2

  • प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करना: सीखने वालों को केवल परिणाम पर नहीं, बल्कि समस्या-समाधान की प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करना।

  • प्रयोग और अन्वेषण: सीखने वालों को विभिन्न समाधानों का प्रयोग और अन्वेषण करने के अवसर प्रदान करना।

स्तर 3

  • सीखने को संकलित करना: सीखने वालों को अपने अनुभवों पर चिंतन करने और प्रमुख निष्कर्षों की पहचान करने में मदद करना।

  • ज्ञान का पुनर्निर्माण: सीखने वालों को अपने अनुभवों के आधार पर अपने ज्ञान और समझ का पुनर्निर्माण करने के लिए प्रोत्साहित करना।

इस ढाँचे का उद्देश्य छात्रों के भीतर सहयोग की भावना विकसित करना, विभिन्न परिस्थितियों में सोचने की क्षमता बढ़ाना और समस्या-समाधान कौशल को सशक्त बनाना है।

सनबीम ग्रामीण स्कूल
रवि प्रकाश

Monday, August 29, 2022

उत्तरदायित्व और सहयोग - ज्योति तड़ियाल


उत्तरदायित्व – उत्तरदायित्व जीवन में यदि न हो तो मनुष्य कभी आगे नहीं बढ़ सकता। हमसब प्रत्येक परिस्थिति और परिणाम के उत्तरदाई स्वयं होते हैं। हमारे ऊपर कई उत्तरदायित्व होते हैं, जिनका हम निर्वहन करते हैं। एक शिक्षिका के रूप में हमारी उत्तरदायित्व बहुत बढ़ जाते हैं। कक्षा कक्ष में विद्यार्थियों के भविष्य के उत्तरदाई हम स्वयं हो जाते हैं। हम उस विद्यार्थी के प्रति उत्तरदाई हैं जो हमारे दिए ज्ञान को आत्मसात कर जीवन में आगे बढ़ता है, हम उन माता पिता के प्रति भी उत्तरदाई हैं जो अपने अबोध बालकों को हमें सौंपते हैं, हम उस संस्था के प्रति भी उत्तरदाई हैं जहां हम कार्य करते हैं। वैसे ही विद्यार्थी भी उत्तरदाई होते हैं। कक्षा में जब कार्य दिया जाता है तो सभी उसे पूरी मेहनत से करते हैं क्योंकि वे भी उत्तरदाई हैं। इस प्रकार हम सभी उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए जीवन मे आगे बढ़ते जाते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।

सहयोग – सहयोग एक ऐसी भावना है जो समाज की आधारशिला है। सहयोग के बिना मानव समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। जीवन में सभी को सहयोग चाहिए। विद्यार्थी जीवन में सहयोग की भावना अधिक बलवती होती है। कक्षा में सहयोग से अनेक कठिनाइयां दूर हो जाती हैं। कक्षा के लिए बोर्ड बनाना हो या प्रार्थना सभा कराना इन गतिविधियों में प्रत्येक का सहयोग होता है। एक अध्यापिका के रूप में मुझे भी सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह सहयोग अपने सहकर्मियों से , प्रधानाचार्य से, विद्यालय परिवार से और बच्चों से भी प्राप्त होता है। सहयोग लेना जितना आवश्यक है उतना ही सहयोग देना। सभी को साथ लेकर चलना है ताकि कर्तव्य पथ पर कोई छूट न जाए।

सहयोग की इसी भावना पर गुप्त जी की काव्य पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगी –

है कार्य ऐसा कौन सा, साधे न जिसको एकता।
देती नहीं अदभुद अलौकिक शक्ति किसको एकता।
दो एक एकादश हुए, किसने नहीं देखे सुने।
हां शून्य के भीर योग से हैं अंक होते सौ गुने।

प्रेषक – ज्योति तड़ियाल
द दून गर्ल्स स्कूल।

Monday, September 14, 2020

हमारी हिंदी: कृष्ण गोपाल

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

संविधान सभा में निर्णय लिया गया कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी और लिपि देवनागरी, प्रयोग में आने वाले अंको का रूप अंतरराष्ट्रीय होगा। गांधीजी के अनुसार हिंदी जनमानस की भाषा है। हिंदी में कई भाषाओं का समावेश है, कई बोलियों का समावेश है। और यही वजह है कि हिंदी भाषा में पूरे देश की संस्कृति की झलक दिखाई देती है।

संस्कृत से तो हिंदी का जुड़ाव विशेष है। हिंदी को कई कवियों और लेखकों ने संजोया है। भारतेंदुजी ने इसके खड़ी बोली के रूप का प्रचार किया तो जयशंकर प्रसाद ने कामायनी से परिचय करवाया। हरिऔंध जी ने प्रियप्रवास, दिनकर जी ने रश्मिरथी, बच्चनजी ने निशा निमंत्रण तो मैथिलीशरण जी ने साकेत जैसी रचनाओं से हिंदी विशिष्ठता प्रतिपादित की। वैसे तो ये सूचि बहुत छोटी है, ऐसा कह सकते है, ये तो एक झाँकी है। अपार साहित्य सृजन हो चुका है और होता जा रहा है। इन रचनाकारों ने हिंदी को समृद्ध किया। 

तुलसी का रामचरितमानस हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत करता है। पिता के साथ, माता के साथ, भाई के साथ, मित्र के साथ यहाँ तक कि शत्रु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए यह राम के चरित्र से ज्ञात हो जाता है। विनम्रता, सहयोग, आत्मविश्वास, साहस, संकल्प, क्षमा और भी कई जीवन मूल्यों का परिचय करवाया गया है।

यदि हम बात करें कबीरदास जी की तो उन्होंने सर्वधर्म समभाव की रूपरेखा समाज को दी। उनके अनुसार व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से होती है, ऊँचे कुल से नहीं। जो व्यक्ति विनम्र होता है सही अर्थों में वही ज्ञानी होता है। ईश्वर एक है और आडम्बर से प्राप्त नहीं होंगे, इसके लिए सत्कर्म कीजिए। इस प्रकार कई महान विभूतियों ने समाज का मार्गदर्शन किया, जीवन का उद्देश्य सबके समक्ष रखा। भगवद्गीता में भी कर्म करने की बात कही, यदि कर्म निष्ठा पूर्वक किया जाएगा तो परिणाम भी अनुकूल ही होगा, इसलिए फल की चिंता न करने की बात कही गई।

उपर्युक्त तथ्य केवल उदाहरणार्थ लिखे गए है, ऐसे साहित्यों की कतई कमी नहीं हैं जो हमें जीवन का पाठ पढ़ाए। आधुनिकता की दौड़ में हम कहीं यह न भूल जाएँ कि हमारा अपना साहित्य, संस्कृति और भाषा कितनी प्रगाढ़ है। सीखना सब चाहिए पर अपना भूल जाएँ यह तो उचित नहीं। विदेशी भाषाओं के प्रयोग पर गर्वान्वित महसूस न करें। गर्व अपनी चीजों का होना चाहिए। धोती-कुरता पहनने वाले को कमतर समझ लिया जाता है जो उचित नहीं है। पढ़ा-लिखा ज्ञानी होना केवल विदेशी पौशाक से ही प्रदर्शित होता है क्या ?

गर्व से हिंदी बोलिए, यह हमारी भाषा है, हमारी भाषा में हमारी संस्कृति है, हमारी पहचान है। अपनी पहचान और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए हिंदी का सम्मान कीजिए, प्रयोग कीजिए।
Krishan Gopal
The Fabindia School

Wednesday, July 29, 2020

परवाह और समझदारी: आयशा टॉक


परवाह का अर्थ है- किसी की सुविधा का ख्याल रखना, किसी की चिंता करना । उदाहरण के लिए एक माँ दुनिया में सबसे ज्यादा परवाह अपने बच्चों की करती है। वह किसी भी हालत में उन्हें दुखी और परेशान नहीं देख सकती है। ठीक इसी तरह एक अध्यापक भी अपने विद्यार्थियों के लिए बहुत ही चिंतित रहते है। उनकी बहुत परवाह करते हैं। उनको हमेशा यही चिंता रहती है, कि जो भी सिखाया जाये, वो सारे बच्चों को आना चाहिए।

इसी प्रकार विद्यार्थियों को भी अपने साथ में पढ़ने वाले अन्य विद्यार्थियों की चिंता करनी चाहिए उनको सहयोग देना चाहिए। बच्चों को बचपन से ही कोमल हृदय वाला बनाना चाहिए। उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि जो व्यक्ति हमारी परवाह करता है, हमें भी उनकी परवाह करनी चाहिए। हमें कोई भी ऐसी बात या ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी दूसरे व्यक्ति को कष्ट का अनुभव हो। यह बातें बच्चों को विद्यालय और घर दोनों ही जगहों पर सिखाई जा सकती है। 

समझदारी का अर्थ है- दूरदर्शी, विवेकशीलता का अपनाया जाना। आमतौर पर लोग तात्कालिक लाभ को ही सब-कुछ मान लेते हैं और उसके लिए बुरी बातों को भी अपना लेते हैं। बल्कि जो दूरदर्शी व्यक्ति होंगे वो बहुत ही समझदारी से सोच-समझ कर कोई भी निर्णय लेते हैं। कभी भी बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए। इसके परिणाम अच्छे नहीं होते हैं।

जो समझदार व्यक्ति होगा वह खुद का स्वार्थ कभी नहीं देखता है। बल्कि उसका हमेशा यहीं प्रयास रहता है कि मेरी वजह से किसी को किसी प्रकार की कोई हानि न उठानी पड़े। समझदार व्यक्ति कभी भी बुरी बातों को नहीं अपनाते हैं और ना ही किसी बुरे कार्य में नासमझ व्यक्ति की कोई मदद करते हैं। उनका प्रयास रहता है कि वह कोई व्यक्ति अगर किसी गलत राह पर जा रहा है तो उसे समझा कर गलत राह पर जाने से रोकने का प्रयत्न  करें। समझदार व्यक्ति हमेशा अपनी समझदारी के बल पर ही जीतता है। वह हर परिस्थिति को अपनी समझदारी से हल कर लेते हैं। 
Ayasha Tak
The Fabindia School, Bali

Friday, April 24, 2020

आशा अमर धन: कृष्ण गोपाल

सच ही कहा गया है कि आशा अमर धन है।  व्यक्ति जब निराश हो जाता है तब कुछ भी करने की इच्छा नहीं रहती।  यदि इसीप्रकार निठल्ला बैठ जाएगा तो प्रगति का चक्र ही रुक जाएगा।  निराशा का भाव मन में जगते देर नहीं लगती।  ऐसे अवसर तो जैसे तैयार ही बैठे है। जब कुछ करने की चाह हो और उसमें असफलता मिले तो निराश हो सकते है। उचित सहयोग मिले तो निराश हो सकते है।  अर्थात निराश होने के कई बहाने है।  

जीवन में उम्मीद होना बहुत आवश्यक है। ऐसे जीवन का कोई प्रयोजन नहीं जो निराशा से घिरा हो। आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि मन में आशा की किरण जगाए रखें।  किसी कवि की कविता कहती है -
निराशा के दीप बुझाकर,
आशाओं के दीप जलाएँ,
दसों दिशा में फैले तम को,
मिलकर कोसों दूर भगाएँ  

हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए, कठिन और सुखद दिन तो आते रहते हैं।  निराशा व्यक्ति को पतन की और ले जाती है जबकि आशा एक नई शक्ति का संचार करती है।  परोपकार करने से आशा बलवती होती है।  अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा कार्य अवश्य करें। 

आशा जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है।  प्रसन्नचित मन और सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति को कभी बीमारियाँ नहीं घेरती। जीवन में लक्ष्य प्राप्ति करनी है तो आशावादी बने रहो, चाहे असफलता मिले किसी काम में, फिर भी आशा  दामन छोड़ो।  राष्ट्रकवि  मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में -
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।  
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali

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