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Monday, August 29, 2022

उत्तरदायित्व और सहयोग - ज्योति तड़ियाल


उत्तरदायित्व – उत्तरदायित्व जीवन में यदि न हो तो मनुष्य कभी आगे नहीं बढ़ सकता। हमसब प्रत्येक परिस्थिति और परिणाम के उत्तरदाई स्वयं होते हैं। हमारे ऊपर कई उत्तरदायित्व होते हैं, जिनका हम निर्वहन करते हैं। एक शिक्षिका के रूप में हमारी उत्तरदायित्व बहुत बढ़ जाते हैं। कक्षा कक्ष में विद्यार्थियों के भविष्य के उत्तरदाई हम स्वयं हो जाते हैं। हम उस विद्यार्थी के प्रति उत्तरदाई हैं जो हमारे दिए ज्ञान को आत्मसात कर जीवन में आगे बढ़ता है, हम उन माता पिता के प्रति भी उत्तरदाई हैं जो अपने अबोध बालकों को हमें सौंपते हैं, हम उस संस्था के प्रति भी उत्तरदाई हैं जहां हम कार्य करते हैं। वैसे ही विद्यार्थी भी उत्तरदाई होते हैं। कक्षा में जब कार्य दिया जाता है तो सभी उसे पूरी मेहनत से करते हैं क्योंकि वे भी उत्तरदाई हैं। इस प्रकार हम सभी उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए जीवन मे आगे बढ़ते जाते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।

सहयोग – सहयोग एक ऐसी भावना है जो समाज की आधारशिला है। सहयोग के बिना मानव समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। जीवन में सभी को सहयोग चाहिए। विद्यार्थी जीवन में सहयोग की भावना अधिक बलवती होती है। कक्षा में सहयोग से अनेक कठिनाइयां दूर हो जाती हैं। कक्षा के लिए बोर्ड बनाना हो या प्रार्थना सभा कराना इन गतिविधियों में प्रत्येक का सहयोग होता है। एक अध्यापिका के रूप में मुझे भी सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह सहयोग अपने सहकर्मियों से , प्रधानाचार्य से, विद्यालय परिवार से और बच्चों से भी प्राप्त होता है। सहयोग लेना जितना आवश्यक है उतना ही सहयोग देना। सभी को साथ लेकर चलना है ताकि कर्तव्य पथ पर कोई छूट न जाए।

सहयोग की इसी भावना पर गुप्त जी की काव्य पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगी –

है कार्य ऐसा कौन सा, साधे न जिसको एकता।
देती नहीं अदभुद अलौकिक शक्ति किसको एकता।
दो एक एकादश हुए, किसने नहीं देखे सुने।
हां शून्य के भीर योग से हैं अंक होते सौ गुने।

प्रेषक – ज्योति तड़ियाल
द दून गर्ल्स स्कूल।

Tuesday, March 30, 2021

अनुशासन — उषा पंवार

Courtesy: ecoleglobale.com
अनुशासन ही मनुष्य को श्रेष्ठता प्रदान करता हैं। 
अनुशासन से राष्ट्र की उन्नति होती हैं। 
स्वयं पर स्वयं का शासन कहलाता है अनुशासन
यह है नियमों का अनुसरण, बनता है जिससे आदर्श जीवन।
अनुशासन सुसंस्कार है, सफल जीवन का यही आधार है।
अच्छे विद्यालय ही अनुशासन के निर्माता हैं।
सुसंस्कृत परिवार में ही बालक अनुशासन पाता है,
अनुशासित विद्यार्थी बढ़ाते हैं देश का मान।
अनुशासन राष्ट्र हित में है जरूरी, 
कर्तव्यों का पालन हमारी है जिम्मेदारी,
अनुशासित रहना ही है सच्ची समझदारी।।

जीवन में सफल होना है तो अनुशासित होना आवश्यक है। विद्यार्थी जीवन में तो इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है क्योंकि विद्यार्थी जीवन को किसी भी मनुष्य के जीवन काल की आधारशिला कह सकते है क्योंकि इस समय वह जो भी गुण अवगुण अपनाता है उसी के अनुसार उसके चरित्र निर्माण होता है। अनुशासित रहने से जीवन में एक तरह की नियम बद्धता आ जाती हैं। नियम बद्ध होकर काम करने मैं बहुत आनंद आता है। कठिन कार्य सरलता से हो जाते हैं ।विद्यालय, परिवार, समाज में भी अनुशासन का होना आवश्यक होता है। अनुशासित व्यक्ति के अंदर साहस, धैर्य जैसे गुणों का विकास होता है।

अपने जीवन को अनुशासित बनाए रखने के लिए हमें हर संभव प्रयास करना चाहिए क्योंकि अनुशासन ही सफल जीवन की पहली सीधी मानी जाती है। अनुशासन जैसे कार्यों को समय पर पूरा करने का प्रयास करना बुरी आदतों व कार्यों से दूरी बनाना अपने कार्यों के प्रति पूरी लगन रखना यही अनुशासन है।

प्रकृति कभी अनुशासन का उल्लंघन नहीं करती जैसे सूर्य चंद्रमा हर दिन सही समय पर उदय और सही समय पर अस्त होते हैं। हम भी तो प्रकृति के ही अंग हैं तो हमें भी अनुशासन का सदैव पालन करना चाहिए। बचपन से ही बच्चों को अनुशासन का महत्व बताया जाए और उसका पालन करने के लिए प्रेरित किया जाए।

धन्यवाद,
उषा पंवार
The Fabindia School 
upr@fabindiaschools.in

Wednesday, July 29, 2020

सावधानी और समझ: उषा पंवार


शिक्षक की हर कोशिश बच्चों को आगे बढ़ने में मदद करती है इसलिए उनको तात्कालिक परिणामों की परवाह किए बगैर पूरे मन से बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने की प्रक्रिया जारी रखना चाहिए, कभी-कभी बच्चों में परिणाम आने में समय लगता है इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी कोशिशों की कोई उपयोगिता नहीं है।

गुरू ही ब्रह्मा, गुरू ही विष्णु, गुरू ही शंकर” ऐसा इसलिए है क्योंकि एक गुरू ही अपने शिष्य को व्यवहारिक जीवन से रूबरू कराता है। एक शिक्षक और छात्र का रिश्ता उन रिश्तों में से एक होता है जिसे हम जिंदगी भर भूल नहीं सकते हैं। बचपन से बड़े होने तक शिक्षक हमें कई बातों का अनुभव कराते है। हमें जीवन में आगे बढ़ने और सफलता पाने का रास्ता भी दिखाते है।

शिक्षक को समाज की आधारशिला माना गया है। शिक्षक व शिक्षार्थियों को विनम्र होना चाहिए। विनम्रता फूल में महकने वाली सुगंध की तरह एक मानवीय गुण है, वह गुण यदि एक स्थान पर प्रकट होगा तो दूसरे स्थान पर भी ठीक उसी तरह प्रगट होगा। जिस छात्र में गुरु जनों के प्रति भावना होती हैं उसकी प्रतिभा अपने आप परिष्कृत होती रहती है और जल्दी से ज्ञानार्जन करता रहता है। गुरू के प्रति श्रद्धा रखने वाला छात्र शिक्षक की हर बात बड़े ध्यान से सुनता है और विश्वास पूर्वक ग्रहण करता है। वह अपना हितैषी समझ कर गुरू के दिए निर्देशों का आस्था पूर्वक पालन करता है जिससे उसमें चारित्रिक बल का विकास होता है। 

छात्रों को चार दिवारी कक्ष में पढ़ाने के साथ-साथ कभी-कभी बाहर पेड़ के नीचे खुली हवा में पढ़ाना चाहिए, पढ़ाने का अर्थ सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि बाहरी ज्ञान भी देना आवश्यक है। शिक्षकों को समझ होनी चाहिए कि प्रत्येक विद्यार्थी की सोचने समझने की शक्ति अलग-अलग होती है और जरूरी नहीं कि हमारा समझाया गया सबको समझ आए। अलग-अलग विधि से उदाहरण देकर समझाना चाहिए। पढ़ाने के लिए उपकरण हो क्योंकि छात्र सुनने से ज्यादा देखकर वे समझ सकते हैं।
Usha Panwar
The Fabindia School, Bali

Monday, March 23, 2020

कर्तव्य के प्रति निष्ठा: राजेश्वरी राठौड़


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैI मानव को योग्यता और आवश्यकतानुसार कार्य करना, उसका कर्तव्य पालन कहलाता है I मनुष्य के जीवन में अथाह कर्तव्य  है, कर्तव्य उसकी आयु के अनुसार छोटे और बड़े होते हैं उनको करने से जीवन में खुशी, आत्मिक शांति और यश मिलता हैI अतः बचपन से ही अच्छी आदतों का पालन करना हमारा पहला कर्तव्य हैI यह आदतें यह है माता- पिता, परिवार व विद्यालय से बालक सीखता हैI 

विद्यार्थी जीवन मानव जीवन की आधारशिला हैI विद्यार्थी जीवन में नैतिक गुणों को अपनाता है जैसे बचपन से ही अच्छी आदतों को डालना हमारा पहला कर्तव्य है ठीक समय पर सोना और उठना, शरीर की सफाई रखना ताजा व स्वास्थ्यवर्धक भोजन करना, ध्यान से पढ़ना-लिखना आदि ऐसे ही अनेक कर्तव्य निभाए जा सकते हैंI सबसे पहले अपने बड़ों का कहना मानना, विद्यालय में अनुशासित जीवन बिताना, अपने शिक्षकों की आज्ञा मानना दूसरों के हित के लिए अपना स्वार्थ का त्याग करना, हमारा कर्तव्य हैI 

एक अच्छा नागरिक होने के कारण देश के प्रति भी हमारे कर्तव्य हैंI देश के कानून को मानना व अच्छे कार्य करना और अनुशासन पालन करना I वही उसके व्यक्तित्व वह चरित्र निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाता है, अपने सहपाठियों के साथ मृदुल व्यवहार रखना भी विद्यार्थी का परम कर्तव्य हैं I तभी वह राष्ट्र का अच्छा नागरिक बन सकता हैI ईमानदारी से अपना कार्य करना उसका परम कर्तव्य हैI कार्य छोटा हो या बड़ा कार्य उसे ईमानदारी व लगन-मेहनत व रुचि के साथ किया जाएI यह सब बालक बचपन से ही अच्छे संस्कारों के मिलने से कर सकता है, इसलिए परिवार और विद्यालय का अनुशासन ही बालक को अच्छे संस्कार दे सकता है तभी वह राष्ट्र का अच्छा नागरिक बन सकता हैI
Rajeshwari Rathore
rre4fab@gmail.com
The Fabindia School, Bali

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