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Wednesday, July 29, 2020

सावधानी और समझ: उषा पंवार


शिक्षक की हर कोशिश बच्चों को आगे बढ़ने में मदद करती है इसलिए उनको तात्कालिक परिणामों की परवाह किए बगैर पूरे मन से बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने की प्रक्रिया जारी रखना चाहिए, कभी-कभी बच्चों में परिणाम आने में समय लगता है इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी कोशिशों की कोई उपयोगिता नहीं है।

गुरू ही ब्रह्मा, गुरू ही विष्णु, गुरू ही शंकर” ऐसा इसलिए है क्योंकि एक गुरू ही अपने शिष्य को व्यवहारिक जीवन से रूबरू कराता है। एक शिक्षक और छात्र का रिश्ता उन रिश्तों में से एक होता है जिसे हम जिंदगी भर भूल नहीं सकते हैं। बचपन से बड़े होने तक शिक्षक हमें कई बातों का अनुभव कराते है। हमें जीवन में आगे बढ़ने और सफलता पाने का रास्ता भी दिखाते है।

शिक्षक को समाज की आधारशिला माना गया है। शिक्षक व शिक्षार्थियों को विनम्र होना चाहिए। विनम्रता फूल में महकने वाली सुगंध की तरह एक मानवीय गुण है, वह गुण यदि एक स्थान पर प्रकट होगा तो दूसरे स्थान पर भी ठीक उसी तरह प्रगट होगा। जिस छात्र में गुरु जनों के प्रति भावना होती हैं उसकी प्रतिभा अपने आप परिष्कृत होती रहती है और जल्दी से ज्ञानार्जन करता रहता है। गुरू के प्रति श्रद्धा रखने वाला छात्र शिक्षक की हर बात बड़े ध्यान से सुनता है और विश्वास पूर्वक ग्रहण करता है। वह अपना हितैषी समझ कर गुरू के दिए निर्देशों का आस्था पूर्वक पालन करता है जिससे उसमें चारित्रिक बल का विकास होता है। 

छात्रों को चार दिवारी कक्ष में पढ़ाने के साथ-साथ कभी-कभी बाहर पेड़ के नीचे खुली हवा में पढ़ाना चाहिए, पढ़ाने का अर्थ सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि बाहरी ज्ञान भी देना आवश्यक है। शिक्षकों को समझ होनी चाहिए कि प्रत्येक विद्यार्थी की सोचने समझने की शक्ति अलग-अलग होती है और जरूरी नहीं कि हमारा समझाया गया सबको समझ आए। अलग-अलग विधि से उदाहरण देकर समझाना चाहिए। पढ़ाने के लिए उपकरण हो क्योंकि छात्र सुनने से ज्यादा देखकर वे समझ सकते हैं।
Usha Panwar
The Fabindia School, Bali

Tuesday, November 12, 2019

राजेश्वरी राठौड़: लेखन- संप्रेषण की व्यवस्थित प्रक्रिया


 लेखन विचारों को व्यवस्थित करने का तरीका है इसके द्वारा अपने विचारों को व्यवस्थित करके प्रकट करता है यह छात्र के मानसिक विकास बुद्धिमता को प्रेरित-उत्प्रेरक करने वाले करने वाली प्रक्रिया है यह समालोचनात्मक विचारों की एक प्रक्रिया है जिसमें नए ज्ञान को अपने स्वयं के  अनुभव से मिश्रित करते हुए एक नई अवधारणा या विचार को प्रकट किया जाता है जो कि पूर्ववर्ती विचारों से अधिक परिष्कृत विचार होता है प्रमाण है कि जो छात्र लेखन का अभ्यास अधिक करते है, उनमें  विवेक और विश्लेषण की उच्च  क्षमता पाई जाती हैं

लेखन बच्चे में तंत्रिका तंत्र के विकास और धैर्य को भी प्रभावित करता है क्योंकि लेखन में जो पूर्ववर्ती क्रियाएँ है  जैसे कि रंग भरनाS] चित्रांकन करना के द्वारा छात्र वर्णों की घुमावदार आकृतियाँ शीघ्रता से सीखता है वर्तमान समय में छात्र लेखन का अभ्यास करने के बजाए कंप्यूटर व टेबलेटस से ज्ञान अर्जन का प्रयास अधिक कर रहे हैं जिसमें भी की बोर्ड संचालन में प्रवीणता से अभ्यास द्वारा ज्ञान अर्जित किया  जाता है उसी प्रकार लेखन में भी निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है क्योंकि वर्ण की संरचना जटिल होती है जिसको की पूर्ण करने में एक जटिल तंत्रिका तंत्र को कार्य करना पड़ता है जिसके लिए शारीरिक विकास की अत्यधिक आवश्यकता होती है। वे छात्र जिन्हें  घर पर खेलने का या व्यायाम करने का अवसर प्राप्त नहीं होता है वे विद्यालय छात्र के रूप में अधिक सफल नहीं हो पाते हैं अतः पूर्व प्राथमिक विद्यालय में खेलकूद और व्यायाम पर विशेष बल दिया जाना चाहिए उसके पश्चात लेखन में रुचि जागृत करने हेतु सर्वप्रथम रंग भरने अधूरी लाइन पूरी करते हुए चित्र बनाना आदि कार्य करवाने से उनके हाथों और उंगलियों की मांसपेशियों का मस्तिष्क के साथ  सामंजस्य स्थापित हो जाता है उसकी और लेखन में रुचि जागृत हो जाती है
- Rajeshwari Rathore, The Fabindia School

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