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Thursday, January 26, 2023

विचारशीलता और आपसी समझ - ज्योति तड़ियाल

Thoughtfullness अर्थात विचारशीलता, चिंताशीलता, सोच विचार या सोच समझ।

अनेक अर्थ स्वयं में समाहित किए यह शब्द पूर्णता प्रदर्शित करता है। किसी भी विषय पर कार्य करने से पूर्व विचारशीलता अति आवश्यक है। कार्य को सही दिशा में कार्यान्वित करने के लिए विचारशीलता अत्यंत आवश्यक है। कक्षा कक्ष में भी सोच विचार के द्वारा ही सभी कार्य सुगमता से पूरे होते हैं। कक्षा कक्ष में कार्य की सफलता हेतु तीन प्रकार के उपाय अपनाए जा सकते हैं –

पहला किसी भी कार्य को करने से पूर्व विद्यार्थियों के मध्य उसकी सोच समझ विकसित करना। जब कार्य को भली प्रकार से सोच समझकर किया जाता है तो उसका परिणाम सुखद ही होता है।

दूसरा आपसी समझ । किसी भी कार्य को दो दिमाग अधिक अच्छे से कर सकते हैं परंतु यह तभी संभव है जब दोनो दिमाग एक दिशा में सही तालमेल के साथ सोचें। विद्यार्थियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि उनके मध्य सही तालमेल बना रहे, तभी प्रयास सार्थक होंगे।

तीसरा है सावधानी। किसी भी कार्य को करने से पूर्व क्या क्या सावधानियां आवश्यक हैं यह भी कक्षा कक्ष में चर्चा का विषय है हर कार्य में सावधानी से ही सफलता प्राप्त की जा सकती है।

अपने विद्यार्थियों के मध्य विचारशीलता को सही प्रकार से परिभाषित करना आवश्यक है। कक्षा कक्ष में इसे सही रूप से कार्यान्वित भी करना आवश्यक है। किसी भी कार्य की सफलता उस पर किए गए सोच विचार व सोच समझ पर ही निर्भर है।

Understanding के हिंदी पर्याय हैं – सहमति, समझदारी, सामंजस्य, तालमेल व आपसी समझ।

सहमति व सामंजस्य के द्वारा ही हमारे भीतर समानुभूति की भावना उत्पन्न होती है। विद्यार्थियों के मध्य इस भाव को विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।जब हम दूसरे के कष्ट व परेशानी को दया की दृष्टि से न देखे अपितु उस पर समानुभूति व संवेदना का भाव रखें तो इसे ही empathy व समानुभूति कहते हैं।

कक्षा कक्ष में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करी जाए जहां कुछ विद्यार्थी स्वयं को किसी कार्य में असमर्थ पा रहे हैं, उन्हें सहायता की आवश्यकता है । उसी समय कुछ विद्यार्थियों  को उनका सहायक बनाया जाए। वे उन विद्यार्थियों की सहायता इस भाव से करें मानो वे स्वयं ही इस परिस्थिति का। सामना कर रहे हों। धीरे धीरे यह भावना सभी विद्यार्थियों में विकसित हो जायेगी। सारे विद्यार्थी इस प्रकार समानुभुति की भावना से पूर्ण होंगे और सबकी सहायता करना सीख जाएंगे। इस प्रकार निश्चित रूप से वे उत्कृष्ट नागरिक बनेंगे। 

यह एक शाश्वत सत्य ही है कि समानुभूति व सामंजस्य की यह भावना जीवन में भी विद्यार्थियों के लिए अत्यंत फलदायी रहेगी व कुशल नागरिकों का निर्माण करेगी।

ज्योति तड़ियाल
द दून गर्ल्स स्कूल

Saturday, May 15, 2021

सकारात्मकता में उम्मीद किरण: कृष्ण गोपाल

 एक समय था जब लोग सकारात्मकता को केवल एक पुस्तकीय बात समझते थे। परंतु वर्तमान समय में लोगों का नजरिया बदला है। कहा जाता है खुशी के पलों की अपेक्षा विपद के पल बहुत कुछ सिखा जाते हैं। सकारात्मकता एक उम्मीद की तरह है और एक छोटी सी उम्मीद हमें भीषण संकट से भी उबार सकती है।

 वर्तमान समय में जो महामारी चल रही है इस दौरान कई किस्से या घटनाएँ  हमें पढ़ने या सुनने को मिल रही है। सकारात्मक सोच की वजह से गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति भी स्वस्थ हो गया। ऐसे ही कई बच्चों के उदाहरण भी सामने आते हैं जो सकारात्मकता की वजह से पूर्ण स्वस्थ हो गए। इसके विपरीत, नकारात्मक भावना रखने वाले कई मरीज उपचार मिलने के बावजूद भी सुखद समाचार न दे पाए।


 अभी परिस्थितियाँ विकट है। लगभग हर परिवार आर्थिक या मानसिक या व्यक्तिगत सेहत संबंधी समस्याओं से गुजर रहा है और जूझ रहा है। सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति आने वाले कल के लिए चिंतन करेगा किंतु नकारात्मक व्यक्ति बीते हुए कल का सोचेगा। बीते हुए कल में जिन कठिनाइयों- समस्याओं को झेला है उन्हें याद करके और अधिक दुःख का अनुभव करेगा। किंतु सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति हमेशा आने वाले कल को कैसे बेहतर बनाया जा सके इस पर चिंतन करेगा।


जो लोग समय के साथ बदलने की उम्मीद रखते हैं वे लोग सकारात्मक होते हैं। जो लोग स्वयं को बदलने के लिए तैयार नहीं होते हैं वे परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना नहीं कर पाते हैं। वर्तमान में चल रही महामारी के संक्रमण के फैलाव के लिए हम दूसरों को दोष देते हैं। किंतु यदि हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को कर्तव्य समझकर निभाए तो उम्मीद की किरण अवश्य नजर आएगी। 


कहा जाता है समय एक सा नहीं रहता। यह कठिन समय भी ढल जाएगा किंतु हमें सकारात्मक सोच के साथ उम्मीद को जगाए रखना चाहिए। समय के साथ सामंजस्य और संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। एक नन्हा सा दीपक संपूर्ण जगत को उजाला नहीं दे सकता किंतु एक घर में तो उजाला कर सकता है। इसे ध्यान में रखकर चुनौतियों का सामना सकारात्मकता के साथ करें। नया दिन, नई उम्मीद के साथ अवश्य आएगा। 


Krishan Gopal 

The Fabindia School, Bali 

kde@fabindiaschools.in

Tuesday, November 12, 2019

राजेश्वरी राठौड़: लेखन- संप्रेषण की व्यवस्थित प्रक्रिया


 लेखन विचारों को व्यवस्थित करने का तरीका है। इसके द्वारा अपने विचारों को व्यवस्थित करके प्रकट करता है । यह छात्र के मानसिक विकास बुद्धिमता को प्रेरित-उत्प्रेरक करने वाले करने वाली प्रक्रिया है। यह समालोचनात्मक विचारों की एक प्रक्रिया है। जिसमें नए ज्ञान को अपने स्वयं के  अनुभव से मिश्रित करते हुए एक नई अवधारणा या विचार को प्रकट किया जाता है। जो कि पूर्ववर्ती विचारों से अधिक परिष्कृत विचार होता है। प्रमाण है कि जो छात्र लेखन का अभ्यास अधिक करते है, उनमें  विवेक और विश्लेषण की उच्च  क्षमता पाई जाती हैं ।

लेखन बच्चे में तंत्रिका तंत्र के विकास और धैर्य को भी प्रभावित करता है । क्योंकि लेखन में जो पूर्ववर्ती क्रियाएँ है  जैसे कि रंग भरनाS] चित्रांकन करना के द्वारा छात्र वर्णों की घुमावदार आकृतियाँ शीघ्रता से सीखता है। वर्तमान समय में छात्र लेखन का अभ्यास करने के बजाए कंप्यूटर व टेबलेटस से ज्ञान अर्जन का प्रयास अधिक कर रहे हैं। जिसमें भी की बोर्ड संचालन में प्रवीणता से अभ्यास द्वारा ज्ञान अर्जित किया  जाता है। उसी प्रकार लेखन में भी निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है क्योंकि वर्ण की संरचना जटिल होती है। जिसको की पूर्ण करने में एक जटिल तंत्रिका तंत्र को कार्य करना पड़ता है। जिसके लिए शारीरिक विकास की अत्यधिक आवश्यकता होती है। वे छात्र जिन्हें  घर पर खेलने का या व्यायाम करने का अवसर प्राप्त नहीं होता है वे विद्यालय छात्र के रूप में अधिक सफल नहीं हो पाते हैं। अतः पूर्व प्राथमिक विद्यालय में खेलकूद और व्यायाम पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। उसके पश्चात लेखन में रुचि जागृत करने हेतु सर्वप्रथम रंग भरने अधूरी लाइन पूरी करते हुए चित्र बनाना आदि कार्य करवाने से उनके हाथों और उंगलियों की मांसपेशियों का मस्तिष्क के साथ  सामंजस्य स्थापित हो जाता है उसकी और लेखन में रुचि जागृत हो जाती है।
- Rajeshwari Rathore, The Fabindia School

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