आज की कहानी से यह सीख मिलती है कि शिक्षा दो प्रमुख स्थानों से मिलती है। यह किताबी सच है कि घर में संस्कार मिलते हैं और विद्यालय में ज्ञान। लेकिन अभिभावक की भूमिका इन दोनों से कहीं अधिक व्यापक होती है।
अभिभावक ही बच्चे के पहले शिक्षक होते हैं। बच्चा घर में जो देखता है, वही सीखता है। आप सच बोलते हैं या झूठ, गुस्सा करते हैं या समझाते हैं—यही उसके जीवन की वास्तविक शिक्षा है।
अभिभावक वे होते हैं, जो स्कूल की फीस, कॉपी-किताबों और ट्यूशन के खर्च के लिए अपनी जरूरतों को पीछे रख देते हैं, लेकिन बच्चे को कभी इसका एहसास नहीं होने देते।
शिक्षक 40 बच्चों को पढ़ाकर घर लौट जाता है, लेकिन अभिभावक रात में भी यही सोचता रहता है कि उसका बच्चा सही रास्ते पर चल रहा है या नहीं।
बच्चा आपके उपदेशों से नहीं, बल्कि आपके आचरण से सीखता है। इसलिए कहा जाता है—
“अच्छा विद्यालय बच्चे को पाँच घंटे सँवारता है, लेकिन अच्छे अभिभावक उसका पूरा जीवन गढ़ते हैं।”
अशोक कुमार मौर्य
सनबीम ग्रामीण स्कूल

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