एक तरफ दाई का किरदार है, जिसके पास कोई औपचारिक डिग्री या लाइसेंस नहीं है, फिर भी वह पूरे आत्मविश्वास से भरी है। उसके भारी शरीर, बेतरतीब बाल और बिना मेकअप वाले चेहरे से उसका समाज की परवाह न करने वाला बेबाकपन झलकता है। वह अपने ‘रसूख’ और हुनर के दम पर खुद को साबित करती है।
दूसरी तरफ लेखिका की माँ हैं, जो पारंपरिक रूप से सुंदर हैं, हर सुबह सजती-संवरती हैं, लेकिन भीतर से घबराहट और असुरक्षा से भरी हैं। वे दाई के सामने खुद को छोटा महसूस करती हैं और अनजाने में ही सही, हर बात के लिए माफी माँगती हैं। यह दिखाता है कि कैसे समाज महिलाओं को हमेशा ‘परफेक्ट’ और दूसरों को खुश रखने के साँचे में ढाल देता है।

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