समानता, संवेदनशीलता और समझ — एक शिक्षक की जिम्मेदारी
आज की कक्षा से मुझे यह सीख मिली कि किसी भी व्यक्ति के कार्यों, वेशभूषा, खानपान और रहन-सहन को देखकर उसका मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। सबसे पहले हमें उसकी परिस्थितियों और उसके व्यवहार के पीछे के कारणों को समझने का प्रयास करना चाहिए।
यदि कोई बच्चा रोज बिना स्नान किए या फटे कपड़ों में स्कूल आता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके माता-पिता अयोग्य हैं। हो सकता है कि उसकी माँ सुबह चार बजे दूसरों के खेतों में काम करने चली जाती हो और पिता बाहर मजदूरी करते हों। ऐसी परिस्थितियों में बच्चे को डाँटने के बजाय प्यार से यह पूछना अधिक उचित होगा कि, "बेटा, आज तुम्हारी चोटी किसने बनाई?" हमारा यह छोटा-सा अपनापन बच्चे के जीवन में बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है।
बच्चे वही सीखते हैं, जो वे अपने आसपास के बड़ों को करते हुए देखते हैं। यदि हम गरीब-अमीर या कपड़ों के आधार पर बच्चों के बीच भेदभाव करेंगे, तो वे भी यही व्यवहार सीखेंगे। इसके विपरीत, यदि हम सभी बच्चों को एक ही बेंच पर समान अधिकार और सम्मान के साथ बैठाएँगे, तो उनमें बचपन से ही समानता और आपसी सम्मान की भावना विकसित होगी। वे दूसरों का मजाक उड़ाने के बजाय उनका सम्मान करना सीखेंगे।
एक अध्यापक के रूप में हमारा दायित्व है कि हम सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार करें और कक्षा में ऐसा वातावरण बनाएँ, जहाँ प्रत्येक बच्चा बिना किसी भेदभाव के स्वयं को सहज, सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।
अशोक कुमार मौर्य
सनबीम ग्रामीण स्कूल

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