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Friday, March 14, 2025

साहस: प्रतिबिंब आर्थर फुट अकादमी

 "डर कहीं और नहीं, बस आपके दिमाग में होता है!"
मनुष्य के सभी गुणों में साहस सर्वोत्तम है क्योंकि यह सभी गुणों की जननी है। मानव के इतिहास में जो कुछ भी कहानियाँ हैं, वे मनुष्य के साहस और विपरीत परिस्थितियों में उसके संघर्ष की कहानियाँ हैं। संकट में साहस से काम लेना चाहिए और अधिक सफलता प्राप्त करनी चाहिए।

जो मनुष्य कभी साहस नहीं छोड़ता, वह कभी हार नहीं मानता। नेपोलियन ने चुनौतियाँ स्वीकार करते हुए कहा था, "कोई अफसोस नहीं है!" वह अपनी सेना को पहाड़ों के पार इटली ले गया और विजय प्राप्त की। साहस के बिना जीवन में कोई भी काम सही नहीं हो सकता। साहस के अभाव में विद्या, सम्मान, और अन्य गुण भी अधूरे रहते हैं। जो कुछ देखकर सुंदर लगता है, वह बिना ठोस आधार के जल्द ही नष्ट हो जाता है।

निर्णय लेना साहस का सबसे बड़ा उदाहरण है, और साहस के बिना किसी कार्य में सफलता प्राप्त करना कठिन होता है। जीवन में साहस का होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति में खड़ा रहने की ताकत देता है।
"अकेले खड़े होने का साहस रखो, चाहे पूरी दुनिया आपके विरोध में क्यों न हो!"
देवानंद


"कोई भी लक्ष्य मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, हारा वही जो लड़ा नहीं।"
पाठ "साहस" से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हम किसी लक्ष्य को देखते हैं, तो हमें वह प्राप्त करना है, चाहे हम उसमें कितनी बार असफल हो जाएं। हमें अपने लक्ष्य पर अटल रहना है और उसे प्राप्त करने के लिए पूरे मनोबल के साथ मेहनत करनी है।

साहसी लोग बेखौफ तरीके से मेहनत करते हैं, सफलता और असफलता की चिंता किए बिना। वे अपने लक्ष्य के प्रति लगातार पूरी मेहनत से कार्य करते रहते हैं। यदि हमारे अंदर साहस विराजमान है, तो हम विपरीत परिस्थितियों में भी अच्छा कार्य कर सकते हैं।

साहस हमारे अंदर बार-बार किसी कार्य को करने की शक्ति प्रदान करता है, चाहे हम उसमें अनगिनत बार असफल हो चुके हों। यह हमें अलग प्रकार से मेहनत करने के लिए प्रेरित करता है। निराशा में भी हमे आशा की किरण दिखाई देती है यदि हमारे अंदर धैर्य और साहस है।

साहस वह गुण है जिसकी मदद से हम वह काम कर सकते हैं, जो हम करना चाहते हैं। इसलिए साहस बनाए रखना चाहिए।
नीरज कुमार

Monday, August 29, 2022

उत्तरदायित्व और सहयोग - ज्योति तड़ियाल


उत्तरदायित्व – उत्तरदायित्व जीवन में यदि न हो तो मनुष्य कभी आगे नहीं बढ़ सकता। हमसब प्रत्येक परिस्थिति और परिणाम के उत्तरदाई स्वयं होते हैं। हमारे ऊपर कई उत्तरदायित्व होते हैं, जिनका हम निर्वहन करते हैं। एक शिक्षिका के रूप में हमारी उत्तरदायित्व बहुत बढ़ जाते हैं। कक्षा कक्ष में विद्यार्थियों के भविष्य के उत्तरदाई हम स्वयं हो जाते हैं। हम उस विद्यार्थी के प्रति उत्तरदाई हैं जो हमारे दिए ज्ञान को आत्मसात कर जीवन में आगे बढ़ता है, हम उन माता पिता के प्रति भी उत्तरदाई हैं जो अपने अबोध बालकों को हमें सौंपते हैं, हम उस संस्था के प्रति भी उत्तरदाई हैं जहां हम कार्य करते हैं। वैसे ही विद्यार्थी भी उत्तरदाई होते हैं। कक्षा में जब कार्य दिया जाता है तो सभी उसे पूरी मेहनत से करते हैं क्योंकि वे भी उत्तरदाई हैं। इस प्रकार हम सभी उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए जीवन मे आगे बढ़ते जाते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।

सहयोग – सहयोग एक ऐसी भावना है जो समाज की आधारशिला है। सहयोग के बिना मानव समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। जीवन में सभी को सहयोग चाहिए। विद्यार्थी जीवन में सहयोग की भावना अधिक बलवती होती है। कक्षा में सहयोग से अनेक कठिनाइयां दूर हो जाती हैं। कक्षा के लिए बोर्ड बनाना हो या प्रार्थना सभा कराना इन गतिविधियों में प्रत्येक का सहयोग होता है। एक अध्यापिका के रूप में मुझे भी सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह सहयोग अपने सहकर्मियों से , प्रधानाचार्य से, विद्यालय परिवार से और बच्चों से भी प्राप्त होता है। सहयोग लेना जितना आवश्यक है उतना ही सहयोग देना। सभी को साथ लेकर चलना है ताकि कर्तव्य पथ पर कोई छूट न जाए।

सहयोग की इसी भावना पर गुप्त जी की काव्य पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगी –

है कार्य ऐसा कौन सा, साधे न जिसको एकता।
देती नहीं अदभुद अलौकिक शक्ति किसको एकता।
दो एक एकादश हुए, किसने नहीं देखे सुने।
हां शून्य के भीर योग से हैं अंक होते सौ गुने।

प्रेषक – ज्योति तड़ियाल
द दून गर्ल्स स्कूल।

Wednesday, July 20, 2022

सरलता और विश्वास - ज्योति तड़ियाल

सरलता
भूमिका मनुष्य को अपना व्यवहार इतना सरल रखना चाहिए कि जरूरत के समय वह सबकी पहुंच में हो। 

एक अध्यापिका के रूप में व्यवहार की सरलता उतनी ही आवश्यक है जितनी श्यामपट्ट के लिए चाक। विद्यार्थी तभी बिना किसी भय व झिझक के अपनी समस्या साझा करे पाते हैं। उनके मन में यह दुविधा नहीं रहती कहें या ना कहें।

व्यवहार की सरलता व सादगी का ज्वलंत उदाहरण रहे हैं राष्ट्रपति अब्दुल कलाम। उनसे बातें करना अपनत्व का अनुभव कराता था। यही अपनत्व विद्यार्थी शिक्षक अनुभव करे तो ही अध्यापन काल सार्थक व सफल है।

विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया

जब कक्षा कक्ष में सरलता का व्यवहार किया गया, सादगी को अपनाया गया तो निश्चित रूप से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगत हुआ। वे विद्यार्थी जो मुखर थे उनसे घनिष्ठता बढ़ी, साथ ही वह विद्यार्थी जो अंतिम पंक्ति पर बैठा था अपनी बात व विचार रख पाया। व्यवहार की सरलता का प्रभाव दूरगामी होता है और कब यह किसके मन को कितना प्रभावित कर देती है यह कहना सरल तो नहीं है परंतु निश्चित ही इसके परिणाम सकारात्मक मिलते हैं।

विश्वास

विश्वास पर ही दुनिया कायम है। विश्वास की नींव पर ही सफलता का भवन  खड़ा है। इस विश्वास की शुरुआत परिवार से होती है, जहां माता पिता व बच्चे इस विश्वास की बेल को पोषित करते हैं और फिर इस विश्वास की परिणीति उस वट वृक्ष के रूप में होती है जिसे हम समाज के रूप में देखते हैं, घनिष्ट मित्रता के रूप में देखते हैं।

विश्वास की कसौटी पर विद्यार्थी

मुझे विश्वास है कि मेरे विद्यार्थी उस ज्ञान को ग्रहण कर रहे हैं जो मैं उन्हें दे रही हूं। उस कला को सीख रहे हैं जो मैं उन्हें सिखाना चाहती हूं।

यही विश्वास होता है जब किसी प्रतियोगिता के लिए हम प्रतिभागियों का चयन करते हैं। यह हमारा विश्वास होता है कि चयनित प्रतिभागी श्रेष्ठ है, और इस विश्वास पर खरा उतरने के लिए वह भी जी जान से जुट जाता है। और जब वह सफल होता है तो निःसंदेह उस विश्वास की जीत होती है जो दोनों का एक दूसरी पर  था।

विश्वास की इसी जीत पर राष्ट्रकवि की कुछ पंक्तियां लिखना चाहूंगी

सौ सौ निराशाए रहें, विश्वास यह दृढ़ मूल है,

इस आत्मलीला भूमि के, वह विभु न सकता भूल है।

अनुकूल अवसर पर दयामय, फिर दया दिखलाएंगे,

वे दिन यहां फिर आयेंगे, फिर आयेंगे, फिर आयेंगे।

( कविता हमारी सभ्यता और कवि मैथिलीशरण गुप्त)


प्रेषक ज्योति तड़ियाल
विद्यालय द दून गर्ल्स स्कूल  JOL परियोजना ४ सरलता और विश्वास LFIN 2022 के हैप्पी टीचर्स प्रोग्राम


Monday, May 25, 2020

वाणी का महत्व - धर्मेन्द्र पोद्दार


 
[ अक्सर हमारे मन में यह विचार उत्पन्न होती है कि –हम अपने विचारों और भावों को किस प्रकार अभिव्यक्त करें की वह प्रभावी, आकर्षक, एवं सारगर्भित हो| इस रचना के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि मानव जीवन में “वाणी का क्या महत्त्व” है ]

हमारे समाज में या यों कहें तो हममें से अधिकांश व्यक्ति यह नहीं जानते की – क्या.. बोलें..?.. कहाँ..बोलें..?  किससे… बोलें…? कितना… बोलें? क्यों.. बोलें…? क्या बोलना प्रासंगिक है या अप्रासंगिक और फिर बोलने का परिणाम क्या होगा? क्या बोलने के पश्च्यात परिणाम सद् परिणाम होगा या दुष्परिणाम आदि |

मनुष्य के जीवन में असफलता, निराशा, दुःख, विषाद, चिन्ता, कष्ट, कलह, अशांति, नफरत, हिंसा, आक्रोश आदि के कारणों पर यदि गहन चिन्तन करें, तो निष्कर्ष के रूप में हम पायेंगे कि – मानव जीवन की समस्याओं, कष्टों, हिंसा, आक्रोश, नफ़रत  तथा विनाश का मूल कारण उनका जीभ का न दबना अर्थात परिणाम की परवाह किए बिना कुछ भी कह देना होता है | कुछ मनुष्य तो बोलने से पहले अपना विवेक और आत्म नियंत्रण इतना खो देते है, कि उन्हें भले बुरे, उचित, अनुचित, न्याय, अन्याय आदि का ज्ञान तक नहीं रहता, और वे क्रोध और आक्रोश के कारण अपना ही विनाश कर लेते हैं, कभी-कभी तो अपना अस्तित्व ही नष्ट कर लेते हैं |

कई बार तो ऐसा होता है कि वक्ता का कथन अथवा वक्तव्य समाप्त होते ही श्रोता अपनी आत्म नियंत्रण तथा संयम एवं सहनशीलता की सीमा खो बैठता है और परिणाम की परवाह किए बिना, बिना विचारे अनाप-सनाप अथवा मन को ठेस पहुँचाने वाली अथवा दिल को चुभने वाली बात कह देता है | और इसके भयंकर दुष्परिणाम देखने को मिलती है |

इतिहास इस बात की साक्षी रही है कि – महाभारत जैसा सर्वनाशी एवं हृदय विदारक संग्राम इसी जीभ के न दबने के परिणाम स्वरूप ही हुई थी | यदि इतिहास के साक्ष्य के आधार पर विचार करें, तो हम  निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि – यदि द्रोपदी ने दुर्योधन को “अन्धे के पुत्र भी अन्धे होते हैं” जैसी हृदय विदारक अथवा दिल को ठेस लगने वाली या मन को चुभने वाली बात न कही होती और उसके मन को चोट न पहुँचाई होती अथवा उसके हृदय को न दुखाया होता तो शायद दुर्योधन तथा अन्य कौरवों और पाण्डवों के बीच कटुता, नफ़रत, आक्रोश अर्थात दरार पैदा न हुईं होती | और शायद इतना भीषण परिणाम भी न हुआ होता | कौरवों और पाण्डवों के मध्य हुए महासंग्राम और भीषण रक्तपात में अठारह अक्षौहिणी सेना कट मरी थी |
                                                                           
व्यावहारिक जीवन-गत उदाहरण और महाभारत के परिणाम, इन्हीं सब कारणों से से सिद्ध होता है कि – मनुष्य अपनी जीभ पर जहाँ तक हो चौकसी कर सके करें अर्थात अपने वाणी पर नियंत्रण करें और आवश्यकता अनुसार उसको (जीभ) दबा सके तो दबाये, क्योंकि युद्ध हो अथवा जीवन संग्राम किसी भी झगड़े, युद्ध, क्रोध, आक्रोश, नफ़रत आदि का परिणाम विध्वंस ही होता है|

समय-समय पर होने वाले मानव मन के मतभेद, आक्रोश और विध्वंस का कारण वाणी पर नियंत्रण न होना अथवा जिह्वा (जीभ) की स्वच्छंदता ही तो है | इसी के कारण आपसी मनमुटाव, आक्रोश, मतभेद, विद्रोह, घृणा आदि बुराइयाँ जन्म लेती हैं | जिससे समय-समय पर भयंकर  नुकसान तबाही के साथ-साथ मानव अस्तित्व पर खतरे के बादल मँडराने लगते हैं |

क्योंकि मेरी दृष्टि में युद्ध हो या मतभेद अथवा वैचारिक मतान्तर विरोधी अथवा   हारने वाला पक्ष दोनों पक्ष  का तो सर्वनाश तो होता ही है, वह तो एक  इतिहास हो जाता है | किन्तु जितने वाले पक्ष पर पुनः सृजन की जिम्मेदारी तथा उत्तरदायित्व भी होता है, साथ ही युद्ध अथवा कलह का दुष्परिणाम और नुकसान अलग |

अतः मनुष्य यदि अपनी जिह्वा पर संयम रखकर उचित अनुचित का ध्यान रखकर वाणी को अभिव्यक्ति दे तो जिह्वा के कारण उत्पन्न होने वाले दुष्परिणाम से बचा जा सकता है |

महान सन्त “कबीर दास” जी ने भी वाणी को अभिव्यक्त करने की सलाह देते हुए कहा है –
            “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय |
              अपना मन शीतल करे,  औरण को सुख होय ||   
                                                            ||समाप्त ||                             
धर्मेन्द्र पोद्दार
भाषा विभाग प्रमुख, सेक्रेड हार्ट स्कूल, सिलीगुड़ी

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