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Monday, May 25, 2020

वाणी का महत्व - धर्मेन्द्र पोद्दार


 
[ अक्सर हमारे मन में यह विचार उत्पन्न होती है कि –हम अपने विचारों और भावों को किस प्रकार अभिव्यक्त करें की वह प्रभावी, आकर्षक, एवं सारगर्भित हो| इस रचना के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि मानव जीवन में “वाणी का क्या महत्त्व” है ]

हमारे समाज में या यों कहें तो हममें से अधिकांश व्यक्ति यह नहीं जानते की – क्या.. बोलें..?.. कहाँ..बोलें..?  किससे… बोलें…? कितना… बोलें? क्यों.. बोलें…? क्या बोलना प्रासंगिक है या अप्रासंगिक और फिर बोलने का परिणाम क्या होगा? क्या बोलने के पश्च्यात परिणाम सद् परिणाम होगा या दुष्परिणाम आदि |

मनुष्य के जीवन में असफलता, निराशा, दुःख, विषाद, चिन्ता, कष्ट, कलह, अशांति, नफरत, हिंसा, आक्रोश आदि के कारणों पर यदि गहन चिन्तन करें, तो निष्कर्ष के रूप में हम पायेंगे कि – मानव जीवन की समस्याओं, कष्टों, हिंसा, आक्रोश, नफ़रत  तथा विनाश का मूल कारण उनका जीभ का न दबना अर्थात परिणाम की परवाह किए बिना कुछ भी कह देना होता है | कुछ मनुष्य तो बोलने से पहले अपना विवेक और आत्म नियंत्रण इतना खो देते है, कि उन्हें भले बुरे, उचित, अनुचित, न्याय, अन्याय आदि का ज्ञान तक नहीं रहता, और वे क्रोध और आक्रोश के कारण अपना ही विनाश कर लेते हैं, कभी-कभी तो अपना अस्तित्व ही नष्ट कर लेते हैं |

कई बार तो ऐसा होता है कि वक्ता का कथन अथवा वक्तव्य समाप्त होते ही श्रोता अपनी आत्म नियंत्रण तथा संयम एवं सहनशीलता की सीमा खो बैठता है और परिणाम की परवाह किए बिना, बिना विचारे अनाप-सनाप अथवा मन को ठेस पहुँचाने वाली अथवा दिल को चुभने वाली बात कह देता है | और इसके भयंकर दुष्परिणाम देखने को मिलती है |

इतिहास इस बात की साक्षी रही है कि – महाभारत जैसा सर्वनाशी एवं हृदय विदारक संग्राम इसी जीभ के न दबने के परिणाम स्वरूप ही हुई थी | यदि इतिहास के साक्ष्य के आधार पर विचार करें, तो हम  निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि – यदि द्रोपदी ने दुर्योधन को “अन्धे के पुत्र भी अन्धे होते हैं” जैसी हृदय विदारक अथवा दिल को ठेस लगने वाली या मन को चुभने वाली बात न कही होती और उसके मन को चोट न पहुँचाई होती अथवा उसके हृदय को न दुखाया होता तो शायद दुर्योधन तथा अन्य कौरवों और पाण्डवों के बीच कटुता, नफ़रत, आक्रोश अर्थात दरार पैदा न हुईं होती | और शायद इतना भीषण परिणाम भी न हुआ होता | कौरवों और पाण्डवों के मध्य हुए महासंग्राम और भीषण रक्तपात में अठारह अक्षौहिणी सेना कट मरी थी |
                                                                           
व्यावहारिक जीवन-गत उदाहरण और महाभारत के परिणाम, इन्हीं सब कारणों से से सिद्ध होता है कि – मनुष्य अपनी जीभ पर जहाँ तक हो चौकसी कर सके करें अर्थात अपने वाणी पर नियंत्रण करें और आवश्यकता अनुसार उसको (जीभ) दबा सके तो दबाये, क्योंकि युद्ध हो अथवा जीवन संग्राम किसी भी झगड़े, युद्ध, क्रोध, आक्रोश, नफ़रत आदि का परिणाम विध्वंस ही होता है|

समय-समय पर होने वाले मानव मन के मतभेद, आक्रोश और विध्वंस का कारण वाणी पर नियंत्रण न होना अथवा जिह्वा (जीभ) की स्वच्छंदता ही तो है | इसी के कारण आपसी मनमुटाव, आक्रोश, मतभेद, विद्रोह, घृणा आदि बुराइयाँ जन्म लेती हैं | जिससे समय-समय पर भयंकर  नुकसान तबाही के साथ-साथ मानव अस्तित्व पर खतरे के बादल मँडराने लगते हैं |

क्योंकि मेरी दृष्टि में युद्ध हो या मतभेद अथवा वैचारिक मतान्तर विरोधी अथवा   हारने वाला पक्ष दोनों पक्ष  का तो सर्वनाश तो होता ही है, वह तो एक  इतिहास हो जाता है | किन्तु जितने वाले पक्ष पर पुनः सृजन की जिम्मेदारी तथा उत्तरदायित्व भी होता है, साथ ही युद्ध अथवा कलह का दुष्परिणाम और नुकसान अलग |

अतः मनुष्य यदि अपनी जिह्वा पर संयम रखकर उचित अनुचित का ध्यान रखकर वाणी को अभिव्यक्ति दे तो जिह्वा के कारण उत्पन्न होने वाले दुष्परिणाम से बचा जा सकता है |

महान सन्त “कबीर दास” जी ने भी वाणी को अभिव्यक्त करने की सलाह देते हुए कहा है –
            “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय |
              अपना मन शीतल करे,  औरण को सुख होय ||   
                                                            ||समाप्त ||                             
धर्मेन्द्र पोद्दार
भाषा विभाग प्रमुख, सेक्रेड हार्ट स्कूल, सिलीगुड़ी

Sunday, October 20, 2019

आयशा टॉक: कुशल वक्ता


एक अच्छा वक्ता वहीं बन सकता है जो अच्छा श्रोता होता है, इसलिए सिर्फ बोले नहीं बल्कि सामने वाले की बातों को ध्यान से सुने और उसमें रुचि भी लें। हमेशा अपनी बात कहते समय प्वॉइंट टू प्वॉइंट का तरीका अपनाएं, ताकि सामने वाला आपकी बात आसानी से समझ जाए। सामने वाले को बातों में उलझाने की कोशिश न करें। हर शख्स से बात करने का अलग तरीका होता है, इसलिए जब भी आप किसी से बात करें  तो उसकी उम्र और प्रोफेशन का ध्यान अवश्य रखें। जब आप किसी छोटे बच्चे से बात कर रहें है तो उसका तरीका अलग होता है। किसी छोटे बच्चे से बात करने में सरल शब्दों का प्रयोग करना चाहिए एवं कम शब्दों में अपनी बात बोलनी चाहिए। सीधी एवं सटीक भाषा में बोलना चाहिए। कभी भी ज्यादा घूमा-फिराकर किसी से कोई भी बात नहीं करें। 

जब भी आप किसी से कुछ बोल रहे हो, उस समय सही शब्दों का चयन करें। कभी भी सस्ते एवं काम चलाऊ शब्दों को अपनी बातों में शामिल न करें। क्योंकि जब आप अच्छे और इम्प्रेसिव शब्दों का चयन करेंगे तब लोग आपकी बातों को ध्यान से और रुचिपूर्वक सुनेंगे। अगर हम पढ़ेंगे तो हम बोलने में सक्षम बनेंगे और हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा। हम दूसरों को पढ़े गए विषय पर बोलकर समझा सकेंगे। लगातार अलग- अलग विषय पर बोलते रहने से अलग-अलग लहजे में बोलने की क्षमता का विकास होगा। सुनकर बोलने की शक्ति बढ़ेगी, क्योंकि छोटे बच्चे सुनी हुई बात को जल्दी समझेंगे और उसके बारे में और ज्यादा जानने के लिए प्रश्न भी पूछेंगे इससे उनकी बोलने की क्षमता बढ़ेगी। वे अपने मन की बात को बोलकर अपने भाव प्रकट कर सकेंगे।
Ayesha Tak, The Fabindia School
atk4fab@gmail.com

Tuesday, September 24, 2019

उषा पंवार:आत्मविश्वास से बोलना

केयूराणि भूषयन्ति पुरुषं हारा चन्द्रोज्वला:
स्नानं विलेपनं कुसुमं नालकृंता मूर्धजा:
वाण्येका समलकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततम्केका वाग्भूषणम भूषणमं।।

बाजुबंद पुरुष को शोभित नहीं करते और हीं चंद्रमा के समान हार, स्नान, चन्दन, फूल और सजे हुए केश शोभा बढ़ाते हैं। केवल सुसंस्कृत प्रकार से धारण की हुई एक वाणी ही उसकी शोभा बढ़ाती हैं साधारण आभूषण नष्ट हो जाते है, वाणी ही सनातन आभूषण हैं।

मनुष्य की वाणी में इतनी शक्ति होती हैं कि वह पूरे राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। वाणी में इतनी शक्ति है कि किसी का दिल भी जीत सकते हैं मनुष्य को बचपन से ही हर स्तर पर , प्रत्येक क्षेत्र में बोलना ही पड़ता हैं जो इन्सान बोलना सीख गया वह प्रत्येक क्षेत्र में जिन्दगी में सफल हो सकते है। वाणी में अपार शक्ति है।

जो भी शब्द बोले पूरी तरह से स्पष्ट हो साफ़ हो। स्पष्ट शब्द जल्दी दूसरो को ज्यादा समझ सकें। बोली में मधुरता हो। शब्दों में भाव होने के साथ स्पष्ट उच्चारण से बोले। आज का युग तकनीकी युग है। आवाज़ को रिकार्ड कर के बोले। आत्मविश्वास के साथ अपने विचारों को धीरे धीरे और सावधानी से बोले। एक सर्वश्रेष्ठ बोलने वाले को सबसे पहले सर्वश्रेष्ठ सुनने वाला होना चाहिए। बोलना सुनना सभी क्षेत्रों में होते हैं। अधिक से अधिक पुस्तकें पढ़नी चाहिए जिससे ज्ञान बढ़े और अधिक विचार आयेंगे और विश्वास के साथ बोल सके।

छोटे बच्चे पढ ना लिखना शुरू कर ने से बहुत पहले सुनने और देखकर बोलने लगते हैं, वे सीखते हैं कि बोलकर वे अपनी जरूरतों और इच्छाओं को व्यक्त कर सकते हैं। खेलों एवं अनेक रंगीन चित्रों, वस्तुओं को देखकर बच्चो में भाषा कौशल से सुनने, बोलने के अवसर मिलते हैं। अन्य गतिविधियों, खेलों, समूह में बातचीत करने के माध्यम से बच्चों में ध्यानपूर्वक सुनने सुनकर निर्देश का पालन करने और बेझिझक बोलने के गुर को बढ़ावा दे सकते हैं। बच्चों के बोलने के उच्चारण में स्पष्टता और शुद्धता लाना कहानियों, रंगीन चित्रों के माध्यम से शब्दकोश बढ़ाया जा सकता हैं। बातचीत मानव विकास का हिस्सा है जो सोचने ,विचारने, सीखने में हमारी मदद करती हैं।

जैसे किसी शिक्षक द्वारा छात्र को कुछ प्रश्न पूछे जाने पर छात्र द्वारा उस प्रश्न का उत्तर देना चाहे वह गलत हो परन्तु छात्र द्वारा आत्मविश्वास से बोलने का प्रयास किया हैं उन्हें प्रोत्सहित करना चाहिए बोलने से ही गुण अवगुण का पता चलता है। जिस व्यक्ति में आत्म विश्वास से बोलने की कला होती है वह दुनिया के सामने अपनी बात को प्रभावी तरीके से पेश कर पाता है जिसकी बातचीत में नम्रता, मिठास, प्रसन्नता, दया और प्रोत्साहन होता है असल मायने में वही व्यक्ति अच्छा बोलने वाला (वक्ता)होता है। तौल मौल के बोल का पालन होना चाहिए।

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए
औरन  को शीतल करे, आपहू शीतल होए।
Usha Panwar, The Fabindia School
upr4fab@gmail.com

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