Monday, August 29, 2022
उत्तरदायित्व और सहयोग - ज्योति तड़ियाल
Thursday, February 18, 2021
तनाव को कम करने के तरीके - Ayasha Tak
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Monday, February 15, 2021
समय का महत्व - जफ्फर खां
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Monday, January 25, 2021
खुद को समय अवश्य दीजिए - राजेश्वरी राठौड़
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Tuesday, December 15, 2020
रिश्तों का महत्त्व - Ayasha Tak
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Thursday, December 10, 2020
आशा - जफ्फर खां
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Monday, December 7, 2020
साहस - Krishan Gopal
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Thursday, October 22, 2020
जीवन मे शिक्षा का महत्व - उस्मान गनी
Monday, October 12, 2020
कठिन परिश्रम कभी असफल नहीं होता - Ayasha Tak
उन्होनें अपनी मेहनत की शुरुआत अपने स्कूली जीवन से की। लड़के ने कड़ी मेहनत से हाई - स्कूल में अच्छा परिणाम प्राप्त किया। उन्होंने अध्ययन में बहुत अधिक समय बिताया। कई तरह के काम उन्हें बिना अध्ययन के पूरे करने पड़ते थे। वह अपने परिवार के साथ नहीं रहता था। क्योंकि उनका स्कूल उनके गाँव से बहुत दूर था। इसलिए वह स्कूल के छात्रावास में रहता था। वहाँ पर उसे अपना हर काम स्वयं करना पड़ता था। इसलिए वह ठीक से सो भी नहीं पाता था। इसके बावजूद उसने अपनी कड़ी मेहनत से अच्छे अंक प्राप्त किए। अन्यथा यदि आप कड़ी मेहनत करते है ,तो आपकी प्रतिभा में वृद्धि होगी।
स्कूल की पढाई पूरी होने के बाद में उसे कॉलेज में दाखिला लेना था। परन्तु उसका परिवार गरीब होने के कारण उसकी कॉलेज की फीस भरने में असमर्थ था। उसने अपने लिए नौकरी प्राप्त करके फिर अपनी पढाई और नौकरी दोनों ही कामों में कड़ी मेहनत की। आखिरकार, वह अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने सफलता प्राप्त करने में सक्षम हुआ। अब वह एक बहुत बड़े व्यवसायी है। उन्होनें अपनी मेहनत से सब कुछ हासिल किया। अगर वह मेहनत नहीं कर पाता तो उन सफलताओं को कभी हासिल नहीं कर पाता
Ayasha Tak, The Fabindia School <atk@fabindiaschools.in>
Monday, September 21, 2020
उद्देश्य का महत्त्व - Ayasha Tak
Wednesday, September 2, 2020
संघर्ष ही जीवन है - सुरेश सिंह नेगी
Saturday, August 15, 2020
समस्या समाधान - उर्मिला राठौड़
Monday, August 3, 2020
जीवन को सफल बनाने का मंत्र - उस्मान गनी
पापा.. ये 'सफल जीवन' क्या होता है ?
पिता, बेटे को पतंग उड़ाने ले गए।
बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था...
थोड़ी देर बाद बेटा बोला-
पापा.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की और नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !! ये और ऊपर चली जाएगी....
*पिता ने धागा तोड़ दिया *
पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...
तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया...
बेटा..
'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं
जैसे :
*घर* -
*परिवार*-
*अनुशासन*
*माता-पिता*
*गुरू-और*
*समाज*
और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...
वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..
'इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'
"अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."
"धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन' कहते हैं.।."
अतः इस छोटी सी कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है कि सम्बन्ध केसा भी हो हमे उसे तोड़ना नही चाहिए। सब से मिलजुल कर रहना चाहिए । जिंदगी में उतार चढ़ाव तो आते रहते है उनका हमे मुकाबला करना चाहिए और अपनी जिंदगी को सफल बनाना चाहिए।
उस्मान गनी
The Fabindia School
ugi@fabindiaschools,in
Monday, May 25, 2020
वाणी का महत्व - धर्मेन्द्र पोद्दार
हमारे समाज में या यों कहें तो हममें से अधिकांश व्यक्ति यह नहीं जानते की – क्या.. बोलें..?.. कहाँ..बोलें..? किससे… बोलें…? कितना… बोलें? क्यों.. बोलें…? क्या बोलना प्रासंगिक है या अप्रासंगिक और फिर बोलने का परिणाम क्या होगा? क्या बोलने के पश्च्यात परिणाम सद् परिणाम होगा या दुष्परिणाम आदि |
मनुष्य के जीवन में असफलता, निराशा, दुःख, विषाद, चिन्ता, कष्ट, कलह, अशांति, नफरत, हिंसा, आक्रोश आदि के कारणों पर यदि गहन चिन्तन करें, तो निष्कर्ष के रूप में हम पायेंगे कि – मानव जीवन की समस्याओं, कष्टों, हिंसा, आक्रोश, नफ़रत तथा विनाश का मूल कारण उनका जीभ का न दबना अर्थात परिणाम की परवाह किए बिना कुछ भी कह देना होता है | कुछ मनुष्य तो बोलने से पहले अपना विवेक और आत्म नियंत्रण इतना खो देते है, कि उन्हें भले बुरे, उचित, अनुचित, न्याय, अन्याय आदि का ज्ञान तक नहीं रहता, और वे क्रोध और आक्रोश के कारण अपना ही विनाश कर लेते हैं, कभी-कभी तो अपना अस्तित्व ही नष्ट कर लेते हैं |
कई बार तो ऐसा होता है कि वक्ता का कथन अथवा वक्तव्य समाप्त होते ही श्रोता अपनी आत्म नियंत्रण तथा संयम एवं सहनशीलता की सीमा खो बैठता है और परिणाम की परवाह किए बिना, बिना विचारे अनाप-सनाप अथवा मन को ठेस पहुँचाने वाली अथवा दिल को चुभने वाली बात कह देता है | और इसके भयंकर दुष्परिणाम देखने को मिलती है |
इतिहास इस बात की साक्षी रही है कि – महाभारत जैसा सर्वनाशी एवं हृदय विदारक संग्राम इसी जीभ के न दबने के परिणाम स्वरूप ही हुई थी | यदि इतिहास के साक्ष्य के आधार पर विचार करें, तो हम निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि – यदि द्रोपदी ने दुर्योधन को “अन्धे के पुत्र भी अन्धे होते हैं” जैसी हृदय विदारक अथवा दिल को ठेस लगने वाली या मन को चुभने वाली बात न कही होती और उसके मन को चोट न पहुँचाई होती अथवा उसके हृदय को न दुखाया होता तो शायद दुर्योधन तथा अन्य कौरवों और पाण्डवों के बीच कटुता, नफ़रत, आक्रोश अर्थात दरार पैदा न हुईं होती | और शायद इतना भीषण परिणाम भी न हुआ होता | कौरवों और पाण्डवों के मध्य हुए महासंग्राम और भीषण रक्तपात में अठारह अक्षौहिणी सेना कट मरी थी |
व्यावहारिक जीवन-गत उदाहरण और महाभारत के परिणाम, इन्हीं सब कारणों से से सिद्ध होता है कि – मनुष्य अपनी जीभ पर जहाँ तक हो चौकसी कर सके करें अर्थात अपने वाणी पर नियंत्रण करें और आवश्यकता अनुसार उसको (जीभ) दबा सके तो दबाये, क्योंकि युद्ध हो अथवा जीवन संग्राम किसी भी झगड़े, युद्ध, क्रोध, आक्रोश, नफ़रत आदि का परिणाम विध्वंस ही होता है|
समय-समय पर होने वाले मानव मन के मतभेद, आक्रोश और विध्वंस का कारण वाणी पर नियंत्रण न होना अथवा जिह्वा (जीभ) की स्वच्छंदता ही तो है | इसी के कारण आपसी मनमुटाव, आक्रोश, मतभेद, विद्रोह, घृणा आदि बुराइयाँ जन्म लेती हैं | जिससे समय-समय पर भयंकर नुकसान तबाही के साथ-साथ मानव अस्तित्व पर खतरे के बादल मँडराने लगते हैं |
क्योंकि मेरी दृष्टि में युद्ध हो या मतभेद अथवा वैचारिक मतान्तर विरोधी अथवा हारने वाला पक्ष दोनों पक्ष का तो सर्वनाश तो होता ही है, वह तो एक इतिहास हो जाता है | किन्तु जितने वाले पक्ष पर पुनः सृजन की जिम्मेदारी तथा उत्तरदायित्व भी होता है, साथ ही युद्ध अथवा कलह का दुष्परिणाम और नुकसान अलग |
अतः मनुष्य यदि अपनी जिह्वा पर संयम रखकर उचित अनुचित का ध्यान रखकर वाणी को अभिव्यक्ति दे तो जिह्वा के कारण उत्पन्न होने वाले दुष्परिणाम से बचा जा सकता है |
महान सन्त “कबीर दास” जी ने भी वाणी को अभिव्यक्त करने की सलाह देते हुए कहा है –
“ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय |
अपना मन शीतल करे, औरण को सुख होय ||
||समाप्त ||
धर्मेन्द्र पोद्दार
भाषा विभाग प्रमुख, सेक्रेड हार्ट स्कूल, सिलीगुड़ी
Founder of Good Schools Alliance, author, educator, and adventurer empowering children to discover the magic of literature.
Sunday, April 19, 2020
मझधार में ज़िन्दगी (जीवन धारा)
(मानव जीवन की कई अवस्थाएँ होती है, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था | वैसे तो बाल्यावस्था, किशोरावस्था और युवावस्था में जीवन सम्बन्धी धारणाये बिलकुल निराली होती है, यह अवस्था अल्हड़पन में ही गुजर जाता है, किन्तु प्रौढ़ावस्था तक पहुँचते-पहुँचते मानव यह सोचने लगता की उसने अपने जीवन में क्या पाया और क्या खोया| यह कविता जीवन दर्शन पर आधारित है |)न जाने कब, किस करवट, किस और चल रही ज़िन्दगी |
स्वप्न पूरी करने, किस और मुड चली ज़िन्दगी |
अधूरे ख्वाब पूरी करने की, प्रयास में मुड़ चली ज़िन्दगी |
धैर्य, हौसला, उत्साह, हिम्मत को सजोने लगी ज़िन्दगी |
कितनी रातें, कितने दिन प्रयास में बीती ज़िन्दगी |
कुछ सफ़लता, कुछ आशा, कुछ उम्मीद में कट रही ज़िन्दगी |
यही सोचते-सोचते न जाने कब, मझधार में आ फँसी ज़िन्दगी |
समय के तेज़ प्रवाह में किस ओर बह चली ज़िन्दगी |
नाव में सवार पथिक की तरह है यह ज़िन्दगी |
मझधार में बवण्डर और तूफानों से जूझ रही ज़िन्दगी |
भँवर में और तेज़, आँधी, तूफ़ान, बवण्डरों से लड़ रही ज़िन्दगी |
नाव में बैठे पथिक की तरह शंकातुर ज़िन्दगी.. . |
दिन के उजाले में भी धूल, धूसड़, अँधियारे सी ज़िन्दगी |
अब, ज़िन्दगी और मौत के ख़ौफ़ से बे ख़ौफ़ ज़िन्दगी |
अब, परिणाम की परवाह से, बेफिक्र ज़िन्दगी…. |
सिर्फ़ ज़िन्दगी या हो मौत, आलिंगन को बेताब ज़िन्दगी |
Founder of Good Schools Alliance, author, educator, and adventurer empowering children to discover the magic of literature.
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