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Sunday, May 25, 2025

गुरु नानक देव जी: मानवता और समानता के महान प्रेरक - साक्षी खन्ना Arthur Foot Academy

 

गुरु नानक देव जी सिख धर्म के संस्थापक थे और पहले गुरु थे। उन्होंने समानता और मानवता का संदेश दिया, जो आज भी लोगों को प्रेरित करता है। उन्होंने अपने जीवन में हमेशा सच बोलना और ईश्वर के प्रति भक्ति का संदेश दिया।

गुरु नानक देव जी ने हमें प्रेम, एकता और सच्चाई के मार्ग पर चलना सिखाया। उनका जीवन आज भी हमें सिखाता है कि हम सभी का जीवन एक समान है और हमें मिलजुलकर रहना चाहिए तथा सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। वे न केवल सिख धर्म के संस्थापक थे, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक महान संत और मार्गदर्शक भी थे।

गुरु नानक देव जी केवल एक धार्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे समाज सुधारक और प्रेरणादायक भी थे। उन्होंने हमें सिखाया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है और हमें सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए तथा मेहनत करके जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।

साक्षी खन्ना


गुरु नानक देव जी की यात्राएँ: एकता और प्रेम का संदेश - स्वाति Arthur Foot Academy

 

"यात्रा सिर्फ स्थानों की नहीं होती, यह आत्मा की गहराइयों में उतरने का माध्यम भी बन जाती है। गुरु नानक देव जी की यात्राएँ हमें सिखाती हैं कि सच्चाइयों, प्रेम और एकता की खोज के लिए सीमाएँ कोई मायने नहीं रखतीं।"

पाठ ‘प्रवास’ से मैंने सीखा है कि कैसे गुरु नानक देव जी ने अपनी यात्राओं के दौरान अलग-अलग धर्मों, जातियों के लोगों से मुलाकात की, जिससे सीखने को मिलता है कि "ईश्वर एक है और सभी इंसान बराबर हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या जाति से हों। हमें सभी के साथ समानता और भाईचारे का व्यवहार करना चाहिए।"

गुरु नानक जी ने अपने जीवन में लगभग 150 से अधिक स्थानों पर यात्रा की, जिनका उद्देश्य था:

  • सभी के साथ समानता और भाइचारे से व्यवहार करना और समझना कि सबका ईश्वर एक है।

  • अंधविश्वास और जात-पात के खिलाफ बोलना।

  • सभी धर्मों के लोगों के साथ बातचीत करके उनकी भावनाओं को समझना, उनका हल निकालना या उनकी मदद करना।

  • एकता का संदेश देना; गुरु नानक जी ने सभी धर्मों, जातियों के लोगों से मिलकर एकता, भाइचारे और प्रेम का संदेश दिया।

प्रवास हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे जीवन के पड़ाव, चाहे वे कितने भी छोटे क्यों न हों, वे कभी नहीं भूल सकते हैं, बल्कि हर रुके हुए ठहराव को एक प्रेरणा में बदला जा सकता है।

प्रवास एक ऐसा संदेश है जो आज भी हमारे भीतर झांकने और सुधारकर जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

"गुरु नानक जी ने सिखाया है कि ईश्वर न तो किसी एक धर्म में सीमित है, न ही किसी एक स्थान में है, वह सबमें और हर जगह मौजूद है।"

ना कोई हिन्दू है, ना कोई मुसलमान है, सभी मनुष्य हैं, सभी एक समान हैं। — गुरु नानक देव जी
स्वाति

Wednesday, February 22, 2023

स्तर और प्रेम - Jyoti Tadiyal

  परियोजना कार्य  11 - स्तर और प्रेम

मनुष्य स्वयं में अनेक गुणों की खान है परंतु सभी मनुष्यों में इस योग्यता का स्तर भिन्न भिन्न है। यह भिन्नता प्रत्येक को अलग व्यक्तित्व पहचान देती है। विद्यार्थी भी ऐसे ही अलग अलग गुण योग्यता से भरे होते हैं जो उनकी विशिष्ट पहचान होती है।


परिस्थिति

कक्षा कक्ष में विद्यार्थी द्वारा कक्षा कार्य गृह कार्य में लापरवाही दिखाना।

इस प्रकार के विद्यार्थी प्रायः कक्षा में होते हैं जिनमें कार्य कोकर लेंगे” ऐसी प्रवृत्ति होती है, यद्यपि ये कार्य तो पूरा करते हैं परंतु यथा समय और उचित प्रकार से नहीं। जब ऐसे विद्यार्थियों के साथ कार्य करते हैं तो
सर्वप्रथम दिमाग में यही विचार आता है कि किस प्रकार इनका सर्वोत्तम निकलवाया जाए और जो कार्य ये करेंगे वे केवलरटन्त हो कुछ सकारात्मक हो, जिससे विद्यार्थी कुछ सीख लें। ऐसी परिस्थिति में मैं लिखने से ज्यादा समझने पर ज़ोर देती हूं। आवश्यक नहीं मैं उनसे उतना कार्य अपेक्षित रखूं जितना बाकी विद्यार्थी करते करते हैं कार्य पूरा करने पर इनका उत्साहवर्धन प्रोत्साहन किया जाए ऐसा मेरे द्वारा प्रयास रहा। अंततोगत्वा परिणाम सकारात्मक रहे और विद्यार्थी में परिवर्तन देखा गया।


परिस्थिति

प्रेम प्रकृति में सर्वत्र व्याप्त है।प्रत्येक जीवधारी इसे अनुभव करता है। घर, परिवार, विद्यालय सभी जगह प्रेम व्याप्त है और कोई भी इससे अछूता नहीं रह सकता। विद्यालय में जहां सह शिक्षा व्याप्त होती है कभी कभी विद्यार्थियों के मध्य इस प्रकार की भावनाएं बलवती हो उठती हैं। वे परस्पर प्रेम लगाव को अनुभव करते हैं। मेरे समक्ष भी इस प्रकार की परिस्थिति गई। इस पर सर्वप्रथम मेरी कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं रही। मैंने इसे कोई इस प्रकार नहीं लिया मानो आसमान टूट पड़ा हो या धरती हिल उठी हो। सर्वप्रथम दोनों विद्यार्थियों के साथ मेरा व्यवहार सहज ही रहा कोई परिवर्तन मैंने उसमें नहीं किया। 


दूसरी बात उन्हें भी सबके समक्ष असहज अनुभव नहीं होने दिया। सही अवसर समय पर दोनों को साथ बैठाकर यह समझाया कि इस समय दोनों के लिए आवश्यक क्या है? इस समय किसे और क्यों प्राथमिकता देनी है? माता पिता परिवार की उनसे क्या अपेक्षाएं हैं, उन पर वे कितना विश्वास करते हैं, उन्हें माता पिता के सपनों को साकार करना है, जीवन में सफ़ल बनना है। इस प्रकार समय समय पर उन्हें समझाया गया साथ ही कोशिश की गई व्यवहार को सामान्य रखने की। कुछ समय बीतने पर परिणाम सामने आए परिस्थिति थोड़ी बदली दोनों का व्यवहार भी सुधर गया। इस तरह दोनों ही समय व्यवहार को सहज रखा गया। प्रेम की शक्ति अदभुद होती है प्रेम द्वारा कठिन से कठिन समस्या भी सुलझ जाती है।

Jyoti Tadiyal
The Doon Girls' School Dehradun

Monday, August 30, 2021

Quality and Love - Chandra Prakash

Quality
गणुवत्ता एक ऐसा तत्व हैं जो वस्तु को उपयोग में लाने के लिए उपयक्त बनाता हैं। वस्तओु के उत्पादन में
मानक मापदंडो का गणुवत्ता के लिए पालन होना अनि वार्य हैं। गणुवत्ता का सबसे महत्वपर्णू  लक्षण मानक के
अनरूप बने वस्तु पर स्टैंप सर्टिफिकेट या मानक कागज जिस से वस्तु की गणुवत्ता का पता लग सके। गणुवत्ता पर्णू 
शिक्षा(quality education) आधनिुनिक समाज की मांग हैं और चाहे कोई भी क्षेत्र हो गणुवत्ता की मांग हर जगह
होती हैं। गणुवत्ता शिक्षा से आशय शिक्षा में  गुण का विकास करना या गणु का समावेश करना हैं। जिस से छात्रों
एवं शिक्षा के उद्देश्य की प्राप्ति भली-भाँति हो सके। जब किसी कार्य में उस कार्य से सबंधित सभी गणु का
(व्यावहारिक एवंसद्धान्तिक) समावेश होता हैं। तो उसे उस कार्य की गणुवत्ता के रूप में देखा व समझा जाता
हैं।और यही पहलू शिक्षा में भी होता हैं। हम शिक्षा में गणुवत्ता की बात जब करते हैं तो हम ऐसी शिक्षा को
गणुवत्तापर्णू   मानेंगे  जो छात्रों को उस शिक्षा का लाभ पहुंचाए। शिक्षा में प्रायः उसी शिक्षा का समावेश होता हैं जो
शिक्षा शिक्षण अधिगम में छात्रों की रूचि एवं क्षमताओं को समझे एवं समाज की आवश्यकताओं की पर्तिू  करें  और 
छात्रों को जीवि को पार्जनर्ज योग्य बनाए।

उ.1- एक छात्र जो कक्षा के काम और गहृकार्य के साथ एक घटिया काम करता हैं।
पहला महत्वपर्णू  उपाय - जो छात्र class work और home work को अच्छे ढंग से नहीं करता हैं। तो इसके लिए हम उस छात्र को Punish नही करेंगे बल्कि इसके स्थान पर जो कक्षा में अच्छा छात्र हैं जो अपना class work अच्छे ढंग से करता हैं ,और Home work भी ठीक ढंग से करता हैं,और जो पढाई में अच्छा हो, उस छात्र का
  उदाहरण उस छात्र के पास रहेंगे, और कहेगे कि इस बच्चे की Note book देखिए और इस बच्चे से अपने आप
को Compare करो।
दसूरा उपाय- हमें बच्चों के प्रति लापरवाही नही  बरतनी   चाहिए । अगर हम कक्षा की बात करें तो कक्षा में जो कुछ
भी पढाया जाता हैं तो उस कार्य को उसी समय देखना चाहिए। जिस से बच्चे अपने कार्य के प्रति सजग रहें।
तीसरा उपाय- जो छात्र पढने में अच्छा हैं और Class work ठीक ढंग से करता हैं, और Home work भी अच्छे
ढंग से करता हैं। तो हमें प्रत्येक Week में प्रतियोगिता करानी चाहिए। जो बच्चे कक्षा में प्रथम , द्वितीय व ततृय
आये उन्हें इनाम देना चाहिए। जिस से बच्चे पढ़ाई व अपने कार्य के प्रति सजग रहें।और इनाम पाने के लिए
तत्पर रहे।
Love
प्रेम, प्यार, स्नेह कई नामों से जाने वाला शब्द हैं। जो अपने अर्थ को इतना विशिष्ट बनाये हुए हैं। आज तक
बहुत सारे कवियों, साहित्यकारों ,लेखकों और अन्य सभी पथ्वीवासियों ने प्रेम शब्द का अर्थ एक लाईन या कुछ
शब्दों में बताना आज भी उतना ही जटिल हैं। जितना मानव के प्रादर्भाुर्भाव के समय था। इस प्रकार प्रेम को
परिभाषित करना आसान नहीं हैं। प्रत्येक मनष्य प्रेम की अलग अलग रूपरेखा बना सकता हैं। प्रेम की परिभाषा के
रूप मेंअलग- अलग हो सकते हैं। उसके प्रति नजरिया भी अलग हो सकते हैं। लेकिन प्रेम तो प्रेम ही होता हैं। प्रेम
रूपी बीज का अंकुर उस भावना रूपी उपजाऊ  भूमि में होता हैं।  मनुष्य  जन्म से ही प्रेम की चाहत रखता हैं। वह प्रेम के बिना जीना नहीं चाहता हैं। जसै ही बच्चे का जन्म होता हैं वह अपने माता पिता तथा दादा दादी से प्रेम करता
हैं। वह उनसे  दूर नहीं जाना चाहता हैं। जसै ही बच्चे की उम्र चार-पाँच वर्ष हो जाती हैं उसके बाद वह अपने भाई
-बहिन का प्यार उसे प्राप्त होता हैं। यही से ही व्यक्तियों के सस्ंकारो में व्यापकता आना प्रारंभ हो जाती हैं। तथा
प्रारंभिक  मूल्यों  के विकास में प्रेम की महत्वपर्णू भूमिका होती  हैं। उसके बाद व्यक्ति स्कूल तथा काँलेजो में अपने
मित्रों के साथ प्यार बाटता हैं, प्राप्त करता हैं। तथा प्यार के प्रति उसकी समझ गहरी होती हैं। उसके बाद व्यक्ति
अपने कार्य स्थल तथा पारिवारिक जीवन में भी प्रेम चाहता हैं। कहने का अर्थ हैं कि प्रेम जीवन प्रयत्न चलनेवाली
एक व्यापक अवधारणा हैं।

रोमांटिक रिश्ते में दो नाबालि क छात्र
न. 1 महत्वपर्णू  बात -   हमें  बच्चों को प्रेम के बारे में समझाना चाहिए। प्रेम वह होता हैं जो मन से मन का हृदय सेहृदय का होता हैं। जसै कि आप अपने माता पिता भाई बहिन व दादा दादी से करते हैं। इसे ही प्रेम कहते हैं। आप प्रेम शब्द का गलत अर्थ न ले। अगर कोई छोटे बच्चे को उसके माता पिता बिना बताये इधर उधर चले जाते हैं। तो वह बच्चा कितना तड़पता हैं। इसेही प्रेम कहते हैं। हमें प्रेम का गलत अर्थ नहीं लेना चाहिए।
. 2- अध्यापक को, बच्चों को समझाना चाहिए - अध्यापक को, बच्चों को अपने पास  बुलाकर उन्हें समझाना
चाहिए और कहना चाहिए कि अभी आप नाबालिक हो। तम्हें अभी अच्छे और गलत में कोई अतंर नहीं दिखाई
देता हैं। आपको ये सब नहीं करना चाहिए। आपके पीछे आपके माता व पिता हैं। कभी आपने उनके बारे में सोचा हैं।
आपके माता पिता को आपसे कितनी उम्मीद हैं। जब उनको ये बात पता चलेगी तो क्या होगा। इसके बजाय आप
कुछ ऐसा अच्छा कार्य जो  दुनिया  के लिए मिशाल बन जाए। तब आपके माता पिता का सिर कितना ऊँचा हो
जाएगा। ये सब बातें हमें बच्चों को प्यार से समझाना चाहिए।

-Chandra Prakash@JMMS, John Martyn Memorial School, Salangaon, Dehradun 

Monday, February 15, 2021

चरित्र का महत्व - राजेश्वरी राठौड़

चरित्र से ही मनुष्य का जीवन गौरवपूर्ण बनता है, धन, पदवी , आदि से नहीं ।समाज में महत्व और सम्मान जितना सदाचारी व्यक्ति का होता है, उतना धनाढ्य तथा ऊंचे पद वाले व्यक्ति का भी नहीं होता है।धनवान के यश से सबको ईर्ष्या होती है, इसी प्रकार धन, विद्या या योग्यता वाले में अभिमान होता है परंतु शुद्ध चरित्र वाले से न तो    कोई ईर्ष्या करता है और न उसका मन और अशुद्ध होता है। 

चरित्र के कई अंग है जैसे सत्य पर अटूट विश्वास, शांत आदि। जो व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर दृढ़ होता है, उसी का चरित्र शुद्ध होता है। सरल हृदय व्यक्ति में विश्वास, प्रेम, दया ,कोमलता तथा स्वानुभूति के भाव स्वयं ही उत्पन्न हो जाते हैं। इनमें से एक भी गुण पूरी तरह आ जाए, तो व्यक्ति शिष्ट कहलाने लगता हैं। अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति डरता नहीं है, निराश नहीं होता। है। पवित्र चरित्र के प्रधान अंग है छल कपट ना होना, लेन -देन में सफाई, वचन पालन,  दया -भाव, परिश्रम पर विश्वास ,अभिमान का अभाव जिस के चरित्र में उक्त सभी गुण विद्यमान हो, वह सज्जन व्यक्ति की श्रेणी में आता है।

राजेश्वरी राठौड़
The Fabindia School
rre@fabindiaschools.in

Tuesday, December 15, 2020

रिश्तों का महत्त्व - Ayasha Tak

Courtesy: clipart-library.com
मनुष्य जीवन रिश्तों से जुड़ा हुआ है। रिश्तों के कारण ही मनुष्य जीवन में आगे बढ़ने की , सफलता पाने की , शिक्षित होने की , कार्य करने की इच्छा रखता है। यदि रिश्ते मजबूत हो तो जीवन खुशहाल व सुखमय बन जाता है, लेकिन रिश्तों में खटास आते ही व्यक्ति भी टूट जाता है। रिश्तों में अपनेपन की भावना की खातिर ही व्यक्ति एक - दूसरे पर मर - मिटने तक को तैयार हो जाते हैं। 

एक माँ के अंदर शुरू से ही अपने बच्चे के प्रति बेहद अपनेपन की भावना कायम हो जाती है। उसे अपना बच्चा सारी दुनिया में सबसे प्रिय व सुंदर लगता है। मनोवैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि अकेले व्यक्ति को भौतिक , भावनात्मक , मानसिक व आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाता है। करीबी रिश्तेदारों एवं मित्रों से व्यक्ति अपने मन की वे सारी बातें करते हैं , जिन्हें वे अन्य व्यक्तियों से नहीं कर पाते हैं। 

रिश्तेदार व परिवार व्यक्ति के बुरे समय में साथ खड़े रहते हैं। ऐसे में अकेले व्यक्ति की पीड़ा पूरे परिवार और रिश्तेदारों की पीड़ा बन जाती हैं। वे एकजुट होकर मुसीबत से लड़ते है और मुसीबत को दूर भगा कर कामयाबी हासिल करते है। दोस्त रिश्तेदार और परिवार दुआ भी बन जाए इसके लिए व्यक्ति को प्रेम , दुआ , विनम्रता और मदद का मार्ग पकड़ लेना चाहिए। इससे ये बंधन मजबूत होकर जीवन को सशक्त , रोगहीन व सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाते है।

 रिश्ते निभाना भी समझौते का दूसरा नाम है। रिश्ते केवल खून के ही नहीं होते हैं , भावनात्मक भी होते हैं। कई बार भावनात्मक रिश्ते अटूट बन जाते हैं , क्योंकि उनमें प्रेम , सामंजस्य , धैर्य और ईमानदारी का साथ होता हैं।
  
Ayasha Tak
The Fabindia School
atk@fabindiaschools.in

Friday, April 10, 2020

भारतीय शास्त्रीय संगीत - किशोर कुमार

भारतीय शास्त्रीय संगीत का हम अगर सही सही अर्थ करें तो इसका अर्थ होगा की ऐसा संगीत जो हमे सत्य, शांति, आंनद, अहिंसा, प्रेम की ओर जाने के लिए प्रेरित करता है उसे भारत में संगीत कहा जाता है।

भारत में संगीत का अर्थ वह नही है जो पश्चिम में संगीत का है। पश्चिम में संगीत का मतलब मन के मनोरंजन से है लेकिन भारत में संगीत का अर्थ पूजा, प्रार्थना और साधना से है।

भारतीय संगीत के दो प्रकार है- उत्तरी भारतीय संगीत और दक्षिणी भारतीय संगीत और दोनों ही अपने आप में महान है। भारतीय संगीत में कई तरह तर की राग और ताल है जिन्हे हम सुने तो ये हमारे मन को अपूर्व रूप से शांत करते हैं और हमारे भीतर की अशांति को मिटा देते है भारत का संगीत वेदों के अनुसार हजारों वर्षों से भी बहुत प्राचीन है

धन्यवाद
किशोर कुमार
द फैबइंडिया स्कुल

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