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Saturday, August 22, 2026

संवेदनशील शिक्षक और हर बच्चे की छिपी संभावनाएँ - सनबीम ग्रामीण स्कूल

“एक शिक्षक के अंदर विभिन्न प्रकार के कौशल होना आवश्यक है।”

एक अच्छे शिक्षक के अंदर केवल विषय का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके अंदर विभिन्न प्रकार के कौशल भी होने चाहिए। शिक्षक को प्रभावी ढंग से पढ़ाने के साथ-साथ बच्चों की भावनाओं और उनकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को समझने की क्षमता भी होनी चाहिए। एक शिक्षक में संचार कौशल, नेतृत्व कौशल, रचनात्मकता, धैर्य, समय-प्रबंधन, तकनीकी ज्ञान और समस्या-समाधान की क्षमता होना बहुत आवश्यक है। हर बच्चा अलग होता है और उसकी सीखने की गति तथा रुचि भी अलग होती है। इसलिए शिक्षक को अपनी शिक्षण विधि में आवश्यकता के अनुसार बदलाव करने का कौशल होना चाहिए। कभी शिक्षक को मार्गदर्शक, कभी मित्र और कभी प्रेरणादाता की भूमिका निभानी पड़ती है।

इससे मुझे यह सीख मिली कि एक शिक्षक का कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहयोग देना भी है। एक कुशल शिक्षक अपने ज्ञान, व्यवहार और विभिन्न कौशलों के माध्यम से बच्चों के अंदर आत्मविश्वास, जिज्ञासा और सीखने की इच्छा पैदा करता है। इसलिए एक शिक्षक को हमेशा नए कौशल सीखते रहना चाहिए और बच्चों को आगे बढ़ने में सहयोग करते रहना चाहिए।

चंचल

आज की क्लास से यह सीख मिलती है कि एक टीचर के बारे में तुरंत गलत नहीं सोचना चाहिए। पहले कुछ समय उस टीचर के साथ व्यतीत करें, हो सकता है कि जिस टीचर को आप गलत समझ रहे हैं, वह सभी टीचर्स से बेस्ट निकले। और आज की क्लास से यह भी शिक्षा मिलती है कि किसी व्यक्ति को हमेशा गलत नजरों से नहीं देखना चाहिए, किसी व्यक्ति को हमेशा पत्थर दिल का नहीं समझना चाहिए। कुछ व्यक्ति देखने में काफी निर्दयी एवं झगड़ालू दिखते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता कि वह व्यक्ति किसी बच्चे से प्रेम न करें या बच्चों के साथ कठोरता से पेश आएँ, क्योंकि हर व्यक्ति के अंदर प्रेम एवं ममता रहती है।

अशोक कुमार मौर्य 

Wanted Back-Bencher and Last-Ranker Teacher

इस पूरी पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे सबसे ज्यादा यह महसूस हुआ कि शिक्षक बनना आसान है, लेकिन बच्चों के दिल में शिक्षक के रूप में जगह बनाना बहुत कठिन है। कोई शिक्षक रोज कक्षा में जाकर पाठ पढ़ा सकता है, होमवर्क दे सकता है और परीक्षा की तैयारी कर सकता है, लेकिन हर शिक्षक ऐसा नहीं होता जिसकी विदाई पर बच्चे अपनी आँखों में आँसू लेकर उसे रोकना चाहें। रोमा माथुर की कहानी ने मुझे भीतर तक छू लिया। उनके पास आगे बढ़ने का अवसर था, उनके सामने एक बेहतर करियर, बड़ा पद और नई पहचान थी, फिर भी उनका मन अपने बच्चों से अलग होने के लिए तैयार नहीं था। इससे मुझे महसूस हुआ कि कभी-कभी जिंदगी में बड़ा निर्णय यह नहीं होता कि हमारे लिए क्या बेहतर है, बल्कि यह होता है कि हमारे होने से किसका जीवन बेहतर हो रहा है।

हर बच्चा अपनी जगह खास होता है, बस उसे समझने वाली नजर चाहिए। हम अक्सर बच्चों को उनके marks, rank और behaviour के आधार पर पहचान लेते हैं—कोई topper है, कोई average, कोई back-bencher और कोई last-ranker। लेकिन पुस्तक ने मुझे सिखाया कि ये labels बच्चे की पूरी पहचान नहीं हैं।

रोमा माथुर का बच्चों के साथ व्यवहार मुझे बहुत प्रभावित करता है। वह केवल यह नहीं देखतीं कि बच्चा क्या कर रहा है, बल्कि यह समझने की कोशिश करती हैं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। मुझे लगता है कि एक शिक्षक के लिए यही सबसे जरूरी गुण है—पहले बच्चे को समझना और फिर उसे सही दिशा देना।

पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों से मुझे यह भी समझ आया कि classroom में केवल discipline काफी नहीं है। प्यार, patience, humour, encouragement और विश्वास भी उतने ही जरूरी हैं। अगर कोई बच्चा पढ़ाई से bored है या बार-बार गलती करता है, तो उसे तुरंत कमजोर या naughty कहने के बजाय हमें उसकी परेशानी और जरूरत को समझना चाहिए।

मुझे विशेष रूप से back-bencher और last-ranker बच्चों को लेकर सोचने का नया नजरिया मिला। पीछे बैठने वाला बच्चा जरूरी नहीं कि पीछे रहने वाला ही हो। हो सकता है उसे केवल एक ऐसा शिक्षक चाहिए, जो उस पर विश्वास करे और उसे मौका दे।

रोमा माथुर का अपने विद्यार्थियों के साथ भावनात्मक रिश्ता और अंत में बच्चों का उन्हें छोड़ना न चाहना मेरे लिए सबसे भावुक हिस्सा रहा। इससे मुझे लगा कि शिक्षक की असली सफलता उसके पद या achievement में नहीं, बल्कि बच्चों के दिल में बनाई हुई जगह में होती है।

इस पुस्तक के बाद मैं अपने शिक्षक-रूप को लेकर एक बात जरूर याद रखना चाहूँगी—

मैं किसी बच्चे को उसके आज के marks से नहीं, उसके कल की संभावना से देखूँ।

मैं चाहती हूँ कि मेरी classroom में topper को प्रोत्साहन मिले, average बच्चे को confidence मिले, back-bencher को अवसर मिले और last-ranker को यह एहसास हो कि “तुम भी कर सकते हो।”

मेरे लिए इस पूरी पुस्तक की सबसे सुंदर सीख यही है—

“एक अच्छा शिक्षक पाठ पढ़ाता है, लेकिन एक महान शिक्षक बच्चे को खुद पर विश्वास करना सिखाता है।”

मंजुला सागर

इस अध्याय से मुझे यह सीख मिली कि एक शिक्षक का विद्यार्थियों के साथ संबंध केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें विश्वास, अपनापन और जिम्मेदारी भी शामिल होती है। रोमा का अपने विद्यार्थियों के भविष्य और सुरक्षा को प्राथमिकता देना एक आदर्श शिक्षक की भावना को दर्शाता है। एक शिक्षक के रूप में मुझे भी यह समझना चाहिए कि विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, भावनाओं और कठिनाइयों को समझकर उनका मार्गदर्शन करना मेरी जिम्मेदारी है।

इस अध्याय ने मुझे यह भी प्रेरणा दी कि परिस्थितियाँ कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, शिक्षक को विद्यार्थियों के हित में धैर्यपूर्वक और संवेदनशील होकर निर्णय लेना चाहिए। विद्यार्थियों को केवल विषय का ज्ञान देना ही पर्याप्त नहीं है; उनमें आत्मविश्वास, सुरक्षा की भावना और आगे बढ़ने की प्रेरणा विकसित करना भी शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

मनोज कुमार

कभी-कभी कक्षा की आखिरी बेंच पर बैठा बच्चा केवल एक विद्यार्थी नहीं होता, बल्कि वह एक अनकही कहानी, छिपी हुई प्रतिभा और अनदेखे सपनों को अपने भीतर समेटे होता है। “Back-Bencher, Last-Ranker Teacher” से मुझे यही सीख मिली कि किसी बच्चे की वर्तमान स्थिति उसके भविष्य का अंतिम सत्य नहीं होती।

एक शिक्षक के रूप में हम अक्सर अंक, अनुशासन और प्रदर्शन के आधार पर बच्चों को पहचानने लगते हैं। लेकिन एक सच्चा शिक्षक बच्चे के अंकों के पीछे छिपे मन को पढ़ता है। जो बच्चा बार-बार असफल हो रहा है, हो सकता है उसे डाँट की नहीं, बल्कि विश्वास की आवश्यकता हो। जो बच्चा सबसे पीछे बैठता है, संभव है कि उसके भीतर सबसे आगे बढ़ने की क्षमता छिपी हो।

इस पुस्तक ने मेरे भीतर एक प्रश्न जगाया—“क्या मैं अपने विद्यार्थियों को वास्तव में समझती हूँ, या केवल उनके परिणामों को देखती हूँ?” एक शिक्षक बनकर मैंने यह महसूस किया कि हमारा कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि किसी बच्चे के जीवन में वह व्यक्ति बनना है, जो उसके भीतर कह सके—“तुम कर सकते हो, मुझे तुम पर विश्वास है।”

ऐसा मैं स्वयं भी अपनी कक्षा में कमजोर एवं कम नंबर लाने वाले बच्चे एवं पीछे बैठने वाले बच्चे की कक्षा में तारीफ करके उनके बदलाव को महसूस करती हूँ, क्योंकि कभी-कभी एक छोटी-सी प्रशंसा, एक धैर्यपूर्ण बातचीत और एक अवसर किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदल सकती है। इसलिए अब मेरे लिए Last-Ranker कोई अंतिम स्थान नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।

एक शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता तब नहीं होती जब पूरी कक्षा प्रथम आए, बल्कि तब होती है जब वह उस बच्चे को भी आगे बढ़ा दे, जिसे सबने पीछे छोड़ दिया था। एक शिक्षक के रूप में अपनी कक्षा के सबसे पीछे एवं सबसे कम नंबर लाने वाले विद्यार्थियों को आगे बढ़ाने के लिए हमने यह जाना कि—

“हर बच्चा संभावनाओं का अनमोल खजाना है, जिसमें असीमित प्रतिभाएँ और क्षमताएँ छिपी हैं। जैसे कोई कुम्हार मिट्टी को सुंदर आकार में ढालता है, वैसे ही एक शिक्षक की भूमिका होती है कि वह इन अंतर्निहित संभावनाओं को सही दिशा में विकसित करे। इसके लिए शिक्षक को धैर्य, समझ और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। वह हर बच्चे को विद्यालय में की जाने वाली छोटी-बड़ी गतिविधियों में हिस्सा लेने का एक विशेष, अनोखा अवसर प्रदान करता है, जिससे उसकी छिपी हुई क्षमताएँ प्रकट हो सकें। इससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन के बीज बोए जाते हैं, जिनके फल समाज को प्रगति और समृद्धि की ओर ले जाते हैं।”

गुलाबी

Saturday, August 8, 2026

शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास: संवेदनशील शिक्षा की ओर एक कदम- सनबीम ग्रामीण स्कूल

"हर बच्चा एक खुली किताब नहीं होता। कुछ बच्चों को पढ़ने के लिए शब्द नहीं, बल्कि संवेदनशील हृदय चाहिए।"

"Wanted Backbenchers, Last Ranker Teacher" पढ़ने से हमें यह एहसास हुआ कि शिक्षक का वास्तविक दायित्व केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि हर विद्यार्थी के मन तक पहुँचना है। हम कक्षा में जब हर बच्चे के चेहरे की मासूमियत को देखते हैं, तो हमें यह एहसास होता है कि हर बच्चा एक जैसी परिस्थितियों से नहीं गुजरता। कोई पढ़ाई में पीछे है, कोई घर की समस्याओं से जूझ रहा है, तो कोई केवल इस इंतज़ार में है कि कोई उसकी बात बिना टोके सुन ले। एक शिक्षक के रूप में हमने कई बार अपनी बात बच्चों से कहने से पहले उनकी बातों को सुनना उचित समझा और विद्यार्थियों के बीच समन्वय बनाने के लिए अपना निर्णय सुनाने से पहले बच्चों की परिस्थिति को समझने का प्रयास करती हूँ। हमने कई बार देखा कि जो बच्चा सबसे अधिक शरारती या कमजोर दिखाई देता है, वही भीतर से सबसे अधिक स्नेह, विश्वास और मार्गदर्शन चाहता है।

इस पुस्तक ने हमें यह जानने का अवसर दिया कि किसी भी समस्या का समाधान डाँट या दंड से नहीं, बल्कि संवाद, धैर्य और विश्वास से निकलता है। कई बार हमने स्वयं यह महसूस किया है कि जब विद्यार्थी को यह विश्वास हो जाता है कि "शिक्षक उसके साथ है, उसके खिलाफ नहीं," तब सबसे कठिन विवाद भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। विद्यार्थी स्वयं अपनी गलतियों को स्वीकार करता है और उन्हें सुधारने का प्रयास करता है।

एक सच्चा शिक्षक वही है जो अंक नहीं, संभावनाएँ देखता है; कमियाँ नहीं, क्षमताएँ पहचानता है। शिक्षक का एक विश्वास भरा शब्द किसी विद्यार्थी के जीवन की दिशा बदल सकता है।

इस पुस्तक से हमें सबसे बड़ी सीख यह मिली कि शिक्षा का आधार केवल ज्ञान नहीं, बल्कि मानवीय संबंध हैं। जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता का समन्वय होता है, वहाँ हर समस्या का समाधान संभव हो जाता है और वहीं से वास्तविक शिक्षा का आरंभ होता है।
गुलाबी, सनबीम ग्रामीण स्कूल

इस पुस्तक का अध्ययन मेरे लिए एक प्रेरणादायक अनुभव रहा। पुस्तक ने यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक विद्यार्थी अपने भीतर कोई न कोई विशेष क्षमता लेकर आता है। कई बार जो बच्चे पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं या कक्षा में कम सक्रिय दिखाई देते हैं, उन्हें केवल सही मार्गदर्शन, विश्वास और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है।

इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मेरी सोच में सकारात्मक परिवर्तन आया। मैंने महसूस किया कि एक शिक्षक का वास्तविक दायित्व केवल अच्छे अंक दिलाना नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे के व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और नैतिक मूल्यों का विकास करना भी है। यदि शिक्षक धैर्य, प्रेम और संवेदनशीलता के साथ बच्चों को समझे, तो वे अपनी कठिनाइयों को दूर करके सफलता की ओर बढ़ सकते हैं।

यह पुस्तक हमें यह भी सिखाती है कि किसी भी विद्यार्थी का मूल्यांकन केवल उसके परीक्षा परिणामों से नहीं करना चाहिए। प्रत्येक बच्चे को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलना चाहिए। एक प्रेरणादायक शिक्षक वही है जो हर बच्चे पर विश्वास करता है और उसे आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रेरित करता है।

एक शिक्षिका के रूप में मैं इस पुस्तक से प्राप्त शिक्षाओं को अपने दैनिक शिक्षण में अपनाने का प्रयास करूँगी। मैं प्रत्येक विद्यार्थी को समान सम्मान, प्रोत्साहन और सीखने के अवसर प्रदान करूँगी, ताकि कोई भी बच्चा स्वयं को उपेक्षित या असफल न समझे। मेरा विश्वास है कि प्रेम, धैर्य और सकारात्मक सोच से हर विद्यार्थी अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है।
सुनीता त्रिपाठी, सनबीम ग्रामीण स्कूल

आज की क्लास में यह बताया गया कि छोटे बच्चों का क्लास में व्यवहार बिल्कुल ऊर्जावान, जिज्ञासु एवं ईमानदार वाला होता है। मन में जो आए, तुरंत बोल देते हैं, "मुझे वाशरूम जाना है", "वह लड़का मुझे चिढ़ा रहा है।" लगता है कि झूठ बोलना अभी सीखे नहीं होते। थोड़े पल में दोस्ती, थोड़ी देर में किताब के लिए लड़ाई, फिर 2 मिनट बाद बेस्ट फ्रेंड बनकर एक-दूसरे की मदद भी करते हैं और हम यह भी देखते हैं कि जो बच्चे पढ़ने में अच्छे होते हैं, वही बच्चे क्लास में शैतानी भी करते हैं और किसी भी तरह का प्रश्न करिए तो उसका उत्तर भी तुरंत दे देते हैं। अतः टीचर्स को चाहिए कि बच्चों को डाँटने के बजाय उन्हें प्यार से समझाना चाहिए एवं टीचर्स हँसमुख और खेल-खेल में पढ़ाने वाले होने चाहिए।
अशोक कुमार मौर्य, सनबीम ग्रामीण स्कूल

एक शिक्षक का दायित्व केवल विद्यार्थियों को शिक्षा देना ही नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा, भावनाओं और आत्मविश्वास का भी ध्यान रखना है। इस संदर्भ में रोमा मैम ने एक अत्यंत संवेदनशील और प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति एक छात्रा को लगातार परेशान कर रहा था। स्थिति को गंभीरता से समझते हुए उन्होंने बिना किसी हंगामे के, साहस और समझदारी का परिचय दिया तथा अप्रत्यक्ष रूप से छात्रा की सहायता की। उनके विवेकपूर्ण प्रयासों से छात्रा उस व्यक्ति से सुरक्षित दूरी बना सकी और स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करने लगी।

इस घटना से यह सीख मिलती है कि बच्चों की सहायता केवल प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से ही नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने, धैर्य रखने और परिस्थिति को समझदारी से संभालने से भी की जा सकती है। एक शिक्षक के रूप में हमें बच्चों का विश्वास जीतना चाहिए, उनकी बातों को ध्यान से सुनना चाहिए, उनके व्यवहार में आने वाले छोटे-छोटे बदलावों को समझना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर संवेदनशीलता, गोपनीयता तथा उचित मार्गदर्शन के साथ उनका सहयोग करना चाहिए।

साहस और समझदारी का संतुलित प्रयोग ही बच्चों के लिए सुरक्षित, भरोसेमंद और सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है। यही एक शिक्षक की वास्तविक भूमिका और जिम्मेदारी है।
Swati Tripathi, Sunbeam Gramin School

Wanted Back Bencher and Last Ranker Teacher – Reflection

आज के सत्र में जब Lesson-11 का टॉम एंड जेरी नाम सुना तो पहले थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन जब पाठ में आगे बढ़ने के बाद समझ में आया कि टॉम एंड जेरी का रिश्ता प्यार और नफरत का अनूठा मेल है, जिसमें दुश्मनी के बीच भी छिपी हुई दोस्ती और एक-दूसरे के बिना अधूरापन शामिल है, तो यह समझ आया कि वे एक-दूसरे के विरोधी होकर भी मुसीबत आने पर एक टीम बन जाते हैं और एक-दूसरे की जान बचाते हैं।

इस अध्ययन ने मुझे कक्षा के वातावरण की ओर ले जाकर यह सोचने पर विवश किया कि कक्षा में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच हमेशा डाँट का डर और विरोध का माहौल होगा, तो वह कक्षा सीखने का स्थान नहीं, बल्कि तनाव का स्थान बन जाएगी।

हर बच्चा अपने भीतर असीम संभावनाएँ लेकर आता है। कोई बच्चा तेज़ी से सीखता है, कोई धीरे-धीरे; कोई आत्मविश्वासी होता है, तो कोई अपनी बात कहने से भी डरता है। यह मुझे अपने स्कूल की याद दिलाता है। जब मैं छोटी थी और कुछ भी पूछने या बोलने से डरती थी और कभी-कभी सही उत्तर पता होने पर भी मैं बोल नहीं पाती थी, लेकिन एक शिक्षक, जो गणित के अध्यापक थे, उनके द्वारा मुझे प्रोत्साहित किया गया और मेरे अंदर से डर काफी हद तक दूर हुआ। आज जब उस जगह शिक्षक के रूप में खुद को खड़ा पाती हूँ, तो यह एहसास होता है कि हमारे छात्र भी उसी जगह पर आज खड़े हैं, जहाँ हम कभी खड़े थे। शिक्षक का कर्तव्य केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि हर बच्चे की क्षमता को पहचानना और उसे आगे बढ़ने का अवसर देना है। मेरी कक्षा ऐसी होगी जहाँ हर बच्चे के लिए सीखना एक सकारात्मक चुनौती होगा। मेधावी बच्चों को नई ऊँचाइयों तक पहुँचने के अवसर मिलेंगे, औसत बच्चों को अपनी क्षमता पर विश्वास मिलेगा और कमजोर बच्चों को यह एहसास होगा कि वे भी सफल हो सकते हैं।

मैं ऐसी कक्षा का निर्माण करना चाहूँगी जहाँ हर बच्चा बिना डर के प्रश्न पूछ सके, अपनी गलतियों से सीख सके, अपनी प्रतिभा को पहचान सके और यह महसूस करे कि उनका शिक्षक हर परिस्थिति में उनके साथ खड़ा है। जब शिक्षक बच्चों के लिए प्रेरणा बन जाता है, तब कक्षा केवल एक कमरा नहीं रहती, बल्कि सपनों को साकार करने की सबसे सुंदर जगह बन जाती है।
मंजुला सागर, सनबीम ग्रामीण स्कूल

इस अध्ययन से—"एक सच्ची शिक्षिका केवल किताबी ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि वह एक माँ की तरह बच्चे के जीवन और सुरक्षा की ढाल बनती है। कक्षा में अक्षरों को सिखाने से लेकर, स्कूल के बाद बस स्टैंड तक सुरक्षित पहुँचाने तक का सफर... यह दिखाता है कि एक शिक्षक का दायित्व केवल स्कूल की घंटी बजने तक सीमित नहीं होता। यह स्नेह और जिम्मेदारी ही एक गुरु को भगवान का रूप बनाती है।"
लवकुश सिंह यादव, सनबीम ग्रामीण स्कूल

स्तरानुसार शिक्षण का मेरा अनुभव

कक्षा में प्रत्येक बच्चा अपनी अलग क्षमता, रुचि और सीखने की गति के साथ आता है। यदि एक शिक्षक बच्चों के स्तर को समझकर शिक्षा देने का प्रयास करे, तो बच्चों को सीखने का बेहतर अवसर मिल सकता है।

मुझे याद है, मेरी कक्षा में कुछ बच्चे कक्षा कार्य जल्दी से समाप्त करके कक्षा में शोर मचाते थे और कमजोर बच्चों को परेशान करते थे। पहले तो मुझे समझ नहीं आया कि वे ऐसा क्यों करते हैं। फिर एक दिन मैंने उन बच्चों को अपने पास बुलाया और उनसे प्यार से बात करके समझने का प्रयास किया। इससे मुझे यह ज्ञात हुआ कि वे बच्चे जल्दी सीखने वाले हैं। उन्हें उनकी सीखने की गति तथा रुचि के अनुसार कक्षा कार्य देना चाहिए, जिससे उन्हें और अधिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल सके और कक्षा में शांति भी बनी रहे।

कक्षा में बच्चों के अलग-अलग सीखने के स्तर को समझकर उसी के अनुसार शिक्षण प्रारंभ करना मेरे लिए एक नया और सकारात्मक अनुभव रहा। पहले मैं सभी बच्चों को एक समान तरीके से पढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन जब मैंने बच्चों की क्षमता, रुचि और सीखने की गति को ध्यान में रखकर गतिविधियाँ करानी शुरू कीं, तो बच्चों की सहभागिता में स्पष्ट बदलाव देखने को मिला।

कम गति से सीखने वाले बच्चों को अतिरिक्त सहयोग और सरल गतिविधियाँ देने से उनमें आत्मविश्वास बढ़ा, वहीं जल्दी सीखने वाले बच्चों को उनकी क्षमता के अनुसार चुनौतीपूर्ण गतिविधियाँ देने से उनकी रुचि बनी रही।

इस अनुभव से मुझे यह समझ आया कि हर बच्चा अलग है और हर बच्चे को सीखने का समान अवसर मिलना चाहिए। शिक्षक का कार्य केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे को समझना, उसकी आवश्यकता के अनुसार मार्गदर्शन देना और उसे सीखने के लिए प्रेरित करना भी है।
बच्चों की सीखने की क्षमता के अनुसार शिक्षण ने मेरे शिक्षण को अधिक प्रभावी, आनंदमय और बाल-केंद्रित बनाया।
सरोज पटेल, सनबीम ग्रामीण स्कूल

"शिक्षक विद्यालय के बाहर भी बच्चों के मार्गदर्शक और सहयोगी होते हैं"

आज के सेशन में मैंने यह सीखा कि शिक्षक का कार्य केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे बच्चों के जीवन के हर महत्वपूर्ण पहलू में उनका मार्गदर्शन और सहयोग करते हैं।

ऐसी ही एक घटना हमारे साथ घटी। मैं स्कूल की छुट्टी के बाद घर जा रही थी। हमारे घर जाने का रास्ता कच्चा था और सुनसान जगह से होकर गुजरता था। उस समय बरसात का समय था। पूरी सड़क कीचड़ से भरी थी। स्कूल से थोड़ी ही दूर जाने पर मैंने देखा कि कक्षा दो की छात्रा अंशिका पटेल एक छोटी-सी साइकिल लेकर कीचड़ में फँसी हुई थी। उसकी साइकिल कीचड़ में सनी हुई थी, जिसके कारण साइकिल लेकर आगे बढ़ने में वह बच्ची असमर्थ थी। जब मैं उसके पास पहुँची, मेरे पूछने पर वह और तेज़ रोने लगी और कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। उसी समय मैंने उसके आई-कार्ड से उसके पिता का नंबर लेकर उन्हें फोन किया और सारी बात बताई। वे बोले, "मैं 15 मिनट में वहाँ पहुँच जाऊँगा।" इसके बाद जब तक उसके पिता नहीं आए, मैं वहीं पर उसके साथ रुकी। जब उसके पिता आए, तो उन्होंने मुझे धन्यवाद कहा और अपनी बच्ची को लेकर वहाँ से चले गए।

इस अनुभव से मुझे यह सीख मिली कि शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि वे बच्चों के जीवन के हर महत्वपूर्ण पहलू में उनका मार्गदर्शन करते हैं। जब किसी बच्चे को विद्यालय के बाहर किसी प्रकार की समस्या या कठिनाई का सामना करना पड़ता है, तब भी शिक्षक उसकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
चंचल, सनबीम ग्रामीण स्कूल

प्रत्येक बच्चे की क्षमता के अनुसार शिक्षण :
आज की सीख से मुझे यह समझ में आया कि प्रत्येक बच्चे की सीखने की गति और क्षमता अलग-अलग होती है। कक्षा में जहाँ कुछ बच्चों को अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता होती है, वहीं तेज गति से सीखने वाले बच्चों को उनकी क्षमता के अनुरूप चुनौतीपूर्ण कार्य देना भी उतना ही आवश्यक है। यदि ऐसे बच्चों को केवल सामान्य अभ्यास कार्य दिए जाएँ, तो वे उन्हें शीघ्र पूरा कर लेते हैं और उनका ध्यान भटक सकता है। इसलिए उन्हें सोचने, खोजने और नए विचार प्रस्तुत करने का अवसर देने वाले कार्य दिए जाने चाहिए।
तेज बच्चों को परियोजना कार्य, पुस्तक समीक्षा, पोस्टर या मॉडल निर्माण, पहेलियाँ बनाना, रचनात्मक लेखन, प्रश्न तैयार करना, किसी विषय पर प्रस्तुति देना तथा अपने साथियों की सीखने में सहायता करना जैसे कार्य दिए जा सकते हैं। इससे उनकी रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और समस्या-समाधान कौशल का विकास होता है। साथ ही वे अपनी ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करते हैं और पूरी कक्षा का सीखने का वातावरण भी बेहतर बनता है।
एक शिक्षक के रूप में हमारा दायित्व है कि हम प्रत्येक बच्चे की आवश्यकता और क्षमता को पहचानते हुए उसे उपयुक्त अवसर प्रदान करें, ताकि सभी बच्चों का संतुलित, आनंददायक और सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके।
ममता, सनबीम ग्रामीण स्कूल 

Saturday, August 1, 2026

विश्वास, संवेदनशीलता और प्रोत्साहन: शिक्षक की सबसे बड़ी शक्ति - सनबीम ग्रामीण स्कूल

 बच्चों की सहायता करने का मेरा अनुभव

बच्चों की सहायता करना मेरे लिए केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष का माध्यम है। विद्यालय में अनेक ऐसे अवसर आए, जब कुछ विद्यार्थियों को पढ़ाई समझने में कठिनाई होती थी या वे किसी कारणवश निराश और आत्मविश्वासहीन महसूस करते थे। ऐसे समय में मैंने सदैव धैर्यपूर्वक उनकी बातें सुनीं, उनका उत्साहवर्धन किया और उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप मार्गदर्शन देने का प्रयास किया।

इसी संदर्भ में मुझे अपनी सहकर्मी रोमा मैम से भी बहुत प्रेरणा मिली। उन्होंने प्रत्येक बच्चे को स्नेह, धैर्य और अपनत्व के साथ संभाला। वे केवल पढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि बच्चों की भावनाओं को समझते हुए उनमें आत्मविश्वास भी जगाया। यही कारण था कि सभी बच्चे उनसे बहुत प्रेम करते थे, उनका सम्मान करते थे और उनके साथ सहज जुड़ाव महसूस करते थे। उन्हें देखकर मुझे यह समझने का अवसर मिला कि बच्चों का विश्वास और स्नेह केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम, संवेदनशीलता और सहयोग से जीता जाता है।

इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि बच्चों को केवल शिक्षा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें विश्वास, प्रेरणा, स्नेह और सकारात्मक वातावरण प्रदान करना भी उतना ही आवश्यक है। प्रत्येक बच्चे में कोई न कोई विशेष प्रतिभा होती है; आवश्यकता केवल उसे पहचानने, सही दिशा देने और समय-समय पर प्रोत्साहित करने की होती है।

मेरा मानना है कि एक शिक्षक की वास्तविक सफलता केवल विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और मुस्कान में दिखाई देती है। जब कोई बच्चा स्वयं पर विश्वास करना सीख जाता है, तभी एक शिक्षक का प्रयास वास्तव में सार्थक सिद्ध होता है।

- स्वाति त्रिपाठी

एक मुस्कान, एक टिफिन और एक नया जीवन
आज के सत्र से मुझे यह सीख मिली कि एक शिक्षक का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। उसका व्यवहार, उसकी मुस्कान, उसकी विनम्रता और उसकी संवेदनशीलता किसी बच्चे का पूरा जीवन बदल सकती है।
कहानी में रोमा ने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, ईमानदारी और पेशेवर व्यवहार का परिचय दिया। बाद में जब वह स्वयं शिक्षिका बनी, तब उसे यह एहसास हुआ कि बच्चे शिक्षक के आचरण से ही जीवन के सबसे महत्वपूर्ण संस्कार सीखते हैं।
इस कहानी ने मुझे अपने जीवन की एक सच्ची घटना याद दिला दी।

मेरा अनुभव- मैं सनबीम ग्रामीण स्कूल में कक्षा 4 की कक्षाध्यापिका हूँ। अप्रैल में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हुई। मैंने देखा कि मेरी कक्षा की एक छात्रा लगातार विद्यालय नहीं आ रही थी।
जब मैंने उसके अभिभावक से बात की, तो पता चला कि उसके परिवार की परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हैं। उसकी माँ घर छोड़कर चली गई थीं। पिता मानसिक रूप से बहुत परेशान थे और बच्ची भी भीतर से पूरी तरह टूट चुकी थी। इसी कारण उसका विद्यालय आना बंद हो गया था।
मैंने उसके पिता से विनम्रतापूर्वक कहा,
"सर, कृपया बच्ची को विद्यालय भेजिए। यहाँ अपने साथियों के बीच रहकर उसका मन हल्का होगा। धीरे-धीरे वह सामान्य होने लगेगी और पढ़ाई से उसका आत्मविश्वास भी लौट आएगा।"
उन्होंने मेरी बात मानी और बच्ची को विद्यालय भेजना शुरू कर दिया। लेकिन वह प्रतिदिन विद्यालय आकर रोने लगती थी।
मैं उसके पास बैठती और प्यार से कहती,
"बेटा, मम्मी अभी तुम्हारे साथ नहीं हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तुम अपने सपनों को छोड़ दो। जीवन में आगे बढ़ना है तो पढ़ाई बहुत ज़रूरी है। तुम रोज़ स्कूल आओ। यहाँ अपनी बातें साझा करोगी तो तुम्हारा मन भी हल्का होगा और धीरे-धीरे सब अच्छा लगने लगेगा।"
फिर भी अगले दिन वही स्थिति होती। वह उदास रहती और पढ़ाई में उसका बिल्कुल मन नहीं लगता था।
तब मुझे लगा कि केवल समझाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसे अपनापन और सहयोग का अनुभव कराना भी आवश्यक है।
पहला कदम – दोस्ती का सहारा
मैंने उसकी सहेलियों से कहा,
"बेटा, इसे कभी अकेला मत छोड़ना। इसके साथ बैठो, खेलो और अपना टिफिन भी इसके साथ साझा किया करो।"
घर में केवल उसके पिताजी और चाचा थे। भोजन बनाने वाला कोई नहीं था, इसलिए कई बार वह बिना टिफिन के विद्यालय आती थी।

दूसरा कदम – छोटी-सी जिम्मेदारी
मैं प्रतिदिन उससे पूछती,
"बेटा, आज सब ठीक है?"
वह मुस्कुराकर कहती,
"हाँ मैम, चाचा ने जल्दी खाना बना दिया।"
मैं उसे प्रोत्साहित करते हुए कहती,
"बहुत अच्छा। तुम भी चाचा की थोड़ी-सी मदद किया करो और समय पर विद्यालय आ जाया करो।"

परिणाम- धीरे-धीरे उस बच्ची में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगा। अब वह नियमित रूप से विद्यालय आती है, मुस्कुराती है, पढ़ाई में रुचि लेती है और अपने साथियों के साथ खुशी-खुशी समय बिताती है। यदि कभी वह टिफिन नहीं लाती, तो उसकी सहेलियाँ बिना कहे अपना भोजन उसके साथ साझा कर लेती हैं।

निष्कर्ष- इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि एक अच्छा शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देता, बल्कि अपने व्यवहार, संवेदनशीलता और प्रेम से बच्चों को जीवन जीने की दिशा भी देता है।
कभी-कभी एक मुस्कान, कुछ स्नेहभरे शब्द और एक साझा किया हुआ टिफिन किसी बच्चे के जीवन में नई आशा जगा सकते हैं। एक शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह टूटे हुए मन को संभालकर उसे फिर से मुस्कुराना सिखा दे।
– ममता देवी
शिक्षक द्वारा विद्यार्थी की सहायता
आज की कक्षा से मैंने यह सीखा कि विद्यालय में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जब कोई विद्यार्थी पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक या शैक्षणिक समस्याओं का सामना कर रहा होता है। ऐसे समय में शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह एक मार्गदर्शक, प्रेरक और सहयोगी की भूमिका भी निभाता है।
एक दिन कक्षा में एक विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान पाठ को समझने में कठिनाई महसूस कर रहा था। वह प्रश्नों के उत्तर देने में झिझक रहा था और उसका आत्मविश्वास भी कम दिखाई दे रहा था। मैंने धैर्यपूर्वक उसकी समस्या को समझा, सरल भाषा और उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से विषय को स्पष्ट किया तथा उसे प्रोत्साहित किया कि वह बिना किसी डर या संकोच के अपनी शंकाएँ पूछे।

कुछ समय बाद विद्यार्थी ने विषय को अच्छी तरह समझ लिया और स्वयं उत्तर देने का प्रयास भी किया। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
इस अनुभव से मुझे यह महसूस हुआ कि प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति अलग होती है। यदि शिक्षक धैर्य, सहानुभूति और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उनका मार्गदर्शन करें, तो विद्यार्थी न केवल विषय को अच्छी तरह समझता है, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

मेरा विश्वास है कि एक शिक्षक का स्नेह, प्रोत्साहन और विश्वास किसी भी विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही एक सच्चे शिक्षक की पहचान है।
- चंचल
एक शिक्षक का विश्वास, एक बच्चे का आत्मविश्वास
जैसा कि हम सभी जानते हैं, आज के सत्र से मैंने यह सीखा कि हर बच्चा अपने भीतर अनगिनत संभावनाएँ लेकर विद्यालय आता है। उसे केवल एक ऐसे शिक्षक की आवश्यकता होती है, जो उस पर विश्वास करे और सही समय पर उसका हाथ थाम ले। इसी संदर्भ में मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूँ।
मेरी कक्षा में एक विद्यार्थी था, जो बहुत शांत रहता था। वह किसी से बात नहीं करता था और पढ़ाई में भी उसका मन नहीं लगता था। मैंने उसे ध्यान से समझने का प्रयास किया। प्रतिदिन कुछ समय उसके साथ बैठकर बात की, उसकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की प्रशंसा की और उसे यह विश्वास दिलाया कि वह भी अन्य बच्चों की तरह सक्षम है।

धीरे-धीरे उसके व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आने लगा। उसने कक्षा में उत्तर देना शुरू किया, विभिन्न गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ किया और उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की मुस्कान स्पष्ट दिखाई देने लगी।
उस दिन मुझे यह महसूस हुआ कि एक शिक्षक का प्रेम, धैर्य और विश्वास किसी बच्चे के जीवन में नई उम्मीद जगा सकता है। मैंने सीखा कि बच्चों को केवल पढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समझना, उनका मनोबल बढ़ाना और हर कदम पर उनका उत्साहवर्धन करना भी एक शिक्षक का महत्वपूर्ण दायित्व है।
उस बच्चे की मुस्कान और बढ़ता हुआ आत्मविश्वास मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था। इस अनुभव ने मुझे और अधिक संवेदनशील, धैर्यवान तथा समर्पित शिक्षक बनने की प्रेरणा दी।
- सुनीता त्रिपाठी
शिक्षक का आचरण ही सबसे बड़ी शिक्षा
आज की GSA कक्षा से मुझे यह सीख मिली कि बच्चे शिक्षक को केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं मानते, बल्कि वे उन्हें अपना आदर्श समझते हैं। बच्चों को लगता है कि उनके शिक्षक हर विषय का ज्ञान रखते हैं—चाहे वह गणित हो, विज्ञान, कहानी, गीत या चित्रकला। वे अपने शिक्षक के व्यवहार और आचरण से भी बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए एक शिक्षक का प्रत्येक कार्य और व्यवहार बच्चों के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है।

आज की कक्षा में यह भी बताया गया कि बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कठिन या संवेदनशील परिस्थितियों को उनकी आयु और समझ के अनुरूप ही प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि उनके मन पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

इसी संदर्भ में मुझे अपना एक अनुभव याद आया। कक्षा 8 का एक विद्यार्थी एक दिन मेरे घर आया और उसने कहा, "सर, मुझे गणित समझ में नहीं आती। मैं गणित कैसे सीखूँ?"

मैंने उसे हर रविवार एक घंटे के लिए अपने घर आने के लिए कहा। उस दौरान मैंने उसे प्रत्येक पाठ के सरल-सरल प्रश्नों से अभ्यास कराया और धैर्यपूर्वक उसकी शंकाओं का समाधान किया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और गणित उसके लिए आसान लगने लगी।

जब परीक्षा का परिणाम आया, तो उसने गणित में अच्छे अंक प्राप्त किए। उसकी सफलता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। इस अनुभव ने मुझे यह विश्वास दिलाया कि यदि शिक्षक धैर्य, समय और सही मार्गदर्शन दें, तो कोई भी विद्यार्थी अपनी कठिनाइयों पर विजय पा सकता है।
- अशोक कुमार मौर्य
कठिन परिस्थितियों में छात्र-शिक्षक संबंध
आज के सत्र से मैंने यह सीखा कि विद्यालय केवल पढ़ाई का स्थान नहीं है, बल्कि वह ऐसा संसार है जहाँ बच्चों के सपने, उम्मीदें और भावनाएँ आकार लेती हैं। कई बार बच्चे किसी विशेष अवसर का लंबे समय तक इंतज़ार करते हैं, लेकिन किसी कारणवश वह अवसर उन्हें नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में उनके मन में निराशा, उदासी और अनेक प्रश्न जन्म लेने लगते हैं। ऐसे समय में एक शिक्षक का सहयोग और संवेदनशीलता उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

इसी संदर्भ में मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूँ। मेरी कक्षा में एक विद्यार्थी था, जो पढ़ाई में बहुत अच्छा था। किन्तु पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उसका मन पढ़ाई से हटने लगा। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास भी कम हो गया और वह कक्षा में प्रश्नों के उत्तर देने से घबराने लगा। कई बार वह स्वयं को असमर्थ पाकर रो भी पड़ता था।

मैंने उसके व्यवहार में आए इस परिवर्तन का कारण जानने के लिए उससे धैर्यपूर्वक बात की। उसकी समस्या को समझने के बाद मैंने उसे समझाया, उसका उत्साहवर्धन किया तथा उसके माता-पिता से भी इस विषय में चर्चा की। धीरे-धीरे उसकी स्थिति में सुधार होने लगा और उसका आत्मविश्वास वापस लौटने लगा।
कुछ समय बाद परिस्थितिवश उसे विद्यालय बदलना पड़ा। आज भी जब उसे किसी प्रकार की समस्या होती है, तो वह मुझे फोन करके अपनी बात साझा करता है। यह मेरे लिए अत्यंत संतोष और खुशी की बात है। इससे मुझे यह विश्वास हुआ कि एक शिक्षक का स्नेह, विश्वास और मार्गदर्शन बच्चों के जीवन पर गहरी छाप छोड़ता है।
इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि कठिन परिस्थितियों में शिक्षक को केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि बच्चों की भावनाओं को समझने वाला एक संवेदनशील मार्गदर्शक बनना चाहिए। जब शिक्षक बच्चों की बात धैर्यपूर्वक सुनता है, उनकी भावनाओं का सम्मान करता है और उन्हें विश्वास दिलाता है कि वह उनके साथ है, तब उनकी निराशा आशा में बदलने लगती है।यही विश्वास छात्र और शिक्षक के संबंध को इतना गहरा बना देता है कि वह केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवनभर प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बन जाता है।
-गुलाबी
एक मुस्कान, एक सराहना और एक नया जीवन
आज के सत्र ने इस बात को और भी स्पष्ट किया कि एक शिक्षक का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। उसका व्यवहार, संवेदनशीलता और प्रोत्साहन किसी बच्चे के पूरे जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
आज की कहानी सुनकर मुझे अपने शिक्षण जीवन का एक अनुभव याद आ गया। जब मैंने सनबीम ग्रामीण स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यभार संभाला, तब कक्षा 3 में एक ऐसा छात्र था, जो उम्र और शारीरिक बनावट में अपने सहपाठियों से बड़ा था। इसी कारण वह अपने साथ पढ़ने वाले बच्चों के साथ सहज रूप से घुल-मिल नहीं पाता था। धीरे-धीरे उसकी शरारतें बढ़ने लगीं। वह कक्षा में बार-बार बातचीत करता, अन्य बच्चों को परेशान करता और पढ़ाई का वातावरण भी प्रभावित करता था।
मैंने कई बार उसे समझाने का प्रयास किया, लेकिन अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया। तब मैंने एक अलग तरीका अपनाने का निर्णय लिया। मैंने उसे अपनी कक्षा का मॉनिटर बना दिया। साथ ही, उसकी छोटी-छोटी अच्छी आदतों और प्रयासों की सराहना करने लगा, उसे मंच पर बोलने के अवसर दिए और नियमित रूप से उसकी जिम्मेदारियों का उत्साहवर्धन करता रहा।
धीरे-धीरे उसमें सकारात्मक परिवर्तन आने लगा। उसे यह महसूस हुआ कि उस पर विश्वास किया गया है और वह एक जिम्मेदार विद्यार्थी है। परिणामस्वरूप उसकी शरारतें लगभग समाप्त हो गईं, उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने पढ़ाई में भी रुचि लेनी शुरू कर दी।
आज वह छात्र कक्षा 6 में पहुँच चुका है। अब वह पहले की तुलना में कहीं अधिक अनुशासित, जिम्मेदार और आत्मविश्वासी है। यह परिवर्तन देखकर मुझे अपार संतोष मिलता है।
इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि हर बच्चे को केवल डाँटकर नहीं बदला जा सकता। विश्वास, सराहना, प्रोत्साहन और जिम्मेदारी देकर भी उसके व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। कभी-कभी एक मुस्कान, एक सच्ची प्रशंसा और एक छोटा-सा अवसर किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदलने के लिए पर्याप्त होते हैं।
- रवि प्रकाश

अध्याय – मुस्कान और उदासी
इस अध्याय से हमें यह सीख मिली कि एक शिक्षक का मुस्कुराता हुआ चेहरा, सकारात्मक व्यवहार और प्रोत्साहन बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाते हैं। हमें सदैव बच्चों के साथ धैर्य, स्नेह और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए, ताकि वे बिना किसी डर या संकोच के अपने विचार व्यक्त कर सकें।
मुझे भी अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आता है। जब आर.पी. सर के विद्यालय छोड़ने के बाद मुझे उनकी कक्षा और विषय पढ़ाने की जिम्मेदारी मिली, तब मैंने सबसे पहले बच्चों के साथ सकारात्मक संबंध बनाने का प्रयास किया। मैंने उनकी शंकाओं और भावनाओं को समझा तथा उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी पढ़ाई बिना किसी रुकावट के नियमित रूप से चलती रहेगी।
अक्सर बच्चे किसी एक शिक्षक की शिक्षण शैली, व्यवहार और पढ़ाने के तरीके के अभ्यस्त हो जाते हैं। ऐसे में नए शिक्षक के साथ सहज होने में उन्हें कुछ समय लगता है। प्रारंभ में उन्हें यह भी लगता है कि पहले वाले शिक्षक अधिक अच्छा पढ़ाते थे। इसलिए मैंने धैर्य और आत्मीयता के साथ बच्चों का विश्वास जीतने का प्रयास किया।
समय के साथ बच्चे मेरी कक्षा में सहज हो गए। उनका मुझ पर विश्वास बढ़ा और हमारे बीच आत्मीय संबंध स्थापित हो गए। आज बच्चे बिना किसी झिझक के अपनी शंकाएँ, विचार और भावनाएँ मेरे साथ साझा करते हैं। इस अनुभव ने मुझे यह सिखाया कि एक शिक्षक का स्नेह, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार ही बच्चों के मन तक पहुँचने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
- मनोज कुमार

मुस्कान की शक्ति
इस विषय पर हुई चर्चा से मुझे यह अनुभव हुआ कि एक शिक्षक की सच्ची और सहज मुस्कान केवल चेहरे की अभिव्यक्ति नहीं होती, बल्कि विद्यार्थियों के साथ विश्वास, अपनापन और सकारात्मक संबंध स्थापित करने का एक प्रभावी माध्यम भी होती है। जब शिक्षक मुस्कुराकर बच्चों का स्वागत करते हैं, तो वे स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और प्रोत्साहित महसूस करते हैं। इससे वे बिना किसी झिझक के अपनी बात साझा करते हैं और सीखने की प्रक्रिया में अधिक सक्रियता से भाग लेते हैं।
इस सत्र ने मेरी यह समझ और अधिक मजबूत की कि एक छोटी-सी मुस्कान भी कक्षा के वातावरण को आनंदमय, प्रेरणादायक और सीखने के अनुकूल बना सकती है। एक सकारात्मक शिक्षक न केवल ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि अपने व्यवहार और मुस्कान से विद्यार्थियों के मन में आत्मविश्वास, उत्साह और सीखने की रुचि भी विकसित करता है।
भविष्य में मैं अपने शिक्षण व्यवहार में और अधिक सकारात्मकता, संवेदनशीलता तथा मुस्कान को एक महत्वपूर्ण शिक्षण कौशल के रूप में अपनाकर अपने शिक्षण कार्य को और अधिक प्रभावी तथा प्रेरणादायक बनाने का प्रयास करूँगी।
- सरोज पटेल
अध्याय – मुस्कान और उदासी
इस अध्याय से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि एक शिक्षक का सकारात्मक व्यक्तित्व बच्चों के व्यक्तित्व को भी सकारात्मक दिशा प्रदान करता है। कक्षा का वातावरण सदैव छात्र-केंद्रित, प्रेरणादायक और आनंददायक होना चाहिए, ताकि प्रत्येक बच्चा स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सके।
हमें हमेशा बच्चों के साथ धैर्य, स्नेह और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए, ताकि वे बिना किसी डर या संकोच के अपने विचार व्यक्त कर सकें। बच्चों की गलतियों पर उन्हें डाँटने के बजाय धैर्यपूर्वक समझाना चाहिए तथा खेल-खेल में सीखने के अवसर प्रदान करने चाहिए। इससे प्रत्येक बच्चा आत्मविश्वास के साथ सीखता है, प्रश्न पूछने का साहस विकसित करता है और अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर प्राप्त करता है।
एक शिक्षक की मुस्कान, सकारात्मक सोच और संवेदनशील व्यवहार ही बच्चों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बनते हैं।
- लवकुश सिंह यादव

Friday, July 17, 2026

संवेदनशील शिक्षक: शिक्षा से पहले समझ - सुनीता त्रिपाठी

जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं जब दिल कुछ और कहता है और दिमाग कुछ और। दिल भावनाओं, प्रेम, करुणा और रिश्तो की और खींचता है, जबकि दिमाग में सोच समझ कर सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है। 

सच्ची सफलता तभी मिलती है जब दिल की संवेदनशीलता और दिमाग की समझ साथ चले। केवल भावनाओं में बह जाना या केवल तर्क पर चलना, दोनों ही हमें अधूरा बना सकते हैं। 

कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां दिल रिश्तो को बचाना चाहता है और दिमाग सही निर्णय लेने की सलाह देता है। उस पल का संघर्ष हमें भीतर से बहुत कुछ सिखाता है। जीवन की असली सुंदरता तब है, जब दिमाग सही दिशा दिखाएं और दिल उसे राह पर इंसानियत, करुणा और प्रेम के साथ चलना सिखाए। 

दिल से जुड़े रहिए लेकिन निर्णय विवेक से लीजिए। क्योंकि सही निर्णय वही होता है, जिसमें दिमाग की समझ और दिल की संवेदना दोनों शामिल हों। यही संतुलन हमारे व्यक्तित्व को सुंदर बनाता है और हमारे जीवन को सार्थक।

आज की चर्चा ने मुझे यह एहसास कराया कि हर बच्चे की कहानी उसकी पढ़ाई से कहीं बड़ी होती है। कई बार जो व्यवहार हमें अनुशासनहीनता लगता है, उसके पीछे भावनात्मक उलझन, असमंजस या  सही मार्गदर्शन की कमी छिपी होती है। एक शिक्षक का दायित्व केवल नियमों का पालन करवाना नहीं, बल्कि बच्चों को समझना, आवश्यक है। जब शिक्षक विश्वास, धैर्य और संवेदनशीलता के साथ बच्चों का साथ देते हैं, तब वे न केवल एक अच्छे विद्यार्थी बल्कि एक अच्छे इंसान भी बनाते हैं। 

यह चर्चा मेरे लिए आत्म मंथन का अवसर रही। अब मैं अपने विद्यार्थियों को केवल उनकी उपस्थितियों या गलतियों से नहीं, बल्कि उनकी परिस्थितियों और संभावनाओं के आधार पर समझने का प्रयास करूंगी। मेरा विश्वास और भी मजबूत हुआ है कि एक शिक्षक का सबसे बड़ा गुण बच्चों के मन तक पहुंचाना है, क्योंकि वही से वास्तविक शिक्षा की शुरुआत होती है ।

सुनीता त्रिपाठी, सनबीम ग्रामीण स्कूल

 

Sunday, May 10, 2026

किशोर मन को समझने की सीख - गुलाबी

आज विद्यालय में हमने सभी शिक्षकों के साथ आयोजित बैठक में “किशोरों को समझना एवं उनका मार्गदर्शन करना” विषय पर चर्चा की। इस चर्चा ने मुझे एक शिक्षक के रूप में अपने दृष्टिकोण, व्यवहार और कार्यप्रणाली पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया।

किशोरावस्था एक ऐसी संवेदनशील अवस्था है, जिसमें बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर तेजी से परिवर्तन होते हैं। बैठक के दौरान मुझे अलग-अलग शिक्षकों की राय जानने एवं समझने का मौका मिला। कई बार हम शिक्षक विद्यार्थियों के व्यवहार को अनुशासनहीनता या अवज्ञा के रूप में देख लेते हैं, जबकि वास्तव में वह उनके अंदर चल रहे द्वंद्व, असुरक्षा या पहचान की खोज का परिणाम होता है। इसलिए, सबसे पहले हमें उनके व्यवहार के पीछे के कारणों को समझना आवश्यक है।

इस चर्चा के दौरान हमें यह भी पता चला कि किशोरों के साथ कठोरता की बजाय सहानुभूति, संवाद और विश्वास का संबंध बनाना अधिक प्रभावी होता है। यदि छात्र अपने शिक्षक को एक मार्गदर्शक और मित्र के रूप में देखते हैं, तो वे अपनी समस्याएँ खुलकर साझा करते हैं। इससे उनके अंदर का तनाव कम होता है और वे सही दिशा में आगे बढ़ पाते हैं।

इस बातचीत के दौरान एक महत्वपूर्ण बिंदु यह सामने आया कि आज के किशोर सोशल मीडिया, पारिवारिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की चिंता जैसी कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में शिक्षक की भूमिका केवल विषय पढ़ाने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें एक सलाहकार (counsellor) की भूमिका भी निभानी चाहिए।

एक शिक्षक ने बताया कि हमें विद्यार्थियों के साथ सकारात्मक और सहायक वातावरण बनाना चाहिए। नियमित संवाद, प्रेरणा और प्रोत्साहन के माध्यम से हम उन्हें सही दिशा दिखा सकते हैं। हर विद्यार्थी अलग होता है, इसलिए उनके अनुसार मार्गदर्शन देना जरूरी है।

सभी शिक्षकों से बातचीत के दौरान हमें यह महसूस हुआ कि एक सफल शिक्षक वही है, जो केवल ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि अपने विद्यार्थियों के जीवन को सही दिशा देने में भी सहायक होता है। यह बैठक मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक रही और मैं भविष्य में अपने शिक्षण कार्य में इन विचारों को अवश्य लागू करने का प्रयास करूँगी।

गुलाबी, सनबीम ग्रामीण स्कूल

Wednesday, July 20, 2022

सरलता और विश्वास - ज्योति तड़ियाल

सरलता
भूमिका – मनुष्य को अपना व्यवहार इतना सरल रखना चाहिए कि जरूरत के समय वह सबकी पहुंच में हो। 

एक अध्यापिका के रूप में व्यवहार की सरलता उतनी ही आवश्यक है जितनी श्यामपट्ट के लिए चाक। विद्यार्थी तभी बिना किसी भय व झिझक के अपनी समस्या साझा करे पाते हैं। उनके मन में यह दुविधा नहीं रहती – कहें या ना कहें।

व्यवहार की सरलता व सादगी का ज्वलंत उदाहरण रहे हैं राष्ट्रपति अब्दुल कलाम। उनसे बातें करना अपनत्व का अनुभव कराता था। यही अपनत्व विद्यार्थी शिक्षक अनुभव करे तो ही अध्यापन काल सार्थक व सफल है।

विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया

जब कक्षा कक्ष में सरलता का व्यवहार किया गया, सादगी को अपनाया गया तो निश्चित रूप से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगत हुआ। वे विद्यार्थी जो मुखर थे उनसे घनिष्ठता बढ़ी, साथ ही वह विद्यार्थी जो अंतिम पंक्ति पर बैठा था अपनी बात व विचार रख पाया। व्यवहार की सरलता का प्रभाव दूरगामी होता है और कब यह किसके मन को कितना प्रभावित कर देती है यह कहना सरल तो नहीं है परंतु निश्चित ही इसके परिणाम सकारात्मक मिलते हैं।

विश्वास

विश्वास पर ही दुनिया कायम है। विश्वास की नींव पर ही सफलता का भवन  खड़ा है। इस विश्वास की शुरुआत परिवार से होती है, जहां माता पिता व बच्चे इस विश्वास की बेल को पोषित करते हैं और फिर इस विश्वास की परिणीति उस वट वृक्ष के रूप में होती है जिसे हम समाज के रूप में देखते हैं, घनिष्ट मित्रता के रूप में देखते हैं।

विश्वास की कसौटी पर विद्यार्थी

मुझे विश्वास है कि मेरे विद्यार्थी उस ज्ञान को ग्रहण कर रहे हैं जो मैं उन्हें दे रही हूं। उस कला को सीख रहे हैं जो मैं उन्हें सिखाना चाहती हूं।

यही विश्वास होता है जब किसी प्रतियोगिता के लिए हम प्रतिभागियों का चयन करते हैं। यह हमारा विश्वास होता है कि चयनित प्रतिभागी श्रेष्ठ है, और इस विश्वास पर खरा उतरने के लिए वह भी जी जान से जुट जाता है। और जब वह सफल होता है तो निःसंदेह उस विश्वास की जीत होती है जो दोनों का एक दूसरी पर  था।

विश्वास की इसी जीत पर राष्ट्रकवि की कुछ पंक्तियां लिखना चाहूंगी –

सौ – सौ निराशाए रहें, विश्वास यह दृढ़ मूल है,

इस आत्मलीला – भूमि के, वह विभु न सकता भूल है।

अनुकूल अवसर पर दयामय, फिर दया दिखलाएंगे,

वे दिन यहां फिर आयेंगे, फिर आयेंगे, फिर आयेंगे।

( कविता – हमारी सभ्यता और कवि – मैथिलीशरण गुप्त)


प्रेषक – ज्योति तड़ियाल
विद्यालय – द दून गर्ल्स स्कूल  JOL परियोजना ४ सरलता और विश्वास LFIN 2022 के हैप्पी टीचर्स प्रोग्राम


Monday, February 15, 2021

चरित्र का महत्व - राजेश्वरी राठौड़

चरित्र से ही मनुष्य का जीवन गौरवपूर्ण बनता है, धन, पदवी , आदि से नहीं ।समाज में महत्व और सम्मान जितना सदाचारी व्यक्ति का होता है, उतना धनाढ्य तथा ऊंचे पद वाले व्यक्ति का भी नहीं होता है।धनवान के यश से सबको ईर्ष्या होती है, इसी प्रकार धन, विद्या या योग्यता वाले में अभिमान होता है परंतु शुद्ध चरित्र वाले से न तो    कोई ईर्ष्या करता है और न उसका मन और अशुद्ध होता है। 

चरित्र के कई अंग है जैसे सत्य पर अटूट विश्वास, शांत आदि। जो व्यक्ति अपने सिद्धांतों पर दृढ़ होता है, उसी का चरित्र शुद्ध होता है। सरल हृदय व्यक्ति में विश्वास, प्रेम, दया ,कोमलता तथा स्वानुभूति के भाव स्वयं ही उत्पन्न हो जाते हैं। इनमें से एक भी गुण पूरी तरह आ जाए, तो व्यक्ति शिष्ट कहलाने लगता हैं। अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति डरता नहीं है, निराश नहीं होता। है। पवित्र चरित्र के प्रधान अंग है छल कपट ना होना, लेन -देन में सफाई, वचन पालन,  दया -भाव, परिश्रम पर विश्वास ,अभिमान का अभाव जिस के चरित्र में उक्त सभी गुण विद्यमान हो, वह सज्जन व्यक्ति की श्रेणी में आता है।

राजेश्वरी राठौड़
The Fabindia School
rre@fabindiaschools.in

Sunday, August 30, 2020

किशोरावस्था में बच्चों को समझाना और समझना - Kusum Dangi

किशोरावस्था  का  अर्थ हैं  बढ़ना  या  विकसित होना  इस अवस्था में अनेक परिवर्तन होते हैं जैसे - शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक इस  समय  में  अधिक  बदलाव  के कारण  बच्चों को  अनेक कठिनाइयों  का सामना  करना पड़ता  हैं। वे अचानक  से हूए  वह शारीरिक परिवर्तन   को अनुभव तो कर सकते हैं परंतु समझ नहीं पाते हैं वह इन  परिवर्तनों के विषय में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं इसके लिए या तो  सहकर्मी   आयु  की मदद लेते  है  या गुमराह करने वाले साहित्य पर निर्भर हो जाते हैं।  गलत  जानकारी  मिलने  से वे और भी  परेशान हो जाते हैं  इससे उनके मानसिक और शारिरिक  विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता हैं।  

इस दौरान परिवार की अहम  भूमिका होती है क्योंकि   इस समय  जरूरत होती हैं  उन्हें समझने की जैसे-जैसे  वे इस अवस्था  में प्रवेश करते हैं वे अपनी पहचान बनाना चाहते हैं इसलिए उनको अपने स्वयं के    निर्णय लेने  और अपने स्वयं के कार्य की जिम्मेदारी लेने के अवसरों को प्रदान करने  की जरूरत हैं  अगर वह कोई गलती करे  तो उनको समझाएं और  सही करने में सहयोग करें इस अवस्था में उनको समझाना बहुत आवश्यक हैं  इसके लिए माता -पिता को  पहले उनके अच्छे दोस्त बनने की आवश्यकता हैं  क्योंकि  इस दौरान उनको कोई समस्या आती हैं तो वे इस बारे में आपसे  बात करेंगे  उनके ऊपर विश्वास करे तथा उनको  जिम्मेदार बनाए इसके लिए उन्हें कोई भी जरूरी कार्य दे और करने के लिए कहे सबसे आवश्यक है वह कुछ भी बात करें या करें तो उन पर विश्वास करें।

Kusum Dangi
The Fabindia Schools
kdi@fabinndiaschools.in

Monday, August 3, 2020

विश्वास - जफ्फर खां

विश्वास एक छोटा सा शब्द है | उसको पढ़ने में एक सेकेंड लगता है सोचो तो एक मिनट लगता है समझो तो दिन लगता है पर साबित करने
में तो जिंदगी लगती है - जैसे कि आज वाली स्थिति कोरोना महामारी के कारण सभी लोगों का विश्वास टूटता जा रहा है तथा एक दूसरे से लोग मिल नहीं पा रहे हैं, दूरी बढ़ गई हैं ,घरों से बाहर निकलने से डर रहे हैं | किसी भी वस्तु को छूने से ही लोगों को अत्यधिक  समस्याओं का सामना करना पड़ रहा  हैं | हमारे बाली शहर में बाहर से आए हुए मनुष्यों की कोरोना पॉजिटिव की रिपोर्ट के आंकड़ों के कारण व्यक्तियों के मन एक डर बैठ गया है  | उन गली मोहल्ले को भी बंद किया गया है जहाँ कोरोना पोजिटिव लोग मिले हैं तथा पुलिस का पहरा भी लगाया गया हैं जिससे  लोगो में भय बढे  नहीं | 

लोग दुकानो पर बनी चीजों को नही खरीद रहे हैं | हमे इस समस्या का सामना पूरे विश्वास और सहयोग से करना चाहिए | जब कोई मुश्किल आती है तो उस मुश्किल का हल भी निकल सकता है | हमें किसी भी मुसीबत में घबराना व डरना नही चाहिए  क्योंकि हम लोग जब घबरा जाते हैं तो हमारा असर हमारे बच्चों के ऊपर पर पड़ता है और बच्चे हमसे ज्यादा घबरा जाते हैं | ऐसी  स्थिति में हमें विश्वास और हिम्मत से कार्य करना चाहिए | पहले भी लोग कई बीमारियों से ठीक हुए हैं  तो  यह कोरोना की बीमारी थोडा समय लेगी लेकिन हमें  विश्वास रखना होगा कि इस बीमारी का  समाधान निश्चित निकलने वाला है तथा सभी पहले जैसे होने वाला है| हमे अपने आप पर विश्वास रखना चाहिए  कि हम सभी पहले जैसे मिल जुलकर साथ रहेंगे और दुख-सुख में अपने पड़ोसियों की मदद  करते रहेंगे बुजुर्गों की देखभाल करते रहेंगे |

 हमारे अंदर विश्वास हैं तो हम भविष्य में बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का सामना कर सकते है | अपने अंदर आत्मविश्वास की बढ़ोतरी करना और सरकार द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हुए अपने आप को सुरक्षित रखना है और अपनी गली मोहल्ले में लोगों की मदद करनी है | उनको कोरोना से बचने के उपाय भी बताने होंगे क्योंकि जो व्यक्ति अनपढ़ है उनको उपायों के बारे में पता नही है उन्हें बताना  होगा कि कोरोना से बचने के लिए मुँह पे माक्स बांधे और अपने हाथों को बार-बार साबुन से धोए  तथा दूसरे लोगो से मिलते समय एक मीटर की दूरी  बनाए रखनी चाहिए | अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखना चाहिए जिससे हमारा आत्मविश्वास मजबूत हो सके |

जफ्फर खां 
The Fabindia School
zkn@fabindiaschools.in

Monday, May 25, 2020

सरलता एवं विश्वास: आयशा टॉक


सादगी एक महान गुण है, जिसे हर कोई जीवन में पालन कर सकता है। हमें सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास रखना चाहिए। हमारे पास एक साधारण जीवन - शैली होनी चाहिए। हमें फैशन के पीछे नहीं भागना चाहिए। हमें अपने साधनों से अधिक खर्च नहीं करना चाहिए। हमें अपने भाषण अर्थात बोली में शिष्टाचार एवं सादगी का पालन करना चाहिए। हमें अपनी बात में मीठा एवं विनम्र होना चाहिए। हमें घमंड नहीं करना चाहिए, न ही हमें अपनी कड़वी बातों से किसी का दिल दुखाना चाहिए। हमें किसी भी परिस्थिति में अपना आपा अर्थात मानसिक संतुलन नहीं खोना चाहिए। हमें अगर किसी को कुछ कहना होता है, तो हम अपनी बात को बहुत ही सरल लहजे से कह सकते है। सरलता कभी किसी को दुखी नहीं करती है, बल्कि सरलता किसी व्यक्ति के दिल में आपके लिए सम्मान एवं विश्वास पैदा करती है। 

 विश्वास एक बहुत छोटा - सा  शब्द लगता है, लेकिन इसके मायने बहुत बड़े एवं गहरे होते हैं। विश्वास ही जीवन का आधार है। विश्वास पर दुनिया टिकी हुई है। जिंदगी में किसी पर विश्वास करना एवं किसी का विश्वास जीतना बहुत जरूरी होता है। विश्वास एक बहुत ही अमूल्य भावना है, जिसका कोई मोल नहीं होता है। यदि जीवन में आप पर किसी ने विश्वास कर लिया एवं आपने किसी का विश्वास जीत लिया तो आप बहुत ही भाग्यशाली व्यक्ति है। विश्वास हर रिश्ते में बहुत जरूरी होता है। यह जरूरी नहीं है कि हर बार हम किसी पर या कोई हम पर एकदम से विश्वास कर लें। विश्वास की राह कठिन जरूर है, परन्तु फिर भी हम उसे पा जरूर सकते है, वह नामुमकिन नहीं है। हो सकता है, अगले को हम पर विश्वास करने में कुछ ज्यादा वक्त लग जाए। 

परन्तु बालकों का मन बहुत कोमल होता हैं, वे आसानी से अपने रिश्तेदारों, मित्रों एवं अध्यापकों पर विश्वास कर लेते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ प्यार, अपनत्व एवं सादगी भरे व्यवहार की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए जैसे - एक छोटा बच्चा जब चलना सीखता है, जब वह डगमगाने लगता है तो अपने परिवार के किसी बड़े व्यक्ति का हाथ थाम लेता है। ठीक ऐसे ही जब कोई बच्चा पहली बार विद्यालय में आता है तो वह बहुत रोता है, परन्तु जब उसके अध्यापक उसकी भावनाओं को पूरी तरह से समझने लग जाते है। वे उसके सामने सरलता और प्यार से पेश आने लगते है तो वह बच्चा रोना बंद कर देता है एवं अपने अध्यापक पर पूर्ण  विश्वास करने लगता  है एवं अपनी हर बात उनके साथ में बाँटने लगता है। फिर तो वह अपनी हर परेशानी को अपने रिश्तेदारों से ज्यादा अपने अध्यापक पर भरोसा करके उन्हें बता सकता है। 
Aysha Tak
The Fabindia School, Bali

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