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Friday, April 18, 2025

पाठ दबाव से निपटना - आर्थर फूट अकैडमी


"शासन संचालन का है विज्ञान,
सबसे प्यारा हमारा संविधान।
भारतीय संविधान के रचनाकार,
बाबासाहेब की हो जय जयकार।
संविधान हिन्दुस्तान की जान है।"

दबाव से निपटने से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारी जीवनशैली में दबाव का होना बहुत ज़रूरी है। लेकिन हमें दबाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। जीवन में दबाव तब ज़्यादा बढ़ता है, जब हम अपने काम को समय से नहीं करते और सोचते हैं, "आज नहीं, कल," और वह कल दबाव में बदल जाता है। इसलिए हमें अपने काम को समय पर करके लेना चाहिए, जिससे दबाव हमारे ऊपर हावी न हो, क्योंकि अगर ऐसा होता है, तो हम अपने लक्ष्य से पीछे हटते चले जाएंगे। अगर हम मेहनत और लगन से अपने कार्य को करते हैं, तो हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। "क्योंकि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती।"

जैसे पाठ के माध्यम से भी बताया गया है, एक बार मुझे एक न्यूरोसर्जन से मिलने का मौका मिला, जो दबाव का सामना अच्छे से करते हैं। हम योजना बनाने में चाहे कितने भी हो, लेकिन दबाव कभी नहीं जाता। दबाव जीवन का अभिन्न अंग होता है। प्रत्येक व्यक्ति दैनिक जीवन में लगभग असंख्य चुनौतियों का सामना करता है, जो व्यक्ति में अपने सामर्थ्य अनुसार दबाव की अनुभूति को प्रेरित करती है। व्यक्ति को सार्थक और गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने के लिए इन चुनौतियों से निपटने की जरूरत होती है।

दबाव से निपटने (coping) का मतलब होता है दबाव पर नियंत्रण करना, उसे कम करना, या फिर उसे सहन करने के लिए अपने मानसिक संसाधनों को जागरूकता के साथ जैसे स्वयं के लिए प्रयोग करना, और व्यक्तिगत और पारस्परिक समस्याओं का समाधान योजना।

क्योंकि अमृता हमारे स्कूल में ऐसी बच्ची है, जिसे बहुत कुछ पढ़ना आता है, पर वह अपने माता-पिता को नहीं बता पाती। लेकिन जब स्कूल में उसके माता-पिता यह शिकायत लेकर आते हैं, तो वह उनके सामने कुछ ही बता पाती है, लेकिन लिखकर सब देती है। जो उससे बोलते हैं।

दबाव से निपटने के लिए:
"भरपूर दबाव पड़ने पर भी,
कभी अनुचित काम न करें।

जिस कार्य को करने के लिए
आपका मन गवाही न दे, उसे किसी आदरणीय व्यक्ति के
कहने पर भी न करें।"
रीना

पाठ दबाव से निपटना से मुझे यह सीखने को मिला कि ज़िंदगी में दबाव होना ज़रूरी है, पर वह दबाव जो हमें मंज़िल की ओर लेकर जाए, हमें ज़िंदगी में कुछ नया सिखा कर जाए — वह दबाव ज़िंदगी में होना ज़रूरी है।
जैसे न्यूरोसर्जन डॉ. बेन कार्सन से पूछा गया कि आप दबाव का सामना कैसे करते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया — 

"आप दबाव से युद्ध मत कीजिए, बल्कि दबाव को ही बदल दीजिए। उसको बेहतरीन प्रेरणा में ले जाइए, ताकि आपको वह दबाव न लगे, बल्कि वह आपको अच्छी राह दिखाए।"
ऐसा नहीं है कि ज़िंदगी में हमें ही दबाव है, बल्कि हर व्यक्ति दबाव में होता है। पर अगर हम सोच के ही हार मान लें कि हमारे ऊपर दबाव है, तो हम पहले ही हार जाते हैं। मगर अगर हम यह सोचें कि यह दबाव हमें हमारी मंज़िल की ओर लेकर जाएगा, तो ज़िंदगी में यह दबाव होना ज़रूरी है।
कुछ-कुछ दबाव ज़िंदगी में ऐसे भी होते हैं जो हमें हमारे ऊपर 'दबाव' ही लगते हैं। तो ऐसे दबाव में हमें नहीं रहना चाहिए।
साक्षी खन्ना 
बहुत ज़्यादा दबाव पड़ने पर भी कभी अनुचित काम न करें। जिस काम को करने के लिए आपका मन गवाही न दे, उसे किसी आदरणीय व्यक्ति के कहने पर भी न करें।
पाठ 'दबाव से निपटना' से हमने सीखा कि हम सभी के जीवन में अलग-अलग तरह के दबाव होते हैं। इनमें से कुछ दबावों का हमारे जीवन पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, तो कुछ का गलत प्रभाव, जो हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल सकता है।
परंतु अगर हम दबाव की स्थिति में भी शालीनता बनाए रखने का साहस रखते हैं, तो कहीं न कहीं हमारी ज़िंदगी भी बदल सकती है और हमें एक सही दिशा या मंज़िल मिल सकती है।

"दबाव हद से ज़्यादा बढ़ जाए तो दो ही चीज़ें होती हैं — या तो हम टूटकर बिखर जाते हैं, या भयंकर दबाव को तोड़ने की ऐसी ताक़त हासिल कर लेते हैं, जो कि अब तक हम में थी ही नहीं।"
स्वाति

"होके मायूस ना, यूं शाम की तरह ढलते रहिए,
ज़िंदगी एक भोर है, सूरज की तरह निकलते रहिए।"

पाठ "दबाव से निपटना" से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। और जैसे कि पाठ में कई किस्से सुनने को मिले हैं, ठीक उसी प्रकार सबके जीवन में दबाव होता है। स्कूल में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं पर अपने माता-पिता का दबाव या फिर अध्यापकों का भी हो सकता है। आजकल हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई-लिखाई और हर गतिविधि में आगे हो। और माता-पिता की ये शिकायतें अध्यापकों से भी करते हैं कि हमारा बच्चा कक्षा में, स्कूल में सबसे होशियार होना चाहिए।

इस प्रकार, अगर उनके पड़ोसी का बच्चा अपनी कक्षा में प्रथम आ जाए, तो वे अपने बच्चे को डांटते-धमकाते हैं, प्रथम आने वाले बच्चे से उसकी तुलना करते हैं। जिससे कभी-कभी बच्चे का मनोबल कम होने लगता है, और उसके मन में नकारात्मक विचार आने लगते हैं।

तथा इस पाठ में बताया गया है कि हमारे सामने अनेकों चुनौतियां और काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। और इन चुनौतियों और कठिनाइयों पर हमें किस प्रकार विजय प्राप्त करनी है। जैसे कि पाठ में एक पंक्ति लिखी हुई है, "मज़बूत बनो, दबाव में आकर काम मत करो, दबाव पर काम करो।"

जीवन आनंद लेने के लिए है, सहने के लिए नहीं।
साक्षी पाल

"कोई भी मुश्किल थका नहीं सकती,
रास्ते की रुकावट गिरा नहीं सकती,
अगर जूनून है जितने का, तो हार भी हरा नहीं सकती।"

दबाव से निपटना — ऐसे तो हर इंसान के जीवन में दबाव होते हैं, और उनका होना भी बहुत ज़रूरी है, क्योंकि अगर किसी के जीवन में दबाव न हो, तो फिर किसी का भी कोई लक्ष्य नहीं होगा। क्योंकि अगर हमारे सामने किसी भी क्षेत्र में कोई दबाव हो, तो हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति करने की पूरी कोशिश करते हैं और उसे प्राप्त भी कर लेते हैं।

मुझे इस पाठ में न्यूरोसर्जन डॉ. बेन कार्सन की यह लाइन बहुत अच्छी लगी, जब उनसे पूछा गया कि दबाव का सामना आप कैसे करते हैं, तो उन्होंने जो जवाब दिया:

"आप योजना बनाने में चाहे कितने ही अच्छे हों, लेकिन दबाव कभी नहीं जाता। इसलिए उससे युद्ध मत करो, मैं तो बेहतरीन प्रदर्शन के लिए दबाव को प्रेरणा में बदल देता हूं।"

तो मैं भी यही चाहती हूँ कि मैं अपने बच्चों को बहुत अच्छे से समझा पाऊं, जिससे उन्हें स्कूल आना और पढ़ना किसी भी प्रकार से दबाव न लगे, बल्कि वे इंतजार करें कि कब रात बीते और कब सुबह हो और हम स्कूल जाएं। एक नई उमंग के साथ हर उस चुनौती का सामना करें जो उनके जीवन में आए, चाहे वो पढ़ाई हो या फिर किसी खेल में भाग लेना हो। जो भी कला उनके अंदर छिपी हो, उसका ऐसा प्रदर्शन करें कि हर दबाव से आगे निकल जाएं और हर दबाव को चुनौती दें कि हम इन सबके लिए पहले से तैयार हैं।
ललिता पाल

"सीखने का जुनून पैदा करो, अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपकी सफलता निश्चित है।"

मैं सिमरन, आर्थर फुट एकेडमी की अध्यापिका हूं।
मैंने साहस पाठ से यही सिखा कि अगर जिंदगी में एक बार कामयाबी नहीं मिली, तो बार-बार उसी कार्य को करना चाहिए।
वह कार्य कितना भी कठिन क्यों न हो, अगर हमारे अंदर साहस और हिम्मत है, तो हम उसे जरूर कर सकते हैं।
जैसे मैं अंग्रेजी बोलने और पढ़ने में कमजोर हूं, तो मैं अंग्रेजी बोलना और पढ़ना जरूर सीखूंगी।
अगर मैं सीखने का साहस करूंगी, तो जरूर सीख जाऊंगी और बच्चों को भी सीख दूंगी।
ज़िंदगी में कैसी भी परिस्थितियाँ क्यों न आ जाएं, मैं उनका सामना करने का साहस और हिम्मत जरूर रखूंगी।
सिमरन कौर

हमें दबाव से निपटने के उपाय ढूंढ़ने चाहिए, जैसा कि बच्चों पर बहुत दबाव होता है। उन्हें अपने माता-पिता, दादा-दादी और स्कूल का दबाव भी होता है। उन्हें परीक्षा में उत्तीर्ण होने का दबाव होता है और वह दबाव के कारण अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। इस कारण बच्चों के परीक्षा में अंक कम आते हैं और उस पर माता-पिता का भी अधिक दबाव पड़ जाता है।

हाल ही में मैंने देखा कि 14 साल के बच्चे का वजन 4 महीने में 10 किलो कम हो गया। इस तरह वजन घटना कहीं बीमारियों का संकेत हो सकता है। बच्चे की डॉक्टर से जांच भी कराई गई और पता चला कि बच्चे को किसी बात का दबाव था। उस बच्चे से पूछने पर पता चला कि उसके स्कूल में कुछ बच्चे उसके मोटापे पर उसका मजाक उड़ाते थे और उसने यह बात दिल पर ले ली। इस कारण उस बच्चे ने खाना-पीना भी छोड़ दिया, जिस कारण वह बहुत कमजोर हो गया और उस पर इस बात का बहुत दबाव पड़ा। उस बच्चे को डॉक्टर से दवाई चलाई गई, जिस कारण वह कुछ महीनों के बाद ठीक से खाना-पीना शुरू कर दिया।

रूबल कौर

Saturday, August 28, 2021

Quality and Love - Asha Bhandari

Quality गुणवत्ता
अगर कोई बच्चा कक्षा व गहृ कार्य ठीक से नहीं कर पा रहा है, तो हमें बच्चे के पास बैठ कर  उसकी समस्या सुननी चाहिए। बच्चे के घर में कोई समस्या तो नहीं चल रही है। जिस कारण बच्चा अपने काम के प्रति जागरूक नहीं हो पा रहा है। जब बच्चा कक्षा में उपस्थि त होकर भी कार्य में ध्यान नहीं लगा पाता है तो नि श्चय ही उसके दिमाग में कुछ चल रहा होता है। यह उसके घर के माहौल या साथि यों का भी असर हो सकता है।

हमें बच्चे के साथ प्यार का रिश्ता बना कर उसके मन और दिमाग में चल रही समस्या का समाधान ढूंढ कर बच्चे की सहायता करने की कोशि श करनी चाहि ए। अगर बच्चा कक्षा में गुमसुम बठै है और आपकी बात का कोई जवाब नहीं दे रहा है तो हमें अकेले में बच्चे से बात करनी चाहिए। जब वह बच्चा कार्य में थोड़ी भी रुचि दिखाता है तो हमें सबके सामने उसे प्रोत्साहित करना चाहिए।


Love प्यार
कक्षा में जब बच्चे का दाखिला करते हैं, तो वह अपने घर की सारी बातें अपने दोस्तों तथा अपने अध्यापक को बताता है। इसी प्रकार वह स्कूल की सारी बातें घर जाकर अपने माता - पिता को बताता है। कक्षा में वह अपने मन पसंद अध्यापक या साथियों के साथ बैठना पसदं करता है। धीरे धीरे उसकी यह पसंद एक लगाव का रूप ले लेती है। अगर उसका पसंदीदा अध्यापक या दोस्त किसी वजह से कक्षा में उपस्थित नहीं होता है तो उसका मन कक्षा में नहीं लगता है। इसके लिए अध्यापक को चाहिए कि वह समय-समय पर बच्चों को अलग-अलग दोस्तों के साथ बिठाए। सभी बच्चों के अदंर कोई ना कोई खूबी अवश्य होती है। कोई बच्चा देखने में सुंदर होता है तो कोई पढ़ाई में बहुत होशि यार होता है।


- Asha Bhandari @JMMS, John Martyn Memorial School, Salangaon, Dehradun

Tuesday, July 27, 2021

Thoughtfulness and Understanding - Asha Bhandari

विचारशीलता और समझदारी
कक्षा में पढ़ाने से पहले हमें यह खुद भी समझ लेना है कि हम जो बच्चों को सिखाने जा रहे हैं वह बच्चों की समझ में आ रहा है या नहीं ।हमें खुद भी बच्चों की समझ के हिसाब से काम देना चाहिए हमें हमें काम बच्चों की समझ के हिसाब से ही कराना चाहिए जिस प्रकार हम कक्षा में पहले दिन केवल परिचय ही से शुरु करते हैं ।जब कोई बच्चा किसी आसान कार्य को कर देता है तो उसका उत्साह बढ़ जाता है और धीरे-धीरे हम बच्चे की क्षमता को देखते हुए अभ्यास कराते हुए आगे बढ़ते हैं ।जब धीरे सीखने वाला बच्चा थोड़ा अच्छा सीखता है तो हमें उसे उत्साहित करना चाहिए इससे बच्चों के अंदर सीखने की इच्छा जागृत हो जाती है ।और  उनके अंदर की डर  समाप्त हो जाती है ।बच्चा किसी टीचर के सामने अपने मन की बात कहने मे सहज नहीं होता है लेकिन अपने साथी से वह अपनी समस्या को आसानी से कह देता है ।बच्चे आपस में एक दूसरे की समस्या को सुनते हैं और उसका समाधान ढूंढने की कोशिश करते हैंI

परवाह
अगर कोई बच्चा किसी कारण से रोज स्कूल देर से आता है या ग्रह का है पूरा नहीं करता है तो टीचर को पता करना चाहिए कि बच्चे की क्या समस्या हो सकती है। कभी किसी के घर का माहौल पढ़ाई के अनुकूल नहीं है या घर में कोई सदस्य बीमार है तो भी बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है इसके लिए बच्चे के साथ प्यार या दोस्ती का रिश्ता बनाना चाहिए। बच्चे को सहारा देकर कहानी या किसी महापुरुष की जीवन गाथा सुना कर बच्चे को प्रोत्साहित करना चाहिए। जैसे लगातार कोशिश करने पर एक चींटी भी दीवार के ऊपर चढ़ जाती हैं उसी प्रकार धीरे सीखने वाला बच्चा भी अच्छा कर जाता है।  बच्चे का विश्वास अपने अभिभावक से ज्यादा टीचर पर होता है वह अपने मन की बात टीचर से बेझिझक करता है और आशा करता है की टीचर उसका सही मार्गदर्शन करेंगे। हम बच्चों को खेल के माध्यम से भी प्रोत्साहित कर सकती हैं। खेल में बच्चों को हार जीत पर ध्यान न देकर अपना बेहतर प्रयास देना चाहिए। कक्षा में भी जो बच्चे होशियार हैं उन्हें दूसरे बच्चों का भी ध्यान रखना चाहिए। इससे बच्चों के मन में दूसरों की परवाह करने की भावना पैदा हो जाती है।। कक्षा में बच्चों को दो टीम में बांट कर अंताक्षरी या कोई खेल खिला कर भी प्रोत्साहित किया जा सकता है हमें समय-समय पर बच्चों को क्लास रूम से बाहर लाकर कोई खेल या कंपटीशन अवश्य कराना चाहिए।इससे बच्चों का रुझान भी पता लग जाता है।। कभी-कभी कोई बच्चा पढ़ाई में ज्यादा अच्छा नहीं होता लेकिन दूसरी एक्टिविटी में वह बेहतर करता है और अपने जीवन में आगे बढ़ जाता है।

- Asha Bhandari@JMMS, John Martyn Memorial School, Salangaon, Dehradun 

Monday, August 3, 2020

विश्वास - जफ्फर खां

विश्वास एक छोटा सा शब्द है | उसको पढ़ने में एक सेकेंड लगता है सोचो तो एक मिनट लगता है समझो तो दिन लगता है पर साबित करने
में तो जिंदगी लगती है - जैसे कि आज वाली स्थिति कोरोना महामारी के कारण सभी लोगों का विश्वास टूटता जा रहा है तथा एक दूसरे से लोग मिल नहीं पा रहे हैं, दूरी बढ़ गई हैं ,घरों से बाहर निकलने से डर रहे हैं | किसी भी वस्तु को छूने से ही लोगों को अत्यधिक  समस्याओं का सामना करना पड़ रहा  हैं | हमारे बाली शहर में बाहर से आए हुए मनुष्यों की कोरोना पॉजिटिव की रिपोर्ट के आंकड़ों के कारण व्यक्तियों के मन एक डर बैठ गया है  | उन गली मोहल्ले को भी बंद किया गया है जहाँ कोरोना पोजिटिव लोग मिले हैं तथा पुलिस का पहरा भी लगाया गया हैं जिससे  लोगो में भय बढे  नहीं | 

लोग दुकानो पर बनी चीजों को नही खरीद रहे हैं | हमे इस समस्या का सामना पूरे विश्वास और सहयोग से करना चाहिए | जब कोई मुश्किल आती है तो उस मुश्किल का हल भी निकल सकता है | हमें किसी भी मुसीबत में घबराना व डरना नही चाहिए  क्योंकि हम लोग जब घबरा जाते हैं तो हमारा असर हमारे बच्चों के ऊपर पर पड़ता है और बच्चे हमसे ज्यादा घबरा जाते हैं | ऐसी  स्थिति में हमें विश्वास और हिम्मत से कार्य करना चाहिए | पहले भी लोग कई बीमारियों से ठीक हुए हैं  तो  यह कोरोना की बीमारी थोडा समय लेगी लेकिन हमें  विश्वास रखना होगा कि इस बीमारी का  समाधान निश्चित निकलने वाला है तथा सभी पहले जैसे होने वाला है| हमे अपने आप पर विश्वास रखना चाहिए  कि हम सभी पहले जैसे मिल जुलकर साथ रहेंगे और दुख-सुख में अपने पड़ोसियों की मदद  करते रहेंगे बुजुर्गों की देखभाल करते रहेंगे |

 हमारे अंदर विश्वास हैं तो हम भविष्य में बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का सामना कर सकते है | अपने अंदर आत्मविश्वास की बढ़ोतरी करना और सरकार द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हुए अपने आप को सुरक्षित रखना है और अपनी गली मोहल्ले में लोगों की मदद करनी है | उनको कोरोना से बचने के उपाय भी बताने होंगे क्योंकि जो व्यक्ति अनपढ़ है उनको उपायों के बारे में पता नही है उन्हें बताना  होगा कि कोरोना से बचने के लिए मुँह पे माक्स बांधे और अपने हाथों को बार-बार साबुन से धोए  तथा दूसरे लोगो से मिलते समय एक मीटर की दूरी  बनाए रखनी चाहिए | अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखना चाहिए जिससे हमारा आत्मविश्वास मजबूत हो सके |

जफ्फर खां 
The Fabindia School
zkn@fabindiaschools.in

Monday, May 4, 2020

ख़ुशी और सहनशीलता: आयशा टॉक


ख़ुशी एक ऐसी चीज है जिसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता है। यह केवल किसी की मुस्कान की अभिव्यक्ति से महसूस किया जा सकता है। इसके अलावा ख़ुशी मन के भीतर से आती है और कोई भी आपकी ख़ुशी नहीं चुरा सकता है। 

सहनशीलता, हमारे जीवन का सबसे आवश्यक गुण है। यदि हमारे भीतर सहनशीलता होगी तो हम अपने भीतर के ईर्ष्या एवं दर्द से मुक्त रहेंगे। तब हमारी आत्मा में एक अजीब सी संतुष्टि रहेगी।

बचपन से ही बच्चों में सहनशीलता की आदत विकसित करनी चाहिए। उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि किसी भी तरह की परेशानी में एकदम से घबराना नहीं चाहिए एवं धैर्यपूर्वक उसका समाधान निकालने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से सफलता जरूर मिलती है। 

 कक्षा में ख़ुशी का माहौल होना भी बहुत जरूरी होता है। इसके लिए अध्यापक विद्यार्थियों को पूरा समय पढ़ाई न करवाकर कभी - कभी पढ़ाई के दौरान थोड़ा - बहुत मनोरंजन भी करवा सकते है, जैसे कि -विद्यार्थियों को आगे आकर कहानी सुनाने का अवसर दिया जाए, कभी कुछ रचनात्मक कार्य करवाया जा सकता है। कभी किसी पाठ का विद्यार्थियों द्वारा समूह में चर्चा एवं अभिनय भी करवा सकते है। पढ़ाने के तरीके बदलने से भी कक्षा में ख़ुशी का माहौल बन सकता है। 

सहनशील एवं खुशमिज़ाज व्यक्ति को हर कोई पसंद करता है। एक अध्यापक में सहनशीलता होना अति - आवश्यक होता है। क्योंकि कक्षा में सभी विद्यार्थियों की समझने की क्षमता एक जैसी नहीं होती है। कुछ बहुत जल्दी समझ जाते हैं और कुछ विद्यार्थी बार - बार  पूछते हैं। ऐसी स्थिति में अध्यापक को सहिष्णु एवं खुशमिज़ाज  रहना  बहुत जरूरी हो जाता है। यदि अध्यापक उस वक़्त क्रोध करेगा, तो बच्चे डर के मारे कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाएँगे। इस कारण से ऐसे विद्यार्थी हमेशा पीछे ही रह जाते है। वे संकोची स्वभाव के हो जाते है। 
Ayasha Tak
The Fabindia School, Bali

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