Showing posts with label संतुष्टि. Show all posts
Showing posts with label संतुष्टि. Show all posts

Tuesday, May 18, 2021

दूसरों की मदद करना: जफ्फर खान

 मानव जीवन का उद्देश्य है कि अपने मन, वचन और काया से औरों की मदद करना हमेशा यह देखा गया है कि जो लोग दूसरों की मदद करते हैं, उन्हें कम तनाव रहता है, मानसिक शांति और आनंद का अनुभव होता है। वे अपनी आत्मा से ज़्यादा जुड़े हुए महसूस करते हैं, और उनका जीवन संतोषपूर्ण होता है। 

जब कोई अपना मन, वचन और काया को दूसरों की सेवा के लिए उपयोग करता है, तब उसे सब कुछ मिल जाता है। उसे सांसारिक सुख-सुविधा की कमी कभी नहीं होती। जब हम दूसरों के लिए कुछ करते हैं, उसी पल खुशी की शुरुआत हो जाती हैं। दूसरों की मदद करने और उनके प्रति दया दिखाने से हमें एक संतुष्टि की भावना मिलती है और जो भी हम देते हैं वह जल्द ही हमारे पास बहुतायत में आ जाता है।


हमें उन लोगों की भी सहायता करने की आवश्यकता है जो हर समय हमारे साथ रहना पसंद करते हैं। हमें उन्हें अपने ऊपर आश्रित नहीं बनाना चाहते है। हमें दूसरों की सहायता इस ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए कि वह उनके लिए उपयुक्त हो। यदि कोई हमसे आग्रह करता है कि हम उसे कोई चीज़ सिखाएँ, तो भले ही वह कार्य हमारी पसंद का कार्य न हो, तब भी यदि वह कार्य उस व्यक्ति के लिए उपयुक्त है तो हमें उस व्यक्ति को सिखाने के लिए पूरा प्रयास करना चाहिए। सबसे अच्छी सहायता वह होगी जहाँ उनके लिए ऐसी स्थितियाँ और साधन उपलब्ध कराए जाए जहाँ वे जीवन में आगे बढ़ने और खुद अपना खयाल रखने के काबिल बन सकें।


Jaffer Khan 

The Fabindia School, Bali 

jkn@fabindiaschools.in 


Friday, September 11, 2020

गुणवत्ता और प्रेम: राजेश्वरी राठौड़


आप किसी भी विभाग में काम करते हैं तो उस जगह आपको हर बात का ध्यान रखकर अपने गुणों के स्तर को बढ़ाना और वह कार्य को अच्छी तरह करना है। जिससे ग्राहक को संतुष्टि हो सके ऐसे ही विद्यालय में भी हम सब को नैतिक मूल्यो से जोड़कर एकता के सूत्र में बाँध कर रखते है और हम सबको एक दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है ताकि हम अपने विभाग में छोटी-छोटी गतिविधि को जाने और विद्यालय को जाने और उनकी संतुष्टि को हासिल करने के लिए वचनबद्ध रहे और अपने कार्य में रोजाना सुधार लेकर आए ताकि हम अपने परिवार का अपने विद्यालय का पूरी दुनिया में नाम कर सकेअगर सभी कर्मचारी एक खुले दिमाग से साथ काम करें तो गुणवत्ता को सामने लाए तो सफलता अवश्य संभव है

प्रेम का एहसास जो दिमाग से नहीं दिल से होता है। मानव समाज के लिए प्रेम एक सर्वोत्तम सौगात हैंप्रेम प्रकृति का है अनमोल उपहार है, जो मानव जाति का अस्तित्व है जो जीवन में मिठास घोल देता हैकटुता दूर करके व वात्सल्य तथा भाईचारे के संचार में प्रेम की महती भूमिका हैऐसे ही विद्यालय में शिक्षक सभी विद्यार्थियों को सच्चे प्रेम का पुष्प कोमल भावनाओं की भूमि पर आपसे विश्वास और मन की पवित्रता के संरक्षण से ही खिलता और महकता हैं

प्रेम मानव मन का वह भाव है, जो कहने सुनने के लिए नहीं बल्कि समझने के लिए होता हैउससे भी बढ़कर महसूस करने के लिए होता है प्रेम ही मानव जीवन की नीवं है। प्रेम के बिना सुखमय इंसानी जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती हैंसच्चा प्रेम केवल देने और देते रहने में ही विश्वास करता हैजहाँ प्यार है वहाँ समर्पण है जहाँ समर्पण है वहाँ अपनेपन की भावना है। इसलिए मनुष्य को एक दूसरे से प्रेम से रहना चाहिए
Rajeshwari Rathore 
The Fabindia School

Monday, May 4, 2020

ख़ुशी और सहनशीलता: आयशा टॉक


ख़ुशी एक ऐसी चीज है जिसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता है। यह केवल किसी की मुस्कान की अभिव्यक्ति से महसूस किया जा सकता है। इसके अलावा ख़ुशी मन के भीतर से आती है और कोई भी आपकी ख़ुशी नहीं चुरा सकता है। 

सहनशीलता, हमारे जीवन का सबसे आवश्यक गुण है। यदि हमारे भीतर सहनशीलता होगी तो हम अपने भीतर के ईर्ष्या एवं दर्द से मुक्त रहेंगे। तब हमारी आत्मा में एक अजीब सी संतुष्टि रहेगी।

बचपन से ही बच्चों में सहनशीलता की आदत विकसित करनी चाहिए। उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि किसी भी तरह की परेशानी में एकदम से घबराना नहीं चाहिए एवं धैर्यपूर्वक उसका समाधान निकालने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से सफलता जरूर मिलती है। 

 कक्षा में ख़ुशी का माहौल होना भी बहुत जरूरी होता है। इसके लिए अध्यापक विद्यार्थियों को पूरा समय पढ़ाई न करवाकर कभी - कभी पढ़ाई के दौरान थोड़ा - बहुत मनोरंजन भी करवा सकते है, जैसे कि -विद्यार्थियों को आगे आकर कहानी सुनाने का अवसर दिया जाए, कभी कुछ रचनात्मक कार्य करवाया जा सकता है। कभी किसी पाठ का विद्यार्थियों द्वारा समूह में चर्चा एवं अभिनय भी करवा सकते है। पढ़ाने के तरीके बदलने से भी कक्षा में ख़ुशी का माहौल बन सकता है। 

सहनशील एवं खुशमिज़ाज व्यक्ति को हर कोई पसंद करता है। एक अध्यापक में सहनशीलता होना अति - आवश्यक होता है। क्योंकि कक्षा में सभी विद्यार्थियों की समझने की क्षमता एक जैसी नहीं होती है। कुछ बहुत जल्दी समझ जाते हैं और कुछ विद्यार्थी बार - बार  पूछते हैं। ऐसी स्थिति में अध्यापक को सहिष्णु एवं खुशमिज़ाज  रहना  बहुत जरूरी हो जाता है। यदि अध्यापक उस वक़्त क्रोध करेगा, तो बच्चे डर के मारे कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाएँगे। इस कारण से ऐसे विद्यार्थी हमेशा पीछे ही रह जाते है। वे संकोची स्वभाव के हो जाते है। 
Ayasha Tak
The Fabindia School, Bali

Wednesday, April 29, 2020

ख़ुशी और सहनशीलता: प्रलय नाग

अच्छा जीवन जीने के लिए खुश होना बेहद जरूरी है।  छात्रों और शिक्षकों के लिए इसका विशेष महत्व हो जाता है।  सीखना-सिखाना तभी संभव है जब वातावरण खुशियों भरा हो। हालाँकि ख़ुशी की परिभाषा भी अपने-अपने तरीके से बदल जाती है। अलग-अलग लोगों के पास खुशी के अलग-अलग विचार हैं।  

कुछ लोग मानते हैं कि यह पैसों में पाया जा सकता है, कुछ लोग प्यार में होते हैं तो ख़ुशी का अनुभव महसूस करते हैं और कुछ को ख़ुशी और संतुष्टि तब महसूस होती है जब वे पेशेवर जीवन में अच्छा काम करते हैं। छात्रों के भी अपने विचार होते है, उनके अनुरूप काम हो रहा है तो उन्हें ख़ुशी अनुभव होती है। खुशी को अनुभव करने का एकमात्र तरीका है कि हम अपने आस-पास सभी के बारे में अच्छी सोचें।  

कई लोग खुशी को पैसे से जोड़ते हैं और कई लोग इसे रिश्तों से जोड़ते हैं।  वे यह नहीं समझते हैं कि जब तक वे खुद खुश नहीं रहेंगे तब तक वे अपने रिश्तों में भी खुश नहीं रहेंगे। लोग आजकल खुशी को धन और सामानों से जोड़ते है। लोग सोचते है कि उनके पास धन है तो वे खुश है इसलिए रिश्ते से ज्यादा ख़ुशी उन्हें धन में लगता है।  इसलिए आजकल लोगों में सहनशीलता कम है।  जो लोग सहनशील है उन्हें ख़ुशी के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता। उनके पास धन या सुख-सुविधा का सामान है या नहीं वे हर छोटे-छोटी चीजों में खुश रहते हैं। पहले लोग कम संसाधनों में भी संतुष्ट रहते थे। ये संतुष्टि सहनशीलता है। व्यक्ति क्रियाशील रहे परन्तु सहनशील भी रहे। कई बार किए गए कार्यों के परिणाम देर से आते है। ऐसे में व्यक्ति कर्म हीन हो जाता है। पुरुषार्थ करना महत्वपूर्ण है। अतः सहनशील बनकर खुशियाँ बटोरते हुए कर्तव्य परायण बनना परमावश्यक है। 
Pralay Nag
The Fabindia School, Bali

Blog Archive