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Friday, April 24, 2026

रिफ्लेक्शन: स्टाफ रूम में मेरा अनुभव - सनबीम ग्रामीण स्कूल

आज का सत्र, जो कि वांटेड बैक बैंचर एंड लास्ट रैंकर टीचर के तीसरे अध्याय पर आधारित था, हमें एक नई सीख देता है। हर बच्चे का पारिवारिक और सामाजिक वातावरण अलग-अलग होता है, इसलिए उसके सीखने का तरीका और व्यवहार भी अलग होता है। बच्चा किस माहौल से आता है, यह उसके सीखने की प्रक्रिया को बहुत प्रभावित करता है। कुछ बच्चे ऐसे माहौल से आते हैं जहाँ पढ़ाई के लिए शांत वातावरण, संसाधन और मार्गदर्शन मिलता है, जबकि कुछ बच्चों को ये सुविधाएँ नहीं मिल पातीं। हर बच्चे की अपनी-अपनी समस्याएँ भी हो सकती हैं। शिक्षक यदि बच्चों से व्यक्तिगत रूप से बात करें और उसकी समस्या को समझें, तथा उसे व्यक्तिगत रूप से किसी को न बताते हुए सहानुभूति दिखाएँ और प्रोत्साहित करें, तो बच्चे में पढ़ाई के प्रति रुचि जाग सकती है।

जो बच्चे कठिन परिस्थितियों से आते हैं, वे पढ़ाई में पीछे रह सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे कम बुद्धिमान हैं। उनकी सीखने की गति, तरीका और पढ़ाई के प्रति रुचि अलग हो सकती है। इसलिए शिक्षक को चाहिए कि वह बच्चों की पृष्ठभूमि को समझे और उसी के अनुसार पढ़ाने का तरीका अपनाए। जब शिक्षक सहानुभूति और सहयोग से पढ़ाता है, तो हर बच्चा धीरे-धीरे आगे बढ़ सकता है। इसलिए मेरे विचार से शिक्षक के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि शिक्षा में केवल परिणाम ही नहीं, बल्कि परिस्थिति और प्रयास को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

मंजुला सागर

आज विद्यालय में नए बच्चों का प्रवेश हुआ। स्टाफ रूम में बैठकर जब मैं इन छोटे-छोटे बच्चों को देख रही थी, तो उनके चेहरों पर अलग-अलग भाव साफ दिखाई दे रहे थे—कहीं खुशी, कहीं डर, तो कहीं झिझक। कुछ बच्चे रो रहे थे, और कुछ अपने माता-पिता का हाथ कसकर पकड़े हुए थे।

इन दृश्यों ने मुझे यह एहसास कराया कि स्कूल का पहला दिन बच्चों के लिए कितना महत्वपूर्ण और भावनात्मक होता है। एक नई जगह, नए लोग और नया वातावरण—यह सब उनके लिए थोड़ा कठिन होता है। लेकिन साथ ही, यह उनके जीवन की एक नई और सुंदर शुरुआत भी होती है।

मैंने महसूस किया कि एक शिक्षक के रूप में हमारी भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को प्यार, सुरक्षा और अपनापन देना भी उतना ही जरूरी है। जब शिक्षक बच्चों को स्नेह से समझते हैं और उन्हें सहारा देते हैं, तो धीरे-धीरे उनका डर कम होकर खुशी में बदल जाता है।

आज का अनुभव मेरे लिए बहुत सीख देने वाला रहा। स्टाफ रूम में बैठकर मैंने सोचा कि मेरी भी एक शुरुआत थी। अब फिर से उसी मोड़ पर आकर खड़ी हूँ।

सुनीता त्रिपाठी

Saturday, July 4, 2020

एकता और देखभाल: सुरेश सिंह नेगी


समाज के साथ-साथ पूरे देश के लिए एकता का अत्यधिक महत्व है।  एक साथ मिलजुल काम करने को एकता कहते हैं। एकता में बहुत शक्ति होती है। किसी भी छोटे या बड़े काम को अगर एक साथ किया जाए तो उस काम को बड़ी जल्दी और आसानी से किया जा सकता है। एक साथ काम करने से जहाँ बोरियत का अनुभव भी नहीं होता है वंही दूसरी ओर उस काम में काम करने वालों को आनंद भी आता है। एकता में लोग अपने स्वयं के उद्देश्यों को पूरा करने के बजाय एक सामान्य लक्ष्य की दिशा में काम करते हैं।

एकसाथ काम करने से लोगों में मनमुटाव समाप्त होने के साथ-साथ उनमें आपसी समझ और भाईचारा भी बढ़ता है। लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें आर्थिक सहायता भी प्रदान करते हैं। मेरा मानना है कि एकल परिवार के बजाय संयुक्त परिवार में रहने वाले बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है। बेहतर जीवन शैली और राष्ट्र के विकास के लिए एकता का आपस में होना अत्यंत आवश्यक है।

इस प्रकार, हम देखते हैं कि एकता में रहने के बेशुमार लाभ हैं। हम बड़े कार्यों को पूरा कर सकते हैं, जरूरत के समय में लोगों पर भरोसा कर सकते हैं और बेहतर तरीके से युवा शक्ति का पोषण कर सकते हैं।

दूसरों  की परवाह करना, दूसरों के बारें में अच्छा सोचना, आपस में मिलजुलकर रहना, चीजों को एक -दूसरे से साझा करना, दूसरों  के प्रति ईर्ष्या और  मनमुटाव रखना  ही देखभाल कहलाता है। चीजों को एक दूसरे से साझा करने से यह पता चलता है कि आप दूसरों की देखभाल करते हैं साथ ही साथ यह आपको  एक इंसान के रूप में आत्म-विकास करने और दूसरों के प्रति निस्वार्थ, विनम्र और सशक्त बनाने में भी मदद करता है। चीजों को एक-दूसरे से साझा करने से जहाँ एक व्यक्ति में सामाजिक-कौशल का निर्माण और समाज के प्रति जिम्मेदारी का एहसास होता है वहीं दूसरी ओर वह हमेशा दूसरों के द्वारा सराहा जाता है।
Suresh Singh Negi
The Fabindia School, Bali

Sunday, May 17, 2020

साहसी व्यक्ति का धैर्य: कृष्ण गोपाल


जो किसी से डरे वह साहसी है, ये साहस की परिभाषा नहीं है। हर व्यक्ति के भीतर भी डर रूपी चिनगारी दिखाई पड़ती है  किन्तु जो डर को जीत ले वही साहसी है।  कई बार काम करने से पहले हम कतराते हैं।  एक प्रश्न मस्तिष्क में कौंध ही जाता है -'मुझे सफलता नहीं मिली तो, कहीं मैं हार तो नहीं जाऊँगा ?' इस डर को जीतना ही साहस है।  कभी यह स्मरण नहीं रहता कि यदि हार गए तो एक नया अनुभव मिलेगा।  जीत गए तो प्रयास सफल होगा ही।

 सच्चा साहसी वही है जो अपनी सफलता का धैर्य से प्रतीक्षा करे।  विद्यार्थी के लिए ये दोनों मूल्य आवश्यक है।एक नन्हा बालक खूब अभ्यास करता है, तब कहीं जाकर लिखने के लिए तैयार होता है।  ऐसे नन्हे बालकों के शिक्षक भी धैर्य की प्रतिमा होते हैं। एक खिलाड़ी लगातार अभ्यास करता है, तब कहीं जाकर उसे प्रदर्शन करने का अवसर मिलता है।  ठीक ऐसे ही एक गायक नियमित साधना करता है। ये सब धैर्य से ही संभव हो सकता है। 

दशरथ मांझी ने पहाड़ तोड़ने का साहस दिखाया, धैर्य भी रखा।  कई लोग उसके काम पर हँसे भी, समय भी बहुत लगा किन्तु उसने यह प्रण  छोड़ा।  जो ठाना वह करके दिखाया।  मुश्किलें भी आयी होगी पर पीछे मुड़कर नहीं देखा।  इसलिए आज वह साहस और धैर्य का पर्याय बन गया।  हम अपनी गलतियों को स्वीकार करने में घबराते हैं। 

यदि गलतियों को स्वीकारा जाए तो साहसी व्यक्ति कहलाएँगे  बच्चे भी कतराते हैं, उनका मार्गदर्शन करना चाहिए।  अपनी गलतियों को स्वीकार करना और उससे प्रेरणा लेना कि भविष्य में इस गलती को दोहराया नहीं जाएगा। साहस और धैर्य दोनों ऐसे मूल्य है, जिसको अपनाकर व्यक्ति सफलता की ओर अग्रसर होगा ही। विद्यार्थियों को आने वाले समय में कई सफलताएँ अर्जित करना है। अतः इन मूल्यों की विशेष आवश्यकता जान पड़ती है। विद्यार्थियों को राह दिखाने की जिम्मेदारी शिक्षकों और अभिभावकों की है।  अतः यह भी आवश्यक हो जाता है कि सर्वप्रथम ये मूल्य शिक्षकों और अभिभावकों में विकसित हो। 
Krishan Gopal
The Fabindia School

Wednesday, April 29, 2020

ख़ुशी और सहनशीलता: प्रलय नाग

अच्छा जीवन जीने के लिए खुश होना बेहद जरूरी है।  छात्रों और शिक्षकों के लिए इसका विशेष महत्व हो जाता है।  सीखना-सिखाना तभी संभव है जब वातावरण खुशियों भरा हो। हालाँकि ख़ुशी की परिभाषा भी अपने-अपने तरीके से बदल जाती है। अलग-अलग लोगों के पास खुशी के अलग-अलग विचार हैं।  

कुछ लोग मानते हैं कि यह पैसों में पाया जा सकता है, कुछ लोग प्यार में होते हैं तो ख़ुशी का अनुभव महसूस करते हैं और कुछ को ख़ुशी और संतुष्टि तब महसूस होती है जब वे पेशेवर जीवन में अच्छा काम करते हैं। छात्रों के भी अपने विचार होते है, उनके अनुरूप काम हो रहा है तो उन्हें ख़ुशी अनुभव होती है। खुशी को अनुभव करने का एकमात्र तरीका है कि हम अपने आस-पास सभी के बारे में अच्छी सोचें।  

कई लोग खुशी को पैसे से जोड़ते हैं और कई लोग इसे रिश्तों से जोड़ते हैं।  वे यह नहीं समझते हैं कि जब तक वे खुद खुश नहीं रहेंगे तब तक वे अपने रिश्तों में भी खुश नहीं रहेंगे। लोग आजकल खुशी को धन और सामानों से जोड़ते है। लोग सोचते है कि उनके पास धन है तो वे खुश है इसलिए रिश्ते से ज्यादा ख़ुशी उन्हें धन में लगता है।  इसलिए आजकल लोगों में सहनशीलता कम है।  जो लोग सहनशील है उन्हें ख़ुशी के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता। उनके पास धन या सुख-सुविधा का सामान है या नहीं वे हर छोटे-छोटी चीजों में खुश रहते हैं। पहले लोग कम संसाधनों में भी संतुष्ट रहते थे। ये संतुष्टि सहनशीलता है। व्यक्ति क्रियाशील रहे परन्तु सहनशील भी रहे। कई बार किए गए कार्यों के परिणाम देर से आते है। ऐसे में व्यक्ति कर्म हीन हो जाता है। पुरुषार्थ करना महत्वपूर्ण है। अतः सहनशील बनकर खुशियाँ बटोरते हुए कर्तव्य परायण बनना परमावश्यक है। 
Pralay Nag
The Fabindia School, Bali

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