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Friday, September 11, 2020

गुणवत्ता और प्रेम: कुसुम डाँगी


किसी व्यक्ति के पास एक विशिष्ट गुण या विशेषता ही गुणवत्ता है हर व्यक्ति में अलग-अलग गुण होते हैं जैसे- कोई खेल में अच्छा है तो कोई शिक्षा में विद्यार्थी में सबसे अच्छा और पहला गुण आदर्श का होना है आदर्श विद्यार्थी वह है जो ज्ञान या विद्या प्राप्ति को जीवन का आदर्श मानता है यह विद्या ही है जो मनुष्य को नम्र, सहनशील और गुणवान बनाती है इस बदलते समय में हम सब को अपने अंदर अतिरिक्त गुणों का विकास करना आवश्यक है उसके लिए सबसे जरूरी है वास्तविक जीवन मूल्यों को समझना जैसे- दूसरों से मधुरता से बात करना अंहकार ना करना आदि।


प्रेम एक एहसास हैं जो दिल से होता हैं। प्रेम स्नेह से लेकर खुशी की और अग्रसर होता हैं इसमें दया भावना आदि होते हैं। यह किसी के लिए भी हो सकता हैं जैसे- माता -पिता, भाई-बहन, शिक्षकों का अपने विद्यार्थियों या किसी जानवर के प्रति हो सकता है सच्चा प्रेम वह है जो सभी हालातों में आपके साथ हो, हर सुख या दुख में आपके साथ खड़ा हो इसके लिए सबसे जरूरी है कि इसमें सच्चाई हो

सबसे जरूरी है कि वो. आपकी इज्ज़त करे क्योंकि जहाँ सम्मान नहीं वहाँ कभी प्रेम नहीं हो सकता और जहाँ सम्मान हो वहाँ सच्चा प्रेम जरूर होता हैं।

शिक्षा में भी प्रेम का महत्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि प्रेम के आधार पर ही एक शिक्षक और विद्यार्थी के बीच रिश्ता होता हैं। प्रेम के आधार पर ही उनमें सच्चाई, और विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करता हैं और उनके अच्छे गुणों को अपने जीवन में अपनाता हैं।
Kusum Dangi
The Fabindia School, Bali

Sunday, May 17, 2020

साहसी व्यक्ति का धैर्य: कृष्ण गोपाल


जो किसी से डरे वह साहसी है, ये साहस की परिभाषा नहीं है। हर व्यक्ति के भीतर भी डर रूपी चिनगारी दिखाई पड़ती है  किन्तु जो डर को जीत ले वही साहसी है।  कई बार काम करने से पहले हम कतराते हैं।  एक प्रश्न मस्तिष्क में कौंध ही जाता है -'मुझे सफलता नहीं मिली तो, कहीं मैं हार तो नहीं जाऊँगा ?' इस डर को जीतना ही साहस है।  कभी यह स्मरण नहीं रहता कि यदि हार गए तो एक नया अनुभव मिलेगा।  जीत गए तो प्रयास सफल होगा ही।

 सच्चा साहसी वही है जो अपनी सफलता का धैर्य से प्रतीक्षा करे।  विद्यार्थी के लिए ये दोनों मूल्य आवश्यक है।एक नन्हा बालक खूब अभ्यास करता है, तब कहीं जाकर लिखने के लिए तैयार होता है।  ऐसे नन्हे बालकों के शिक्षक भी धैर्य की प्रतिमा होते हैं। एक खिलाड़ी लगातार अभ्यास करता है, तब कहीं जाकर उसे प्रदर्शन करने का अवसर मिलता है।  ठीक ऐसे ही एक गायक नियमित साधना करता है। ये सब धैर्य से ही संभव हो सकता है। 

दशरथ मांझी ने पहाड़ तोड़ने का साहस दिखाया, धैर्य भी रखा।  कई लोग उसके काम पर हँसे भी, समय भी बहुत लगा किन्तु उसने यह प्रण  छोड़ा।  जो ठाना वह करके दिखाया।  मुश्किलें भी आयी होगी पर पीछे मुड़कर नहीं देखा।  इसलिए आज वह साहस और धैर्य का पर्याय बन गया।  हम अपनी गलतियों को स्वीकार करने में घबराते हैं। 

यदि गलतियों को स्वीकारा जाए तो साहसी व्यक्ति कहलाएँगे  बच्चे भी कतराते हैं, उनका मार्गदर्शन करना चाहिए।  अपनी गलतियों को स्वीकार करना और उससे प्रेरणा लेना कि भविष्य में इस गलती को दोहराया नहीं जाएगा। साहस और धैर्य दोनों ऐसे मूल्य है, जिसको अपनाकर व्यक्ति सफलता की ओर अग्रसर होगा ही। विद्यार्थियों को आने वाले समय में कई सफलताएँ अर्जित करना है। अतः इन मूल्यों की विशेष आवश्यकता जान पड़ती है। विद्यार्थियों को राह दिखाने की जिम्मेदारी शिक्षकों और अभिभावकों की है।  अतः यह भी आवश्यक हो जाता है कि सर्वप्रथम ये मूल्य शिक्षकों और अभिभावकों में विकसित हो। 
Krishan Gopal
The Fabindia School

Wednesday, April 29, 2020

सहनशीलता के साथ ख़ुशी: कृष्ण गोपाल

ख़ुशी को शब्दों में वर्णित करना कठिन है, इसे महसूस किया जा सकता है। अच्छा जीवन जीने के लिए ख़ुशी होना बहुत जरुरी है।  हर छोटी-छोटी बात में खुशियाँ ढूँढी जा सकती है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हमें हमारे मस्तिष्क को इस तरह प्रशिक्षित करें कि वह हर क्षेत्र में ख़ुशी का आभास करें। 

विभिन्न स्थितियों में अति-उत्साही या उदास होना, वर्तमान में रहना, पुरानी बातों पर विचार नहीं करना, ख़ुशी का जरा सा पल देने वालों के प्रति आभारी रहना, सकारात्मक सोच रखना और सकारात्मक सोच रखने वालों के संपर्क में रहना   इन बातों से खुशियाँ अर्जित की जा सकती है।  विद्यार्थियों  के लिए खुश रहना और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।  खुश रहने वाला व्यक्ति सीखने में अग्रणी होता है।  कक्षा का वातावरण भी खुशनुमा होने  से बच्चे मन लगाकर सीखते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि कक्षा का वातावरण ऐसा बनाया जाए कि बच्चे को उबाऊ लगे। 

बालकों की प्रवृत्ति चंचल होती है, इसलिए सहनशीलता की कमी मिलना संभव है।  वैसे देखा जाए तो शिक्षक और विद्यार्थी के कई किस्से मिलते है, जिसमें विद्यार्थी द्वारा सहनशीलता प्रदर्शित की गई हो। आरुणि की कथा हो या परशुराम शिष्य कर्ण की अनेक उदाहरण मिल जाते हैं। ये कथाएँ प्राचीन भी हैं, वर्तमान में सहनशीलता का अभाव पाया जाता है। यह अभाव लक्ष्य से भटकता है। फलस्वरूप असफलता हाथ लगती है। सहनशील बनकर हम अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो सकते हैं। सहनशीलता जिसमें नहीं होती है वह क्रोधी स्वभाव का हो जाता है।  यह क्रोध गलत निर्णय लेने के लिए प्रेरित करता है। अतः पतन होना लाज़मी है। असफलता मिलने पर भी सहनशील बने रहें, आगे जाकर सफलता भी मिलेगी। संकट और तनाव को हावी मत होने दीजिए। सहनशील व्यक्ति अपने लोगों में सम्मान पाता है। सहनशीलता से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।  अतः सभी को विशेषकर विद्यार्थियों को सहनशील बनना चाहिए।  उन्हें आगे कई सफलताएँ अर्जित करनी हैं।   
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali

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