Saturday, August 1, 2026

विश्वास, संवेदनशीलता और प्रोत्साहन: शिक्षक की सबसे बड़ी शक्ति - सनबीम ग्रामीण स्कूल

 बच्चों की सहायता करने का मेरा अनुभव

बच्चों की सहायता करना मेरे लिए केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष का माध्यम है। विद्यालय में अनेक ऐसे अवसर आए, जब कुछ विद्यार्थियों को पढ़ाई समझने में कठिनाई होती थी या वे किसी कारणवश निराश और आत्मविश्वासहीन महसूस करते थे। ऐसे समय में मैंने सदैव धैर्यपूर्वक उनकी बातें सुनीं, उनका उत्साहवर्धन किया और उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप मार्गदर्शन देने का प्रयास किया।

इसी संदर्भ में मुझे अपनी सहकर्मी रोमा मैम से भी बहुत प्रेरणा मिली। उन्होंने प्रत्येक बच्चे को स्नेह, धैर्य और अपनत्व के साथ संभाला। वे केवल पढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि बच्चों की भावनाओं को समझते हुए उनमें आत्मविश्वास भी जगाया। यही कारण था कि सभी बच्चे उनसे बहुत प्रेम करते थे, उनका सम्मान करते थे और उनके साथ सहज जुड़ाव महसूस करते थे। उन्हें देखकर मुझे यह समझने का अवसर मिला कि बच्चों का विश्वास और स्नेह केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम, संवेदनशीलता और सहयोग से जीता जाता है।

इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि बच्चों को केवल शिक्षा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें विश्वास, प्रेरणा, स्नेह और सकारात्मक वातावरण प्रदान करना भी उतना ही आवश्यक है। प्रत्येक बच्चे में कोई न कोई विशेष प्रतिभा होती है; आवश्यकता केवल उसे पहचानने, सही दिशा देने और समय-समय पर प्रोत्साहित करने की होती है।

मेरा मानना है कि एक शिक्षक की वास्तविक सफलता केवल विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और मुस्कान में दिखाई देती है। जब कोई बच्चा स्वयं पर विश्वास करना सीख जाता है, तभी एक शिक्षक का प्रयास वास्तव में सार्थक सिद्ध होता है।

- स्वाति त्रिपाठी

एक मुस्कान, एक टिफिन और एक नया जीवन
आज के सत्र से मुझे यह सीख मिली कि एक शिक्षक का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। उसका व्यवहार, उसकी मुस्कान, उसकी विनम्रता और उसकी संवेदनशीलता किसी बच्चे का पूरा जीवन बदल सकती है।
कहानी में रोमा ने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, ईमानदारी और पेशेवर व्यवहार का परिचय दिया। बाद में जब वह स्वयं शिक्षिका बनी, तब उसे यह एहसास हुआ कि बच्चे शिक्षक के आचरण से ही जीवन के सबसे महत्वपूर्ण संस्कार सीखते हैं।
इस कहानी ने मुझे अपने जीवन की एक सच्ची घटना याद दिला दी।

मेरा अनुभव- मैं सनबीम ग्रामीण स्कूल में कक्षा 4 की कक्षाध्यापिका हूँ। अप्रैल में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हुई। मैंने देखा कि मेरी कक्षा की एक छात्रा लगातार विद्यालय नहीं आ रही थी।
जब मैंने उसके अभिभावक से बात की, तो पता चला कि उसके परिवार की परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हैं। उसकी माँ घर छोड़कर चली गई थीं। पिता मानसिक रूप से बहुत परेशान थे और बच्ची भी भीतर से पूरी तरह टूट चुकी थी। इसी कारण उसका विद्यालय आना बंद हो गया था।
मैंने उसके पिता से विनम्रतापूर्वक कहा,
"सर, कृपया बच्ची को विद्यालय भेजिए। यहाँ अपने साथियों के बीच रहकर उसका मन हल्का होगा। धीरे-धीरे वह सामान्य होने लगेगी और पढ़ाई से उसका आत्मविश्वास भी लौट आएगा।"
उन्होंने मेरी बात मानी और बच्ची को विद्यालय भेजना शुरू कर दिया। लेकिन वह प्रतिदिन विद्यालय आकर रोने लगती थी।
मैं उसके पास बैठती और प्यार से कहती,
"बेटा, मम्मी अभी तुम्हारे साथ नहीं हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तुम अपने सपनों को छोड़ दो। जीवन में आगे बढ़ना है तो पढ़ाई बहुत ज़रूरी है। तुम रोज़ स्कूल आओ। यहाँ अपनी बातें साझा करोगी तो तुम्हारा मन भी हल्का होगा और धीरे-धीरे सब अच्छा लगने लगेगा।"
फिर भी अगले दिन वही स्थिति होती। वह उदास रहती और पढ़ाई में उसका बिल्कुल मन नहीं लगता था।
तब मुझे लगा कि केवल समझाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसे अपनापन और सहयोग का अनुभव कराना भी आवश्यक है।
पहला कदम – दोस्ती का सहारा
मैंने उसकी सहेलियों से कहा,
"बेटा, इसे कभी अकेला मत छोड़ना। इसके साथ बैठो, खेलो और अपना टिफिन भी इसके साथ साझा किया करो।"
घर में केवल उसके पिताजी और चाचा थे। भोजन बनाने वाला कोई नहीं था, इसलिए कई बार वह बिना टिफिन के विद्यालय आती थी।

दूसरा कदम – छोटी-सी जिम्मेदारी
मैं प्रतिदिन उससे पूछती,
"बेटा, आज सब ठीक है?"
वह मुस्कुराकर कहती,
"हाँ मैम, चाचा ने जल्दी खाना बना दिया।"
मैं उसे प्रोत्साहित करते हुए कहती,
"बहुत अच्छा। तुम भी चाचा की थोड़ी-सी मदद किया करो और समय पर विद्यालय आ जाया करो।"

परिणाम- धीरे-धीरे उस बच्ची में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगा। अब वह नियमित रूप से विद्यालय आती है, मुस्कुराती है, पढ़ाई में रुचि लेती है और अपने साथियों के साथ खुशी-खुशी समय बिताती है। यदि कभी वह टिफिन नहीं लाती, तो उसकी सहेलियाँ बिना कहे अपना भोजन उसके साथ साझा कर लेती हैं।

निष्कर्ष- इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि एक अच्छा शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देता, बल्कि अपने व्यवहार, संवेदनशीलता और प्रेम से बच्चों को जीवन जीने की दिशा भी देता है।
कभी-कभी एक मुस्कान, कुछ स्नेहभरे शब्द और एक साझा किया हुआ टिफिन किसी बच्चे के जीवन में नई आशा जगा सकते हैं। एक शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह टूटे हुए मन को संभालकर उसे फिर से मुस्कुराना सिखा दे।
– ममता देवी
शिक्षक द्वारा विद्यार्थी की सहायता
आज की कक्षा से मैंने यह सीखा कि विद्यालय में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जब कोई विद्यार्थी पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक या शैक्षणिक समस्याओं का सामना कर रहा होता है। ऐसे समय में शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह एक मार्गदर्शक, प्रेरक और सहयोगी की भूमिका भी निभाता है।
एक दिन कक्षा में एक विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान पाठ को समझने में कठिनाई महसूस कर रहा था। वह प्रश्नों के उत्तर देने में झिझक रहा था और उसका आत्मविश्वास भी कम दिखाई दे रहा था। मैंने धैर्यपूर्वक उसकी समस्या को समझा, सरल भाषा और उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से विषय को स्पष्ट किया तथा उसे प्रोत्साहित किया कि वह बिना किसी डर या संकोच के अपनी शंकाएँ पूछे।

कुछ समय बाद विद्यार्थी ने विषय को अच्छी तरह समझ लिया और स्वयं उत्तर देने का प्रयास भी किया। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
इस अनुभव से मुझे यह महसूस हुआ कि प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति अलग होती है। यदि शिक्षक धैर्य, सहानुभूति और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उनका मार्गदर्शन करें, तो विद्यार्थी न केवल विषय को अच्छी तरह समझता है, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

मेरा विश्वास है कि एक शिक्षक का स्नेह, प्रोत्साहन और विश्वास किसी भी विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही एक सच्चे शिक्षक की पहचान है।
- चंचल
एक शिक्षक का विश्वास, एक बच्चे का आत्मविश्वास
जैसा कि हम सभी जानते हैं, आज के सत्र से मैंने यह सीखा कि हर बच्चा अपने भीतर अनगिनत संभावनाएँ लेकर विद्यालय आता है। उसे केवल एक ऐसे शिक्षक की आवश्यकता होती है, जो उस पर विश्वास करे और सही समय पर उसका हाथ थाम ले। इसी संदर्भ में मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूँ।
मेरी कक्षा में एक विद्यार्थी था, जो बहुत शांत रहता था। वह किसी से बात नहीं करता था और पढ़ाई में भी उसका मन नहीं लगता था। मैंने उसे ध्यान से समझने का प्रयास किया। प्रतिदिन कुछ समय उसके साथ बैठकर बात की, उसकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की प्रशंसा की और उसे यह विश्वास दिलाया कि वह भी अन्य बच्चों की तरह सक्षम है।

धीरे-धीरे उसके व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आने लगा। उसने कक्षा में उत्तर देना शुरू किया, विभिन्न गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ किया और उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की मुस्कान स्पष्ट दिखाई देने लगी।
उस दिन मुझे यह महसूस हुआ कि एक शिक्षक का प्रेम, धैर्य और विश्वास किसी बच्चे के जीवन में नई उम्मीद जगा सकता है। मैंने सीखा कि बच्चों को केवल पढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समझना, उनका मनोबल बढ़ाना और हर कदम पर उनका उत्साहवर्धन करना भी एक शिक्षक का महत्वपूर्ण दायित्व है।
उस बच्चे की मुस्कान और बढ़ता हुआ आत्मविश्वास मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था। इस अनुभव ने मुझे और अधिक संवेदनशील, धैर्यवान तथा समर्पित शिक्षक बनने की प्रेरणा दी।
- सुनीता त्रिपाठी
शिक्षक का आचरण ही सबसे बड़ी शिक्षा
आज की GSA कक्षा से मुझे यह सीख मिली कि बच्चे शिक्षक को केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं मानते, बल्कि वे उन्हें अपना आदर्श समझते हैं। बच्चों को लगता है कि उनके शिक्षक हर विषय का ज्ञान रखते हैं—चाहे वह गणित हो, विज्ञान, कहानी, गीत या चित्रकला। वे अपने शिक्षक के व्यवहार और आचरण से भी बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए एक शिक्षक का प्रत्येक कार्य और व्यवहार बच्चों के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है।

आज की कक्षा में यह भी बताया गया कि बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कठिन या संवेदनशील परिस्थितियों को उनकी आयु और समझ के अनुरूप ही प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि उनके मन पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

इसी संदर्भ में मुझे अपना एक अनुभव याद आया। कक्षा 8 का एक विद्यार्थी एक दिन मेरे घर आया और उसने कहा, "सर, मुझे गणित समझ में नहीं आती। मैं गणित कैसे सीखूँ?"

मैंने उसे हर रविवार एक घंटे के लिए अपने घर आने के लिए कहा। उस दौरान मैंने उसे प्रत्येक पाठ के सरल-सरल प्रश्नों से अभ्यास कराया और धैर्यपूर्वक उसकी शंकाओं का समाधान किया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और गणित उसके लिए आसान लगने लगी।

जब परीक्षा का परिणाम आया, तो उसने गणित में अच्छे अंक प्राप्त किए। उसकी सफलता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। इस अनुभव ने मुझे यह विश्वास दिलाया कि यदि शिक्षक धैर्य, समय और सही मार्गदर्शन दें, तो कोई भी विद्यार्थी अपनी कठिनाइयों पर विजय पा सकता है।
अशोक कुमार मौर्य
कठिन परिस्थितियों में छात्र-शिक्षक संबंध
आज के सत्र से मैंने यह सीखा कि विद्यालय केवल पढ़ाई का स्थान नहीं है, बल्कि वह ऐसा संसार है जहाँ बच्चों के सपने, उम्मीदें और भावनाएँ आकार लेती हैं। कई बार बच्चे किसी विशेष अवसर का लंबे समय तक इंतज़ार करते हैं, लेकिन किसी कारणवश वह अवसर उन्हें नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में उनके मन में निराशा, उदासी और अनेक प्रश्न जन्म लेने लगते हैं। ऐसे समय में एक शिक्षक का सहयोग और संवेदनशीलता उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

इसी संदर्भ में मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूँ। मेरी कक्षा में एक विद्यार्थी था, जो पढ़ाई में बहुत अच्छा था। किन्तु पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उसका मन पढ़ाई से हटने लगा। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास भी कम हो गया और वह कक्षा में प्रश्नों के उत्तर देने से घबराने लगा। कई बार वह स्वयं को असमर्थ पाकर रो भी पड़ता था।

मैंने उसके व्यवहार में आए इस परिवर्तन का कारण जानने के लिए उससे धैर्यपूर्वक बात की। उसकी समस्या को समझने के बाद मैंने उसे समझाया, उसका उत्साहवर्धन किया तथा उसके माता-पिता से भी इस विषय में चर्चा की। धीरे-धीरे उसकी स्थिति में सुधार होने लगा और उसका आत्मविश्वास वापस लौटने लगा।
कुछ समय बाद परिस्थितिवश उसे विद्यालय बदलना पड़ा। आज भी जब उसे किसी प्रकार की समस्या होती है, तो वह मुझे फोन करके अपनी बात साझा करता है। यह मेरे लिए अत्यंत संतोष और खुशी की बात है। इससे मुझे यह विश्वास हुआ कि एक शिक्षक का स्नेह, विश्वास और मार्गदर्शन बच्चों के जीवन पर गहरी छाप छोड़ता है।
इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि कठिन परिस्थितियों में शिक्षक को केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि बच्चों की भावनाओं को समझने वाला एक संवेदनशील मार्गदर्शक बनना चाहिए। जब शिक्षक बच्चों की बात धैर्यपूर्वक सुनता है, उनकी भावनाओं का सम्मान करता है और उन्हें विश्वास दिलाता है कि वह उनके साथ है, तब उनकी निराशा आशा में बदलने लगती है।यही विश्वास छात्र और शिक्षक के संबंध को इतना गहरा बना देता है कि वह केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवनभर प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बन जाता है।
-गुलाबी
एक मुस्कान, एक सराहना और एक नया जीवन
आज के सत्र ने इस बात को और भी स्पष्ट किया कि एक शिक्षक का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। उसका व्यवहार, संवेदनशीलता और प्रोत्साहन किसी बच्चे के पूरे जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
आज की कहानी सुनकर मुझे अपने शिक्षण जीवन का एक अनुभव याद आ गया। जब मैंने सनबीम ग्रामीण स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यभार संभाला, तब कक्षा 3 में एक ऐसा छात्र था, जो उम्र और शारीरिक बनावट में अपने सहपाठियों से बड़ा था। इसी कारण वह अपने साथ पढ़ने वाले बच्चों के साथ सहज रूप से घुल-मिल नहीं पाता था। धीरे-धीरे उसकी शरारतें बढ़ने लगीं। वह कक्षा में बार-बार बातचीत करता, अन्य बच्चों को परेशान करता और पढ़ाई का वातावरण भी प्रभावित करता था।
मैंने कई बार उसे समझाने का प्रयास किया, लेकिन अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया। तब मैंने एक अलग तरीका अपनाने का निर्णय लिया। मैंने उसे अपनी कक्षा का मॉनिटर बना दिया। साथ ही, उसकी छोटी-छोटी अच्छी आदतों और प्रयासों की सराहना करने लगा, उसे मंच पर बोलने के अवसर दिए और नियमित रूप से उसकी जिम्मेदारियों का उत्साहवर्धन करता रहा।
धीरे-धीरे उसमें सकारात्मक परिवर्तन आने लगा। उसे यह महसूस हुआ कि उस पर विश्वास किया गया है और वह एक जिम्मेदार विद्यार्थी है। परिणामस्वरूप उसकी शरारतें लगभग समाप्त हो गईं, उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने पढ़ाई में भी रुचि लेनी शुरू कर दी।
आज वह छात्र कक्षा 6 में पहुँच चुका है। अब वह पहले की तुलना में कहीं अधिक अनुशासित, जिम्मेदार और आत्मविश्वासी है। यह परिवर्तन देखकर मुझे अपार संतोष मिलता है।
इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि हर बच्चे को केवल डाँटकर नहीं बदला जा सकता। विश्वास, सराहना, प्रोत्साहन और जिम्मेदारी देकर भी उसके व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। कभी-कभी एक मुस्कान, एक सच्ची प्रशंसा और एक छोटा-सा अवसर किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदलने के लिए पर्याप्त होते हैं।
- रवि प्रकाश

अध्याय – मुस्कान और उदासी
इस अध्याय से हमें यह सीख मिली कि एक शिक्षक का मुस्कुराता हुआ चेहरा, सकारात्मक व्यवहार और प्रोत्साहन बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाते हैं। हमें सदैव बच्चों के साथ धैर्य, स्नेह और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए, ताकि वे बिना किसी डर या संकोच के अपने विचार व्यक्त कर सकें।
मुझे भी अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आता है। जब आर.पी. सर के विद्यालय छोड़ने के बाद मुझे उनकी कक्षा और विषय पढ़ाने की जिम्मेदारी मिली, तब मैंने सबसे पहले बच्चों के साथ सकारात्मक संबंध बनाने का प्रयास किया। मैंने उनकी शंकाओं और भावनाओं को समझा तथा उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी पढ़ाई बिना किसी रुकावट के नियमित रूप से चलती रहेगी।
अक्सर बच्चे किसी एक शिक्षक की शिक्षण शैली, व्यवहार और पढ़ाने के तरीके के अभ्यस्त हो जाते हैं। ऐसे में नए शिक्षक के साथ सहज होने में उन्हें कुछ समय लगता है। प्रारंभ में उन्हें यह भी लगता है कि पहले वाले शिक्षक अधिक अच्छा पढ़ाते थे। इसलिए मैंने धैर्य और आत्मीयता के साथ बच्चों का विश्वास जीतने का प्रयास किया।
समय के साथ बच्चे मेरी कक्षा में सहज हो गए। उनका मुझ पर विश्वास बढ़ा और हमारे बीच आत्मीय संबंध स्थापित हो गए। आज बच्चे बिना किसी झिझक के अपनी शंकाएँ, विचार और भावनाएँ मेरे साथ साझा करते हैं। इस अनुभव ने मुझे यह सिखाया कि एक शिक्षक का स्नेह, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार ही बच्चों के मन तक पहुँचने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
- मनोज कुमार

मुस्कान की शक्ति
इस विषय पर हुई चर्चा से मुझे यह अनुभव हुआ कि एक शिक्षक की सच्ची और सहज मुस्कान केवल चेहरे की अभिव्यक्ति नहीं होती, बल्कि विद्यार्थियों के साथ विश्वास, अपनापन और सकारात्मक संबंध स्थापित करने का एक प्रभावी माध्यम भी होती है। जब शिक्षक मुस्कुराकर बच्चों का स्वागत करते हैं, तो वे स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और प्रोत्साहित महसूस करते हैं। इससे वे बिना किसी झिझक के अपनी बात साझा करते हैं और सीखने की प्रक्रिया में अधिक सक्रियता से भाग लेते हैं।
इस सत्र ने मेरी यह समझ और अधिक मजबूत की कि एक छोटी-सी मुस्कान भी कक्षा के वातावरण को आनंदमय, प्रेरणादायक और सीखने के अनुकूल बना सकती है। एक सकारात्मक शिक्षक न केवल ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि अपने व्यवहार और मुस्कान से विद्यार्थियों के मन में आत्मविश्वास, उत्साह और सीखने की रुचि भी विकसित करता है।
भविष्य में मैं अपने शिक्षण व्यवहार में और अधिक सकारात्मकता, संवेदनशीलता तथा मुस्कान को एक महत्वपूर्ण शिक्षण कौशल के रूप में अपनाकर अपने शिक्षण कार्य को और अधिक प्रभावी तथा प्रेरणादायक बनाने का प्रयास करूँगी।
- सरोज पटेल
अध्याय – मुस्कान और उदासी
इस अध्याय से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि एक शिक्षक का सकारात्मक व्यक्तित्व बच्चों के व्यक्तित्व को भी सकारात्मक दिशा प्रदान करता है। कक्षा का वातावरण सदैव छात्र-केंद्रित, प्रेरणादायक और आनंददायक होना चाहिए, ताकि प्रत्येक बच्चा स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सके।
हमें हमेशा बच्चों के साथ धैर्य, स्नेह और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए, ताकि वे बिना किसी डर या संकोच के अपने विचार व्यक्त कर सकें। बच्चों की गलतियों पर उन्हें डाँटने के बजाय धैर्यपूर्वक समझाना चाहिए तथा खेल-खेल में सीखने के अवसर प्रदान करने चाहिए। इससे प्रत्येक बच्चा आत्मविश्वास के साथ सीखता है, प्रश्न पूछने का साहस विकसित करता है और अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर प्राप्त करता है।
एक शिक्षक की मुस्कान, सकारात्मक सोच और संवेदनशील व्यवहार ही बच्चों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बनते हैं।
- लवकुश सिंह यादव

No comments:

Post a Comment

Blog Archive