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Saturday, August 22, 2026

संवेदनशील शिक्षक और हर बच्चे की छिपी संभावनाएँ - सनबीम ग्रामीण स्कूल

“एक शिक्षक के अंदर विभिन्न प्रकार के कौशल होना आवश्यक है।”

एक अच्छे शिक्षक के अंदर केवल विषय का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके अंदर विभिन्न प्रकार के कौशल भी होने चाहिए। शिक्षक को प्रभावी ढंग से पढ़ाने के साथ-साथ बच्चों की भावनाओं और उनकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को समझने की क्षमता भी होनी चाहिए। एक शिक्षक में संचार कौशल, नेतृत्व कौशल, रचनात्मकता, धैर्य, समय-प्रबंधन, तकनीकी ज्ञान और समस्या-समाधान की क्षमता होना बहुत आवश्यक है। हर बच्चा अलग होता है और उसकी सीखने की गति तथा रुचि भी अलग होती है। इसलिए शिक्षक को अपनी शिक्षण विधि में आवश्यकता के अनुसार बदलाव करने का कौशल होना चाहिए। कभी शिक्षक को मार्गदर्शक, कभी मित्र और कभी प्रेरणादाता की भूमिका निभानी पड़ती है।

इससे मुझे यह सीख मिली कि एक शिक्षक का कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहयोग देना भी है। एक कुशल शिक्षक अपने ज्ञान, व्यवहार और विभिन्न कौशलों के माध्यम से बच्चों के अंदर आत्मविश्वास, जिज्ञासा और सीखने की इच्छा पैदा करता है। इसलिए एक शिक्षक को हमेशा नए कौशल सीखते रहना चाहिए और बच्चों को आगे बढ़ने में सहयोग करते रहना चाहिए।

चंचल

आज की क्लास से यह सीख मिलती है कि एक टीचर के बारे में तुरंत गलत नहीं सोचना चाहिए। पहले कुछ समय उस टीचर के साथ व्यतीत करें, हो सकता है कि जिस टीचर को आप गलत समझ रहे हैं, वह सभी टीचर्स से बेस्ट निकले। और आज की क्लास से यह भी शिक्षा मिलती है कि किसी व्यक्ति को हमेशा गलत नजरों से नहीं देखना चाहिए, किसी व्यक्ति को हमेशा पत्थर दिल का नहीं समझना चाहिए। कुछ व्यक्ति देखने में काफी निर्दयी एवं झगड़ालू दिखते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता कि वह व्यक्ति किसी बच्चे से प्रेम न करें या बच्चों के साथ कठोरता से पेश आएँ, क्योंकि हर व्यक्ति के अंदर प्रेम एवं ममता रहती है।

अशोक कुमार मौर्य 

Wanted Back-Bencher and Last-Ranker Teacher

इस पूरी पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे सबसे ज्यादा यह महसूस हुआ कि शिक्षक बनना आसान है, लेकिन बच्चों के दिल में शिक्षक के रूप में जगह बनाना बहुत कठिन है। कोई शिक्षक रोज कक्षा में जाकर पाठ पढ़ा सकता है, होमवर्क दे सकता है और परीक्षा की तैयारी कर सकता है, लेकिन हर शिक्षक ऐसा नहीं होता जिसकी विदाई पर बच्चे अपनी आँखों में आँसू लेकर उसे रोकना चाहें। रोमा माथुर की कहानी ने मुझे भीतर तक छू लिया। उनके पास आगे बढ़ने का अवसर था, उनके सामने एक बेहतर करियर, बड़ा पद और नई पहचान थी, फिर भी उनका मन अपने बच्चों से अलग होने के लिए तैयार नहीं था। इससे मुझे महसूस हुआ कि कभी-कभी जिंदगी में बड़ा निर्णय यह नहीं होता कि हमारे लिए क्या बेहतर है, बल्कि यह होता है कि हमारे होने से किसका जीवन बेहतर हो रहा है।

हर बच्चा अपनी जगह खास होता है, बस उसे समझने वाली नजर चाहिए। हम अक्सर बच्चों को उनके marks, rank और behaviour के आधार पर पहचान लेते हैं—कोई topper है, कोई average, कोई back-bencher और कोई last-ranker। लेकिन पुस्तक ने मुझे सिखाया कि ये labels बच्चे की पूरी पहचान नहीं हैं।

रोमा माथुर का बच्चों के साथ व्यवहार मुझे बहुत प्रभावित करता है। वह केवल यह नहीं देखतीं कि बच्चा क्या कर रहा है, बल्कि यह समझने की कोशिश करती हैं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। मुझे लगता है कि एक शिक्षक के लिए यही सबसे जरूरी गुण है—पहले बच्चे को समझना और फिर उसे सही दिशा देना।

पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों से मुझे यह भी समझ आया कि classroom में केवल discipline काफी नहीं है। प्यार, patience, humour, encouragement और विश्वास भी उतने ही जरूरी हैं। अगर कोई बच्चा पढ़ाई से bored है या बार-बार गलती करता है, तो उसे तुरंत कमजोर या naughty कहने के बजाय हमें उसकी परेशानी और जरूरत को समझना चाहिए।

मुझे विशेष रूप से back-bencher और last-ranker बच्चों को लेकर सोचने का नया नजरिया मिला। पीछे बैठने वाला बच्चा जरूरी नहीं कि पीछे रहने वाला ही हो। हो सकता है उसे केवल एक ऐसा शिक्षक चाहिए, जो उस पर विश्वास करे और उसे मौका दे।

रोमा माथुर का अपने विद्यार्थियों के साथ भावनात्मक रिश्ता और अंत में बच्चों का उन्हें छोड़ना न चाहना मेरे लिए सबसे भावुक हिस्सा रहा। इससे मुझे लगा कि शिक्षक की असली सफलता उसके पद या achievement में नहीं, बल्कि बच्चों के दिल में बनाई हुई जगह में होती है।

इस पुस्तक के बाद मैं अपने शिक्षक-रूप को लेकर एक बात जरूर याद रखना चाहूँगी—

मैं किसी बच्चे को उसके आज के marks से नहीं, उसके कल की संभावना से देखूँ।

मैं चाहती हूँ कि मेरी classroom में topper को प्रोत्साहन मिले, average बच्चे को confidence मिले, back-bencher को अवसर मिले और last-ranker को यह एहसास हो कि “तुम भी कर सकते हो।”

मेरे लिए इस पूरी पुस्तक की सबसे सुंदर सीख यही है—

“एक अच्छा शिक्षक पाठ पढ़ाता है, लेकिन एक महान शिक्षक बच्चे को खुद पर विश्वास करना सिखाता है।”

मंजुला सागर

इस अध्याय से मुझे यह सीख मिली कि एक शिक्षक का विद्यार्थियों के साथ संबंध केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें विश्वास, अपनापन और जिम्मेदारी भी शामिल होती है। रोमा का अपने विद्यार्थियों के भविष्य और सुरक्षा को प्राथमिकता देना एक आदर्श शिक्षक की भावना को दर्शाता है। एक शिक्षक के रूप में मुझे भी यह समझना चाहिए कि विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, भावनाओं और कठिनाइयों को समझकर उनका मार्गदर्शन करना मेरी जिम्मेदारी है।

इस अध्याय ने मुझे यह भी प्रेरणा दी कि परिस्थितियाँ कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, शिक्षक को विद्यार्थियों के हित में धैर्यपूर्वक और संवेदनशील होकर निर्णय लेना चाहिए। विद्यार्थियों को केवल विषय का ज्ञान देना ही पर्याप्त नहीं है; उनमें आत्मविश्वास, सुरक्षा की भावना और आगे बढ़ने की प्रेरणा विकसित करना भी शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

मनोज कुमार

कभी-कभी कक्षा की आखिरी बेंच पर बैठा बच्चा केवल एक विद्यार्थी नहीं होता, बल्कि वह एक अनकही कहानी, छिपी हुई प्रतिभा और अनदेखे सपनों को अपने भीतर समेटे होता है। “Back-Bencher, Last-Ranker Teacher” से मुझे यही सीख मिली कि किसी बच्चे की वर्तमान स्थिति उसके भविष्य का अंतिम सत्य नहीं होती।

एक शिक्षक के रूप में हम अक्सर अंक, अनुशासन और प्रदर्शन के आधार पर बच्चों को पहचानने लगते हैं। लेकिन एक सच्चा शिक्षक बच्चे के अंकों के पीछे छिपे मन को पढ़ता है। जो बच्चा बार-बार असफल हो रहा है, हो सकता है उसे डाँट की नहीं, बल्कि विश्वास की आवश्यकता हो। जो बच्चा सबसे पीछे बैठता है, संभव है कि उसके भीतर सबसे आगे बढ़ने की क्षमता छिपी हो।

इस पुस्तक ने मेरे भीतर एक प्रश्न जगाया—“क्या मैं अपने विद्यार्थियों को वास्तव में समझती हूँ, या केवल उनके परिणामों को देखती हूँ?” एक शिक्षक बनकर मैंने यह महसूस किया कि हमारा कार्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि किसी बच्चे के जीवन में वह व्यक्ति बनना है, जो उसके भीतर कह सके—“तुम कर सकते हो, मुझे तुम पर विश्वास है।”

ऐसा मैं स्वयं भी अपनी कक्षा में कमजोर एवं कम नंबर लाने वाले बच्चे एवं पीछे बैठने वाले बच्चे की कक्षा में तारीफ करके उनके बदलाव को महसूस करती हूँ, क्योंकि कभी-कभी एक छोटी-सी प्रशंसा, एक धैर्यपूर्ण बातचीत और एक अवसर किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदल सकती है। इसलिए अब मेरे लिए Last-Ranker कोई अंतिम स्थान नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।

एक शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता तब नहीं होती जब पूरी कक्षा प्रथम आए, बल्कि तब होती है जब वह उस बच्चे को भी आगे बढ़ा दे, जिसे सबने पीछे छोड़ दिया था। एक शिक्षक के रूप में अपनी कक्षा के सबसे पीछे एवं सबसे कम नंबर लाने वाले विद्यार्थियों को आगे बढ़ाने के लिए हमने यह जाना कि—

“हर बच्चा संभावनाओं का अनमोल खजाना है, जिसमें असीमित प्रतिभाएँ और क्षमताएँ छिपी हैं। जैसे कोई कुम्हार मिट्टी को सुंदर आकार में ढालता है, वैसे ही एक शिक्षक की भूमिका होती है कि वह इन अंतर्निहित संभावनाओं को सही दिशा में विकसित करे। इसके लिए शिक्षक को धैर्य, समझ और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। वह हर बच्चे को विद्यालय में की जाने वाली छोटी-बड़ी गतिविधियों में हिस्सा लेने का एक विशेष, अनोखा अवसर प्रदान करता है, जिससे उसकी छिपी हुई क्षमताएँ प्रकट हो सकें। इससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन के बीज बोए जाते हैं, जिनके फल समाज को प्रगति और समृद्धि की ओर ले जाते हैं।”

गुलाबी

हर बच्चे में छिपी प्रतिभा को पहचानने की सीख - सनबीम ग्रामीण स्कूल

आज पुस्तक पढ़कर समाप्त करते हुए मन में यह विचार आया कि हर बच्चा अपनी अलग क्षमता और पहचान लेकर आता है। इस पुस्तक के सभी पाठकों ने हमें सिखाया कि शिक्षक का काम केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों को समझना, उनकी भावनाओं का सम्मान करना और उनकी छिपी प्रतिभा को पहचानना भी है।

इस पुस्तक से हमने सीखा कि कमजोरी या पीछे बैठने वाला बच्चा असफल नहीं होता, उसे केवल सही दिशा, विश्वास और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। एक अच्छे शिक्षक का सच्चा प्रयास वही है, जो हर बच्चे को यह विश्वास दिलाए—“तुम कर सकते हो।”

यह पुस्तक हमारे लिए केवल पढ़ने की सामग्री नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और बेहतर शिक्षक बनने की प्रेरणा बनकर हमेशा याद रहेगी।

सुनीता त्रिपाठी

Wanted Back-Bencher and Last-Ranker Teacher में रोमा माथुर (Roma Mathur) की कहानी है। यह कहानी पारंपरिक शिक्षा प्रणाली, अनुशासन और एक अनोखी शिक्षिका के सफर को दर्शाती है कि—

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्रियाँ बाँटना या परीक्षा में अंक दिलाना नहीं है। पारंपरिक शिक्षा प्रणाली ने लंबे समय से 'रटंत विद्या' को बढ़ावा दिया है, जहाँ छात्र केवल परीक्षा पास करने के लिए तथ्यों को याद करते हैं और बाद में उन्हें भूल जाते हैं। इसके विपरीत, वास्तविक और सार्थक शिक्षा वह है, जो बच्चों को रटाने के बजाय उनकी समस्याओं को समझती है, उनमें सहानुभूति जगाती है और सीखने के प्रति एक स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा करती है।

जब हम बच्चों को रटने के लिए मजबूर करते हैं, तो हम उनके भीतर के अनूठे रचनात्मक विचारक को मार देते हैं। हर बच्चा अलग गति से और अलग तरीके से सीखता है। एक बेहतरीन शिक्षक या शिक्षा प्रणाली वह है, जो छात्र के मानसिक और भावनात्मक स्तर पर जाकर उसकी व्यक्तिगत समस्याओं को पहचानती है। जब बच्चे को यह महसूस होता है कि उसे समझा जा रहा है, तो उसका डर दूर हो जाता है और वह खुलकर अपने विचार सामने रखता है।

इसके अलावा, शिक्षा में 'सहानुभूति' (Empathy) का होना सबसे महत्वपूर्ण है। एक ऐसा समाज जहाँ लोग केवल तार्किक रूप से बुद्धिमान हों, लेकिन दूसरों के दर्द के प्रति संवेदनशील न हों, कभी भी खुशहाल नहीं रह सकता। शिक्षा के माध्यम से बच्चों में दूसरों के प्रति करुणा और दया की भावना जगाना बेहद जरूरी है।

अंततः, जब रटने का दबाव हट जाता है और सहानुभूति का माहौल मिलता है, तो बच्चों के अंदर 'सीखने की जिज्ञासा' (Curiosity) पैदा होती है। यह जिज्ञासा उन्हें केवल स्कूल की किताबों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें जीवनभर एक जिज्ञासु शिक्षार्थी (Lifelong Learner) बनाती है। वे 'क्या' और 'कैसे' के साथ-साथ 'क्यों' पूछना शुरू करते हैं। यही वह बुनियादी बदलाव है, जिसकी आज हमारी दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है।

मुख्य निष्कर्ष (Conclusion)

यह कहानी हमें सिखाती है कि 'बैक-बेंचर्स' या कम अंक लाने वाले छात्र कमजोर नहीं होते, बल्कि उनके सोचने का तरीका अलग होता है। एक बेहतरीन शिक्षक वह नहीं है, जो केवल टॉपर्स को और बेहतर बनाए, बल्कि वह है, जो आखिरी बेंच पर बैठे डरे हुए बच्चे के भीतर भी आत्मविश्वास जगा दे।

लवकुश सिंह यादव

“Wanted Back Bencher and the Last Ranker Teacher” पुस्तक पर मेरी समीक्षा

यह पुस्तक शिक्षा के उस महत्वपूर्ण पहलू को सामने लाती है, जिसमें कक्षा के कमजोर, पीछे बैठने वाले या अंतिम स्थान पर रहने वाले बच्चों को समझने और उन्हें आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देती है। पुस्तक यह संदेश देती है कि किसी बच्चे की क्षमता केवल उसके परीक्षा परिणाम या रैंक से निर्धारित नहीं की जा सकती।

प्रत्येक बच्चा अलग-अलग क्षमता, रुचि और सीखने की गति लेकर कक्षा में आता है। इसलिए शिक्षक का कार्य केवल अच्छे प्रदर्शन करने वाले बच्चों पर ध्यान देना नहीं, बल्कि पीछे रह जाने वाले बच्चों को भी अवसर, प्रोत्साहन और सहयोग देना है।

यह पुस्तक किशोरावस्था के बच्चों के व्यवहार, उनकी भावनाओं और उनकी सीखने की आवश्यकताओं को समझने में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करती है।

किशोरावस्था में बच्चों के व्यवहार में कई प्रकार के परिवर्तन आते हैं। ऐसे समय में उन्हें डाँटना या उनकी गलतियों पर केवल ध्यान देने की बजाय उनकी भावनाओं को समझना और सही दिशा देना आवश्यक है।

इस पुस्तक से यह सीख मिलती है कि एक शिक्षक को प्रत्येक बच्चे के साथ धैर्य, संवेदनशीलता और अपनत्व के साथ व्यवहार करना चाहिए। विशेष रूप से कमजोर या पीछे रहने वाले बच्चों को अधिक सहयोग और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है।

यह पुस्तक निःस्वार्थ शिक्षण के महत्व पर भी प्रकाश डालती है। शिक्षक का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना या अच्छे परिणाम प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रत्येक बच्चे के व्यक्तित्व और प्रतिभा को पहचान कर, उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना होना चाहिए।

यह पुस्तक शिक्षक को बच्चों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करती है। यदि शिक्षक बच्चे की कठिनाई को समझकर, उसकी रुचि के अनुसार सीखने के अवसर देता है, तो वह बच्चा भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकता है।

एक शिक्षिका के रूप में इस पुस्तक ने मुझे प्रेरित किया कि मैं बच्चों के व्यवहार के पीछे छिपी उनकी भावनाओं और आवश्यकताओं को समझने का प्रयास करूँ तथा बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक बच्चे को सीखने और आगे बढ़ने का अवसर दूँ।

एक अच्छा शिक्षक वही है, जो बच्चों को केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि उन्हें समझता है, उनका आत्मविश्वास बढ़ाता है और निःस्वार्थ भाव से उनके उज्ज्वल भविष्य का मार्गदर्शन करता है।

सरोज पटेल

मेहनत, ईमानदारी और भरोसा
आज के सत्र में Wanted Back-Bencher and Last-Ranker Teacher पुस्तक के अंश को सुनकर मुझे बहुत प्रेरणा मिली। इस अंश से यह समझने का अवसर मिला कि एक शिक्षक का प्रभाव केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह विद्यार्थियों के जीवन और उनके भविष्य को भी प्रभावित करता है।

पुस्तक में लेखिका ने उन सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया है, जिन्होंने उनकी जीवन-यात्रा में उनका साथ दिया। इससे मुझे एहसास हुआ कि एक शिक्षक द्वारा दिया गया प्रोत्साहन, विश्वास और सहयोग विद्यार्थी के जीवन में लंबे समय तक याद रहता है।

इस सत्र में यह बात भी विशेष रूप से महसूस हुई कि हर बच्चा अलग क्षमता और परिस्थिति के साथ कक्षा में आता है। इसलिए शिक्षक को केवल आगे रहने वाले बच्चों पर ध्यान न देकर पीछे रहने वाले और सीखने में कठिनाई महसूस करने वाले बच्चों को भी समझना चाहिए। उन्हें उचित अवसर देना, प्रोत्साहित करना और उनकी क्षमताओं पर विश्वास करना एक शिक्षक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

मेरी सीख- एक अच्छे शिक्षक की पहचान केवल अच्छे परिणामों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह हर बच्चे में संभावना देखे और उसे आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दे।

ममता

Saturday, August 1, 2026

विश्वास, संवेदनशीलता और प्रोत्साहन: शिक्षक की सबसे बड़ी शक्ति - सनबीम ग्रामीण स्कूल

 बच्चों की सहायता करने का मेरा अनुभव

बच्चों की सहायता करना मेरे लिए केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष का माध्यम है। विद्यालय में अनेक ऐसे अवसर आए, जब कुछ विद्यार्थियों को पढ़ाई समझने में कठिनाई होती थी या वे किसी कारणवश निराश और आत्मविश्वासहीन महसूस करते थे। ऐसे समय में मैंने सदैव धैर्यपूर्वक उनकी बातें सुनीं, उनका उत्साहवर्धन किया और उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप मार्गदर्शन देने का प्रयास किया।

इसी संदर्भ में मुझे अपनी सहकर्मी रोमा मैम से भी बहुत प्रेरणा मिली। उन्होंने प्रत्येक बच्चे को स्नेह, धैर्य और अपनत्व के साथ संभाला। वे केवल पढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि बच्चों की भावनाओं को समझते हुए उनमें आत्मविश्वास भी जगाया। यही कारण था कि सभी बच्चे उनसे बहुत प्रेम करते थे, उनका सम्मान करते थे और उनके साथ सहज जुड़ाव महसूस करते थे। उन्हें देखकर मुझे यह समझने का अवसर मिला कि बच्चों का विश्वास और स्नेह केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम, संवेदनशीलता और सहयोग से जीता जाता है।

इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि बच्चों को केवल शिक्षा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें विश्वास, प्रेरणा, स्नेह और सकारात्मक वातावरण प्रदान करना भी उतना ही आवश्यक है। प्रत्येक बच्चे में कोई न कोई विशेष प्रतिभा होती है; आवश्यकता केवल उसे पहचानने, सही दिशा देने और समय-समय पर प्रोत्साहित करने की होती है।

मेरा मानना है कि एक शिक्षक की वास्तविक सफलता केवल विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और मुस्कान में दिखाई देती है। जब कोई बच्चा स्वयं पर विश्वास करना सीख जाता है, तभी एक शिक्षक का प्रयास वास्तव में सार्थक सिद्ध होता है।

- स्वाति त्रिपाठी

एक मुस्कान, एक टिफिन और एक नया जीवन
आज के सत्र से मुझे यह सीख मिली कि एक शिक्षक का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। उसका व्यवहार, उसकी मुस्कान, उसकी विनम्रता और उसकी संवेदनशीलता किसी बच्चे का पूरा जीवन बदल सकती है।
कहानी में रोमा ने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, ईमानदारी और पेशेवर व्यवहार का परिचय दिया। बाद में जब वह स्वयं शिक्षिका बनी, तब उसे यह एहसास हुआ कि बच्चे शिक्षक के आचरण से ही जीवन के सबसे महत्वपूर्ण संस्कार सीखते हैं।
इस कहानी ने मुझे अपने जीवन की एक सच्ची घटना याद दिला दी।

मेरा अनुभव- मैं सनबीम ग्रामीण स्कूल में कक्षा 4 की कक्षाध्यापिका हूँ। अप्रैल में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हुई। मैंने देखा कि मेरी कक्षा की एक छात्रा लगातार विद्यालय नहीं आ रही थी।
जब मैंने उसके अभिभावक से बात की, तो पता चला कि उसके परिवार की परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हैं। उसकी माँ घर छोड़कर चली गई थीं। पिता मानसिक रूप से बहुत परेशान थे और बच्ची भी भीतर से पूरी तरह टूट चुकी थी। इसी कारण उसका विद्यालय आना बंद हो गया था।
मैंने उसके पिता से विनम्रतापूर्वक कहा,
"सर, कृपया बच्ची को विद्यालय भेजिए। यहाँ अपने साथियों के बीच रहकर उसका मन हल्का होगा। धीरे-धीरे वह सामान्य होने लगेगी और पढ़ाई से उसका आत्मविश्वास भी लौट आएगा।"
उन्होंने मेरी बात मानी और बच्ची को विद्यालय भेजना शुरू कर दिया। लेकिन वह प्रतिदिन विद्यालय आकर रोने लगती थी।
मैं उसके पास बैठती और प्यार से कहती,
"बेटा, मम्मी अभी तुम्हारे साथ नहीं हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तुम अपने सपनों को छोड़ दो। जीवन में आगे बढ़ना है तो पढ़ाई बहुत ज़रूरी है। तुम रोज़ स्कूल आओ। यहाँ अपनी बातें साझा करोगी तो तुम्हारा मन भी हल्का होगा और धीरे-धीरे सब अच्छा लगने लगेगा।"
फिर भी अगले दिन वही स्थिति होती। वह उदास रहती और पढ़ाई में उसका बिल्कुल मन नहीं लगता था।
तब मुझे लगा कि केवल समझाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसे अपनापन और सहयोग का अनुभव कराना भी आवश्यक है।
पहला कदम – दोस्ती का सहारा
मैंने उसकी सहेलियों से कहा,
"बेटा, इसे कभी अकेला मत छोड़ना। इसके साथ बैठो, खेलो और अपना टिफिन भी इसके साथ साझा किया करो।"
घर में केवल उसके पिताजी और चाचा थे। भोजन बनाने वाला कोई नहीं था, इसलिए कई बार वह बिना टिफिन के विद्यालय आती थी।

दूसरा कदम – छोटी-सी जिम्मेदारी
मैं प्रतिदिन उससे पूछती,
"बेटा, आज सब ठीक है?"
वह मुस्कुराकर कहती,
"हाँ मैम, चाचा ने जल्दी खाना बना दिया।"
मैं उसे प्रोत्साहित करते हुए कहती,
"बहुत अच्छा। तुम भी चाचा की थोड़ी-सी मदद किया करो और समय पर विद्यालय आ जाया करो।"

परिणाम- धीरे-धीरे उस बच्ची में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगा। अब वह नियमित रूप से विद्यालय आती है, मुस्कुराती है, पढ़ाई में रुचि लेती है और अपने साथियों के साथ खुशी-खुशी समय बिताती है। यदि कभी वह टिफिन नहीं लाती, तो उसकी सहेलियाँ बिना कहे अपना भोजन उसके साथ साझा कर लेती हैं।

निष्कर्ष- इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि एक अच्छा शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान नहीं देता, बल्कि अपने व्यवहार, संवेदनशीलता और प्रेम से बच्चों को जीवन जीने की दिशा भी देता है।
कभी-कभी एक मुस्कान, कुछ स्नेहभरे शब्द और एक साझा किया हुआ टिफिन किसी बच्चे के जीवन में नई आशा जगा सकते हैं। एक शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह टूटे हुए मन को संभालकर उसे फिर से मुस्कुराना सिखा दे।
– ममता देवी
शिक्षक द्वारा विद्यार्थी की सहायता
आज की कक्षा से मैंने यह सीखा कि विद्यालय में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जब कोई विद्यार्थी पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक या शैक्षणिक समस्याओं का सामना कर रहा होता है। ऐसे समय में शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह एक मार्गदर्शक, प्रेरक और सहयोगी की भूमिका भी निभाता है।
एक दिन कक्षा में एक विद्यार्थी पढ़ाई के दौरान पाठ को समझने में कठिनाई महसूस कर रहा था। वह प्रश्नों के उत्तर देने में झिझक रहा था और उसका आत्मविश्वास भी कम दिखाई दे रहा था। मैंने धैर्यपूर्वक उसकी समस्या को समझा, सरल भाषा और उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से विषय को स्पष्ट किया तथा उसे प्रोत्साहित किया कि वह बिना किसी डर या संकोच के अपनी शंकाएँ पूछे।

कुछ समय बाद विद्यार्थी ने विषय को अच्छी तरह समझ लिया और स्वयं उत्तर देने का प्रयास भी किया। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
इस अनुभव से मुझे यह महसूस हुआ कि प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति अलग होती है। यदि शिक्षक धैर्य, सहानुभूति और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उनका मार्गदर्शन करें, तो विद्यार्थी न केवल विषय को अच्छी तरह समझता है, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

मेरा विश्वास है कि एक शिक्षक का स्नेह, प्रोत्साहन और विश्वास किसी भी विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही एक सच्चे शिक्षक की पहचान है।
- चंचल
एक शिक्षक का विश्वास, एक बच्चे का आत्मविश्वास
जैसा कि हम सभी जानते हैं, आज के सत्र से मैंने यह सीखा कि हर बच्चा अपने भीतर अनगिनत संभावनाएँ लेकर विद्यालय आता है। उसे केवल एक ऐसे शिक्षक की आवश्यकता होती है, जो उस पर विश्वास करे और सही समय पर उसका हाथ थाम ले। इसी संदर्भ में मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूँ।
मेरी कक्षा में एक विद्यार्थी था, जो बहुत शांत रहता था। वह किसी से बात नहीं करता था और पढ़ाई में भी उसका मन नहीं लगता था। मैंने उसे ध्यान से समझने का प्रयास किया। प्रतिदिन कुछ समय उसके साथ बैठकर बात की, उसकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की प्रशंसा की और उसे यह विश्वास दिलाया कि वह भी अन्य बच्चों की तरह सक्षम है।

धीरे-धीरे उसके व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आने लगा। उसने कक्षा में उत्तर देना शुरू किया, विभिन्न गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ किया और उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की मुस्कान स्पष्ट दिखाई देने लगी।
उस दिन मुझे यह महसूस हुआ कि एक शिक्षक का प्रेम, धैर्य और विश्वास किसी बच्चे के जीवन में नई उम्मीद जगा सकता है। मैंने सीखा कि बच्चों को केवल पढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समझना, उनका मनोबल बढ़ाना और हर कदम पर उनका उत्साहवर्धन करना भी एक शिक्षक का महत्वपूर्ण दायित्व है।
उस बच्चे की मुस्कान और बढ़ता हुआ आत्मविश्वास मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था। इस अनुभव ने मुझे और अधिक संवेदनशील, धैर्यवान तथा समर्पित शिक्षक बनने की प्रेरणा दी।
- सुनीता त्रिपाठी
शिक्षक का आचरण ही सबसे बड़ी शिक्षा
आज की GSA कक्षा से मुझे यह सीख मिली कि बच्चे शिक्षक को केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं मानते, बल्कि वे उन्हें अपना आदर्श समझते हैं। बच्चों को लगता है कि उनके शिक्षक हर विषय का ज्ञान रखते हैं—चाहे वह गणित हो, विज्ञान, कहानी, गीत या चित्रकला। वे अपने शिक्षक के व्यवहार और आचरण से भी बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए एक शिक्षक का प्रत्येक कार्य और व्यवहार बच्चों के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है।

आज की कक्षा में यह भी बताया गया कि बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कठिन या संवेदनशील परिस्थितियों को उनकी आयु और समझ के अनुरूप ही प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि उनके मन पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

इसी संदर्भ में मुझे अपना एक अनुभव याद आया। कक्षा 8 का एक विद्यार्थी एक दिन मेरे घर आया और उसने कहा, "सर, मुझे गणित समझ में नहीं आती। मैं गणित कैसे सीखूँ?"

मैंने उसे हर रविवार एक घंटे के लिए अपने घर आने के लिए कहा। उस दौरान मैंने उसे प्रत्येक पाठ के सरल-सरल प्रश्नों से अभ्यास कराया और धैर्यपूर्वक उसकी शंकाओं का समाधान किया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और गणित उसके लिए आसान लगने लगी।

जब परीक्षा का परिणाम आया, तो उसने गणित में अच्छे अंक प्राप्त किए। उसकी सफलता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। इस अनुभव ने मुझे यह विश्वास दिलाया कि यदि शिक्षक धैर्य, समय और सही मार्गदर्शन दें, तो कोई भी विद्यार्थी अपनी कठिनाइयों पर विजय पा सकता है।
- अशोक कुमार मौर्य
कठिन परिस्थितियों में छात्र-शिक्षक संबंध
आज के सत्र से मैंने यह सीखा कि विद्यालय केवल पढ़ाई का स्थान नहीं है, बल्कि वह ऐसा संसार है जहाँ बच्चों के सपने, उम्मीदें और भावनाएँ आकार लेती हैं। कई बार बच्चे किसी विशेष अवसर का लंबे समय तक इंतज़ार करते हैं, लेकिन किसी कारणवश वह अवसर उन्हें नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में उनके मन में निराशा, उदासी और अनेक प्रश्न जन्म लेने लगते हैं। ऐसे समय में एक शिक्षक का सहयोग और संवेदनशीलता उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

इसी संदर्भ में मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहती हूँ। मेरी कक्षा में एक विद्यार्थी था, जो पढ़ाई में बहुत अच्छा था। किन्तु पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उसका मन पढ़ाई से हटने लगा। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास भी कम हो गया और वह कक्षा में प्रश्नों के उत्तर देने से घबराने लगा। कई बार वह स्वयं को असमर्थ पाकर रो भी पड़ता था।

मैंने उसके व्यवहार में आए इस परिवर्तन का कारण जानने के लिए उससे धैर्यपूर्वक बात की। उसकी समस्या को समझने के बाद मैंने उसे समझाया, उसका उत्साहवर्धन किया तथा उसके माता-पिता से भी इस विषय में चर्चा की। धीरे-धीरे उसकी स्थिति में सुधार होने लगा और उसका आत्मविश्वास वापस लौटने लगा।
कुछ समय बाद परिस्थितिवश उसे विद्यालय बदलना पड़ा। आज भी जब उसे किसी प्रकार की समस्या होती है, तो वह मुझे फोन करके अपनी बात साझा करता है। यह मेरे लिए अत्यंत संतोष और खुशी की बात है। इससे मुझे यह विश्वास हुआ कि एक शिक्षक का स्नेह, विश्वास और मार्गदर्शन बच्चों के जीवन पर गहरी छाप छोड़ता है।
इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि कठिन परिस्थितियों में शिक्षक को केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि बच्चों की भावनाओं को समझने वाला एक संवेदनशील मार्गदर्शक बनना चाहिए। जब शिक्षक बच्चों की बात धैर्यपूर्वक सुनता है, उनकी भावनाओं का सम्मान करता है और उन्हें विश्वास दिलाता है कि वह उनके साथ है, तब उनकी निराशा आशा में बदलने लगती है।यही विश्वास छात्र और शिक्षक के संबंध को इतना गहरा बना देता है कि वह केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवनभर प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बन जाता है।
-गुलाबी
एक मुस्कान, एक सराहना और एक नया जीवन
आज के सत्र ने इस बात को और भी स्पष्ट किया कि एक शिक्षक का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। उसका व्यवहार, संवेदनशीलता और प्रोत्साहन किसी बच्चे के पूरे जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
आज की कहानी सुनकर मुझे अपने शिक्षण जीवन का एक अनुभव याद आ गया। जब मैंने सनबीम ग्रामीण स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यभार संभाला, तब कक्षा 3 में एक ऐसा छात्र था, जो उम्र और शारीरिक बनावट में अपने सहपाठियों से बड़ा था। इसी कारण वह अपने साथ पढ़ने वाले बच्चों के साथ सहज रूप से घुल-मिल नहीं पाता था। धीरे-धीरे उसकी शरारतें बढ़ने लगीं। वह कक्षा में बार-बार बातचीत करता, अन्य बच्चों को परेशान करता और पढ़ाई का वातावरण भी प्रभावित करता था।
मैंने कई बार उसे समझाने का प्रयास किया, लेकिन अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया। तब मैंने एक अलग तरीका अपनाने का निर्णय लिया। मैंने उसे अपनी कक्षा का मॉनिटर बना दिया। साथ ही, उसकी छोटी-छोटी अच्छी आदतों और प्रयासों की सराहना करने लगा, उसे मंच पर बोलने के अवसर दिए और नियमित रूप से उसकी जिम्मेदारियों का उत्साहवर्धन करता रहा।
धीरे-धीरे उसमें सकारात्मक परिवर्तन आने लगा। उसे यह महसूस हुआ कि उस पर विश्वास किया गया है और वह एक जिम्मेदार विद्यार्थी है। परिणामस्वरूप उसकी शरारतें लगभग समाप्त हो गईं, उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने पढ़ाई में भी रुचि लेनी शुरू कर दी।
आज वह छात्र कक्षा 6 में पहुँच चुका है। अब वह पहले की तुलना में कहीं अधिक अनुशासित, जिम्मेदार और आत्मविश्वासी है। यह परिवर्तन देखकर मुझे अपार संतोष मिलता है।
इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि हर बच्चे को केवल डाँटकर नहीं बदला जा सकता। विश्वास, सराहना, प्रोत्साहन और जिम्मेदारी देकर भी उसके व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। कभी-कभी एक मुस्कान, एक सच्ची प्रशंसा और एक छोटा-सा अवसर किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदलने के लिए पर्याप्त होते हैं।
- रवि प्रकाश

अध्याय – मुस्कान और उदासी
इस अध्याय से हमें यह सीख मिली कि एक शिक्षक का मुस्कुराता हुआ चेहरा, सकारात्मक व्यवहार और प्रोत्साहन बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाते हैं। हमें सदैव बच्चों के साथ धैर्य, स्नेह और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए, ताकि वे बिना किसी डर या संकोच के अपने विचार व्यक्त कर सकें।
मुझे भी अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आता है। जब आर.पी. सर के विद्यालय छोड़ने के बाद मुझे उनकी कक्षा और विषय पढ़ाने की जिम्मेदारी मिली, तब मैंने सबसे पहले बच्चों के साथ सकारात्मक संबंध बनाने का प्रयास किया। मैंने उनकी शंकाओं और भावनाओं को समझा तथा उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी पढ़ाई बिना किसी रुकावट के नियमित रूप से चलती रहेगी।
अक्सर बच्चे किसी एक शिक्षक की शिक्षण शैली, व्यवहार और पढ़ाने के तरीके के अभ्यस्त हो जाते हैं। ऐसे में नए शिक्षक के साथ सहज होने में उन्हें कुछ समय लगता है। प्रारंभ में उन्हें यह भी लगता है कि पहले वाले शिक्षक अधिक अच्छा पढ़ाते थे। इसलिए मैंने धैर्य और आत्मीयता के साथ बच्चों का विश्वास जीतने का प्रयास किया।
समय के साथ बच्चे मेरी कक्षा में सहज हो गए। उनका मुझ पर विश्वास बढ़ा और हमारे बीच आत्मीय संबंध स्थापित हो गए। आज बच्चे बिना किसी झिझक के अपनी शंकाएँ, विचार और भावनाएँ मेरे साथ साझा करते हैं। इस अनुभव ने मुझे यह सिखाया कि एक शिक्षक का स्नेह, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार ही बच्चों के मन तक पहुँचने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
- मनोज कुमार

मुस्कान की शक्ति
इस विषय पर हुई चर्चा से मुझे यह अनुभव हुआ कि एक शिक्षक की सच्ची और सहज मुस्कान केवल चेहरे की अभिव्यक्ति नहीं होती, बल्कि विद्यार्थियों के साथ विश्वास, अपनापन और सकारात्मक संबंध स्थापित करने का एक प्रभावी माध्यम भी होती है। जब शिक्षक मुस्कुराकर बच्चों का स्वागत करते हैं, तो वे स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और प्रोत्साहित महसूस करते हैं। इससे वे बिना किसी झिझक के अपनी बात साझा करते हैं और सीखने की प्रक्रिया में अधिक सक्रियता से भाग लेते हैं।
इस सत्र ने मेरी यह समझ और अधिक मजबूत की कि एक छोटी-सी मुस्कान भी कक्षा के वातावरण को आनंदमय, प्रेरणादायक और सीखने के अनुकूल बना सकती है। एक सकारात्मक शिक्षक न केवल ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि अपने व्यवहार और मुस्कान से विद्यार्थियों के मन में आत्मविश्वास, उत्साह और सीखने की रुचि भी विकसित करता है।
भविष्य में मैं अपने शिक्षण व्यवहार में और अधिक सकारात्मकता, संवेदनशीलता तथा मुस्कान को एक महत्वपूर्ण शिक्षण कौशल के रूप में अपनाकर अपने शिक्षण कार्य को और अधिक प्रभावी तथा प्रेरणादायक बनाने का प्रयास करूँगी।
- सरोज पटेल
अध्याय – मुस्कान और उदासी
इस अध्याय से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि एक शिक्षक का सकारात्मक व्यक्तित्व बच्चों के व्यक्तित्व को भी सकारात्मक दिशा प्रदान करता है। कक्षा का वातावरण सदैव छात्र-केंद्रित, प्रेरणादायक और आनंददायक होना चाहिए, ताकि प्रत्येक बच्चा स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सके।
हमें हमेशा बच्चों के साथ धैर्य, स्नेह और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए, ताकि वे बिना किसी डर या संकोच के अपने विचार व्यक्त कर सकें। बच्चों की गलतियों पर उन्हें डाँटने के बजाय धैर्यपूर्वक समझाना चाहिए तथा खेल-खेल में सीखने के अवसर प्रदान करने चाहिए। इससे प्रत्येक बच्चा आत्मविश्वास के साथ सीखता है, प्रश्न पूछने का साहस विकसित करता है और अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर प्राप्त करता है।
एक शिक्षक की मुस्कान, सकारात्मक सोच और संवेदनशील व्यवहार ही बच्चों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बनते हैं।
- लवकुश सिंह यादव

Sunday, June 7, 2020

विनम्रता और प्रशंसा: उषा पंवार


विनम्रता एक दूसरे के प्रति प्रेम और विश्वास की भावना में वृद्धि करके एक दूसरे के प्रति विश्वास की भावना को जागृत करना । विनम्रता महानता की ओर ले जाती है । विनम्रता मनुष्य का आभूषण है। यह मनुष्य का सर्वोत्तम गुण है क्योंकि व्यक्ति में अगर विनम्रता नहीं हो तो उसके अन्य गुण व्यर्थ है । विनम्रता व्यक्ति के व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण में सहायक है अतः विनम्र होना सबसे बड़ी खूबसूरती है । विनम्र आदमी को डिग्री की जरूरत नहीं होती, विनम्र व्यक्ति में घमंड, अहंकार, दिखावे का कोई भाव नहीं होता।

विनम्रता ही सही मायने में हमें बड़ा बनाती है। विनम्रता व्यक्तित्व में निखार लाती हैं और सफलता का कारण भी बनती है। विनम्रता मनुष्य को बड़ा व ईमानदार बनाती है। विनम्र व्यक्ति के सामने कठोर हृदय वाले व्यक्ति को भी झुकना पड़ता है। जो विनम्र होते हैं हर जगह सम्मान पाते हैं, कोई भी व्यक्ति बिना विनम्र बने धन दौलत तो पा सकता है परंतु लोगों के दिलों में जगह नहीं पा सकता।

जिस प्रकार सूखी मिट्टी पर जल डालकर गीली मिट्टी को मनचाहा आकार दे सकते हैं उसी प्रकार कठोर से कठोर व्यक्ति से विनम्रता पूर्वक व्यवहार कर मनचाहा परिणाम पा सकते हैं । विनम्रता से वह कार्य भी बन जाते हैं जो कठोरता से नहीं बन पाते। व्यक्ति को व्यवहार का मिठास नम्रता से मिलता है। यदि विनम्रता का महत्व ना होता तो कृपया, धन्यवाद आदि शब्दों का महत्व भी नहीं होता इन शब्दों में ही व्यक्ति की नम्रता झलकती है।
                          "पोथी पढि पढि जग मुआ पंडित भया न कोय,
                            ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।"
संत कबीर दास जी कहते हैं कि बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़ने का कोई लाभ नहीं है जब तक कि आप में विनम्रता नहीं आती और आप लोगों से प्रेम से बात नहीं कर पाते । कबीर जी कहते हैं कि जिसे प्रेम के ढाई अक्षर का ज्ञान प्राप्त हो गया वही इस संसार का असली विद्वान है।

ऊंचा उठने के लिए पंखों की जरूरत पक्षियों को पड़ती है,
इंसान जो जितना झुकता है उतना ही ऊपर उठ जाता है।

जो विनम्र होते हैं वही प्रशंसा के पात्र होते हैं। जैसे चांदी की परख घिस कर, सोने की परख भट्टी में होती है वैसे ही मनुष्य की परख लोगों के द्वारा की गई तारीफ से होती है। प्रशंसा व्यक्ति के गुणों का बखान व कार्यों की तारीफ करना। प्रशंसा से आत्मविश्वास बढ़ता है।

प्रशंसा करने के कई प्रकार होते हैं जैसे सामान्य प्रशंसा, अधिक प्रशंसा, वास्तविक प्रशंसा, झूठी प्रशंसा। सही प्रशंसा व्यक्ति का हौसला बढ़ाती है, अधिक प्रशंसा व्यक्ति को लापरवाह बनाती है।

सच्चे लोग कभी प्रशंसा के मोहताज नहीं होते क्योंकि असली फूलों को कभी इत्र लगाने की जरूरत नहीं होती। हम किसी बच्चे को जबरन कक्षा कार्य या कोई भी कार्य करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। उनसे अच्छा कार्य लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहन करना उनके अच्छे कामों की प्रशंसा करना जरूरी है। हमें उनके अच्छे कामों के लिए पीठ थपथपाना, और अच्छा कार्य करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
Usha Panwar
The Fabindia School, Bali

Wednesday, May 6, 2020

ईमानदारी और सम्मान: सुरेश सिंह नेगी


मानव जीवन में ईमानदारी का होना अति आवश्यक हैं।  अक्सर यह देखा गया हैं, कि जो इन्सान ईमानदार  होता है। वह अपने कर्तव्यों के लिए भी उतना ही जागरूक होता हैं जितना कि वह अपने अधिकारों को लेकर होता है। 

ईमानदारी के चरित्र का निर्माण पूरी तरह से व्यक्ति के पारिवारिक मूल्यों और उसके आस पास के वातावरण पर निर्भर करता है। अपने बच्चों के सामने ईमानदार व्यवहार और चरित्र दिखाने वाले माता-पिता का उनके  बच्चों पर गहरा प्रभाव पड़ता  है।

इसलिए घर और विद्यालय एक बच्चे के लिए उसके बढ़ते समय से ईमानदारी विकसित करने के लिए सबसे अच्छी जगह हैं। ईमानदारी को व्यावहारिक रूप से भी विकसित किया जा सकता है, जिसके लिए उचित मार्गदर्शन, प्रोत्साहन, धैर्य और समर्पण की आवश्यकता होती है।

आधुनिक समय में ईमानदारी एक आवश्यक आवश्यकता है। यह सबसे अच्छी आदतों में से एक है जो किसी व्यक्ति को प्रोत्साहित करती है और उसके जीवन में किसी भी कठिन परिस्थिति को हल करने और संभालने के लिए पर्याप्त सक्षम बनाती है। ईमानदारी जीवन में किसी भी बाधाओं का सामना करने और लड़ने की हमारी इच्छा शक्ति को मजबूत करने में उत्प्रेरक का काम करती है।

आदर, जिसे सम्मान भी कहा जाता है, एक सकारात्मक भावना या क्रिया है जिसे किसी महत्वपूर्ण चीज के प्रति दिखाया जाता है। यह अच्छे या मूल्यवान गुणों के लिए प्रशंसा की भावना व्यक्त करता है और यह उनकी आवश्यकताओं या भावनाओं के लिए देखभाल, चिंता या विचार का प्रदर्शन करके किसी को सम्मानित करने की प्रक्रिया भी है।

कुछ लोग दूसरों की सहायता करके या महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका निभाकर व्यक्तियों का सम्मान अर्जित कर सकते हैं। "सुप्रभात," कहना केवल विनम्र नहीं है। बल्कि यह एक व्यक्ति के द्वारा दूसरे व्यक्ति के प्रति एक सम्मान की भावना है।
अतः सबसे पहले अपना फिर अपने माता-पिता, मातृ-भूमि, अपने आस-पास की चीजों का और उस जगह का सम्मान करें जहाँ पर आप रहते हैं।
   Suresh Singh Negi
The Fabindia School, Bali

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