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Saturday, July 25, 2026

संवेदनशील शिक्षा और विवेकपूर्ण जीवन का संतुलन - सुनीता त्रिपाठी


आज की चर्चा ने मुझे यह एहसास कराया कि हर बच्चे की कहानी उसकी पढ़ाई से कहीं बड़ी होती है। कई बार जो व्यवहार हमें अनुशासनहीनता लगता है, उसके पीछे भावनात्मक उलझन, असमंजस या सही मार्गदर्शन की कमी छिपी होती है। एक शिक्षक का दायित्व केवल नियमों का पालन करवाना नहीं, बल्कि बच्चों को समझना भी है। जब शिक्षक विश्वास, धैर्य और संवेदनशीलता के साथ बच्चों का साथ देते हैं, तब वे न केवल अच्छे विद्यार्थी, बल्कि अच्छे इंसान भी बनाते हैं।

यह चर्चा मेरे लिए आत्ममंथन का अवसर रही। अब मैं अपने विद्यार्थियों को केवल उनकी उपस्थितियों या गलतियों से नहीं, बल्कि उनकी परिस्थितियों और संभावनाओं के आधार पर समझने का प्रयास करूँगी। मेरा विश्वास और भी मजबूत हुआ है कि एक शिक्षक का सबसे बड़ा गुण बच्चों के मन तक पहुँचना है, क्योंकि वहीं से वास्तविक शिक्षा की शुरुआत होती है।

जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं, जब दिल कुछ और कहता है और दिमाग कुछ और। दिल भावनाओं, प्रेम, करुणा और रिश्तों की ओर खींचता है, जबकि दिमाग सोच-समझकर सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।

सच्ची सफलता तभी मिलती है, जब दिल की संवेदनशीलता और दिमाग की समझ साथ-साथ चलें। केवल भावनाओं में बह जाना या केवल तर्क पर चलना—दोनों ही हमें अधूरा बना सकते हैं।

कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ दिल रिश्तों को बचाना चाहता है और दिमाग सही निर्णय लेने की सलाह देता है। उस पल का संघर्ष हमें भीतर से बहुत कुछ सिखाता है। जीवन की असली सुंदरता तब है, जब दिमाग सही दिशा दिखाए और दिल उस राह पर इंसानियत, करुणा और प्रेम के साथ चलना सिखाए।

दिल से जुड़े रहिए, लेकिन निर्णय विवेक से लीजिए, क्योंकि सही निर्णय वही होता है, जिसमें दिमाग की समझ और दिल की संवेदना—दोनों शामिल हों। यही संतुलन हमारे व्यक्तित्व को सुंदर बनाता है और हमारे जीवन को सार्थक।

सनबीम ग्रामीण स्कूल
सुनीता त्रिपाठी

Sunday, July 5, 2026

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य - सुनीता त्रिपाठी


 जय हिंद सभी को।

आज का संदेश हमें यह समझाता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे की छिपी हुई प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारना है। हर बच्चा अपने भीतर कोई-न-कोई विशेष गुण लेकर आता है। एक शिक्षक का कर्तव्य है कि वह बच्चों को ऐसा सकारात्मक और प्रेरणादायक वातावरण दे, जहाँ वे बिना किसी डर के अपनी प्रतिभा, विचारों और रचनात्मकता को खुलकर व्यक्त कर सकें।

जब बच्चों को विश्वास, प्रोत्साहन और अपनी क्षमता दिखाने के अवसर मिलते हैं, तब उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे नई ऊँचाइयों को छूने का साहस करते हैं। शिक्षक का एक उत्साहवर्धक शब्द भी किसी बच्चे के जीवन की दिशा बदल सकता है।

आज के इस प्रेरणादायक संदेश से मुझे यह सीख मिली कि एक सच्चा शिक्षक वही है, जो हर बच्चे में छिपे हुए हीरे को पहचानकर उसे तराशे, उसकी प्रतिभा को मंच दे, उसके आत्मविश्वास को मजबूत करे तथा उसे बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने के लिए प्रेरित करे।

धन्यवाद।

सनबीम ग्रामीण स्कूल
सुनीता त्रिपाठी

Friday, April 24, 2026

रिफ्लेक्शन: स्टाफ रूम में मेरा अनुभव - सनबीम ग्रामीण स्कूल

आज का सत्र, जो कि वांटेड बैक बैंचर एंड लास्ट रैंकर टीचर के तीसरे अध्याय पर आधारित था, हमें एक नई सीख देता है। हर बच्चे का पारिवारिक और सामाजिक वातावरण अलग-अलग होता है, इसलिए उसके सीखने का तरीका और व्यवहार भी अलग होता है। बच्चा किस माहौल से आता है, यह उसके सीखने की प्रक्रिया को बहुत प्रभावित करता है। कुछ बच्चे ऐसे माहौल से आते हैं जहाँ पढ़ाई के लिए शांत वातावरण, संसाधन और मार्गदर्शन मिलता है, जबकि कुछ बच्चों को ये सुविधाएँ नहीं मिल पातीं। हर बच्चे की अपनी-अपनी समस्याएँ भी हो सकती हैं। शिक्षक यदि बच्चों से व्यक्तिगत रूप से बात करें और उसकी समस्या को समझें, तथा उसे व्यक्तिगत रूप से किसी को न बताते हुए सहानुभूति दिखाएँ और प्रोत्साहित करें, तो बच्चे में पढ़ाई के प्रति रुचि जाग सकती है।

जो बच्चे कठिन परिस्थितियों से आते हैं, वे पढ़ाई में पीछे रह सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे कम बुद्धिमान हैं। उनकी सीखने की गति, तरीका और पढ़ाई के प्रति रुचि अलग हो सकती है। इसलिए शिक्षक को चाहिए कि वह बच्चों की पृष्ठभूमि को समझे और उसी के अनुसार पढ़ाने का तरीका अपनाए। जब शिक्षक सहानुभूति और सहयोग से पढ़ाता है, तो हर बच्चा धीरे-धीरे आगे बढ़ सकता है। इसलिए मेरे विचार से शिक्षक के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि शिक्षा में केवल परिणाम ही नहीं, बल्कि परिस्थिति और प्रयास को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

मंजुला सागर

आज विद्यालय में नए बच्चों का प्रवेश हुआ। स्टाफ रूम में बैठकर जब मैं इन छोटे-छोटे बच्चों को देख रही थी, तो उनके चेहरों पर अलग-अलग भाव साफ दिखाई दे रहे थे—कहीं खुशी, कहीं डर, तो कहीं झिझक। कुछ बच्चे रो रहे थे, और कुछ अपने माता-पिता का हाथ कसकर पकड़े हुए थे।

इन दृश्यों ने मुझे यह एहसास कराया कि स्कूल का पहला दिन बच्चों के लिए कितना महत्वपूर्ण और भावनात्मक होता है। एक नई जगह, नए लोग और नया वातावरण—यह सब उनके लिए थोड़ा कठिन होता है। लेकिन साथ ही, यह उनके जीवन की एक नई और सुंदर शुरुआत भी होती है।

मैंने महसूस किया कि एक शिक्षक के रूप में हमारी भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को प्यार, सुरक्षा और अपनापन देना भी उतना ही जरूरी है। जब शिक्षक बच्चों को स्नेह से समझते हैं और उन्हें सहारा देते हैं, तो धीरे-धीरे उनका डर कम होकर खुशी में बदल जाता है।

आज का अनुभव मेरे लिए बहुत सीख देने वाला रहा। स्टाफ रूम में बैठकर मैंने सोचा कि मेरी भी एक शुरुआत थी। अब फिर से उसी मोड़ पर आकर खड़ी हूँ।

सुनीता त्रिपाठी

Friday, April 18, 2025

पाठ दबाव से निपटना - आर्थर फूट अकैडमी


"शासन संचालन का है विज्ञान,
सबसे प्यारा हमारा संविधान।
भारतीय संविधान के रचनाकार,
बाबासाहेब की हो जय जयकार।
संविधान हिन्दुस्तान की जान है।"

दबाव से निपटने से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारी जीवनशैली में दबाव का होना बहुत ज़रूरी है। लेकिन हमें दबाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। जीवन में दबाव तब ज़्यादा बढ़ता है, जब हम अपने काम को समय से नहीं करते और सोचते हैं, "आज नहीं, कल," और वह कल दबाव में बदल जाता है। इसलिए हमें अपने काम को समय पर करके लेना चाहिए, जिससे दबाव हमारे ऊपर हावी न हो, क्योंकि अगर ऐसा होता है, तो हम अपने लक्ष्य से पीछे हटते चले जाएंगे। अगर हम मेहनत और लगन से अपने कार्य को करते हैं, तो हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। "क्योंकि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती।"

जैसे पाठ के माध्यम से भी बताया गया है, एक बार मुझे एक न्यूरोसर्जन से मिलने का मौका मिला, जो दबाव का सामना अच्छे से करते हैं। हम योजना बनाने में चाहे कितने भी हो, लेकिन दबाव कभी नहीं जाता। दबाव जीवन का अभिन्न अंग होता है। प्रत्येक व्यक्ति दैनिक जीवन में लगभग असंख्य चुनौतियों का सामना करता है, जो व्यक्ति में अपने सामर्थ्य अनुसार दबाव की अनुभूति को प्रेरित करती है। व्यक्ति को सार्थक और गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने के लिए इन चुनौतियों से निपटने की जरूरत होती है।

दबाव से निपटने (coping) का मतलब होता है दबाव पर नियंत्रण करना, उसे कम करना, या फिर उसे सहन करने के लिए अपने मानसिक संसाधनों को जागरूकता के साथ जैसे स्वयं के लिए प्रयोग करना, और व्यक्तिगत और पारस्परिक समस्याओं का समाधान योजना।

क्योंकि अमृता हमारे स्कूल में ऐसी बच्ची है, जिसे बहुत कुछ पढ़ना आता है, पर वह अपने माता-पिता को नहीं बता पाती। लेकिन जब स्कूल में उसके माता-पिता यह शिकायत लेकर आते हैं, तो वह उनके सामने कुछ ही बता पाती है, लेकिन लिखकर सब देती है। जो उससे बोलते हैं।

दबाव से निपटने के लिए:
"भरपूर दबाव पड़ने पर भी,
कभी अनुचित काम न करें।

जिस कार्य को करने के लिए
आपका मन गवाही न दे, उसे किसी आदरणीय व्यक्ति के
कहने पर भी न करें।"
रीना

पाठ दबाव से निपटना से मुझे यह सीखने को मिला कि ज़िंदगी में दबाव होना ज़रूरी है, पर वह दबाव जो हमें मंज़िल की ओर लेकर जाए, हमें ज़िंदगी में कुछ नया सिखा कर जाए — वह दबाव ज़िंदगी में होना ज़रूरी है।
जैसे न्यूरोसर्जन डॉ. बेन कार्सन से पूछा गया कि आप दबाव का सामना कैसे करते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया — 

"आप दबाव से युद्ध मत कीजिए, बल्कि दबाव को ही बदल दीजिए। उसको बेहतरीन प्रेरणा में ले जाइए, ताकि आपको वह दबाव न लगे, बल्कि वह आपको अच्छी राह दिखाए।"
ऐसा नहीं है कि ज़िंदगी में हमें ही दबाव है, बल्कि हर व्यक्ति दबाव में होता है। पर अगर हम सोच के ही हार मान लें कि हमारे ऊपर दबाव है, तो हम पहले ही हार जाते हैं। मगर अगर हम यह सोचें कि यह दबाव हमें हमारी मंज़िल की ओर लेकर जाएगा, तो ज़िंदगी में यह दबाव होना ज़रूरी है।
कुछ-कुछ दबाव ज़िंदगी में ऐसे भी होते हैं जो हमें हमारे ऊपर 'दबाव' ही लगते हैं। तो ऐसे दबाव में हमें नहीं रहना चाहिए।
साक्षी खन्ना 
बहुत ज़्यादा दबाव पड़ने पर भी कभी अनुचित काम न करें। जिस काम को करने के लिए आपका मन गवाही न दे, उसे किसी आदरणीय व्यक्ति के कहने पर भी न करें।
पाठ 'दबाव से निपटना' से हमने सीखा कि हम सभी के जीवन में अलग-अलग तरह के दबाव होते हैं। इनमें से कुछ दबावों का हमारे जीवन पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, तो कुछ का गलत प्रभाव, जो हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल सकता है।
परंतु अगर हम दबाव की स्थिति में भी शालीनता बनाए रखने का साहस रखते हैं, तो कहीं न कहीं हमारी ज़िंदगी भी बदल सकती है और हमें एक सही दिशा या मंज़िल मिल सकती है।

"दबाव हद से ज़्यादा बढ़ जाए तो दो ही चीज़ें होती हैं — या तो हम टूटकर बिखर जाते हैं, या भयंकर दबाव को तोड़ने की ऐसी ताक़त हासिल कर लेते हैं, जो कि अब तक हम में थी ही नहीं।"
स्वाति

"होके मायूस ना, यूं शाम की तरह ढलते रहिए,
ज़िंदगी एक भोर है, सूरज की तरह निकलते रहिए।"

पाठ "दबाव से निपटना" से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। और जैसे कि पाठ में कई किस्से सुनने को मिले हैं, ठीक उसी प्रकार सबके जीवन में दबाव होता है। स्कूल में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं पर अपने माता-पिता का दबाव या फिर अध्यापकों का भी हो सकता है। आजकल हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई-लिखाई और हर गतिविधि में आगे हो। और माता-पिता की ये शिकायतें अध्यापकों से भी करते हैं कि हमारा बच्चा कक्षा में, स्कूल में सबसे होशियार होना चाहिए।

इस प्रकार, अगर उनके पड़ोसी का बच्चा अपनी कक्षा में प्रथम आ जाए, तो वे अपने बच्चे को डांटते-धमकाते हैं, प्रथम आने वाले बच्चे से उसकी तुलना करते हैं। जिससे कभी-कभी बच्चे का मनोबल कम होने लगता है, और उसके मन में नकारात्मक विचार आने लगते हैं।

तथा इस पाठ में बताया गया है कि हमारे सामने अनेकों चुनौतियां और काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। और इन चुनौतियों और कठिनाइयों पर हमें किस प्रकार विजय प्राप्त करनी है। जैसे कि पाठ में एक पंक्ति लिखी हुई है, "मज़बूत बनो, दबाव में आकर काम मत करो, दबाव पर काम करो।"

जीवन आनंद लेने के लिए है, सहने के लिए नहीं।
साक्षी पाल

"कोई भी मुश्किल थका नहीं सकती,
रास्ते की रुकावट गिरा नहीं सकती,
अगर जूनून है जितने का, तो हार भी हरा नहीं सकती।"

दबाव से निपटना — ऐसे तो हर इंसान के जीवन में दबाव होते हैं, और उनका होना भी बहुत ज़रूरी है, क्योंकि अगर किसी के जीवन में दबाव न हो, तो फिर किसी का भी कोई लक्ष्य नहीं होगा। क्योंकि अगर हमारे सामने किसी भी क्षेत्र में कोई दबाव हो, तो हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति करने की पूरी कोशिश करते हैं और उसे प्राप्त भी कर लेते हैं।

मुझे इस पाठ में न्यूरोसर्जन डॉ. बेन कार्सन की यह लाइन बहुत अच्छी लगी, जब उनसे पूछा गया कि दबाव का सामना आप कैसे करते हैं, तो उन्होंने जो जवाब दिया:

"आप योजना बनाने में चाहे कितने ही अच्छे हों, लेकिन दबाव कभी नहीं जाता। इसलिए उससे युद्ध मत करो, मैं तो बेहतरीन प्रदर्शन के लिए दबाव को प्रेरणा में बदल देता हूं।"

तो मैं भी यही चाहती हूँ कि मैं अपने बच्चों को बहुत अच्छे से समझा पाऊं, जिससे उन्हें स्कूल आना और पढ़ना किसी भी प्रकार से दबाव न लगे, बल्कि वे इंतजार करें कि कब रात बीते और कब सुबह हो और हम स्कूल जाएं। एक नई उमंग के साथ हर उस चुनौती का सामना करें जो उनके जीवन में आए, चाहे वो पढ़ाई हो या फिर किसी खेल में भाग लेना हो। जो भी कला उनके अंदर छिपी हो, उसका ऐसा प्रदर्शन करें कि हर दबाव से आगे निकल जाएं और हर दबाव को चुनौती दें कि हम इन सबके लिए पहले से तैयार हैं।
ललिता पाल

"सीखने का जुनून पैदा करो, अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपकी सफलता निश्चित है।"

मैं सिमरन, आर्थर फुट एकेडमी की अध्यापिका हूं।
मैंने साहस पाठ से यही सिखा कि अगर जिंदगी में एक बार कामयाबी नहीं मिली, तो बार-बार उसी कार्य को करना चाहिए।
वह कार्य कितना भी कठिन क्यों न हो, अगर हमारे अंदर साहस और हिम्मत है, तो हम उसे जरूर कर सकते हैं।
जैसे मैं अंग्रेजी बोलने और पढ़ने में कमजोर हूं, तो मैं अंग्रेजी बोलना और पढ़ना जरूर सीखूंगी।
अगर मैं सीखने का साहस करूंगी, तो जरूर सीख जाऊंगी और बच्चों को भी सीख दूंगी।
ज़िंदगी में कैसी भी परिस्थितियाँ क्यों न आ जाएं, मैं उनका सामना करने का साहस और हिम्मत जरूर रखूंगी।
सिमरन कौर

हमें दबाव से निपटने के उपाय ढूंढ़ने चाहिए, जैसा कि बच्चों पर बहुत दबाव होता है। उन्हें अपने माता-पिता, दादा-दादी और स्कूल का दबाव भी होता है। उन्हें परीक्षा में उत्तीर्ण होने का दबाव होता है और वह दबाव के कारण अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। इस कारण बच्चों के परीक्षा में अंक कम आते हैं और उस पर माता-पिता का भी अधिक दबाव पड़ जाता है।

हाल ही में मैंने देखा कि 14 साल के बच्चे का वजन 4 महीने में 10 किलो कम हो गया। इस तरह वजन घटना कहीं बीमारियों का संकेत हो सकता है। बच्चे की डॉक्टर से जांच भी कराई गई और पता चला कि बच्चे को किसी बात का दबाव था। उस बच्चे से पूछने पर पता चला कि उसके स्कूल में कुछ बच्चे उसके मोटापे पर उसका मजाक उड़ाते थे और उसने यह बात दिल पर ले ली। इस कारण उस बच्चे ने खाना-पीना भी छोड़ दिया, जिस कारण वह बहुत कमजोर हो गया और उस पर इस बात का बहुत दबाव पड़ा। उस बच्चे को डॉक्टर से दवाई चलाई गई, जिस कारण वह कुछ महीनों के बाद ठीक से खाना-पीना शुरू कर दिया।

रूबल कौर

Friday, January 8, 2021

मन के हारे हार है,मन के जीते जीत - उर्मिला राठौड़

 यह सत्य पूर्वजों द्वारा कथित है जो कि अभी भी सर्वत्र प्रचलन में है। यह कहावत ये कहना चाहती हैं कि अगर आपको किसी चुनौती का सामना करना पड़े और आपके सामने कोई ताकतवर विपक्ष हो और उस समय आपका मन उसके बारे में क्या सोचता है? अगर आप का मन दृढ़ निश्चय से उसका सामना करे तो उसमें आपकी जीत है और अगर आपने उस क्षण कुछ नकारात्मक सोचा तो हमारी हार निश्चित है। यह सब अपनी सकारात्मक एवं नकारात्मक सोच पर निर्भर है। यदि  आपने किसी चीज को पाने की ठानी है और आप उस चीज के बारे में सकारात्मक हो तो आप उस चीज को हासिल कर सकते है। यदि आप नकारात्मक रहे तो आपका मन ही आपको वह कार्य करने से रोकेगा और आपको पराजीत करवाने में आपका साथ देगा।

एक बार दो व्यक्तियों ने एक ही रास्ते पर एक साथ चलना आरंभ किया। एक उत्साह से भर मंजिल की तरफ खुशी से बढ़ रहा था, दूसरा मार्ग की परेशानियों व रास्ते की दूरी को नाप रहा था।  कुछ ही देर में वह मन से हताश हो गया और उसे चलना कठिन लगने लगा। वह थक कर बैठ गया और दूसरे से बोला क्या तुम और चल सकते हो।  मैं तो बुरी तरह थक गया रास्ते में परेशानियां भी बहुत हैं तो मैं आगे नहीं जाऊंगा।  दूसरा बोला - मुझे तो कोई थकावट या परेशानी नहीं है और अभी तो थोड़ा सा चला हूं मैं तो मजे करते-करते यूं ही रास्ता पूरा कर लूंगा। वह उस कार्य में सफल होता है, जबकि निराश व्यक्ति असफल। इसमें हमें यह शिक्षा मिलती हैं कि जो व्यक्ति मन से हताश हैं उसका शरीर भी साथ नहीं देता।  संसार का प्रत्येक कार्य मन के खेल पर आधारित है जिस कार्य को करने में मन खुशी महसूस करता है वह कठिन होते हुए भी सरल लगने लगता है।  मान लिया हो कि वह फलां काम कठिन है नहीं होगा तो आसान से आसान काम भी करना असंभव लगता है। कोई भी काम या कैसा भी क्षेत्र हो मेहनत तभी सफल होती हैं जब मन में जीत का उत्साह हो, खुशी हो।

कितनी बार यह देखने को मिलता है शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी ऐसा काम कर देता है कि देखने वाले दांतो तले उंगली दबा देते हैं। मन की मजबूती सफलता का द्वार खोलती है,  मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति में भी मन को हतोत्साहित नहीं होने देती हैं और वह व्यक्ति शीघ्रता से उस हालात पर काबू कर कर लेता है और अपनी मनचाही जीत का रास्ता प्रशस्त कर लेता है। मन में अगर विश्वास हो तो छोटा सा काम भी बड़े से बड़ा काम भी आसान हो जाता है मन में जो शक्ति हैं वह अद्भुत शक्ति है। किसी ने ठीक ही कहा है :  " मन के हारे हार है मन के जीते जीत......."
       
उर्मिला राठौड़
The Fabindia school
urd@fabindiaschools.in

Thursday, October 22, 2020

जीवन मे शिक्षा का महत्व - उस्मान गनी

इल्म, ज्ञान, शिक्षा व नॉलेज शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची है। देखने में सभी शब्द बहुत छोटे हैं मगर इन्ही शब्दों के सहारे पूरी दुनिया चल रही है। यदि एक मिनट के लिए सोचा जाए कि दुनिया से इल्म या ज्ञान पूरी तरह से खत्म हो जाए तो क्या होगा ? तुम तुम्हारे और हम हमारे ! यानि किसी का किसी से कोई लेना-देना ही नहीं होगा। दुनिया पूरी जंगल बन जाएगी और फैल जाएगा जंगलराज। इसलिए इल्म या ज्ञान इंसान के लिए बेपनाह जरूरी है। एक सामान्य जिन्दगी जीने के लिए इंसान को रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा अगर किसी चीज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है वह है ज्ञान।  क्योंकि ज्ञान वह बैसाखी है जिसके सहारे इंसान,  इंसानियत का तरीका सीखता है। 

जाहिल इंसान और अनपढ़ इंसान जानवरों से बदतर जिंदगी गुजारते है।  जब तक इंसान के पास ज्ञान या इल्म नहीं है वह तरक्की की राह पर आगे नहीं बढ़ सकता है। मगर इल्म हासिल करने वाला अवश्य ही तरक्की की मंजिलों को तय करता हुआ बुलंदी हासिल करता है। यानि इल्म वो शमां है जो इंसान की जिंदगी की राह को रोशन करती है जिसके ज्ञान के ऊजाले के सहारे इंसान हर तरह से अपनी जिंदगी रोशन करता है। इसलिए इंसान को जहां से भी जो इल्म मिले उसे हासिल करते रहना चाहिए क्योंकि इल्म से ही बुलंदी नसीब होती है। इसलिए कहा गया है -
'खुदी  को  कर  बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे तेरी रजा क्या हैI'

ज्ञान वह इनवेस्टमेंट हैं जिसका मुनाफा जीवन के अंत तक मिलता रहता है। यानि दुनिया की हर वस्तु खर्च करने के बाद अवश्य खत्म होती है। मगर शिक्षा या इल्म ऐसा धन है जिसे जितना अधिक खर्च किया जाएगा वह उतना ही अधिक बढ़ता जाएगा । दुनिया की हर वस्तु की चोरी हो सकती है मगर ज्ञान ऐसा धन है जिसकी कभी चोरी नहीं हो सकती। ज्ञान में कमी तभी हो सकती है जबकि इसे खर्च नहीं किया जाए या इकठ्ठा  करके रखा जाए। इसलिए ज्ञान को बांटते व हासिल करते रहना जरूरी है।

आज के दौर की हर कौम के मुखिया के साथ-साथ परिवार के मुखिया के लिए यह जरूरी हैं कि वे खुद अगर अच्छी शिक्षा नहीं पा सके हैं तो कोई बात नहीं मगर अपने बच्चों को उन्हें पूरी कोशिश कर अच्छी शिक्षा देने के लिए आगे आना चाहिए। केवल सोचते रहने से कुछ नहीं होगा, आगे बढ़कर पहल भी करनी पड़ेगी। इस पहल को अंजाम देने के लिए चाहे घर में दो निवाले कम खाए मगर अपने बच्चों को जरूर पढ़ाए। क्योंकि
'सोचने से कहां मिलते  हैं तमन्नाओं के शहर, चलना भी जरूरी है मंजिल को पाने के लिए।'
*धन्यवाद*
उस्मान गनी

Saturday, October 17, 2020

अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन - उषा पंवार

अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस प्रत्येक वर्ष 17 अक्टूबर को मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य विकासशील देशों में और विश्व समुदाय में गरीबी समाप्त करना है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 22 दिसंबर 1992 को प्रत्येक 17 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस मनाए जाने की घोषणा की गई थी। इस दिवस पर अलग-अलग राष्ट्रों द्वारा गरीबी उन्मूलन के लिए प्रयास, विकास एवं विभिन्न कार्यों और योजनाओं को जारी किया जाता है।

भारत में गरीबी का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, कमजोर कृषि, भ्रष्टाचार ,जातिवाद ,ऊंच-नीच, अशिक्षा, बेरोजगारी, अमीर-गरीब में भेदभाव आदि है। भारत में गरीबी का प्रमुख कारण बढ़ती जनसंख्या और गरीबी है। गरीबी के विभिन्न प्रभाव हैं जैसे अशिक्षा ,खराब आहार पोषण, बाल श्रम, बेरोजगारी आदि घर अच्छे कपड़े उचित शिक्षा आदि पैसे की कमी के कारण अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ा अंतर पैदा करता है।गरीबी की समस्या को दूर करने के कुछ उपाय भी हैं जैसे किसानों को अच्छी कृषि के साथ साथ उन्हें खेती बड़ी को लाभकारी बनाने के लिए नए-नए कृषि उपकरण, तरीके आदि मिलने चाहिए। अनपढ़ लोगों को जीवन की बेहतरी के लिए आवश्यक शिक्षा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। रचित बच्चे को स्कूल जाना चाहिए और उचित शिक्षा लेनी चाहिए ।भ्रष्टाचार को समाप्त किया जाना चाहिए।

रोजगार के ऐसे रास्ते होने चाहिए जहां सभी श्रेणियों के लोग एक साथ काम कर सके और महिलाओं को भी रोजगार मिल सके। लघु और कुटीर उद्योगों, टेक्सटाइल कपड़े तथा चमड़ा उद्योग को, हस्तशिल्प को बढ़ावा देकर रोजगार बढ़ाया जा सकता है और गरीबी कम की जा सकती है। इसके अलावा प्रधानमंत्री कौशल योजना के उचित क्रियान्वयन से भी रोजगार को बढ़ाया जा सकता ह। आर्थिक वृद्धि दर जितनी अधिक होगी गरीबी का स्तर उतना ही कम होता जाएगा।

धन्यवाद,
उषा पवार
The Fabindia School
upr@fabindiaschools.in

Wednesday, August 5, 2020

शिक्षा और कोविद -१९ - Suresh Negi

कोविद -१९ महामारी के कारण, देश भर की राज्य सरकारों ने स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को अस्थायी
रूप से बंद कर दिया। मौजूदा स्थिति के आधार पर, यह नही कहा जा सकता है कि यें अब कब खुलेंगी। जब स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को फिर से खोला जाएगा तब निस्संदेह, यह शिक्षा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण समय होगा, क्योंकि इस अवधि के दौरान कई स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षाएं और प्रतियोगी परीक्षाएँ आयोजित की जायेंगी।  

तकनीकी रूप से अब पूरा भारत दो भागों में विभाजित हो चुका है, जँहा एक ओर  तकनीक-गरीबों से वंचित और तकनीक के जानकारों को  अलग कर रहा है, वंही दूसरी ओर लाखों बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं की चुनौतियों का सामना करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

कोविद -१९ महामारी, जिसने लोगों को अपने घरों में और स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को आभासी कक्षाएं लेने के लिए मजबूर कर दिया है, जिसके लिए छात्र के पास एक कंप्यूटर या कम से कम एक स्मार्टफोन, एक उचित इंटरनेट कनेक्शन और बिजली की आपूर्ति का होना अति आवश्यक है।शिक्षा का क्षेत्र, जो कभी वास्तविक स्तर पर नहीं पहुंचा था, अब छात्रों, और उनके शिक्षकों के रूप में गांवों, शहरों और कस्बों में समय की माँगों का सामना करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

उदाहरण के लिए, गाँवो में जंहा सिगनल पूर्ण रूप से न होने का सामना करना पड़ता है। वंही इस मौसम में बिजली की आपूर्ति का सामना भी करना पड़ रहा है। कई लोंगो के पास एक फोन है, लेकिन आमतौर पर बिजली नहीं है, इसलिए प्रत्येक दिन ऑनलाइन व्याख्यान लेना मुश्किल है।

कुछ लोग जिनके दो बच्चे जो एक ही स्कूल में पढ़ते ही है, उनमे से एक बच्चा ऑनलाइन कक्षाओं में भाग नही ले पाता है, क्योंकि वे दोनों एक मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं। अंत में मैं यही कहना चाहता हूँ, कि कोविद -१९ का यह दौर जल्दी से जल्दी समाप्त हो जिससे कि जो भी लोग किसी कारणवश शिक्षा से दूर हो गएँ हैं,वो दुबारे से इसका लाभ ले सकें।

Suresh Negi
The Fabindia School
sni@fabindiaschools.in

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