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Friday, September 11, 2020

स्नेह और गुणवत्ता: कृष्ण गोपाल


वर्तमान युग में गुणवत्ता का विशेष महत्व है क्योंकि हर व्यक्ति यह सोचता है कि गुणवत्ता युक्त वस्तुओं का सेवाओं का उपभोग किया जाए। स्वयं के लिए निश्चित रूप से गुणवत्ता युक्त वस्तुओं का चुनाव करेंगे। यहाँ एक कारण है जिससे गुणवत्ता युक्त वस्तुओं की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। ऐसा किसी एक क्षेत्र विशेष में नहीं बल्कि हर क्षेत्र में देखी जा सकती है।

व्यक्ति गुणवत्ता युक्त वस्तुओं का उपभोग करने में संतुष्टि का एहसास करता है। ऐसी वस्तुओं और बनाने वाली कंपनियों के प्रति लोगों को विश्वास होता है। इन वस्तुओं को क्रय करने में आर्थिक क्षति अवश्य हो सकती है किंतु वस्तु गुणवत्ता युक्त होगी, यह बात संतुष्टि का एहसास कराती है।

इसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में भी गुणवत्ता युक्त शिक्षा का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। शिक्षा के मायने बदलते जा रहे हैं। प्रयास किया जा रहा है कि शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात बेरोजगारी की समस्या पैदा ना हो।  हमारी शिक्षा प्रणाली में ऐसी व्यवस्था हो जिससे कि बालक अपने रूचि के क्षेत्र में जाए और अपना सृजनात्मक कौशल प्रकट करें। उसका मार्गदर्शन करने वाले भी ऐसे ही उत्कृष्ट हो जो उसकी रुचि को रोजगार में बदलने में सहायक हो।

हर बच्चे को सीखने के पर्याप्त अवसर मिले। किसी भी तरह का भेदभाव न करते हुए हर बच्चे को समान अवसर दिए जाए। सभी बालकों के स्तर समान नहीं होते हैं इसलिए अलग-अलग युक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अध्यापन करवाया जाना चाहिए। कोई भी बालक पिछड़ न जाये इसका विशेष ख्याल रखा जाए। ऐसे अवसर भी प्रदान किए जाएँ जिसमें बच्चे स्वयं करके सीखने का प्रयास करें। बच्चों को अपनी अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है तथा वे भावनात्मक रूप से स्वयं को सुरक्षित महसूस करें। इन सभी से बच्चों को सीखने के लिए एक साफ सुथरा माहौल मिलेगा जो बहुत आवश्यक है।

जहाँ स्नेह मिलता है, वहाँ बालक का मन रम जाता है। स्नेह प्रकट करने वालों के प्रति विश्वसनीय भावना जागृत हो जाती है। स्नेह पूर्ण वातावरण में बालक प्रसन्नता पूर्वक सीखने का प्रयास करता है। बालक के लिए स्नेह प्रकट करना एक औषधि की तरह है। सामान्य तौर पर ऐसा हर किसी के साथ हो सकता है-जहाँ प्रेम या स्नेह मिले वहाँ वातावरण खुशनुमा हो जाता है, ऐसे माहौल में सीखने की प्रक्रिया विशेष बलवती हो जाती है। अतः यह जरूरी हो जाता है कि शिक्षक अपने छात्रों से स्नेह युक्त व्यवहार करें।

स्नेह और गुणवत्ता दोनों मूल्य जहाँ मिल जाते हैं वहाँ निश्चित रूप से सीखने की प्रक्रिया और वातावरण दोनों ही अनुकूल हो जाते हैं। यदि वास्तविकता में देखा जाए तो उपर्युक्त दोनों मूल्य एक शिक्षक में होने परम आवश्यक है।  जिन शिक्षकों के पास यह दोनों मूल्य मिल जाते हैं वह बालकों के कोमल मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाने में कामयाब होते हैं। अतः अपने कार्य में गुणवत्ता लाकर तथा बच्चों को स्नेह देकर अध्यापन के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया जा सकता है।
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali 

Wednesday, August 19, 2020

विश्व फोटोग्राफी दिवस 19 अगस्त - Aysha Tak

फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो की फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट को तत्कालीन फ्रांस सरकार ने खरीदकर 19 अगस्त 1939 को आम लोगों के लिए फ्री घोषित कर दिया था। इसी उपलब्धि की याद में 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा ,आधिकारिक तौर पर इसकी शुरुआत 2010 में हुई थी । यह दिन उन फ़ोटोग्राफ़रों को समर्पित होता है जो किसी खास पल और खूबसूरत चीजों को कैमरे में कैद कर उन्हें यादगार बना देते है। 


विश्व के बहुत से फ़ोटोग्राफ़रों ने फोटोग्राफी की इस दुनिया में अपना एक अलग मुकाम बनाया है और उन्हें इस मुकाम से धन और शोहरत दोनों खूब मिले हैं। लोगों ने उनके काम को बहुत सराहना दी है। अच्छी फोटोग्राफ और विडियो बनाने के लिए फोटोग्राफर को काफी ज्यादा दिमाग लगाना पड़ता है। उसको फोटो या विडियो बनाने के लिए सही दिशा का चुनाव ,एक बेहतर कोण ,कंट्रास्ट एवं ब्राइटनेस के साथ - साथ बहुत कुछ देखकर काम करना पड़ता है। 

विश्व फोटोग्राफी दिवस का उद्देश्य पूरे विश्व में फोटोग्राफर्स को एक सरल उद्देश्य के साथ में फोटो साझा करने के लिए प्रेरित करना है। इसे अपनी दुनिया को दुनिया के साथ में साझा करना कहते हैं। किसी पल को अगर अमर करना हो तो उसे तस्वीरों में कैद कर लो। तस्वीरें किसी के प्रति आपकी भावनाओं का भी हाल बताती हैं। इंसान के पास जब इतने हाईटेक कैमरे नहीं थे , तब भी वह तस्वीरें बनाता था।
चित्र बनाना इंसान के लिए अपनी रचनात्मकता की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम रहा है। प्राचीन गुफाओं में बनाए गए भित्ति चित्र इस बात के गवाह हैं। इनके जरिए वह आने वाली पीढ़ियों के लिए बेश्कीमती सौगात छोड़ गया है। बाद में जब कैमरे का आविष्कार हुआ, तो फोटोग्राफी भी इंसान के लिए अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन करने का एक माध्यम बन गया। कुछ बातें जो हम बोल कर नहीं समझा पाते हैं , वह तस्वीरों के द्वारा आसानी से समझाई जा सकती हैं।

एक तस्वीर उन तमाम भावनाओं को व्यक्त करने का दम रखती है , जिन्हें हजार शब्द भी बयां नहीं कर पाते है। कुछ तस्वीरें ऐसी होती है जो कि कभी न भूलने वाली होती हैं , उनकी छवि हमारे दिल व दिमाग पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाती है।इन कभी न भूलने वाली तस्वीरों में करुणा , उल्लास ,आक्रोश ,दर्द और शोक नज़र आता है। कुछ तस्वीरें जो सिर्फ यादगार तस्वीरें ही नहीं बल्कि इतिहास के पन्नों में दर्ज तारीखें बन जाती हैं। 

Ayasha Tak 
The Fabindia School
atk@fabindiaschools.in 

Wednesday, June 24, 2020

आजादी और शांति: कृष्ण गोपाल


आजादी का अर्थ यह नहीं कि केवल आप  कानूनी रूप से गुलाम हो। यदि आप किसी के आदेशों की पालना करने के लिए बाध्य हो तब भी आप आजाद नहीं है, ऐसा कहा जा सकता है। स्वतंत्र रूप से आप अपने मनोवृत्ति से जो कुछ करेंगे वही स्वतंत्रता है। आजकल एक बात विशेष रूप से कही जाती है अभिव्यक्ति की आजादी, बिल्कुल लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी होनी चाहिए लेकिन उस आजादी का कहीं कोई गलत अर्थ ना निकाले या उसका कोई गलत फायदा ना उठाए, इसके लिए भी कुछ कुछ प्रयोजन होना चाहिए।

कई लोग जातिवाद को गुलामी मानते हैं कुछ हद तक सही भी है क्योंकि जहाँ तक आप अपने जीवन में कुछ भी निर्णय लेने में सक्षम ना हो तो यह एक तरह से गुलाम मानसिकता ही कही जाएगी। आजादी वहाँ है, जिसमें व्यक्ति कुछ सोचे समझेअपने अधिकारों की रक्षा करें, अपनी भलाई बुराई के विषय में स्वयं सोच सकें, अपने रोजगार के लिए मनचाहा काम कर सके, स्वयं की या अपने बालकों की शिक्षा के प्रति वह अपना निर्णय ले सकें।

इसके अलावा बालकों को भी कुछ स्वतंत्रता है कक्षा में वह अपने प्रश्न खड़े कर सके, अपनी जिज्ञासा अध्यापकों से पूछ सकें अपने मन से किसी विषय पर विचारात्मक लेख लिख सकें, उसे अपने विचार प्रस्तुत करने की आजादी है। यह जरूर है कि यह विचार देश के कानून के विरुद्ध ना हो, वैद्य हो, बालक और अभिभावक अपनी इच्छा से शिक्षा के लिए साधन संस्था और माध्यम चुन सकते हैं।

यह स्वतंत्रता एक तरह से एकता का काम भी करती है। लोगों को वह एक सूत्र में बाँधने का काम करती है। उदाहरण के लिए लोग अपने मित्र स्वयं चुन सकते हैं और अगर चुने हुए मित्र हैं तो उनमें घनिष्ठता होगी ही। शिक्षा का माध्यम और लक्ष्य भी अगर स्वयं ने चुना है तो उसके प्रति भी जागरूक होंगे। खुद में कुछ कर गुजरने की क्षमता रखेंगे, पूर्ण मनोयोग से सफलता अर्जित करने के लिए तैयार रहेंगे। इस प्रकार जीवन में स्वतंत्रता की बड़ी महत्ता है। यह सूक्ति में जैसे कहा गया है, 'पराधीन सपनेहु सुख नाहीं' अर्थात पराधीन व्यक्ति को तो सपने में भी सुख नहीं मिल सकता है और जब व्यक्ति सुखी नहीं रहेगा तो वह अपने देश को स्वयं को आगे बढ़ाने में कभी सफल प्रयत्न नहीं कर सकता।

यदि व्यक्ति मानसिक रूप से स्वतंत्र रहेगा, तो वह मानसिक शांति को भी महसूस करेगा और अगर मन शांत होगा तब वह समाज को कुछ नया देने में सक्षम बनेगा अगर मन अशांत रहेगा तब वह कुछ भी नया नहीं कर पाएगा। प्राचीन समय में हम मानसिक शांति के बारे में सुनते रहे हैं। मनुष्य मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए कई प्रयत्न करता है। कई लोग सोचते हैं कि अगर हम एकांत में चले जाएँ तो शायद मानसिक शांति मिलेगी या शायद किसी और विकल्प से शांति मिले क्योंकि अशांत मन और मस्तिष्क समाज के लिए विकास नहीं कर सकता।

ऐसा ही बालकों के लिए भी है बालकों को शांति मिलती है, खेलों से उसके सहपाठियों से यहाँ तक कि अध्यापकों से भी। उदाहरण के लिए जब कोई एक बालक में विद्यालय में प्रवेश करता है तो उसका मन अशांत रहता है क्योंकि उसे लगता है, यहाँ कौन मेरा मित्र होगा, अध्यापक कैसे होंगे, विद्यालय कैसा होगा, क्या मैं यहाँ अपने आप को समायोजित कर पाऊँगा या नहीं ? यह सारे प्रश्न जो है वह बालक के मन में अशांति पैदा करते हैं लेकिन अगर उसे विद्यालय में एक स्वच्छ वातावरण मिले, अच्छे मित्र मिले, अच्छे अध्यापक मिले, खेल का वातावरण मिले, विद्यालय में अगर उसकी बात सुनी जा रही हो, ऐसा अगर माहौल मिले तो बालक निश्चित रूप से मानसिक शांति महसूस करेगा। साथ ही साथ वह विद्यालय और समाज के लिए एक उत्पादक के रूप में कार्य करेगा।

इसलिए ऐसा नहीं है कि कहीं एकांत में चले जाएँ तो वहाँ हमें शांति मिलेगी। मानसिक शांति हमें अपने तरीके से ही सबके बीच में रहकर ही प्राप्त करनी पड़ेगी। लेकिन बालक के लिए परिवार भी महत्व रखता है। परिवार में भी अगर किसी प्रकार से माहौल ठीक ना हो तो बालक के लिए मानसिक अशांति पैदा करता है। इसलिए अभिभावकों की भी जिम्मेदारी है कि बालक को एक स्वस्थ और स्वच्छ परिवेश प्रदान करें तभी बालक उन्नति कर सकेगा। इस प्रकार देखा जा सकता है कि स्वतंत्रता और मानसिक शांति यह दोनों ही मूल्य बालक और हर व्यक्ति के लिए परम आवश्यक है। अतः उनकी चिंता की जानी चाहिए इनके लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए तभी हम और समाज प्रगति कर पाएँगे।
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali

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