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Monday, January 27, 2025

प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना - Arthur Foot Academy

Tailored PLP Solutions for Schools  
Join us for our engaging PLP Monthly Sessions at the Arthur Foot Academy! Discover innovative strategies and collaborative learning experiences designed to enhance your educational journey. Don't miss out on this opportunity to empower your school community!

Is Your Child Ready To Face The World, a bestselling book by Dr Anupam Sibal, a Learning Forward India Foundation board member. The Arthur Foot Academy customised Professional Learning Program is construted around book reading; the reachers meet every month to read a chapter and share their reflections.


In honour of Arthur Edward Foot's ideals, a dedicated group of Old Boys of The Doon School with Asad Khan leading have joined forces to create a lasting legacy for their first Headmaster, the Arthur Foot Academy. The academy is committed to providing a well-rounded education to the children of Bandarjhud, a small village near Dehradun. 


The Arthur Foot Academy, as a member of the Good Schools Alliance, is dedicated to fostering the personal and social development of each student. The academy emphasizes service, skill development, athletics, and academic study as core components of its educational approach. The mission of the school is to equip students with the confidence to navigate the world successfully. In January 2025, the academy hosted a Professional Learning Program (PLP) session, during which teachers demonstrated their enthusiasm for learning and shared insights into the joy of educational experiences.

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प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना इस पाठ के माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें जीवन में कभी बहाने और किस्मत को दोष नहीं देना चाहिए। अगर हम ऐसा करते हैं तो यह हमारे जीवन की हार होती है। अगर मेरे पास पैसे होते तो मैं अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेती। मेरे पास अगर बहुत ज्यादा पैसे हो तो मैं अपने जीवन में सफल हो जाती ज्यादा पैसा होने से मनुष्य की इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती इच्छा हमेशा बढ़ती ही जाती है जिससे जिससे हम खुश नहीं हो पाए क्योंकि इच्छा असीमित होती है जो कभी पूरी नहीं होती। जैसे हमारी लाइफ में प्रॉब्लम है तो हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए हमें उनका सामना करना चाहिए और हमारे जीवन का एकमात्र यही लक्ष्य होना चाहिए। जब माता-पिता बच्चों के सामने बहाने बनाते हैं और बच्चे उन्हें ऐसा करते देखे हैं तभी वह भी बहाने बनाने सीख जाते हैं और अपने कम से पीछे हट जाते हैं। और सिमी जिसने 2003 में एक क्लीनिक में एक मैनेजर के रूप काम करना शुरू किया जिसकी हंसी बहुत ही प्यारी थी और उसका व्यवहार सबको बहुत अच्छा लगता था। सिमी बहुत बीमार हुई उसने अपनी लाइफ में बहुत ही ज्यादा संघर्ष किया और परेशानियों का सामना किया उसकी बहुत सर्जरी हुई लेकिन उसने कभी किसी को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह इतनी ज्यादा परेशानियों से गुजर रही है। और ना ही वह किसी की दया की पात्र बनना चाहती थी। ऐसे बहुत से उदाहरण है हमें भी अपने जीवन शैली में कभी घबराना नहीं चाहिए। उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। दूसरों से अच्छी बातें सीखनी चाहिए। और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने चाहिए तभी हम अपने लक्ष्य की प्रति कर सकेंगे क्योंकि बहाने बनाने से कुछ नहीं होता है इससे हम वैदिक को देते हैं जो हमें पाना था । 

रीना 


पाठ में मैंने पढ़ा कि एक लड़की सिमी जो संधि शोध की बीमारी से पीड़ित होती हैं| तथा किस प्रकार उसने अपनी बिमारी को बहाना नहीं बनाया और इसी प्रकार संगीतकार बीथोवेन और स्टीवन स्पीलबर्ग, रूजवेल्ट, बॉबी के उदाहरण दिए गए है | इन सभी लोगों को देखकर हमको यही शिक्षा मिलती हैं। कि अगर हमको ईश्वर ने हाथ, पांव व देखने के लिए आँखें दी है। और हमारा शरीर बिल्कुल ठिक है। तो हम भी वह कर सकते हैं। जो हम चाहते है। लेकिन वह तभी संभव है। जब हम मेहनत करेंगे और हमारे पास कोई बहाना बनाने का समय न हो। जैसे कि पाठ में आया एक वाक्य "मैं सपने रात में नहीं दिन में देखता हूँ।" सपने दिन में देखने का मतलब हैं, की खुली आंखों से सपने देखना तथा ऐसे सपने जो आपको नींद ही न आने दे। इस प्रकार पाठ में मैंने यही सीखा की अगर हमें अपनी मंज़िल तक पहुंचना हैं। तो हमें हर परेशानी को स्वीकार करना होगा,और आगे बढ़ना होगा। क्योंकि कहते हैं की बिना संघर्ष किए कुछ प्राप्त नहीं होता।प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना वैसे तो सभी अपनी जिंदगी में किसी न किसी तरह से हर मुश्किल परिस्थितियों का सामना करते है और जिन्हे नहीं कुछ नहीं करना होता है तो बहुत से बहाने बनाकर अपने मन को शांत करने कि कोई करते है  जो इंसान प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना हिम्मत और लगन से कर सकते है तो उनकी जीत निश्चित है जैसे इस पाठ में मुझे स्ट्रटजमैन की कहानीअच्छी लगी जो बिना हाथों के भी सबसे लंबे सही निशाने के लिए गिनीज विश्व रिकॉर्ड बनाया क्योंकि देखा जाय तो बिना हाथों के इंसान कुछ भी नहीं है लेकिन उनकी कहानी पढ़कर ऐसा लगता है कि अगर इंसान चाहे तो कुछ भी मुश्किल नहीं है जब वे बिना हाथों के अपने सारे कार्य कर दिया है तो जैसे उन्होंने 2012 में लंदन के पैरालिंपि गेमज मैं उन्होंने तीरंदाजी में रजत पदक जीता अगर बिना हाथों के भी वे विश्व रिकॉर्ड बना सकते है तो दुनिया में परिश्रम करने वाले कभी हार नही सकते इसलिए हमें प्रतिकूल परिस्थितियों को देखकर कभी घबराना नहीं चाहिए बल्कि उसका सामना करना चाहिए फिर जीत निश्चित है

ललिता पाल

हमे अपने जीवन में हर प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना चाहिए।अपना लक्ष्य पाने के लिए हमें कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता होती है।हमें खुद को कमजोर ना समझकर हर परिस्थिति का सामना करना चाहिए।सफल होने का आत्मविश्वास हमारे अन्दर चाहिए।जैसे पाठ प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना। में हमनें पढ़ा हैं कि कैसे जीन डोमिनिक बॉबी जी का उदाहरण दिया गया है। की कैसे वह तैतालिस साल की उम्र में एक भयानक रूप से लकवा मार गया। और वह कोमा में चले गए। इन परिस्थितियों के बावजूद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कभी भी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया। बल्कि हर परिस्थिति का सामना करते हुए। प्रसिद्ध पुस्तक थे डाइविंग बेल एंड द बटरफ्लाई नामक किताब लिखी। हमें इनसे प्रेरणा मिलती है कि हमें जीवन में हर परिस्थिति का काम करने का आत्मविश्वास हमारे अंदर होना चाहिए। अपने जीवन में किसी भी परिस्थिति को लेकर हार नहीं माननी चाहिए। बल्कि उसका सामना करना चाहिए।

स्वाति


हमें जिंदगी में मुश्किलों का सामना करना चाहिए ना कि उनसे हमें भागना चाहिए जैसे सिम्मी किशोर अवस्था मेथी जब उन्हें संधि शोथ की बीमारी हुई तो उनके जोड़ों में दर्द और जोड़ों में सूजन आती थी उन्होंने जोड़ों के सूजन के की दवाई ले रही थी तो उनकी हालत सही होने के बावजूद बिगड़ ने लगी 21 वर्ष की सिम्मी को घुटनों में इतना दर्द रहने लगा कि उनको प्रत्यारोपण करवाने की नौबत आ गई थी पर सीमी किशोर ने  कभी एहसास नहीं होने दिया कि उनको कोई परेशानी है वह सामने वालों को  खुश रखना ही उनकी आदत थी उन्होंने कभी बहाने नहीं बना कि मुझे यह दिक्कत या परेशानी है ऐसे ही हमें भी अगर बहानो। का ख्याल आए तो हमें सिम्मी की बहादुरी देखनी चाहिए उन्होंने कभी हार नहीं मानी ऐसे ही हमें मुश्किलों का सामना करना चाहिए ।

साक्षी खन्ना

समय और परिस्थितियाँ के प्रतिकुल होने पर हमें जीवन में, कब या किन परिस्थितियों में हमें बिना लड़े, हालत से समझौता कर लेना चाहिए या स्थिति को चुपचाप स्वीकार करना चाहिए? मैं शायद उन लोगों में से नही हूँ जो परिस्थितियों से लगातार लड़ते रहते है और न ही उन लोगों में से हूँ जो परिस्थितियों के सामने झुक जाते है ,उन्हें स्वीकार कर लेते है।

मेरा मानना है कि आपको हर परिस्थिति को पहले समझना होंगा ।उसके सही और गलत परिणामों पर विचार करना होंगा ।फिर आपको कब लड़ना है और कब झुकना है ये स्वयं ही समझ आ जायेगा। कभी कभी जीवन में भी लड़ना जरूरी   होता है और कभी कभी झुकना ।मैं यहां लड़ना नही बोलुंगा  बल्कि कोशिश करना बोलुंगा उस परिस्थिति में खुद को संभालने की।

जीवन ऐसा जिये कि कभी अपने किसी काम के लिए पछतावा न हो कि अगर ये कर लिया होता या फिर ये नही किया होता। परिस्थितियाँ सर्वशक्तिमान होती है लेकिन फिर भी वक़्त के साथ इनको भी बदलना पड़ता है । समय का हाथ पकड़ लो तो आप हर मुश्किल को आसान बना लेंगें।

मैं जब भी कभी किसी बदलाव को आते देखता हूँ तो पहले अपनी तरफ से हर सम्भव कोशिश कर्ता हूँ कि उस बदलाव के सभी पक्षों को स्पष्ट रूप से देख सकूँ और जहां तक बोलने या कुछ करने की जरूरत होती है तो कर्ता  हूँ और जब लगता है अपने हाथ में नही है ये स्थिति ,तो उसे ईश्वर पर इस विश्वास के साथ छोड़कर कि वो जरूर अच्छा ही करेंगे ,स्वयं को साक्षी के रूप में देखने की कोशिश करने मुझे लगता  हूँ।

अभी तक का अनुभव अच्छा ही रहा है । परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन बनी हो पर परिणाम हमेशा मेरे पक्ष में ही आये है।

देवानंद

पाठ  प्रतिकूल परिस्थितियों  का सामना करने से हमे यह शिक्षा मिलती है। यदि हमे अपने जीवन मे सफल होना है। हमने अपने जीवन मे जो लक्ष्य देखा है। उसे प्राप्त करने के लिए हमें निरंतर प्रयास करना चाहिए। और हमें बहाने नहीं बनाने चाहिए की मेरे भाग्य ने साथ नहीं दिया और मैं अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाया।               

सपने वे नहीं होते जो हम नींद में देखते हैं। बल्कि सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते। वास्तविक जीवन में ऐसे बहुत से व्यक्तियों से इतिहास भरा पड़ा है जिन्होंने अजय लगने वाली विपरीत परिस्थितियों को जीत कर दिखाया है। सिमी सिंह जो एक क्लीनिक में मैनेजर थी लेकिन अधिक बीमार हो जाने के कारण तथा अपने पैरों पर खड़ा ना होने के कारण उन्होंने धैर्य नहीं  खोया कठिन परिस्थितियों में भी वे मुस्कराती रही। और वह अपने लिए खुद ही खड़े होना चाहती थी। वह अपने जीवन मे किसी के उपकार का हिस्सा नहीं बनना नहीं चाहती थी। वे आत्मनिर्भर बनना चाहती थी। जिस कारण संसार उन्हें एक सकारात्मक सोच के नजरिए से उन्हें देख सके। तथा दूसरे व्यक्ति भी उनसे प्रोत्साहित हो सके। तथा अपने जीवन मे  अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके। 

नीरज कुमार    


पाठ में मैंने पढ़ा कि एक लड़की सिमी जो संधि शोध की बीमारी से पीड़ित होती हैं| तथा किस प्रकार उसने अपनी बिमारी को बहाना नहीं बनाया और इसी प्रकार संगीतकार बीथोवेन और स्टीवन स्पीलबर्ग, रूजवेल्ट, बॉबी के उदाहरण दिए गए है | इन सभी लोगों को देखकर हमको यही शिक्षा मिलती हैं। कि अगर हमको ईश्वर ने हाथ, पांव व देखने के लिए आँखें दी है। और हमारा शरीर बिल्कुल ठिक है। तो हम भी वह कर सकते हैं। जो हम चाहते है। लेकिन वह तभी संभव है। जब हम मेहनत करेंगे और हमारे पास कोई बहाना बनाने का समय न हो।

 जैसे कि पाठ में आया एक वाक्य "मैं सपने रात में नहीं दिन में देखता हूँ।" सपने दिन में देखने का मतलब हैं, की खुली आंखों से सपने देखना तथा ऐसे सपने जो आपको नींद ही न आने दे। इस प्रकार पाठ में मैंने यही सीखा की अगर हमें अपनी मंज़िल तक पहुंचना हैं। तो हमें हर परेशानी को स्वीकार करना होगा,और आगे बढ़ना होगा। क्योंकि कहते हैं की बिना संघर्ष किए कुछ प्राप्त नहीं होता। 
साक्षी पाल 

Saturday, August 28, 2021

Quality and Love - Asha Bhandari

Quality गुणवत्ता
अगर कोई बच्चा कक्षा व गहृ कार्य ठीक से नहीं कर पा रहा है, तो हमें बच्चे के पास बैठ कर  उसकी समस्या सुननी चाहिए। बच्चे के घर में कोई समस्या तो नहीं चल रही है। जिस कारण बच्चा अपने काम के प्रति जागरूक नहीं हो पा रहा है। जब बच्चा कक्षा में उपस्थि त होकर भी कार्य में ध्यान नहीं लगा पाता है तो नि श्चय ही उसके दिमाग में कुछ चल रहा होता है। यह उसके घर के माहौल या साथि यों का भी असर हो सकता है।

हमें बच्चे के साथ प्यार का रिश्ता बना कर उसके मन और दिमाग में चल रही समस्या का समाधान ढूंढ कर बच्चे की सहायता करने की कोशि श करनी चाहि ए। अगर बच्चा कक्षा में गुमसुम बठै है और आपकी बात का कोई जवाब नहीं दे रहा है तो हमें अकेले में बच्चे से बात करनी चाहिए। जब वह बच्चा कार्य में थोड़ी भी रुचि दिखाता है तो हमें सबके सामने उसे प्रोत्साहित करना चाहिए।


Love प्यार
कक्षा में जब बच्चे का दाखिला करते हैं, तो वह अपने घर की सारी बातें अपने दोस्तों तथा अपने अध्यापक को बताता है। इसी प्रकार वह स्कूल की सारी बातें घर जाकर अपने माता - पिता को बताता है। कक्षा में वह अपने मन पसंद अध्यापक या साथियों के साथ बैठना पसदं करता है। धीरे धीरे उसकी यह पसंद एक लगाव का रूप ले लेती है। अगर उसका पसंदीदा अध्यापक या दोस्त किसी वजह से कक्षा में उपस्थित नहीं होता है तो उसका मन कक्षा में नहीं लगता है। इसके लिए अध्यापक को चाहिए कि वह समय-समय पर बच्चों को अलग-अलग दोस्तों के साथ बिठाए। सभी बच्चों के अदंर कोई ना कोई खूबी अवश्य होती है। कोई बच्चा देखने में सुंदर होता है तो कोई पढ़ाई में बहुत होशि यार होता है।


- Asha Bhandari @JMMS, John Martyn Memorial School, Salangaon, Dehradun

Tuesday, July 27, 2021

Thoughtfulness and Understanding - Asha Bhandari

विचारशीलता और समझदारी
कक्षा में पढ़ाने से पहले हमें यह खुद भी समझ लेना है कि हम जो बच्चों को सिखाने जा रहे हैं वह बच्चों की समझ में आ रहा है या नहीं ।हमें खुद भी बच्चों की समझ के हिसाब से काम देना चाहिए हमें हमें काम बच्चों की समझ के हिसाब से ही कराना चाहिए जिस प्रकार हम कक्षा में पहले दिन केवल परिचय ही से शुरु करते हैं ।जब कोई बच्चा किसी आसान कार्य को कर देता है तो उसका उत्साह बढ़ जाता है और धीरे-धीरे हम बच्चे की क्षमता को देखते हुए अभ्यास कराते हुए आगे बढ़ते हैं ।जब धीरे सीखने वाला बच्चा थोड़ा अच्छा सीखता है तो हमें उसे उत्साहित करना चाहिए इससे बच्चों के अंदर सीखने की इच्छा जागृत हो जाती है ।और  उनके अंदर की डर  समाप्त हो जाती है ।बच्चा किसी टीचर के सामने अपने मन की बात कहने मे सहज नहीं होता है लेकिन अपने साथी से वह अपनी समस्या को आसानी से कह देता है ।बच्चे आपस में एक दूसरे की समस्या को सुनते हैं और उसका समाधान ढूंढने की कोशिश करते हैंI

परवाह
अगर कोई बच्चा किसी कारण से रोज स्कूल देर से आता है या ग्रह का है पूरा नहीं करता है तो टीचर को पता करना चाहिए कि बच्चे की क्या समस्या हो सकती है। कभी किसी के घर का माहौल पढ़ाई के अनुकूल नहीं है या घर में कोई सदस्य बीमार है तो भी बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है इसके लिए बच्चे के साथ प्यार या दोस्ती का रिश्ता बनाना चाहिए। बच्चे को सहारा देकर कहानी या किसी महापुरुष की जीवन गाथा सुना कर बच्चे को प्रोत्साहित करना चाहिए। जैसे लगातार कोशिश करने पर एक चींटी भी दीवार के ऊपर चढ़ जाती हैं उसी प्रकार धीरे सीखने वाला बच्चा भी अच्छा कर जाता है।  बच्चे का विश्वास अपने अभिभावक से ज्यादा टीचर पर होता है वह अपने मन की बात टीचर से बेझिझक करता है और आशा करता है की टीचर उसका सही मार्गदर्शन करेंगे। हम बच्चों को खेल के माध्यम से भी प्रोत्साहित कर सकती हैं। खेल में बच्चों को हार जीत पर ध्यान न देकर अपना बेहतर प्रयास देना चाहिए। कक्षा में भी जो बच्चे होशियार हैं उन्हें दूसरे बच्चों का भी ध्यान रखना चाहिए। इससे बच्चों के मन में दूसरों की परवाह करने की भावना पैदा हो जाती है।। कक्षा में बच्चों को दो टीम में बांट कर अंताक्षरी या कोई खेल खिला कर भी प्रोत्साहित किया जा सकता है हमें समय-समय पर बच्चों को क्लास रूम से बाहर लाकर कोई खेल या कंपटीशन अवश्य कराना चाहिए।इससे बच्चों का रुझान भी पता लग जाता है।। कभी-कभी कोई बच्चा पढ़ाई में ज्यादा अच्छा नहीं होता लेकिन दूसरी एक्टिविटी में वह बेहतर करता है और अपने जीवन में आगे बढ़ जाता है।

- Asha Bhandari@JMMS, John Martyn Memorial School, Salangaon, Dehradun 

Sunday, June 7, 2020

विनम्रता और प्रशंसा: कुसुम डाँगी


विनम्रता का अर्थ है किसी के मन को ठेस ना पहुँचाना, किसी से इज्ज़त या सरलता से बात करना भी विनम्रता हैं। इस शब्द के कई मतलब हो  सकते है, जैसे - अंहकार, घंमड ना करना अगर आप किसी भी ऊँचे पद पर हो फिर भी हर कर्मचारी के साथ सरलता से बात करते हो, उनकी समस्या को समझते हो, ये भी विनम्रता है।

विनम्र व्यक्ति हर जगह सम्मान का पात्र बनता है और लोग उनकी बातों  को ध्यान से सुनते हैं। ऐसे लोगों में धैर्य भी अधिक होता हैं, जिससे वे सफलता को आसानी से प्राप्त करते हैं। यदि आप विनम्र होंगे तो दूसरों  के साथ आपका रिश्ता भी अच्छा होता हैं। कभी बच्चों को उनकी मनपसंद चीज़ चाहे ना मिले तो भी वे शिकायत नहीं करेंगे बल्कि जो उनके पास हैं, उसी में खुश रहेंगे जिससे वे संयम से जीना सीखेंगे। और ऐसे लोगों को मन की शांति भी मिलती हैं।

जिस प्रकार दूसरों को अपना समय, धन, या सलाह देकर उनका भला करते हैं। उसी तरह प्रोत्साहित करके भी भला कर सकते हैं। जब कोई इंसान कोई कार्य करता हैं, उसमें अगर उसको दूसरों से प्रशंसा मिल जाती हैं तो वह इंसान अगली बार वह उससें भी बेहतर करने की कोशिश करता हैं और अधिक मन लगाकर काम करता हैं।

विनम्रता और प्रशंसा दोनों ही बच्चों के लिए आवश्यक है। ऐसे लोगों में अंहकार नहीं होता है जिससें वे दूसरों की खुलकर प्रशंसा करते हो और दूसरों को बेहतर भविष्य निर्माण में योगदान देते हैं।

"अपने आपको कम सोचना नहीं बल्कि अपने बारे में कम सोचना विनम्रता हैं"
Kusum Dnagi
The Fabindia School, Bali

Monday, April 20, 2020

गृहकार्य एवं शिक्षण : आयशा टॉक


वर्तमान स्थिति कई बच्चों को आजकल हर शाम गृहकार्य करने में घंटों समय लगाना पड़ता है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे बच्चों को उनके शैक्षणिक जीवन में मदद मिलेगी। कुछ लोगों को लगता है कि गृहकार्य ज्यादातर बेकार है। 

गृहकार्य के सकारात्मक पहलू कुछ इस प्रकार है -
गृहकार्य के कई फायदे हैं ,अगर इसे सही मात्रा में एवं सही समय पर दिया जाए। इसका कारण यह है कि छात्रों को विद्यालय में जो भी नया सिखाया जाता है उसको स्मरण रखने के लिए अभ्यास की आवयश्कता होती है। घर पर चुपचाप बैठकर यह पता लगाना होगा कि वे नई जानकारी एवं नए विचारों को कितनी अच्छी तरह समझते है ? गृहकार्य के द्वारा शिक्षक को यह जानने में सहायता मिलती है कि छात्रों ने क्या सीखा और जो भी पढ़ाया गया है वह छात्रों को कितना समझ में आया है ? गृहकार्य के द्वारा बच्चों की शिक्षा में माता -पिता को भी शामिल किया जा सकता है। अगर माता -पिता पढ़े -लिखे होते हैं , तो बच्चे की गृहकार्य में सहायता कर सकते हैं। वे बच्चे को प्रोत्साहित कर सकते है और उनकी प्रगति देख सकते है। 

गृहकार्य के नकारात्मक पहलू कुछ इस प्रकार है -
 शिक्षकों को गृहकार्य देने के दौरान गृहकार्य की मात्रा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। बहुत ज्यादा मात्रा में गृहकार्य देने से बच्चे परेशान हो जाते है। उन्हें खेलने आराम करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। इससे बच्चों में तनाव की समस्या उत्पन्न हो सकती है। लम्बी छुट्टियों में बच्चों को गृहकार्य करना पसंद नहीं होता है। फिर भी वह गृहकार्य को बोझ समझ कर जैसे-तैसे खराब लिखावट में कर देते हैं और अध्यापक को देखने-समझने एवं जाँचने में परेशानी आती है। 

बच्चों को विद्यालय से घर आने के बाद में अन्य अध्यापक के पास में पढ़ने के लिए नहीं भेजना चाहिए। इससे उस पर कार्यभार बढ़ सकता है। उसके विद्यालय के  अध्यापक एवं अन्य अध्यापक के पढ़ाने का तरीका अलग -अलग हो सकता है। इससे छात्र को समझ नहीं आता कि कौन सही कौन गलत पढ़ाता है। जो अध्यापक घर पर भी पढ़ाते है, अगर उनको जिस विद्यालय में वे नौकरी करते है, उस विद्यालय में ही उनकी तनख्वाह अच्छी मिलती हो तो उनको और पैसे कमाने के लिए घर पर शिक्षण कार्य करने की जरूरत ही पड़े। वे उस समय को अपने विद्यालय में अपने कार्य को और बेहतर बनाने के लिए योजना बनाने में उपयोग कर सकते है।
Ayasha Tak
The Fabindia School, Bali

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