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Saturday, August 28, 2021

Quality and Love - Asha Bhandari

Quality गुणवत्ता
अगर कोई बच्चा कक्षा व गहृ कार्य ठीक से नहीं कर पा रहा है, तो हमें बच्चे के पास बैठ कर  उसकी समस्या सुननी चाहिए। बच्चे के घर में कोई समस्या तो नहीं चल रही है। जिस कारण बच्चा अपने काम के प्रति जागरूक नहीं हो पा रहा है। जब बच्चा कक्षा में उपस्थि त होकर भी कार्य में ध्यान नहीं लगा पाता है तो नि श्चय ही उसके दिमाग में कुछ चल रहा होता है। यह उसके घर के माहौल या साथि यों का भी असर हो सकता है।

हमें बच्चे के साथ प्यार का रिश्ता बना कर उसके मन और दिमाग में चल रही समस्या का समाधान ढूंढ कर बच्चे की सहायता करने की कोशि श करनी चाहि ए। अगर बच्चा कक्षा में गुमसुम बठै है और आपकी बात का कोई जवाब नहीं दे रहा है तो हमें अकेले में बच्चे से बात करनी चाहिए। जब वह बच्चा कार्य में थोड़ी भी रुचि दिखाता है तो हमें सबके सामने उसे प्रोत्साहित करना चाहिए।


Love प्यार
कक्षा में जब बच्चे का दाखिला करते हैं, तो वह अपने घर की सारी बातें अपने दोस्तों तथा अपने अध्यापक को बताता है। इसी प्रकार वह स्कूल की सारी बातें घर जाकर अपने माता - पिता को बताता है। कक्षा में वह अपने मन पसंद अध्यापक या साथियों के साथ बैठना पसदं करता है। धीरे धीरे उसकी यह पसंद एक लगाव का रूप ले लेती है। अगर उसका पसंदीदा अध्यापक या दोस्त किसी वजह से कक्षा में उपस्थित नहीं होता है तो उसका मन कक्षा में नहीं लगता है। इसके लिए अध्यापक को चाहिए कि वह समय-समय पर बच्चों को अलग-अलग दोस्तों के साथ बिठाए। सभी बच्चों के अदंर कोई ना कोई खूबी अवश्य होती है। कोई बच्चा देखने में सुंदर होता है तो कोई पढ़ाई में बहुत होशि यार होता है।


- Asha Bhandari @JMMS, John Martyn Memorial School, Salangaon, Dehradun

Tuesday, July 27, 2021

चिंताशीलता और समझदारी - Renu Raturi

चिंताशीलता (Thoughtfulness)   

चिंताशीलता एक ऐसी भावना है, जिससे हम यह दिखाते हैं कि हम अपने सामने वाले के प्रति कितने चिंतित हैं और हम उसकी कितनी परवाह करते हैं। चिंताशीलता द्वारा हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि दूसरे व्यक्ति के मन में क्या चल रहा हैं और उसकी समस्याओं का समाधान कर सकेंगे। जिससे वह भी हमें अपना समझकर अपने मन की बात सुना सके। मैं अपनी कक्षा में बच्चों में एक दूसरे के प्रति चिंताशीलता विकसित करने के लिए निम्नलिखित साधनों का प्रयोग करूंगी ...

1)सुनना (Listening) - एक अध्यापक को चाहिए कि वह अपने विधार्थियो में एक दूसरे को सुनने की भावना विकसित कर सकें जिससे बच्चे एक दूसरे की समस्या या मन की बात समझ सकें और उनमें एक दूसरे के प्रति चिंताशीलता की भावना विकसित हो सके। जब बच्चों में एक दूसरे को सुनने की क्षमता विकसित होगी तभी वे आपस में समस्याओं का समाधान भी कर सकेंगे और एक दूसरे को अधिक करीब से समझ सकेंगे। इसके लिए स्वयं अध्यापक को अपने व्यक्तित्व को विधार्थियो के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। यदि अध्यापक बच्चों को ध्यान से सुनते हैं तो बच्चे भी उनका अनुकरण करते हैं। 

 2) दयालुता (Kindness) - बच्चों में वैसे तो दयालुता की भावना होती है लेकिन बचपना भी तो बच्चों में ही होता है इसलिए एक अध्यापक को चाहिए कि वह अपनी कक्षा में बच्चों के सामने इस तरह अपना व्यक्तित्व रखें ताकि बच्चों के अंदर दयालुता की भावना विकसित हो सके। बच्चे एक दूसरे के प्रति इतने दयावान बन जायें कि वे आपस में उचित तालमेल बिठा सकें। इसके लिए मुस्कान एक ज्योति का काम कर सकती है। अगर कोई बच्चा परेशान है और वह कक्षा में किसी से भी अपने मन की बात नहीं कह रहा तो उसका साथी उससे मुस्कुरा कर उसकी परेशानी जानने की कोशिश करे तो वह बिल्कुल भी नहीं हिचकिचायेगा। अध्यापक कहानियों के द्वारा भी विधार्थियो में दयालुता की भावना विकसित कर सकता है। दयालुता के द्वारा बच्चों में चिंताशीलता की भावना विकसित करने में सहायता मिलेगी। 

3)प्रशंसा (Appreciation) - यदि हमारी कक्षा का एक विधार्थी किसी कारण से परेशान रहता है लेकिन किसी से भी अपनी परेशानी बताने में हिचकिचाहट महसूस करता है और हम उसकी मन की बात को समझने में असमर्थ हैं ऎसे में कक्षा का कोई एक बच्चा अपनी दयालुता या अपने अच्छे व्यवहार से उस बच्चे की समस्या का समाधान करने में सफल हो जाता है तो अध्यापक को मदद करने वाले बच्चे की प्रशंसा अवश्य करनी चाहिए ताकि और बच्चे भी उससे प्रेरित होकर दूसरे बच्चों के प्रति चिंताशीलता की भावना अपने आप में विकसित करने में सक्षम हों।  

समझ (Understanding) 

समझ एक ऐसी भावना है जिससे कक्षा में बच्चों में सहानुभूति की भावना विकसित करके ही अध्यापक बच्चों में एक दूसरे को समझने की क्षमता का विकास करने में सक्षम हो सकता है। 

निम्न क्रियाओं द्वारा हम बच्चों में सहानुभूति का विकास कर सकते हैं - 

1) बच्चों को प्रेरक प्रसंग सुनाकर हम बच्चों के मन में यह भाव पैदा कर सकते हैं कि यदि वे एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखें तो आसानी से कक्षा में एक-दूसरे की समस्या को समझ सकते हैं। 

2) अध्यापक स्वयं भी अपनी छवि ऐसे प्रस्तुत करें जिससे सभी बच्चों में सहानुभूति की भावना विकसित हो। यदि अध्यापक बच्चों के प्रति सहानुभूति रखेगा तो बच्चे भी अध्यापक का अनुकरण अवश्य करेंगे। 

3) कक्षा में बच्चों से समूह गतिविधियां करवायी जाये और एक - दूसरे की राय सुनने के लिए कहा जाये, उन्हें यह बताया जाय कि वे समूह गतिविधि को तभी सफल बना सकते हैं जब वे एक-दूसरे के विचारों को समझें और सहानुभूति के साथ कार्य करें। 

4) वार्ता - अध्यापक कक्षा में बच्चों से वार्ता करके भी सहानुभूति के महत्व को समझा सकते हैं। अगर छात्र वार्ता में भाग लेंगे तो निश्चित रूप से सहानुभूति को समझने में सक्षम होंगे। बच्चों के साथ वार्ता करने से छात्रों और शिक्षकों के मध्य मजबूत संबंध स्थापित करने में मदद मिलती है और वार्ता सहानुभूति को बढ़ावा देने के लिए भी एक सांकेतिक मार्गदर्शक है क्योंकि हम बच्चों को सुनने और सुनने के महत्व को सिखा रहे हैं।

       By: Renu Raturi@JMMS, John Martyn Memorial School, Salangaon, Dehradun 

Saturday, August 15, 2020

समस्या समाधान - उर्मिला राठौड़

किसी समस्या का समाधान (हल) प्राप्त करने के लिये हमें विभिन्न पहलुओं का  क्रमबद्ध तरीके से विश्लेषण करना
पड़ता है। रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत से कारक ऐसे आते है, जिनको समझ लेने की बाद ही निष्कर्ष निकलता है कि इससे कैसे निपटे और उसका सामना कैसे करे ? 

व्यक्ति मानसिक और शारीरिक तौर पर मजबूत होगा तभी ऐसी परिस्थितियों से निकल सकता है।इसके लिए हमें अपनी जीवन शैली में बदलाव करने की ज़रुरत है। एक बालक अपनी समस्याओं के निवारण हेतु कोशिश तो करेगा लेकिन सही क्रम अपनाने में गलती कर लेता है। उसके समाधान के लिए वयस्कों की मदद की आवश्कता होती है। 
सबसे पहले व्यक्ति को मानसिक तौर पर मजबूती चाहिए ।  उसके लिए एकाग्रता, सकारात्मकता होना आवश्यक है। यह तभी होगा जब हम नियमित योगाभ्यास करेंगे। अच्छे और प्रेरणास्पद साहित्य पढ़ेंगे और शिष्ट व्यक्तियों के साथ अपने विचारों का आदान प्रदान करेंगे। विपरीत परिस्थितियों से लड़ने का हौसला होगा। प्रत्येक समस्या अपने साथ समाधान रखती है बस जरूरत है तो धैर्यवान बनने की, नए तरीकों को खोजने की। हम धरती से सभी समस्याओं को मिटा नहीं सकते लेकिन उसके लिए रास्ता तो खोज सकते है। यह धैर्य और सकारात्मता से ही होगा।

 किसी विषय से संबंधित समस्याओें के लिए निरन्तर अभ्यास करना चाहिए। जिससे हमारा भविष्य बेहतर बन सके। क्योंकि हम जो हमेशा कार्य करते है वो सफलता पाने के लिए नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए है कि हम कहीं असफल न हो। 

उर्मिला राठौड़
The Fabindia School
ure@fabindiaschools.in 

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