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Tuesday, July 27, 2021

चिंताशीलता और समझदारी - Renu Raturi

चिंताशीलता (Thoughtfulness)   

चिंताशीलता एक ऐसी भावना है, जिससे हम यह दिखाते हैं कि हम अपने सामने वाले के प्रति कितने चिंतित हैं और हम उसकी कितनी परवाह करते हैं। चिंताशीलता द्वारा हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि दूसरे व्यक्ति के मन में क्या चल रहा हैं और उसकी समस्याओं का समाधान कर सकेंगे। जिससे वह भी हमें अपना समझकर अपने मन की बात सुना सके। मैं अपनी कक्षा में बच्चों में एक दूसरे के प्रति चिंताशीलता विकसित करने के लिए निम्नलिखित साधनों का प्रयोग करूंगी ...

1)सुनना (Listening) - एक अध्यापक को चाहिए कि वह अपने विधार्थियो में एक दूसरे को सुनने की भावना विकसित कर सकें जिससे बच्चे एक दूसरे की समस्या या मन की बात समझ सकें और उनमें एक दूसरे के प्रति चिंताशीलता की भावना विकसित हो सके। जब बच्चों में एक दूसरे को सुनने की क्षमता विकसित होगी तभी वे आपस में समस्याओं का समाधान भी कर सकेंगे और एक दूसरे को अधिक करीब से समझ सकेंगे। इसके लिए स्वयं अध्यापक को अपने व्यक्तित्व को विधार्थियो के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। यदि अध्यापक बच्चों को ध्यान से सुनते हैं तो बच्चे भी उनका अनुकरण करते हैं। 

 2) दयालुता (Kindness) - बच्चों में वैसे तो दयालुता की भावना होती है लेकिन बचपना भी तो बच्चों में ही होता है इसलिए एक अध्यापक को चाहिए कि वह अपनी कक्षा में बच्चों के सामने इस तरह अपना व्यक्तित्व रखें ताकि बच्चों के अंदर दयालुता की भावना विकसित हो सके। बच्चे एक दूसरे के प्रति इतने दयावान बन जायें कि वे आपस में उचित तालमेल बिठा सकें। इसके लिए मुस्कान एक ज्योति का काम कर सकती है। अगर कोई बच्चा परेशान है और वह कक्षा में किसी से भी अपने मन की बात नहीं कह रहा तो उसका साथी उससे मुस्कुरा कर उसकी परेशानी जानने की कोशिश करे तो वह बिल्कुल भी नहीं हिचकिचायेगा। अध्यापक कहानियों के द्वारा भी विधार्थियो में दयालुता की भावना विकसित कर सकता है। दयालुता के द्वारा बच्चों में चिंताशीलता की भावना विकसित करने में सहायता मिलेगी। 

3)प्रशंसा (Appreciation) - यदि हमारी कक्षा का एक विधार्थी किसी कारण से परेशान रहता है लेकिन किसी से भी अपनी परेशानी बताने में हिचकिचाहट महसूस करता है और हम उसकी मन की बात को समझने में असमर्थ हैं ऎसे में कक्षा का कोई एक बच्चा अपनी दयालुता या अपने अच्छे व्यवहार से उस बच्चे की समस्या का समाधान करने में सफल हो जाता है तो अध्यापक को मदद करने वाले बच्चे की प्रशंसा अवश्य करनी चाहिए ताकि और बच्चे भी उससे प्रेरित होकर दूसरे बच्चों के प्रति चिंताशीलता की भावना अपने आप में विकसित करने में सक्षम हों।  

समझ (Understanding) 

समझ एक ऐसी भावना है जिससे कक्षा में बच्चों में सहानुभूति की भावना विकसित करके ही अध्यापक बच्चों में एक दूसरे को समझने की क्षमता का विकास करने में सक्षम हो सकता है। 

निम्न क्रियाओं द्वारा हम बच्चों में सहानुभूति का विकास कर सकते हैं - 

1) बच्चों को प्रेरक प्रसंग सुनाकर हम बच्चों के मन में यह भाव पैदा कर सकते हैं कि यदि वे एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखें तो आसानी से कक्षा में एक-दूसरे की समस्या को समझ सकते हैं। 

2) अध्यापक स्वयं भी अपनी छवि ऐसे प्रस्तुत करें जिससे सभी बच्चों में सहानुभूति की भावना विकसित हो। यदि अध्यापक बच्चों के प्रति सहानुभूति रखेगा तो बच्चे भी अध्यापक का अनुकरण अवश्य करेंगे। 

3) कक्षा में बच्चों से समूह गतिविधियां करवायी जाये और एक - दूसरे की राय सुनने के लिए कहा जाये, उन्हें यह बताया जाय कि वे समूह गतिविधि को तभी सफल बना सकते हैं जब वे एक-दूसरे के विचारों को समझें और सहानुभूति के साथ कार्य करें। 

4) वार्ता - अध्यापक कक्षा में बच्चों से वार्ता करके भी सहानुभूति के महत्व को समझा सकते हैं। अगर छात्र वार्ता में भाग लेंगे तो निश्चित रूप से सहानुभूति को समझने में सक्षम होंगे। बच्चों के साथ वार्ता करने से छात्रों और शिक्षकों के मध्य मजबूत संबंध स्थापित करने में मदद मिलती है और वार्ता सहानुभूति को बढ़ावा देने के लिए भी एक सांकेतिक मार्गदर्शक है क्योंकि हम बच्चों को सुनने और सुनने के महत्व को सिखा रहे हैं।

       By: Renu Raturi@JMMS, John Martyn Memorial School, Salangaon, Dehradun 

Monday, July 12, 2021

अनुशासन: ज्योति सैन

स्वयं पर स्वयं का शासन कहलाता है अनुशासन

यह कोई पराधीनता नहीं, ना ही है कोई बंधन

यह है नियमों का अनुकरण,

बनता है जिससे आदर्श जीवन।“

                 अनुशासन चेतना का परिष्करण है,

                अनुशासन सिद्धांतों का अनुकरण है,

                 अनुशासन सुसंस्कारों का धरोहर है,

                  अनुशासन सफल जीवन का आधार है।“

अनुशासन को एकल शब्द कहा जाता है, जो एक औसत व्यक्ति को एक महान व्यक्तित्व में बदल देता है। इस दुनिया की सभी महान हस्तियों के बीच एक गुण है, जो सामान्य हैं वह है अनुशासन।अनुशासित दिनचर्या और उनके मन पर कठोर नियंत्रण ने उन्हें मानव जाति के इतिहास में अमर बना दिया। अनुशासन जीवन में सफलता प्राप्त करने में मदद करता है और सभी सफल लोगों की कहानियाँ हमेशा उनके जीवन में अनुशासन के महत्व को शामिल करेगी।

अनुशासन केवल दूसरों के बनाए नियमों के पालन करने को नहीं कहते, इसमें हमें स्वयं हमारे जीवन को सुव्यवस्थित व नियंत्रित ढंग से यापन करने के लिए नियमों का निर्माण करना व कठोरता से पालन करना है। अनुशासित व्यक्ति कभी जीवन में असफलता का मुँह नहीं देखता। सफल होने के लिए निरंतर प्रयास करने होते हैं। जिसमें अनुशासन एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। हमें हमेशा प्रकृति की तरह अनुशासित रहना चाहिए। जिस तरह से सूर्य समय पर उदय होता है, पृथ्वी अपने अक्ष पर घुमती है, चंद्रमा अपने समय अनुसार निकलता हैमौसम अपने समय के आधार पर बदलते हैं। ये सभी अनुशासित ढंग से अपना कार्य करते हैं। ठीक इसी तरह हमें भी अनुशासन बनाए रखते हुए लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

Jyoti Sain 
The Fabindia School
jsn@fabindiaschools.in

Wednesday, May 6, 2020

ईमानदारी और सम्मान: कृष्ण गोपाल


जीवन में मूल्यों की अधिक आवश्यकता रहती है।  यदि हम विद्यार्थियों की बात करें तो उनके लिए मूल्यों का होना अत्यावश्यक है। इस पर भी उपर्युक्त मूल्यों से विद्यार्थी जीवन लक्ष्य को प्राप्त करेगा ही।  ईमानदारी और सम्मान दोनों ऐसे मूल्य है जो हर स्थान पर चाहिए ही। 

परन्तु खेल के मैदान में इसकी अधिक आवश्यकता जान पड़ती है। एक खिलाडी को खेल और दूसरे खिलाड़ियों के प्रति ईमानदारी रखनी पड़ती है साथ ही दोनों के प्रति सम्मान का भाव भी हो। एक खिलाडी इन मूल्यों को दूसरों में जाग्रत कर सकता है।  मैदान में खेलते हुए कई लोग उसे देखते है, वह ईमानदारी और सम्मान का परिचय दर्शकों को देता है, दर्शकों में से कई उसका अनुकरण करते है। वैसे भी बेईमानी से कभी-कभी लाभ मिल सकता है परन्तु लंबे समय तक नहीं।

परीक्षा में या कहीं और स्थान पर हमें नैतिक मूल्यों को सजीव रखने की आवश्यकता है। ये दौर प्रतियोगिता का है अतः सर्वप्रथम स्वयं के प्रति ईमानदार बने। एक शिक्षक के रूप में भी अपनी गलतियाँ स्वीकार करें और बच्चों को भी प्रेरित करें।  बच्चों के समक्ष सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करें।  काम में कभी बेईमानी करें, सम्मान दें। जिस बात की हम अपेक्षा रखते है, वह पहले देनी भी तो पड़ेगी।

ये मूल्य व्यक्ति में आत्मविश्वास जगाते है और मानसिक तनाव को कम करने में सहायक है। ऐसे लोग अपने समाज में प्रतिष्ठा पाते हैं। यदि ह्रदय से सम्मान पाने की लालसा मन में है तो ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कीजिए। 
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali

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