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Friday, May 14, 2021

भावनात्मक एकता - कुसुम डांगी

Courtesy: L'entraide photos/ facebook.com
भावना के स्तर पर एक देश  या राष्ट्र के सभी जनों  में एकता का भाव रहना अत्यावश्यक हुआ करता हैं। ऐसा भाव ही भावनात्मक एकता कहलाता हैं संस्कृत  की एक कहावत है, संघीय शक्ति कलियुग, अर्थात् कलियुग में संघ संगठन या संगठन में ही वास्तविक शक्ति छिपी रहा करती हैं  संगठन का मूल अर्थ और भाव है -एकता छोटे स्तर पर घर परिवार में, सुरक्षित जीवन जीने के लिए जिस प्रकार एकता या एकत्व का भाव आवश्यक है उसी तरह किसी जाति  , देश और राष्ट्र के जीवित  प्राणवान और, सुरक्षित बने रहने के लिए एकता रहना पहली बुनियादी  शर्त हैं उसके भाव में संकल्प या विस्तृत प्रत्येक स्तर पर विघटन और बिखराव राष्ट्रों  की  एक आवश्यक नियति बन जाया करती हैं। 

इसी कारण समझदार और अनुभवी लोग प्रत्येक स्तर पर एकता बनाए रखने की बात कहा करते हैं केवल कहते ही नहीं आचरण व्यवहार में भी  डाला करते हैं। हमारा देश भारत एक विशाल और विविधताओं वाला देश है यहां की विविधता प्रकृति और भूगोल में तो दिखाई देती है सभ्य चारों सामाजिक व्यवहारों, सहज मानवीय, धारणाओं, आस्थाओं  धर्मों   और संस्कृतियों में भी देखी जा सकती हैं। इसी प्रकार खान- पान, रहन - सहन और भाषाई मे वैविध्य में भी इस देश की एक बहुत बड़ी और प्रमुख विशेषता हैं। जिसे  हम भारतीयता  कहते हैं वह विविधताओं का भावनात्मक संगम है जिससे हम भारतीय  धर्म और भारतीय संस्कृति कह कर गर्व से फूले नहीं समाते वह सब वस्तुत विविध धर्म और संस्कृति के संबंध मे तत्वों का सारा स्वरूप हैं  और इस विविधता तथा अनेकता में एकता के कारण ही वह सब महान  भी हैं  इसी प्रकार सभी स्तरों  पर विविधताओं  और अनेकताओं  के रहते हुए भी जिस चीज में बहुरंगी मणि माला के समान इस देश को एक सूत्र में पिरो रखा है  उसका सूक्ष्म - अमूर्त नाम है भावनात्मक एकता अर्थात भाव के स्तर पर छोटे -बडे़ हर धर्म-जाति के  सभी एक है। 

भारतीय संविधान वस्तुत: भावनात्मक एकता की गारंटी  हैं  व्यवहार, के स्तर , प्रत्येक भारतवासी स्वतंत्र है कि चाहे जिस  भी धर्म और  संप्रदाय  को माने जिस  किसी भी रूप में अपने अल्लाह , ईश्वर की उपासना करें कोई भी भाषा , बोली बोले और पढ़े- लिखे कुछ भी पहने , ओढ़े तथा खाए- पीए किसी भी, भाग में रहे और रोजी- रोटी कमाये कही कोई निषेध या पाबंदी नही हैं। संविधान तक ने इन सब बातों  को स्वतंत्रता  की गारंटी  प्रत्येक जाति - वर्ग के व्यक्ति को प्रदान  कर रखी  हैं पर जहाँ तक देश और, राष्ट्र का  प्रश्न है  भारतीयता और, उसके सामूहिक हितों, का प्रश्न है, भावना के  स्तर पर हम अखण्ड और एक हैं इस व्यापक भावना या वैविध्यपूर्ण स्वरूप को ही भावनात्मक एकता कहते हैं। 

हमें गर्व है कि हमने महात्मा बुद्ध ,कबीर ,तुलसी नानक और गांधी के  देश में  जन्म लिया हैं इन लोगों ने समय के रूख और भविष्य की  नाड़ी को पहचान कर ही हमें सब प्रकार के, भेद- भावों  से ऊपर उठकर सहज  मानवीयता  का भाव उजागर कर भावना के स्तर  पर एक रहने का अमर संदेश दिया हैं उस संदेश को किसी भी दशा मैं हमें बुलाना नहीं है भुलाना आत्महत्या  के समान होगा अपनी राष्ट्रीय और  जाति अस्मिता युग- युगों  तक जीवित या  प्राणवान और प्रवाहमयी  बनाए रखने  के लिए आवश्यक है  कि हम अपने उपयुक्त  महापुरुषों , आदर्शों, मूल्यों की रक्षा भी इसके बने रहने पर ही संभव हो सकती हैं ऐसा सभी समझदार लोग मुफ्तभाव से मानते हैं इसी कारण इस प्रकार की एकता की बात बल दिया गया हैं

हमेशा भावनात्मक एकता बनाए रखें। तथा  आपसी मतभेद को मिटाकर भावनात्मक एकता बनाए रखनी चाहिए। और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।

कुसुम डांगी 
द फैबइंडिया स्कूल
kdi@fabindiaschools.in

Tuesday, December 15, 2020

रिश्तों का महत्त्व - Ayasha Tak

Courtesy: clipart-library.com
मनुष्य जीवन रिश्तों से जुड़ा हुआ है। रिश्तों के कारण ही मनुष्य जीवन में आगे बढ़ने की , सफलता पाने की , शिक्षित होने की , कार्य करने की इच्छा रखता है। यदि रिश्ते मजबूत हो तो जीवन खुशहाल व सुखमय बन जाता है, लेकिन रिश्तों में खटास आते ही व्यक्ति भी टूट जाता है। रिश्तों में अपनेपन की भावना की खातिर ही व्यक्ति एक - दूसरे पर मर - मिटने तक को तैयार हो जाते हैं। 

एक माँ के अंदर शुरू से ही अपने बच्चे के प्रति बेहद अपनेपन की भावना कायम हो जाती है। उसे अपना बच्चा सारी दुनिया में सबसे प्रिय व सुंदर लगता है। मनोवैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि अकेले व्यक्ति को भौतिक , भावनात्मक , मानसिक व आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाता है। करीबी रिश्तेदारों एवं मित्रों से व्यक्ति अपने मन की वे सारी बातें करते हैं , जिन्हें वे अन्य व्यक्तियों से नहीं कर पाते हैं। 

रिश्तेदार व परिवार व्यक्ति के बुरे समय में साथ खड़े रहते हैं। ऐसे में अकेले व्यक्ति की पीड़ा पूरे परिवार और रिश्तेदारों की पीड़ा बन जाती हैं। वे एकजुट होकर मुसीबत से लड़ते है और मुसीबत को दूर भगा कर कामयाबी हासिल करते है। दोस्त रिश्तेदार और परिवार दुआ भी बन जाए इसके लिए व्यक्ति को प्रेम , दुआ , विनम्रता और मदद का मार्ग पकड़ लेना चाहिए। इससे ये बंधन मजबूत होकर जीवन को सशक्त , रोगहीन व सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाते है।

 रिश्ते निभाना भी समझौते का दूसरा नाम है। रिश्ते केवल खून के ही नहीं होते हैं , भावनात्मक भी होते हैं। कई बार भावनात्मक रिश्ते अटूट बन जाते हैं , क्योंकि उनमें प्रेम , सामंजस्य , धैर्य और ईमानदारी का साथ होता हैं।
  
Ayasha Tak
The Fabindia School
atk@fabindiaschools.in

Sunday, August 30, 2020

किशोरावस्था में बच्चों को समझाना और समझना - Kusum Dangi

किशोरावस्था  का  अर्थ हैं  बढ़ना  या  विकसित होना  इस अवस्था में अनेक परिवर्तन होते हैं जैसे - शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक इस  समय  में  अधिक  बदलाव  के कारण  बच्चों को  अनेक कठिनाइयों  का सामना  करना पड़ता  हैं। वे अचानक  से हूए  वह शारीरिक परिवर्तन   को अनुभव तो कर सकते हैं परंतु समझ नहीं पाते हैं वह इन  परिवर्तनों के विषय में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं इसके लिए या तो  सहकर्मी   आयु  की मदद लेते  है  या गुमराह करने वाले साहित्य पर निर्भर हो जाते हैं।  गलत  जानकारी  मिलने  से वे और भी  परेशान हो जाते हैं  इससे उनके मानसिक और शारिरिक  विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता हैं।  

इस दौरान परिवार की अहम  भूमिका होती है क्योंकि   इस समय  जरूरत होती हैं  उन्हें समझने की जैसे-जैसे  वे इस अवस्था  में प्रवेश करते हैं वे अपनी पहचान बनाना चाहते हैं इसलिए उनको अपने स्वयं के    निर्णय लेने  और अपने स्वयं के कार्य की जिम्मेदारी लेने के अवसरों को प्रदान करने  की जरूरत हैं  अगर वह कोई गलती करे  तो उनको समझाएं और  सही करने में सहयोग करें इस अवस्था में उनको समझाना बहुत आवश्यक हैं  इसके लिए माता -पिता को  पहले उनके अच्छे दोस्त बनने की आवश्यकता हैं  क्योंकि  इस दौरान उनको कोई समस्या आती हैं तो वे इस बारे में आपसे  बात करेंगे  उनके ऊपर विश्वास करे तथा उनको  जिम्मेदार बनाए इसके लिए उन्हें कोई भी जरूरी कार्य दे और करने के लिए कहे सबसे आवश्यक है वह कुछ भी बात करें या करें तो उन पर विश्वास करें।

Kusum Dangi
The Fabindia Schools
kdi@fabinndiaschools.in

Saturday, July 4, 2020

एकता और देखभाल: उषा पंवार


एकता सफलता का आधार है। जब हम एकजुट रहेंगे तो मजबूत बने रहेंगे और किसी भी समस्या का सामना करने में सक्षम हो सकेंगे। यह छोटी कक्षाओं से सिखाया जाता है, कहानियों के जरिए। एकता में अटूट शक्ति हैइसे एक किसान और उसके बेटों की कहानी के माध्यम से अच्छी तरह समझाया गया। किसान के बेटों को व्यक्तिगत रूप से लकड़ियों के बंडल को तोड़ने को कहा तो वे नहीं तोड़ पाए। जब उन्हें यही कार्य संयुक्त रूप से करने के लिए कहा तो वह आसानी से कर पाए। इससे स्पष्ट होता है कि जब लोग एक साथ खड़े होते हैं तो वे आसानी से एक मुश्किल काम भी कर सकते हैं। 

हम एक साथ खड़े हो तो हम हमेशा मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक रूप से मजबूत होंगे। जब टीम वर्क और आपसी सहयोग होता है। अद्भुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। एक व्यक्ति एक मुश्किल काम को पूरा नहीं कर  सकता है या उसे ऐसा करने में बहुत समय और ऊर्जा लग जाती है लेकिन अगर यह काम अधिक लोगों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है तो यह आसानी से पूरा किया जा सकता है। एकता पशु-पक्षियों मेंजानवरों में भी होती है।

देखभाल कई तरह से होती हैपरिवार में बड़े बुजुर्गों, छोटे बच्चों की, पालतु जानवरों कीसामान की, स्वयं कीबाग-बगीचों की, पेड़-पौधों कीवाहनों की, घर कीदेश कीविद्यालय में अपने मित्रों की, गरीब बच्चों की, माता-पिता शिक्षकों को बच्चों की देखरेख करनी चाहिए। माता-पिता और शिक्षक एक कुम्हार की तरह होते हैं। कुम्हार जैसा चाहे उसी प्रकार से बर्तन को ढाल देता है अतः माता-पिता को अपने बच्चों को बचपन से ही वृद्धों का सम्मान करनादूसरों की मदद करना, वस्तुओं का आदान-प्रदान करनामिल-जुल कर रहना आदि प्रेरित करना चाहिए। माता-पिता, शिक्षक, समाज बालक को सही दिशा देकर व्यक्तित्व विकास कर सकते हैं। 

बच्चों को शिक्षा देने के लिए सबसे पहले तो उन्हें प्यार देना चाहिए। शिक्षक जब बच्चों को प्यार करता है तो अपना प्यार मन बच्चों पर अर्पित करता है तभी वह उनमें खुशी, मित्रता मानवता की भावना भर सकता है। शिक्षक को बच्चों के मन तक पहुँचना है क्योंकि मन तक पहुँचकर ही उनमें अपेक्षानुसार बदलाव लाया जा सकता है। शिक्षक ऐसा वातावरण बनाए कि विद्यालय घर जैसे बन जाए।
बच्चों की देखभाल करने के लिए कुछ घरों में केयरटेकर रखते हैं लेकिन केयरटेकर बच्चों को वे गुण नहीं सिखा सकती जो कि घर में रहने वाले दादा-दादी सिखा सकते हैं। अतः घर के लोग एकता मजबूती और छोटे बच्चों का सर्वांगीण विकास करने में अहम योगदान निभाते हैं इसी प्रकार पेड़-पौधों की देखभाल (जिम्मेदारीपूरी तरह से करें तो वातावरण शुद्ध रहेगा।
Usha Panwar
The Fabindia School,Bali

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