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Friday, August 2, 2024

Right vs Wrong - Shalini Tiwari

किशोरावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें बच्चों में बहुत सारे बदलाव आते हैं शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक बदलाव, जिसका प्रभाव उनके व्यवहार पर पड़ता है। उनके अंदर जोश उत्साह के साथ कई बार उदासीनता भी जाती है जिसे हम अभिभावक नहीं समझ पाते और बच्चों से कह देते हैं कि तुम्हारी संगत ठीक नहीं जबकि वास्तव में, बच्चे असमंजस में रहते हैं कि क्या सही है और क्या गलत ? उसके लिए भी कहीं--कहीं हम अभिभावक ही जिम्मेदार होते हैं क्योंकि कभी हम उन्हें वयस्कों की तरह बर्ताव करने को कहते और कभी उन्हें बच्चों में गिनती करते हैं |

कई बार इस उम्र में बच्चे अर्थपूर्ण बात नहीं करते हैं इसका कारण शारीरिक विकास, व्यवहारिक ज्ञान एवं दिमागी विकास एक साथ जुड़ ना पाना हैं क्योंकि मस्तिष्क का एक भाग अभी भी विकसित हो रहा होता है इसलिए किशोरावस्था में बच्चे इतने दूरदर्शी नहीं होते हैं , वे तो बस प्रयोग करते रहते हैं जिससे कई बार वे मुसीबत में भी फँस जाते हैं ऐसी स्थिति में इस उम्र के उतार-चढ़ाव को अभिभावक एवं अध्यापकों को समझना होगा।

जिस प्रकार अपने बच्चों के व्यवहार में जरा भी परिवर्तन दिखाई देने पर हमारे मन में संदेहास्पद स्थिति पैदा हो जाती है और हम सतर्क हो जाते है उसी प्रकार विद्यालय में भी एक अध्यापक को सतर्क रहना चाहिए। यदि छात्र में दैनिक व्यवहार से हटकर कुछ परिवर्तन महसूस हो तो हम बच्चे को विश्वास में लेकर उसकी मन: स्थिति को जानने का प्रयास करें , यह तभी संभव है जब आपके प्रति छात्र के मन में विश्वास हो जिससे कभी वह विद्रोह की भावना या सहपाठियों के दबाव से गलत संगत में जा भी रहा हो तो आप उसे बड़ी सफलता से उस स्थिति से उबार सकते है।

Shalini Tiwari 
Sunbeam school Indiranagar

Tuesday, July 27, 2021

देखभाल: राजेश्वरी राठौड़

जीवन में एक दूसरे की चिंता करना और देखभाल करना, ख्याल रखना बहुत मायने रखता है चाहे कोई व्यक्ति हमारे परिवार का हो या ना हो हमें हर किसी के बारे में अच्छा सोचना चाहिए और मुश्किल समय में उनकी देखभाल और चिंता करनी चाहिए। मदद और देखभाल ऐसी चीज होती है, जो आप लोगों को जितना देंगे उतना ही वह आपके पास लौट कर अपने आप मिलता हैघर पर रहने वाले निकटतम लोगों की देखभाल करके प्यार शुरू होता है

ऐसे ही परिवार में अपने बड़े बुजुर्गों की देखभाल करना हमारा नैतिक कर्तव्य हैंजिम्मेदार व्यक्ति होने के नाते हमें पता होना चाहिए कि अपने बड़ों की देखभाल कैसे करें बूढ़े व्यक्ति घर परिवार का मुखिया होते हैं। बुजुर्गों की देखभाल के लिए सबसे जरूरी है कि आप उनको प्यार करें उनको सम्मान दे और इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उनको सक्रिय और फिट रखें अपने बड़ों की देखभाल के लिए थोड़ा समय निकाल कर और थोड़ी मेहनत कर अपने दादा- दादी, नाना- नानी या फिर अन्य परिवार में बुजुर्ग इंसान के चेहरे पर मुस्कान ला सकते हैं। इसके लिए उनकी मानसिक, शारीरिक और भावात्मक देखभाल होनी चाहिए

विद्यार्थी जीवन में विद्यार्थियों को अपने बड़े व अपने मित्रों की भी देखभाल करनी चाहिए कभी स्वार्थ नहीं रखना चाहिएनिस्वार्थ भाव से देखभाल करनी चाहिएऐसे ही हमें अपनी चीजों के प्रति भी देखभाल रखनी चाहिए। देखभाल का मतलब है सही काम करें, श्रेष्ठ प्रदर्शन करेंअपने कर्तव्यों को जिम्मेदारी से पूरा करें

Rajeshwari Rathod
rre@fabindiaschools.in
The Fabindia School, Bali

Thursday, February 18, 2021

तनाव को कम करने के तरीके - Ayasha Tak

Courtesy: managementcentre.co.uk
जीवन के किसी बिंदु पर हर कोई तनाव का अनुभव करता है, तनाव काम या नौकरी से संबंधित हो सकता है ,परिवार से संबंधित हो सकता है या आपकी पढ़ाई ,खराब स्वास्थ्य , वित्तीय समस्याओं आदि के कारण हो सकता है। कई बार किसी करीबी व्यक्ति की मृत्यु भी तनाव का कारण बनती है। 

कुछ लोग तनाव को सही ढंग से संभालते हैं , जबकि कुछ लोग अपने जीवन को फिर से व्यवस्थित करने में  विफल रहते हैं। तनाव के लक्षण मानसिक , शारीरिक या सामाजिक हो सकते हैं , इसमें सिरदर्द , हताशा , भूख का घटना या बढ़ना , नींद न आना या बहुत ज्यादा नींद आना शामिल हैं। 

कुछ आसान तरीकों को अपनाकर हम अपने जीवन में तनाव को कम कर सकते हैं।  जैसे - 
 ज़्यादा मुस्कुराए - जितना हो सके मुस्कुराओ। जैसा की मदर टेरेसा ने कहा था - “ शांति की शुरुआत मुस्कान से होती है और हर बार जब आप किसी पर मुस्कुराते हो, तो यह प्यार की एक कार्यवाही है ,उस व्यक्ति को एक उपहार ,एक सुंदर चीज़। “

संगीत -सॉफ्ट और शांत संगीत एक महान संकटमोचक है। संगीत एक व्यक्ति को खुश और हल्का रखता है। आप अपने पसंदीदा गीत को सुन सकते है और साथ में गुनगुना भी सकते है, इससे आपकी आत्माएं जाग उठेगी और आप फिर से खुश और अद्भुत महसूस करेंगे। 

वास्तविक बनो -अपने लक्ष्य को पूरा करने में अपने आप को ज़्यादा जोर न दें। धैर्य रखें , तार्किक और यथार्थवादी बनें। एक ही दिन में सब कुछ पूरा करने की कोशिश करके अपने आप को तनाव न दें। “नहीं” कहना सीखें। 

हँसना - हंसी एक बेहतरीन दवा है। जितना हो सके हंसें , कॉमेडी धारावाहिक और फिल्में देख सकते है। 

दोस्त - अपने दोस्तों के साथ घूमने और अपने जीवन का आनंद लेने के लिए कुछ समय निकालें। आप अपने जीवन का आनंद लेने के लिए पैदा हुए हैं , इसलिए कम चिंता करें और खुश रहें। 

Ayasha Tak
The Fabindia School
atk@fabindiaschools.in

Friday, January 8, 2021

साहस का जीवन में महत्व - Krishan Gopal

Courtesy: livehindustan.com
साहस का अर्थ यह नहीं कि हम युद्ध भूमि में जाएँ या किसी के साथ शारीरिक शक्ति से मुकाबला करें। यहाँ साहस का अर्थ केवल परिस्थितियों से मुकाबला करना है। कई बार व्यक्ति डरता है कि कहीं कुछ गलत न हो जाए, कहीं मेरा निर्णय गलत न हो। इस प्रकार के भय से मन आतंकित रहता है। इस भय को दूर करना और कुछ अपने मन की करना, परिणाम चाहे जो कुछ भी हो, इसी का नाम साहस है। हम बहुत कुछ करना चाहते हैं किंतु इसी भय के कारण हम कतराते हैं और यह सोचते हैं जैसा चल रहा है, जो चल रहा है वह ठीक ही है।

माता-पिता अपने बच्चे को भी इसी प्रकार कहते हैं। कुछ करने से बच्चे को चोट लगेगी या विफल हो जाएगा तो मन अशांत हो जाएगा, ऐसा विचार करके बच्चे को कुछ करने से रोक देते हैं। जबकि साहस को बढ़ाने का या बच्चे को साहसी बनाने का यही अवसर होता है। बचपन से ही उसे नया करने की स्वतंत्रता मिले तो वह निश्चित रूप से सफलता या असफलता का सामना करने में सक्षम हो जाएगा।

कभी कुछ करने से पहले हम यही सोचते हैं कि कहीं असफल न हो जाए या हम कुछ गलत तो नहीं कर रहे हैं। परंतु यह नहीं सोचते कि असफल हो भी गए तो कुछ सीखने को अवश्य मिलेगा और अगर सफल हो गए तो मंजिल तक पहुँच ही जाएँगे। इसलिए मन को सकारात्मक रखते हुए तथा धैर्य को अपना साथी बनाते हुए हमें ऐसे कार्यों के लिए साहसी बनना पड़ेगा।

हमारे अंदर साहस भरा पड़ा है अब उसके उपयोग की। जीवन में ऐसे कई अवसर आते हैं जब हमें कुछ ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जो हमारे साहस को ही रेखांकित करते हैं। वास्तव में साहस एक सीढ़ी की तरह है, एक कदम आगे बढ़ाने पर और बढ़ाने की आवश्यकता पड़ेगी। जगह-जगह में साहस दिखाने की भी आवश्यकता पड़ेगी। इसलिए परिणामों की चिंता किए बिना हमेशा साहसी बनना पड़ेगा तथा यह बच्चों को भी सिखाना पड़ेगा। 

Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali
kde@fabindiaschools.in

Saturday, July 4, 2020

एकता और देखभाल: उषा पंवार


एकता सफलता का आधार है। जब हम एकजुट रहेंगे तो मजबूत बने रहेंगे और किसी भी समस्या का सामना करने में सक्षम हो सकेंगे। यह छोटी कक्षाओं से सिखाया जाता है, कहानियों के जरिए। एकता में अटूट शक्ति हैइसे एक किसान और उसके बेटों की कहानी के माध्यम से अच्छी तरह समझाया गया। किसान के बेटों को व्यक्तिगत रूप से लकड़ियों के बंडल को तोड़ने को कहा तो वे नहीं तोड़ पाए। जब उन्हें यही कार्य संयुक्त रूप से करने के लिए कहा तो वह आसानी से कर पाए। इससे स्पष्ट होता है कि जब लोग एक साथ खड़े होते हैं तो वे आसानी से एक मुश्किल काम भी कर सकते हैं। 

हम एक साथ खड़े हो तो हम हमेशा मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक रूप से मजबूत होंगे। जब टीम वर्क और आपसी सहयोग होता है। अद्भुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। एक व्यक्ति एक मुश्किल काम को पूरा नहीं कर  सकता है या उसे ऐसा करने में बहुत समय और ऊर्जा लग जाती है लेकिन अगर यह काम अधिक लोगों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है तो यह आसानी से पूरा किया जा सकता है। एकता पशु-पक्षियों मेंजानवरों में भी होती है।

देखभाल कई तरह से होती हैपरिवार में बड़े बुजुर्गों, छोटे बच्चों की, पालतु जानवरों कीसामान की, स्वयं कीबाग-बगीचों की, पेड़-पौधों कीवाहनों की, घर कीदेश कीविद्यालय में अपने मित्रों की, गरीब बच्चों की, माता-पिता शिक्षकों को बच्चों की देखरेख करनी चाहिए। माता-पिता और शिक्षक एक कुम्हार की तरह होते हैं। कुम्हार जैसा चाहे उसी प्रकार से बर्तन को ढाल देता है अतः माता-पिता को अपने बच्चों को बचपन से ही वृद्धों का सम्मान करनादूसरों की मदद करना, वस्तुओं का आदान-प्रदान करनामिल-जुल कर रहना आदि प्रेरित करना चाहिए। माता-पिता, शिक्षक, समाज बालक को सही दिशा देकर व्यक्तित्व विकास कर सकते हैं। 

बच्चों को शिक्षा देने के लिए सबसे पहले तो उन्हें प्यार देना चाहिए। शिक्षक जब बच्चों को प्यार करता है तो अपना प्यार मन बच्चों पर अर्पित करता है तभी वह उनमें खुशी, मित्रता मानवता की भावना भर सकता है। शिक्षक को बच्चों के मन तक पहुँचना है क्योंकि मन तक पहुँचकर ही उनमें अपेक्षानुसार बदलाव लाया जा सकता है। शिक्षक ऐसा वातावरण बनाए कि विद्यालय घर जैसे बन जाए।
बच्चों की देखभाल करने के लिए कुछ घरों में केयरटेकर रखते हैं लेकिन केयरटेकर बच्चों को वे गुण नहीं सिखा सकती जो कि घर में रहने वाले दादा-दादी सिखा सकते हैं। अतः घर के लोग एकता मजबूती और छोटे बच्चों का सर्वांगीण विकास करने में अहम योगदान निभाते हैं इसी प्रकार पेड़-पौधों की देखभाल (जिम्मेदारीपूरी तरह से करें तो वातावरण शुद्ध रहेगा।
Usha Panwar
The Fabindia School,Bali

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