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Sunday, March 1, 2020

लेखन के नियम: आयशा टॉक

अपनी बात को व्यक्त करने के दो माध्यम होते हैं। मौखिक और लिखित जब हम अपने विचार बोलकर व्यक्त करते है तो वह मौखिक भाषा होती है और लिखकर व्यक्त करते है तो वह लिखित भाषा होती है। व्यक्ति दूसरों से सुनकर व समझकर पहले बोलना सीखता है। फिर धीरे-धीरे वह लिखना सीखना शुरू करता हैं। छोटे बच्चों को लेखन सिखाने के लिए सबसे पहले उनके हाथ में पेन्सिल न पकड़ा कर रंग पकड़ाने चाहिए। सर्वप्रथम बच्चों को अपनी सुविधानुसार रंगों का कागज़ पर उपयोग करने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। ताकि वह स्वतंत्र रूप से रेखाएँ एवं आकृतियाँ बनाकर अपनी अँगुलियों के बीच में पकड़ बनाने में सक्षम हो सके। जब वह पेन्सिल या रंग पकड़ना अच्छी तरह से सीख जाएँगे तो फिर उन्हें अक्षरों की बनावट में कोई दिक्कत नहीं आएगी। 

धीरे-धीरे वे पहले अक्षर लिखना व उसके बाद में अक्षरों व मात्राओं को जोड़कर पढ़ना व उसके पश्चात् लिखना सीखते हैं। उसके बाद में बारी आती है, लेखन सुधारने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं का ध्यान रखने की तो सर्वप्रथम जिस विषय पर लिखना है उसके बारे में बहुत सारा साहित्य पढ़े। लिखावट का ढाँचा तैयार करें। महत्वपूर्ण बिन्दुओं की सूची बनाए। आसान शब्दों का उपयोग करें ताकि अधिक से अधिक लोग आप का लेख समझ पाएँ। संक्षिप्त में पूरी बात समझने की कला सीखें। छोटे अनुच्छेद, शब्दों के बीच में सही जगह, सही शब्दों का सही आकार, शब्दों का प्रकार यह सब छोटी-छोटी बातें काफी महत्वपूर्ण हैं। किसी भी बिंदु पर अधिक विस्तारण और किसी भी बिंदु पर अधिक संक्षिप्तिकरण से बचें। एक बिंदु या एक विषय लेख में दो या तीन बार दोहराएँ नहीं। लेख में व्याकरण का भी विशेष ध्यान रखें।
Ayasha Tak
atk4fab@gmail.com
The Fabindia School, Bali

Tuesday, December 24, 2019

राजेश्वरी राठौड़: खेल और शिक्षा का संबंध


खेल मानव जीवन का एक अभिन्न हिस्सा रहा है चाहे वह प्राचीन काल हो या आज का युग मनुष्य बचपन से ही खेल& खेलकर ही आगे बढ़ा है  खेल जन्म देता है उत्साह को और उत्साह हमें जिज्ञासा की राह पर चलता है और यह जिज्ञासा जन्म देती है महत्वाकांक्षा को कहा जाता है मनुष्य एक महत्वाकांक्षी प्राणी है जितना उसे मिलता है वह उससे ज्यादा पाने की कोशिश करता है और एक तरह से आगे बढ़ने की यह लालसा उसके जीवन को संपूर्ण एवं सुखद बनाती है और यही वजह है कि मनुष्य ने आदिम युग को छोड़ नवीन युग में प्रवेश किया  

जब हम बच्चों के स्तर पर खेलों के बारे में सोचते हैं तो हमें यह मालूम पड़ता है कि खेल एक सृजनात्मक सोच के स्रोत है  इन्हीं खेलों को खेलते खेलते कब एक बच्चा वैज्ञानिकता की राह पर निकल पड़ता है यह हमें भी पता नहीं चलता  विद्यालयों का कार्य केवल बच्चों को शिक्षा देना ही नहीं बल्कि संपूर्ण शिक्षा देना है  संपूर्ण शिक्षा से अर्थ है एक छात्र को पूर्ण रूप से सक्षम बनाना और यह तभी संभव है जब विद्यालयों में खेलों का महत्व समझा जाए  

जब छोटा बच्चा प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने विद्यालय में प्रवेश करता है वह कभी पढ़ाई से आकर्षित नहीं होता पर खेल ही है जो उसे विद्यालय से जोड़ते हैं  खेल एक छात्र को मानसिक एवं शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाते हैं वहीं उसमें कई नैतिक गुण जैसे धैर्यपूर्ण रहना] कभी हार न मानना] अपनी काबिलियत पर विश्वास रखना और अपनी गलतियों से सीखना इत्यादि विकसित करते हैं पर आज जब हम देखते हैं तो समय के बदलाव के साथ खेलों में भी परिवर्तन आ चुका है पहले जहाँ सितोलिया] कबड्डी इत्यादि खेल प्रचलित थे वही आज कंप्यूटर और मोबाइल फोन में खेले जाने वाले खेल बच्चों को लुभा रहे हैं  

जो खेल पहले सेहत] तंदुरुस्ती और चुस्ती&फुर्ती के प्रणेता थे वही आज बच्चों की बुरी सेहत के मुख्य कारण बन गए हैं पर हमारे  विद्यालयों में आज भी वह पौराणिक खेलों की याद ताजा है  जब पढ़ाई में छात्र को नीरसता आ जाती है तब यही खेल जीवन में नए उत्साह का संचार करते हैं उम्र का प्रभाव चाहे जो भी हो सभी के जीवन में खेल अति आवश्यक है
राजेश्वरी राठौड़
rre4fab@gmail.com

Sunday, October 20, 2019

आयशा टॉक: कुशल वक्ता


एक अच्छा वक्ता वहीं बन सकता है जो अच्छा श्रोता होता है, इसलिए सिर्फ बोले नहीं बल्कि सामने वाले की बातों को ध्यान से सुने और उसमें रुचि भी लें। हमेशा अपनी बात कहते समय प्वॉइंट टू प्वॉइंट का तरीका अपनाएं, ताकि सामने वाला आपकी बात आसानी से समझ जाए। सामने वाले को बातों में उलझाने की कोशिश न करें। हर शख्स से बात करने का अलग तरीका होता है, इसलिए जब भी आप किसी से बात करें  तो उसकी उम्र और प्रोफेशन का ध्यान अवश्य रखें। जब आप किसी छोटे बच्चे से बात कर रहें है तो उसका तरीका अलग होता है। किसी छोटे बच्चे से बात करने में सरल शब्दों का प्रयोग करना चाहिए एवं कम शब्दों में अपनी बात बोलनी चाहिए। सीधी एवं सटीक भाषा में बोलना चाहिए। कभी भी ज्यादा घूमा-फिराकर किसी से कोई भी बात नहीं करें। 

जब भी आप किसी से कुछ बोल रहे हो, उस समय सही शब्दों का चयन करें। कभी भी सस्ते एवं काम चलाऊ शब्दों को अपनी बातों में शामिल न करें। क्योंकि जब आप अच्छे और इम्प्रेसिव शब्दों का चयन करेंगे तब लोग आपकी बातों को ध्यान से और रुचिपूर्वक सुनेंगे। अगर हम पढ़ेंगे तो हम बोलने में सक्षम बनेंगे और हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा। हम दूसरों को पढ़े गए विषय पर बोलकर समझा सकेंगे। लगातार अलग- अलग विषय पर बोलते रहने से अलग-अलग लहजे में बोलने की क्षमता का विकास होगा। सुनकर बोलने की शक्ति बढ़ेगी, क्योंकि छोटे बच्चे सुनी हुई बात को जल्दी समझेंगे और उसके बारे में और ज्यादा जानने के लिए प्रश्न भी पूछेंगे इससे उनकी बोलने की क्षमता बढ़ेगी। वे अपने मन की बात को बोलकर अपने भाव प्रकट कर सकेंगे।
Ayesha Tak, The Fabindia School
atk4fab@gmail.com

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