Showing posts with label महत्वाकांक्षा. Show all posts
Showing posts with label महत्वाकांक्षा. Show all posts

Sunday, June 7, 2020

विनम्रता और सराहना: कृष्ण गोपाल


विनम्रता एक अद्भुत मूल्य है। यदि हम विनम्र होंगे तो ऊँचाइयों पर अवश्य जाएँगे परन्तु ऊँचाई पर जाने के बाद भी विनम्रता को नहीं छोड़ा तो वहीं बने भी रहेंगे।  प्राणी मात्र के प्रति विनम्र बनना चाहिए।  धन और काया तो कुछ समय तक साथ देगी, विनम्र व्यक्ति को अमर बना देती है।  

विनम्रता अर्थात झुकना, पर झुकने का ये अर्थ नहीं है कि अधीनता स्वीकार कर ली।प्रकृति सभी के लिए विनम्र रहती हैं।  प्राणियों के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार है।  मानव अपनी महत्वाकांक्षा को नहीं छोड़ता।  हमारा जीवन प्रकृति की ही देन है।  विनम्र व्यक्ति हमेशा सम्मान प्राप्त करता है।  विनम्रता के साथ संतोष की प्रवृत्ति का विकास होता है। सम्पूर्ण रूप से संपन्न व्यक्ति विनम्रता प्रकट करे तो प्रशंसनीय है। 

अपने से बड़ों के सामने झुकना विनम्रता है। गलती का पश्चाताप करना विनम्रता है। 
मनुष्य नैतिक मूल्यों का त्याग करते जा रहा हैं। मूल्यों के विनाश से जीवन का स्तर गिरता जा रहा है।  इसलिए ये आवश्यक हो जाता है कि हम आने वाली पीढ़ी में नैतिक मूल्यों का विकास करें। 

बालकों के काम की सराहना की जानी चाहिए। स्कूल में भी किसी काम के कुछ हिस्से को ही किया हो तो भी प्रशंसा करें या प्रोत्साहित करें।  कुछ बालक अंतर्मुखी होते हैं।  उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया तो वे कभी भी आगे नहीं आएँगे। 
प्रोत्साहित करने से बच्चा काम को मनोयोग से करता है। अन्य बालकों के सामने सराहना करने पर प्रोत्साहन दोनों ओर होता है। अन्य बालक भी अपना स्थान बनाने के लिए प्रयत्न करेंगे। बच्चों का ही नहीं अपने मित्रों, सहयोगियों, पड़ोसियों की भी यथा समय सराहना की जानी चाहिए। प्रशंसा का उचित स्तर होना चाहिए।  अकारण, आवश्यकता से अधिक प्रशंसा करें।  अपना काम निकालने के लिए प्रशंसा  न करें।  प्रशंसा का प्रयोग केवल प्रोत्साहन के लिए हो।
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali

Monday, May 4, 2020

सहनशीलता और खुशी: सुरेश सिंह नेगी


सहनशीलता एक ऐसा सत्य है, जिससे प्राय: सभी लोगों को अपने जीवनकाल में रूरू होना पड़ता है। सहनशील होना एक गुण है, जिससे जीवन का वास्तविक विकास होता है। आज के इस भौतिकवादी दौर में हमें अध्ययन करने, पढ़ाने और सहनशीलता का अभ्यास कराने की और इसे अपने बच्चों में, शिक्षा और अपने स्वयं के उदाहरण दोनों के माध्यम से स्थापित करने की आवश्यकता  है। सहनशीलता कोई पकड़ नहीं है, लेकिन यह एक गुणवत्ता है। जिसे हमें संजोना है और इसका लगातार अभ्यास करते रहना है।

हर पाठ के साथ हम यह सीखते हैं कि हमें एक निर्णय लेना पड़ेगा,  जो कि हमारे भविष्य को निर्धारित करेगा। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि हम भविष्य को देखकर के ही सीख सकते हैं, कि केवल अतीत या वर्तमान से।

परिवर्तन केवल हमारे हाथों से होता है। हमें उस शक्ति की आवश्यकता है, जो उस घृणा और असहनशीलता को दूर कर सके। हमारा काम एक ऐसा वातावरण तैयार करना है, जिसमें लोग अपने सपनों और महत्वाकांक्षाओं को प्राप्त कर सकें, अपनी खुशी का निर्माण कर  सके  और आनंद ले सके।

इतिहास की सुबह से, खुशी वह सब है जो मानवता ने मांगी है। अरस्तू ने कहा कि राज्य एक जीवित प्राणी है जो व्यक्तियों के लिए नैतिक पूर्णता और खुशी की उपलब्धि की तलाश में विकसित होता है।

खुशी पर ध्यान देना संभव है और यह पूरी तरह से उचित है। खुशी को मापा जा सकता है। इसके अलावा, इसे विकसित भी किया जा सकता है, और इसकी उपलब्धि भौतिक उद्देश्यों से जुड़ी है। अध्ययनों से पता चलता  है कि खुशहाल लोग अधिक उत्पादन करते हैं, लंबे समय तक रहते हैं, और अपने समुदायों और देशों में बेहतर आर्थिक विकास करतें  हैं।

सहनशीलता का गुण जाने से दोस्तों और पड़ोसियों के बीच में खुशी का माहौल होता है। जिससे जल्दी से तनाव या क्रोध नहीं पाता। इसलिए सहनशील बनकर निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहना  चाहिए।
Suresh Singh Negi
The Fabindia School, Bali

Tuesday, December 24, 2019

राजेश्वरी राठौड़: खेल और शिक्षा का संबंध


खेल मानव जीवन का एक अभिन्न हिस्सा रहा है चाहे वह प्राचीन काल हो या आज का युग मनुष्य बचपन से ही खेल& खेलकर ही आगे बढ़ा है  खेल जन्म देता है उत्साह को और उत्साह हमें जिज्ञासा की राह पर चलता है और यह जिज्ञासा जन्म देती है महत्वाकांक्षा को कहा जाता है मनुष्य एक महत्वाकांक्षी प्राणी है जितना उसे मिलता है वह उससे ज्यादा पाने की कोशिश करता है और एक तरह से आगे बढ़ने की यह लालसा उसके जीवन को संपूर्ण एवं सुखद बनाती है और यही वजह है कि मनुष्य ने आदिम युग को छोड़ नवीन युग में प्रवेश किया  

जब हम बच्चों के स्तर पर खेलों के बारे में सोचते हैं तो हमें यह मालूम पड़ता है कि खेल एक सृजनात्मक सोच के स्रोत है  इन्हीं खेलों को खेलते खेलते कब एक बच्चा वैज्ञानिकता की राह पर निकल पड़ता है यह हमें भी पता नहीं चलता  विद्यालयों का कार्य केवल बच्चों को शिक्षा देना ही नहीं बल्कि संपूर्ण शिक्षा देना है  संपूर्ण शिक्षा से अर्थ है एक छात्र को पूर्ण रूप से सक्षम बनाना और यह तभी संभव है जब विद्यालयों में खेलों का महत्व समझा जाए  

जब छोटा बच्चा प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने विद्यालय में प्रवेश करता है वह कभी पढ़ाई से आकर्षित नहीं होता पर खेल ही है जो उसे विद्यालय से जोड़ते हैं  खेल एक छात्र को मानसिक एवं शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाते हैं वहीं उसमें कई नैतिक गुण जैसे धैर्यपूर्ण रहना] कभी हार न मानना] अपनी काबिलियत पर विश्वास रखना और अपनी गलतियों से सीखना इत्यादि विकसित करते हैं पर आज जब हम देखते हैं तो समय के बदलाव के साथ खेलों में भी परिवर्तन आ चुका है पहले जहाँ सितोलिया] कबड्डी इत्यादि खेल प्रचलित थे वही आज कंप्यूटर और मोबाइल फोन में खेले जाने वाले खेल बच्चों को लुभा रहे हैं  

जो खेल पहले सेहत] तंदुरुस्ती और चुस्ती&फुर्ती के प्रणेता थे वही आज बच्चों की बुरी सेहत के मुख्य कारण बन गए हैं पर हमारे  विद्यालयों में आज भी वह पौराणिक खेलों की याद ताजा है  जब पढ़ाई में छात्र को नीरसता आ जाती है तब यही खेल जीवन में नए उत्साह का संचार करते हैं उम्र का प्रभाव चाहे जो भी हो सभी के जीवन में खेल अति आवश्यक है
राजेश्वरी राठौड़
rre4fab@gmail.com

Blog Archive