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Monday, March 23, 2020

कर्तव्य के प्रति निष्ठा: राजेश्वरी राठौड़


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैI मानव को योग्यता और आवश्यकतानुसार कार्य करना, उसका कर्तव्य पालन कहलाता है I मनुष्य के जीवन में अथाह कर्तव्य  है, कर्तव्य उसकी आयु के अनुसार छोटे और बड़े होते हैं उनको करने से जीवन में खुशी, आत्मिक शांति और यश मिलता हैI अतः बचपन से ही अच्छी आदतों का पालन करना हमारा पहला कर्तव्य हैI यह आदतें यह है माता- पिता, परिवार व विद्यालय से बालक सीखता हैI 

विद्यार्थी जीवन मानव जीवन की आधारशिला हैI विद्यार्थी जीवन में नैतिक गुणों को अपनाता है जैसे बचपन से ही अच्छी आदतों को डालना हमारा पहला कर्तव्य है ठीक समय पर सोना और उठना, शरीर की सफाई रखना ताजा व स्वास्थ्यवर्धक भोजन करना, ध्यान से पढ़ना-लिखना आदि ऐसे ही अनेक कर्तव्य निभाए जा सकते हैंI सबसे पहले अपने बड़ों का कहना मानना, विद्यालय में अनुशासित जीवन बिताना, अपने शिक्षकों की आज्ञा मानना दूसरों के हित के लिए अपना स्वार्थ का त्याग करना, हमारा कर्तव्य हैI 

एक अच्छा नागरिक होने के कारण देश के प्रति भी हमारे कर्तव्य हैंI देश के कानून को मानना व अच्छे कार्य करना और अनुशासन पालन करना I वही उसके व्यक्तित्व वह चरित्र निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाता है, अपने सहपाठियों के साथ मृदुल व्यवहार रखना भी विद्यार्थी का परम कर्तव्य हैं I तभी वह राष्ट्र का अच्छा नागरिक बन सकता हैI ईमानदारी से अपना कार्य करना उसका परम कर्तव्य हैI कार्य छोटा हो या बड़ा कार्य उसे ईमानदारी व लगन-मेहनत व रुचि के साथ किया जाएI यह सब बालक बचपन से ही अच्छे संस्कारों के मिलने से कर सकता है, इसलिए परिवार और विद्यालय का अनुशासन ही बालक को अच्छे संस्कार दे सकता है तभी वह राष्ट्र का अच्छा नागरिक बन सकता हैI
Rajeshwari Rathore
rre4fab@gmail.com
The Fabindia School, Bali

Tuesday, October 15, 2019

राजेश्वरी राठौड़: वाणी-का संबंध शिक्षा से

जब भी हम बोलते है, तो उससे ज्यादा जरूरी है, हम किसी की बात को सुनें और श्रवण के लिए हमेशा धैर्य,लगन और ध्यान दें, जब हम किसी से बात करते तो किसी संवाद में सम्मिलित होने की कला, बोलने के बजाय श्रवण में है और जब हम सुनते हैं तभी अच्छे वक्ता बनते हैं।  बोलना एक ऐसी कला है, जिससे हमारा चरित्र, मन के विचार और ज्ञान का आधार व्यक्त होता हैं, साथ ही  बोलने का सही तरीका होना चाहिए । जैसे- धीरे बोलना, अपनी बात को छोटे से छोटे वाक्यों में व्यक्त करना, हमेशा सकारात्मक भाव प्रकट करते हुए बोलना और इन सभी तरीकों को का महत्व तब समझ में आता है जब हमें अपने शब्दों की अहमियत पता चलती है। क्योंकि “शब्द वह तीर है जो किसी व्यक्ति को तन से नहीं मन से घायल करते है।"

वार्तालाप से हमारे विचार प्रकट कर सकते हैं, लोगों के विचारों का आदान-प्रदान, ज्ञान को बाँटना, आवाज की गहराई, अपनी बात व्यक्त करने की क्षमता ।गलत तरीके से व्यक्त की गई बातें गलतफहमी उत्पन्न कर सकती है। धारा प्रवाह बोलना अपनी सोच की काबिलियत दर्शाता है। सामूहिक वार्तालाप (ग्रुप डिस्कशन) द्वारा विचार विमर्श से हमारी त्रुटियों का हमें पता चलता है।

बच्चे किसी भी भाषा का उच्चारण शीघ्र ही सीख सकते हैं। उच्चारण के लिए उस प्रांत के कार्यक्रम उसी भाषा में सुने रेडियो, टेलिविजन, इंटरनेट द्वारा उसका अभ्यास करें उच्चारण पर ध्यान रहे। बच्चों से वार्तालाप करें उससे आपको उनकी बोलने की अथवा सोचने की गहराई मिलेगी। बच्चे वार्तालाप में अपने विचार प्रकट करते हैं तो उनसे प्रश्न करो आप इसके “बारे में क्या सोचते हैं?”, “आप ऐसा क्यों सोचते हो?” “आप इसे कैसे सिद्ध कर सकते हैं?”, इससे बच्चे में सोचने की क्षमता व बोलने की क्षमता धीरे-धीरे विकसित होती है। अधिकतर 4 से 8 साल के बच्चों में सीखने के गुण अधिक पाए गए हैं। इनसे वे नए शब्द भी सीखते हैं अगर आप बच्चों से चिड़चिड़ापन या गुस्से से व्यवहार करते हो तो बच्चे स्कूल में भी वैसा ही करेंगे । बच्चों की उम्र के बढ़ने के साथ ही साथ बोलने का कौशल विकसित होने लगता है । बोली से मुझे कबीर दास जी द्वारा रचित दोहा याद आता है।  
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोले जानि,
हिये  तराजू तोलि  के तब मुख बाहर आनि ।

इसका अर्थ है बोली अनमोल है, यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है। तो जब ही  जो भी बोले जानकार सोच-समझकर मुँह से बाहर आने दे, उसे हमेशा हृदय से नाप- तोल कर ही बोलना चाहिए, सोच- समझकर ही शब्द बाहर निकालने चाहिए।  किसी के मन में दुख पहुँचे वैसे शब्द नहीं निकालने चाहिए।  इसीलिए वाणी एक अनमोल रत्न है।

Rajeshwari Rathore, The Fabindia School

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