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Thursday, October 22, 2026

परिवार का वातावरण और हमारी सोच का प्रभाव - सरोज पटेल

Educated पुस्तक के पाँचवें अंश को पढ़ते हुए मुझे अपने जीवन की कुछ सामान्य परिस्थितियों पर विचार करने का अवसर मिला। कई बार हम अपने अनुभवों और मान्यताओं को सही मानकर दूसरों पर भी वही सोच थोपने लगते हैं। टायलर के पिता चाहते थे कि वह परिवार के काम में हाथ बँटाए, जबकि टायलर पढ़ाई करके अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहता था। इससे मुझे महसूस हुआ कि कभी-कभी हमारी अपेक्षाएँ दूसरों की संभावनाओं को समझने में बाधा बन जाती हैं।

मैंने अपने आसपास भी महसूस किया है कि जब बच्चे या परिवार के सदस्य अपनी इच्छाएँ व्यक्त करते हैं, तो हम कई बार उनकी बात पूरी तरह सुने बिना ही अपनी राय देने लगते हैं। हम यह समझ नहीं पाते कि किसी की बात से असहमत होने से पहले उसकी परिस्थितियों और सोच को समझना भी ज़रूरी है। हो सकता है कि जिस बात को हम गलत मान रहे हों, वह दूसरे व्यक्ति के लिए अपने भविष्य को बेहतर बनाने का एक प्रयास हो।

तारा के दादा-दादी के घर का वातावरण देखकर हमें यह भी सीख मिलती है कि बच्चों को अनुशासन सिखाने के लिए केवल निर्देश देना पर्याप्त नहीं है। यदि हम चाहते हैं कि घर में सभी एक-दूसरे से सम्मानपूर्वक बात करें, तो इसकी शुरुआत हमें अपने व्यवहार से करनी चाहिए। गुस्से में प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत होकर बात करना और परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी बात रखने का अवसर देना छोटी-छोटी बातें हैं, लेकिन इनका प्रभाव गहरा होता है।

हमें किसी भी परिस्थिति में तुरंत निर्णय लेने के बजाय पहले उसे समझने का प्रयास करना चाहिए। हमें दूसरों की बातों और इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए तथा अपनी मान्यताओं पर भी विचार करना चाहिए। मेरा मानना है कि परिवार हो या समाज, सकारात्मक बदलाव तभी संभव है, जब हम दूसरों को अपनी सोच के अनुसार बदलने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करें।

सरोज पटेल
सनबीम ग्रामीण स्कूल


Friday, October 16, 2026

शिक्षा का महत्त्व, सकारात्मक सोच और जीवन में अनुशासन - मंजुला सागर

तारा वेस्टओवर की पुस्तक Educated में उनके भाई टायलर का व्यक्तित्व और शिक्षा के प्रति उनकी रुचि मुझे गहराई से प्रभावित करती है। टायलर ऐसे परिवार में रहते थे, जहाँ उनके पिता की सोच रूढ़िवादी थी। उनके पिता का मानना था कि केवल पढ़ाई करने से जीवनयापन नहीं किया जा सकता और न ही पढ़ाई के माध्यम से परिवार का खर्च चलाया जा सकता है। उनके विचार में जीवन में काम करना और परिवार की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करना अधिक महत्त्वपूर्ण था। ऐसी परिस्थितियों में भी टायलर ने शिक्षा के प्रति अपनी रुचि बनाए रखी और ज्ञान प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास किया। उनका यह व्यवहार हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हमारे भीतर सीखने की इच्छा और आगे बढ़ने का संकल्प है, तो हम अपने लिए नए रास्ते बना सकते हैं।

इस प्रसंग पर चिंतन करने से मुझे महसूस होता है कि शिक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने या धन कमाने का साधन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के जीवन को सही दिशा देने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। शिक्षा हमें सही और गलत में अंतर करना, तर्कपूर्ण ढंग से सोचना, अपने अधिकारों को समझना तथा जीवन की समस्याओं का समाधान खोजना सिखाती है। यह हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाती है और हमें आत्मनिर्भर बनने की क्षमता प्रदान करती है। यह सच है कि केवल शिक्षा प्राप्त कर लेने से आर्थिक सफलता की गारंटी नहीं होती, लेकिन शिक्षा व्यक्ति के लिए रोजगार, बेहतर अवसरों और सम्मानजनक जीवन की संभावनाएँ अवश्य बढ़ाती है।

एक शिक्षक के रूप में मैं इस प्रसंग को बच्चों के जीवन से जोड़कर देखती हूँ। विद्यालय में हमारा दायित्व केवल बच्चों को किताबी ज्ञान देना नहीं है, बल्कि उनमें शिक्षा के प्रति रुचि, आत्मविश्वास, अनुशासन और आत्मनिर्भरता की भावना विकसित करना भी है। हमें बच्चों को यह समझाना चाहिए कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक समझदार, जागरूक और जिम्मेदार इंसान बनना भी है। जब बच्चे अपनी किताबों और कॉपियों को व्यवस्थित रखना सीखते हैं, तो वे धीरे-धीरे अपने कार्यों के प्रति जिम्मेदारी लेना भी सीखते हैं।

अंततः, टायलर के जीवन से मुझे यह प्रेरणा मिलती है कि शिक्षा मनुष्य के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण आधार है। आर्थिक आवश्यकताएँ जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन शिक्षा हमें उन आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करने की समझ और क्षमता प्रदान कर सकती है। इसलिए हमें बच्चों की शिक्षा को कभी कम महत्त्व नहीं देना चाहिए, बल्कि उन्हें सीखने, प्रश्न पूछने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। मेरा मानना है कि शिक्षा, अनुशासन और अच्छी आदतों का समन्वय ही व्यक्ति को एक बेहतर इंसान बनाने में सहायक होता है।

मंजुला सागर
सनबीम ग्रामीण स्कूल

Sunday, October 11, 2026

साहस, संघर्ष और आत्मविश्वास की सीख - स्वाति त्रिपाठी

अध्याय “Apache Women” में साहस, संघर्ष और कठिन परिस्थितियों में जीवन जीने की क्षमता को दर्शाया गया है। इस अध्याय में लेखक ने अपने परिवार के अनुभवों और उनके सामने आने वाली चुनौतियों का वर्णन किया है। अपाचे महिलाओं की कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत, धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए।

इस अध्याय से मुझे यह सीख मिली कि जीवन में कठिनाइयाँ आना स्वाभाविक है, लेकिन हमें उनका सामना साहस और सकारात्मक सोच के साथ करना चाहिए। यह अध्याय परिवार के महत्त्व, संघर्षों से सीखने और अपने अनुभवों से मजबूत बनने की प्रेरणा देता है। इससे मुझे दूसरों की परेशानियों को समझने और हर परिस्थिति में धैर्य रखने की सीख मिली।

स्वाति त्रिपाठी 

Sunday, May 24, 2026

सकारात्मक सोच और सही निर्णय- सुनीता त्रिपाठी

सोच ही सब कुछ है, यह अध्याय हमें सिखाता है कि शिक्षक का व्यवहार ही कक्षा का माहौल तय करता है। इसलिए, एक अच्छे शिक्षक की सबसे बड़ी पूंजी विश्वास और अपनी सोच है।

रोमा ने भी यही किया। उन्होंने माता-पिता को बताया, पर बात केवल काउंसलर और अभिभावक तक ही सीमित रखी। रोमा की यह सोच थी कि किसी को शर्मिंदा न किया जाए। उन बच्चियों ने स्वीकार किया कि गलती हुई है। रोमा को लगा कि गलतियों को स्वीकार करना व्यक्तिगत विकास और सफलता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर व्यक्ति गलती करता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम उन गलतियों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। अपनी कमियों को स्वीकार करना ईमानदारी और आत्म-जागरूकता को भी बढ़ाता है।

इस अध्याय में मैंने सीखा कि असफलता और गलतियां जीवन का अंत नहीं होतीं, बल्कि हमें आगे बढ़ने की सीख देती हैं। हर व्यक्ति से गलती होती है, लेकिन सफल वही बनता है जो हार मानने के बजाय दोबारा प्रयास करता है। हमारी सोच ही तय करती है कि हम जीवन और स्वयं को किस प्रकार देखते हैं। जब हमें विश्वास होता है कि हम सीख सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं, तब हम अधिक मेहनत करते हैं और आसानी से हार नहीं मानते। अच्छी सोच वाले लोग गलतियों को सीख के रूप में देखते हैं। हम जानते हैं कि असफलता अंत नहीं, बल्कि सुधार करने का एक अवसर है। रोमा ने भी इसी तरह गोपनीयता रखते हुए, अपनी सोच को दर्शाते हुए सही फैसला लिया।

सुनीता त्रिपाठी, सनबीम ग्रामीण स्कूल


Friday, May 15, 2026

किशोरावस्था की चुनौतियां: सनबीम ग्रामीण स्कूल

किशोरावस्था जीवन का एक ऐसा चरण है जिसमें व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कई बदलावों से गुजरता है। इस अवस्था में विद्यार्थियों को पढ़ाई का दबाव, करियर की चिंता, दोस्तों का प्रभाव और अपनी पहचान बनाने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे तनाव और उलझन महसूस होती है। ऐसी स्थिति में, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन और सहयोग न मिले, तो वे गलत दिशा में भी जा सकते हैं।

मेरा मानना है कि किशोरावस्था वाले विद्यार्थियों के साथ धैर्य और प्रेम पूर्ण व्यवहार करना बहुत आवश्यक है। उनसे खुलकर उनकी पसंद और नापसंद के बारे में बातचीत करना और अपना सहयोग देना भी जरूरी है, इससे उनमें आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का विकास हो सकता है जो उन्हें सही मार्गदर्शन की ओर अग्रसर कर सकता है।

सरोज पटेल

किशोरावस्था की गलतियों पर जो पाठ हम लोगों ने पढ़ा इस अंश को पढ़ने के   बाद मुझे अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आया। किशोरावस्था के बच्चों में साथियों के प्रभाव को बहुत जल्दी देखा जा सकता है। एक बार कक्षा के कुछ बच्चे आपस में मजाक करते-करते एक दूसरे की नकल उड़ानें लगे। धीरे धीरे यह आदत पूरी कक्षा में फैलने लगी और कुछ बच्चे मानसिक रूप से दुखी रहने लगे। 

शुरुआत में मुझे लगा कि केवल डांट देने से समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन बाद में मैंने बच्चों से शांतिपूर्वक बात चीत की। मैंने उन्हें समझाया कि मजाक और अपमान में बहुत अंतर होता है। मैंने पूरी कक्षा के साथ एक चर्चा करवाई, जिसमें बच्चों ने अपने मन की बात की। जब बच्चों को यह महसूस हुआ कि उनके शब्द किसी को चोट पहुंचा सकते हैं, तब उन्होंने अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया। कौन है यह धीरे-धीरे बात कर रहा है इसके बाद मैं कक्षा में एक दूसरे का सम्मान विषय पर समूह गतिविधियां करवाई। बच्चों को सकारात्मक शब्द बोलने और अपने मित्रों की अच्छाइयां बताने के लिए प्रेरित किया गया। कुछ ही दिनों में कक्षा का वातावरण पहले से अधिक शांत और सहयोगपूर्ण हो गया। 

इस अनुभव से मुझे यह सीख मिली कि किशोरावस्था में बच्चे कई बार बिना सोचे-समझे गलतियाँ कर बैठते हैं। ऐसे समय में शिक्षक का धैर्य, सही संवाद और सकारात्मक मार्गदर्शन बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि बच्चों को सही समय पर समझाया जाए, तो उनकी ग गलतियां भी उनके लिए एक अच्छी सीख बन सकती है 
सुनीता त्रिपाठी

Thursday, April 9, 2020

सकारात्मक सोच - जफ्फर खां

इस वक्त दुनिया भर में  कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे के बीच मे अपने-अपने घरों में बंद हैं अगर हम  सोच रहे हैं कि घर में बैठकर भी क्या कुछ नया कर सकते हैैं यह कहानी आइजेक न्यूटन की है |  बात है 1661की जब आइजेेेक न्यूटन  ने केम्रिज यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया  था | जब ये जाते थे कॉलेज में पढ़ने तो सोचा करते थे की सैलेबस आउटडेटेड नहीं है कुछ नए रिसर्च नहीं है कुछ नया करने की सोचते थे पर समय नहीं मिल पाता था | 

1665 दुनिया में फैल गई ब्यूबोनिक महामारी चलते समय सेट डाउन होने लगा और लॉक डाउन होने लगा और आज वाली स्थिति तब बन गई थी | तब केम्रिज  यूनिवर्सिटी में भी छुट्टियां हो गई तब आइजेक न्यूटन  को घर जाना पड़ा था वो बुल्सटॉप नगर पहुंचे तो सेल्फ आइसोलेशन में चले गए हम सब की तरह अपने -अपने घरों में बंद हो गए और यह सोचने लगे कि अब मैं कुछ नया कर सकता हूं एक दिन वो बगीचे में घूम रहे थे तो उन्होंने देखा सेब नीचे गिरा पेड़ से सेब नीचे गिरा और तब उन्होंने सोचा कि यह Apple  नीचे क्यों गिरा ऊपर क्यों नहीं गया | 

तब उन्होंने दुनिया को दिया यूनिवर्सल लॉ आफ ग्रेविटी उस वक्त जब नकारात्मकता फैली हुई थी | आइजेक न्यूटन ने अपने अंदर से  पॉजिटिविटी लाकर के कर दिखाया | यह छोटी सी कहानी आज हमें सिखाती है कि जिस हालात में हम हैं सब को पॉजिटीव रहना है ,खुश रहना है अच्छी-अच्छी बातें सोचनी हैं और सोचना है कि अपने बारे में आपको ऐनेलाइज करना है वो वक्त आपको मिल चुका है | जिससे आप अपने बारे में सोचें भागती दौड़ती दुनिया में हम सब भाग रहे थे लेकिन अपने आपको परिवार को वक्त नहीं दे रहे थे |

विद्यार्थियों को कहना चाहूंगा कि आप लोग सैलेबस को पढ़ पढ़ कर बोर हो गए हो तो अब इंटरनेट के माध्यम से सीखने का समय आ चुका है इसका सदुपयोग करना चाहिए और आत्मविश्वास रखकर कुछ नया आविष्कार करना चाहिए जिससे दुनिया में आपका नाम हो।  इस कहानी से  सीख  लेंनी चाहिए कि वक्त कैसा भी हो हमें अपनी सोच को हमेेेशा सकारात्मक रखना चाहिए  |     

- जफ्फर खां, द फैबइंडिया स्कुल  

Sunday, September 29, 2019

कुसुम डांगी: अध्ययन का प्रथम सोपान


अध्ययन के लिए पहली सीढी है- वाचन ।

हर  छात्र  अगर  प्रत्येक  दिन  नियमित  रूप  से  वाचन  करे तो  अपनी  जानकारी को  बहुत  अधिक  बढ़ा  सकता  है।

वाचन  से  न  केवल  जानकारी को  बढ़ाया  जा  सकता  है, बल्कि  छात्र  के अन्दर  सकारात्मक  सोच, रीति-रिवाजों  के प्रति  प्रेम  की  भावना  भी  उत्पन्न  होती  है।

इसके  लिए  जरूरी  नहीं उच्च लेवल  की पुस्तकों  का  चयन  करें  वह  अपनी  रुचि  के  अनुसार  भी  चयन  कर  सकता है।

वाचन  दो  प्रकार   से   किया  जा  सकता  है ।
(!)  सस्वर वाचन   
(!!) मौन  वाचन

वाचन   अगर  छोटे  बच्चों  के  लिए  किया  जा  रहा  है  तो चित्र, साउंड  आदि  से  उनमें रुचि   लायी  जा  सकती   है   व  उनके  अनुसार  गतिविधियाँ  भी  करायी  जा  सकती  है।

विद्यालय  में  छात्रों  में  वाचन  की  रुचि  उत्पन्न  करने  के  लिए  एक  अच्छा  पुस्तकालय का   होना  अत्यावश्यक  है  साथ  ही  पुस्तकालय  अध्यापक  की  पुस्तकों  के  प्रति जानकारी  भी  अत्यावश्यक  है  ताकि  वह  छात्रों  की  उनकी  रूचि  के  अनुसार  पुस्तकें खोजने  में  मदद  कर  सके।

पुस्तकें  चरित्र   निर्माण  का  सर्वोत्तम  साधन  है।

वाचन, ज्ञान  अर्जित  करने  के  अतिरिक्त मनोरंजन  के  लिए  भी  किया  जाता  है। इससें  मन  व  मस्तिष्क  स्वस्थ  रहता है ।वाचन से सोचने  समझने  की  क्षमता  भी  बढती  है ।

जीवन  में  सफलता  पाने  के  लिए  नियमित  रूप  से  वाचन  करना  अत्यावश्यक  है।

Kusum Dangi, The Fabindia School
kdi4fab@gmail.com

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