किशोरावस्था जीवन का एक ऐसा चरण है जिसमें व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कई बदलावों से गुजरता है। इस अवस्था में विद्यार्थियों को पढ़ाई का दबाव, करियर की चिंता, दोस्तों का प्रभाव और अपनी पहचान बनाने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, जिससे तनाव और उलझन महसूस होती है। ऐसी स्थिति में, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन और सहयोग न मिले, तो वे गलत दिशा में भी जा सकते हैं।
मेरा मानना है कि किशोरावस्था वाले विद्यार्थियों के साथ धैर्य और प्रेम पूर्ण व्यवहार करना बहुत आवश्यक है। उनसे खुलकर उनकी पसंद और नापसंद के बारे में बातचीत करना और अपना सहयोग देना भी जरूरी है, इससे उनमें आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का विकास हो सकता है जो उन्हें सही मार्गदर्शन की ओर अग्रसर कर सकता है।
सरोज पटेल
किशोरावस्था की गलतियों पर जो पाठ हम लोगों ने पढ़ा इस अंश को पढ़ने के बाद मुझे अपने विद्यालय का एक अनुभव याद आया। किशोरावस्था के बच्चों में साथियों के प्रभाव को बहुत जल्दी देखा जा सकता है। एक बार कक्षा के कुछ बच्चे आपस में मजाक करते-करते एक दूसरे की नकल उड़ानें लगे। धीरे धीरे यह आदत पूरी कक्षा में फैलने लगी और कुछ बच्चे मानसिक रूप से दुखी रहने लगे।
शुरुआत में मुझे लगा कि केवल डांट देने से समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन बाद में मैंने बच्चों से शांतिपूर्वक बात चीत की। मैंने उन्हें समझाया कि मजाक और अपमान में बहुत अंतर होता है। मैंने पूरी कक्षा के साथ एक चर्चा करवाई, जिसमें बच्चों ने अपने मन की बात की। जब बच्चों को यह महसूस हुआ कि उनके शब्द किसी को चोट पहुंचा सकते हैं, तब उन्होंने अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया। कौन है यह धीरे-धीरे बात कर रहा है इसके बाद मैं कक्षा में एक दूसरे का सम्मान विषय पर समूह गतिविधियां करवाई। बच्चों को सकारात्मक शब्द बोलने और अपने मित्रों की अच्छाइयां बताने के लिए प्रेरित किया गया। कुछ ही दिनों में कक्षा का वातावरण पहले से अधिक शांत और सहयोगपूर्ण हो गया।
इस अनुभव से मुझे यह सीख मिली कि किशोरावस्था में बच्चे कई बार बिना सोचे-समझे गलतियाँ कर बैठते हैं। ऐसे समय में शिक्षक का धैर्य, सही संवाद और सकारात्मक मार्गदर्शन बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि बच्चों को सही समय पर समझाया जाए, तो उनकी ग गलतियां भी उनके लिए एक अच्छी सीख बन सकती है
सुनीता त्रिपाठी

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