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Friday, March 20, 2026

कक्षा का वातावरण: War और Peace - मंजुला सागर

इस अध्याय से हमें यह समझ में आता है कि कक्षा का वातावरण दो प्रकार का हो सकता है – War (युद्ध जैसा माहौल) और Peace (शांतिपूर्ण माहौल)।

War जैसी कक्षा में शिक्षक बहुत सख्त होते हैं, बच्चों को डाँटते हैं, डर का माहौल बनाते हैं और उन्हें अपनी बात कहने का अवसर नहीं देते। ऐसे माहौल में बच्चे डरते हैं, पढ़ाई में उनकी रुचि कम हो जाती है और वे खुलकर सीख नहीं पाते।

इसके विपरीत Peaceful कक्षा में शिक्षक बच्चों के साथ प्रेम, सहानुभूति और समझदारी से व्यवहार करते हैं। यहाँ बच्चे बिना डर के सवाल पूछते हैं, अपनी राय व्यक्त करते हैं और सीखने में आनंद महसूस करते हैं। एक अच्छे शिक्षक को कक्षा में शांति, सहयोग और सम्मान का वातावरण बनाना चाहिए। जब कक्षा का माहौल शांत और मित्रतापूर्ण होता है, तब बच्चे बेहतर तरीके से सीखते हैं, उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें पढ़ाई में आनंद आता है।

लेकिन इसके लिए सबसे पहले शिक्षक को कक्षा के वातावरण को शांतिपूर्ण बनाना पड़ता है। यदि शिक्षक के कक्षा में प्रवेश करने के बाद वहाँ युद्ध जैसा माहौल हो, तो सबसे पहले उस माहौल को सामान्य बनाना आवश्यक होता है, न कि चिल्लाना। शिक्षक कुछ रोचक गतिविधियाँ जैसे—कहानी, कविता, गहरी साँस लेना, गीत या बोर्ड पर कुछ प्रश्न—करवाकर बच्चों का ध्यान अपनी ओर केंद्रित कर सकता है। इससे बच्चे शिक्षक की बात सुनने के लिए तैयार होते हैं। इसके बाद शिक्षक उनकी समस्याएँ समझकर उनका समाधान कर सकता है, जिससे कक्षा को नियंत्रण में लिया जा सके और शिक्षक एवं छात्रों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित हो सके।

इस अध्याय से यह निष्कर्ष निकलता है कि कक्षा में युद्ध जैसा माहौल नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण और सकारात्मक वातावरण होना चाहिए, क्योंकि यही बच्चों के सीखने और समग्र विकास के लिए सबसे उपयुक्त होता है।

मंजुला सागर
सनबीम ग्रामीण स्कूल

Sunday, November 3, 2019

कक्षा में युद्ध एवम शांति का वातावरण

शिक्षक एक कुम्हार की भाँति होती है जो विद्यार्थी रुपी घड़े को बनाने के लिए बाहरी हाथ से हल्की सी चोट भी देता है , लेकिन घड़े के अंदर यानी हमारी आत्मा को भी सहारा देता है ।
एक बार एक कक्षा में सभी विद्यार्थी जब अध्यन कर रहे थे । तभी अगले विषय का समय आरम्भ होने पर शिक्षक कक्षा में से
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चले गए तथा सभी विद्यार्थी एक दूसरे से बात करने में लीन हो गए यह वार्ता कब युद्व में परिवर्तित हो गई इस बात का पता विद्यार्थियों को नहीं लगा । सब एक दूसरे से लगातार बहस करते जा रहे थे । बहस ये थी कि हर कार्य में बालिकाएं ज्यादा तेज हैं या बालक, धीरे धीरे यह झगड़ा युद्ध मे परिवर्तित हो गया । उनको पता ही न चला कि अध्यापिका कब कक्षा में प्रवेश कर गई वह शांति के साथ उनके झगड़े को देख रही थी और समझने का प्रयास कर रही थी कि आखिर क्या हो रहा है ? अचानक से बच्चों की नज़र अध्यापिका पर पड़ी और सब धीरे धीरे अपनी जगह पर बैठ गए । उन्होंने शांत भाव से बच्चों से पूछा कि ,’क्या हुआ और आप सब इतनी तेज तेज़ झगड़ा क्यों कर रहे थे ।‘ सबसे पहले तो बच्चों ने उनसे माफी मांगी और फिर झगड़े का कारण बताया , कारण जान कर अध्यापिका ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी फिर उन्होंने विद्यार्थियों को समझाया कि सभी मनुष्य के अंदर अपने कुछ खास गुण होते हैं जिनके चलते वह सभी अपनी पहचान किसी न किसी रूप में अवश्य बनाते हैं , जैसे यहां से शिक्षा प्राप्त कर कोई गायक बनेगा कोई खिलाड़ी तो कोई डॉक्टर बनेगा और कोई कुछ और व्यवसाय चुनेगा जिसमें की वह निपुण होगा । इसलिए कभी भी किसी को नीचा या कम नहीं समझना चाहिए ।अध्यापिका की समझदारी वाली बातें सुनकर सभी विद्यार्थि शर्मिंदा भी हुए और उन्होंने शिक्षिका से अपने व्यवहार की एक बार फिर से माफी मांगी । 
इस कहानी की महत्वपूर्ण विशेषता यह है की प्रत्येक शिक्षक में धैर्यता को होना अत्यंत आवश्यक है । इसी धैर्य की वजह से शिक्षिका ने कक्षा की युद्ध पूर्ण स्थिति को शांति से हल कर दिया । 
एक अच्छा शिक्षक हमारी समस्याओं का समाधान ही नहीं करता , बल्कि उस समस्या से कैसे निबटा जाए यह भी सिखाता है ।
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