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Sunday, February 23, 2020

मित्रता का भाव : कृष्ण गोपाल


जीवन में मित्र होना परमावश्यक है।  कहा जाता है अन्य रिश्ते ईश्वर बनाता है किन्तु मित्रता का रिश्ता व्यक्ति स्वयं ही बनाता है।  मित्रता के कोई नियम नहीं है।  सुख के पलों की अपेक्षा तकलीफ में मित्र का सहयोग करें। एक सच्चा मित्र बनकर संकटों और कठिनाइयों में सहयोग करें। अपने लिए भी ऐसे ही मित्र का चुनाव करें जो हर परिस्थिति में आपका साथ छोड़े।  अपने मन की बातों, जिसे किसी और के समक्ष प्रकट कर सकें, उन्हें अपने मित्र को बता सकें।  मित्र अंतरंग होने चाहिए हमारी बातों पर पीछे से उपहास करे वह इस अंतरंग मित्र की श्रेणी में नहीं सकता।  अंतरंग मित्र तो दूर वह सामान्य मित्र कहलाने के योग्य भी नहीं हो सकता। वही व्यक्ति सबसे अधिक धनवान है जिसके अधिक मित्र है।  लेने या किसी लाभ के वश मित्रता करें।  श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता यही भाव समझाती है। अपनी तरफ से देने का प्रयास ही मित्रता का भाव है। मित्र में कोई दोष निकालें, यदि है भी तो अपनी योग्यता से उसे दूर करने का प्रयास करें। हमें सच्चे और झूठे मित्र के बीच अंतर करना आना चाहिए। हमारा इतिहास मित्रता के किस्सों से भरा पड़ा है।  उन किस्सों को सुनकर या पढ़कर मित्रता का भाव समझ सकते है। 

कबिरा संगत साधू की हरे और की व्याधि
संगत बुरी असाधु की आंठों पहर उपाधि
कबीर का उपर्युक्त पद मित्रता की सठीक व्याख्या करता है।  सच्चा मित्र व्याधि हर लेता है जबकि दुष्ट मित्र हमेशा कष्ट देता रहता है। मित्र से सहानुभूति रखें, आवश्यकतानुसार सहयोगी बनें, प्रसन्नचित, उदार और हितैषी बने।  हम सामाजिक प्राणी है अतः मित्रों की आवश्यकता रहती ही है।  मित्रों की संख्या में वृद्धि करें और प्रसन्न रहें। 

कहि रहीम संपति सगे बनत बहुत बहु रीत
विपति कसौटी जे कसे तेई सांचे मीत

उपर्युक्त दोहे के अनुसार तो वही सच्चा मित्र है जो कठिनाई में काम आए।  परन्तु मित्र की कठिनाई में पहले स्वयं मदद करें फिर किसी प्रकार की अपेक्षा रखें। 
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali
kde4fab@gmail.com

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