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Monday, July 12, 2021

जीवन मे अच्छे और बुरे लोगों की परख: उस्मान गनी

अक्सर हम कई बार ऐसे लोगों के बीच आ जाते है जहाँ हम अच्छे और बुरे लोगों में फर्क नहीं समझ पाते है। यह जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है | ऐसे में कुछ बुरे लोग हमें भी अपने जैसा बनाने की कोशिश में रहते है और ऐसा करके उन्हें काफ़ी आनंद भी मिलता है |

ऐसे लोग न तो खुद आगे बढ़ते है और न किसी को आगे बढ़ने देते है ।

अच्छे लोग आपको आगे बढ़ने की सलाह देने के साथ-साथ आपकी प्रेरणा के स्रोत्र भी बनते है। कई लोग अपने जीवन स्तर में काफ़ी सुधार कर चुके होते है क्योंकि उनके साथ कुछ ऐसी गतिविधियाँ थी जो उन्हें कुछ अच्छे लोगों से सीखने को मिली।

अपने साधनों का सही उपयोग कहाँ और कैसे करना है ये वो भलीभाँति समझ सकते है।

अक्सर कई लोग उन लोगों के बीच बैठना पसंद करते है जो सिर्फ उनकी झूठी तारीफ करते है, लेकिन आप बस एक बार उनसे अपने लिए मदद की उम्मीद करके देखिएगा आप खुद समझ जाएँगे कि वो हमारे हितैषी है या नहीं। |

नींम कड़वा जरुर होता है पर ज्यादातर बीमारियों में नीम, हकीम का काम करता है। कुछ लोग नीम की तरह होते है। लेकिन वे ही आपके सच्चे हितैषी भी होते है।

ऐसे लोगों से हमेशा आपको फायदा ही मिलता है क्योंकि उनको जब आपकी बुराई करनी होती है तो वो आपके पीठ पीछे नहीं बोलेंगे, बल्कि वो आपके सामने ही आपकी बुराई कर देंगे। उनकी बातें बिलकुल खरी होती है। |

अब में बुरे लोगों की बात करूँ तो वो नकारात्मक पहलुओं को तुरंत पकड़ते है और जब हम उनके साथ रहना शुरू करते है तो हमारे अन्दर भी वो ही नकारात्मक भाव पनपने लगते है।

हमारी सोच भी उन्ही के जैसी होने लगती है।  क्योंकि एक दूसरे में घुलने-मिलने के लिए हमें भी उनके जैसा ही बनना पड़ जाता है। ये मानव की प्रकृति है कि वो नकारात्मकता की ओर जल्दी ही आकर्षित हो जाता है। जिसका प्रभाव उन्हें तब दिखाई पड़ता है जब कोई उनकी आशाओं को रौंदकर उनसे आगे निकल जाता है। 

कई बार तो इतनी देर हो चुकी होती है कि मंजिल हाथ से पूरी तरह निकल जाती है। जो लोग मीठा बोलते है, आपको उनसे सतर्क रहने की जरुरत है। हो सकता है कि वो आपके हितैषी ना हो। मैं ये नहीं कहता कि सभी लोग एक जैसे ही होते है।  कुछ लोग आपकी परवाह करने वाले भी होंगे।

Usman Gani 
The Fabindia School 
ugi@fabindiaschools.in

Wednesday, June 10, 2020

आशा और मित्रता: कृष्ण गोपाल


हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए, कठिन और सुखद दिन तो आते रहते हैं।  निराशा व्यक्ति को पतन की और ले जाती है जबकि आशा एक नई शक्ति का संचार करती है।  परोपकार करने से आशा बलवती होती है।  अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा कार्य अवश्य करें। 

आशा जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है।  प्रसन्नचित मन और सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति को कभी बीमारियाँ नहीं घेरती। जीवन में लक्ष्य प्राप्ति करनी है तो आशावादी बने रहो, चाहे असफलता मिले किसी काम में, फिर भी आशा  दामन छोड़ो।  राष्ट्रकवि  मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में -

समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।  

सच ही कहा गया है कि आशा अमर धन है।  व्यक्ति जब निराश हो जाता है तब कुछ भी करने की इच्छा नहीं रहती। यदि इसी प्रकार निठल्ला बैठ जाएगा तो प्रगति का चक्र ही रुक जाएगा।  निराशा का भाव मन में जगते  देर नहीं लगती।  ऐसे अवसर तो जैसे तैयार ही बैठे है।  जब कुछ करने की चाह हो और उसमें असफलता मिले तो निराश हो सकते है।  उचित सहयोग  मिले तो निराश हो सकते है।  अर्थात निराश होने के कई बहाने है।  

आशा का एक और रूप है- मित्रता।  मित्र होने पर आशा भी बलवती हो जाती है।  सच्चा मित्र व्याधि हर लेता है जबकि दुष्ट मित्र हमेशा कष्ट देता रहता है। मित्र से सहानुभूति रखें, आवश्यकतानुसार सहयोगी बनें, प्रसन्नचित, उदार और हितैषी बने।  हम सामाजिक प्राणी है अतः मित्रों की आवश्यकता रहती ही है।  मित्रों की संख्या में वृद्धि करें और प्रसन्न रहें। 

मित्र ऐसे हो जो हर कठिनाई में मदद करे, परन्तु केवल अपेक्षा ही रखें।  मित्रता का सठीक नियम है, देना।  पहले देने की मंशा रखें, मिलना तो स्वतः ही होता रहेगा।  यदि लेने की चाह में मित्र का हाथ थामा है, तो यह नियम के विरुद्ध है। सच्चा मित्र संकट में साथ नहीं छोड़ता ये बात आप पर भी लागु होगी।  अपने मित्र का साथ हर परिस्थिति में निभाइए, फिर मित्रता का आनंद लीजिए। 
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali

Sunday, February 23, 2020

मित्रता का भाव : कृष्ण गोपाल


जीवन में मित्र होना परमावश्यक है।  कहा जाता है अन्य रिश्ते ईश्वर बनाता है किन्तु मित्रता का रिश्ता व्यक्ति स्वयं ही बनाता है।  मित्रता के कोई नियम नहीं है।  सुख के पलों की अपेक्षा तकलीफ में मित्र का सहयोग करें। एक सच्चा मित्र बनकर संकटों और कठिनाइयों में सहयोग करें। अपने लिए भी ऐसे ही मित्र का चुनाव करें जो हर परिस्थिति में आपका साथ छोड़े।  अपने मन की बातों, जिसे किसी और के समक्ष प्रकट कर सकें, उन्हें अपने मित्र को बता सकें।  मित्र अंतरंग होने चाहिए हमारी बातों पर पीछे से उपहास करे वह इस अंतरंग मित्र की श्रेणी में नहीं सकता।  अंतरंग मित्र तो दूर वह सामान्य मित्र कहलाने के योग्य भी नहीं हो सकता। वही व्यक्ति सबसे अधिक धनवान है जिसके अधिक मित्र है।  लेने या किसी लाभ के वश मित्रता करें।  श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता यही भाव समझाती है। अपनी तरफ से देने का प्रयास ही मित्रता का भाव है। मित्र में कोई दोष निकालें, यदि है भी तो अपनी योग्यता से उसे दूर करने का प्रयास करें। हमें सच्चे और झूठे मित्र के बीच अंतर करना आना चाहिए। हमारा इतिहास मित्रता के किस्सों से भरा पड़ा है।  उन किस्सों को सुनकर या पढ़कर मित्रता का भाव समझ सकते है। 

कबिरा संगत साधू की हरे और की व्याधि
संगत बुरी असाधु की आंठों पहर उपाधि
कबीर का उपर्युक्त पद मित्रता की सठीक व्याख्या करता है।  सच्चा मित्र व्याधि हर लेता है जबकि दुष्ट मित्र हमेशा कष्ट देता रहता है। मित्र से सहानुभूति रखें, आवश्यकतानुसार सहयोगी बनें, प्रसन्नचित, उदार और हितैषी बने।  हम सामाजिक प्राणी है अतः मित्रों की आवश्यकता रहती ही है।  मित्रों की संख्या में वृद्धि करें और प्रसन्न रहें। 

कहि रहीम संपति सगे बनत बहुत बहु रीत
विपति कसौटी जे कसे तेई सांचे मीत

उपर्युक्त दोहे के अनुसार तो वही सच्चा मित्र है जो कठिनाई में काम आए।  परन्तु मित्र की कठिनाई में पहले स्वयं मदद करें फिर किसी प्रकार की अपेक्षा रखें। 
Krishan Gopal
The Fabindia School, Bali
kde4fab@gmail.com

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