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Saturday, May 1, 2021

आचरण सज्जनता की कसौटी है: उर्मिला राठौड़

'सज्जनता' एक भाव नहीं है, यह तो एक पूर्ण रूप से संयुक्त भाव हैउदारता, सहिष्णुता, सहृदयता और स्नेह आदि इनके पूरक गुण हैइन गुणों का विकास समाज के हित में होता हैकिसी भी व्यक्ति की संगति से यह तय होता है कि कौन व्यक्ति सज्जन है एवं कौन दुर्जन

व्यक्ति का निर्मल आचरण मृदुल वार्तालाप, सहज स्नेह भाव और सेवा एवं सहयोग की तत्परता से उसे सज्जन व्यक्ति की उपाधि देता है। बौद्ध धर्म में इसे 'सम्यक विचार' कहकर धर्म की निष्ठा के रूप में स्वीकार किया गया हैसज्जनता की महत्ता 'विनयाद याति पात्रताम्' के वाक्य से भी बताया गया है कि विनयशील व्यक्ति ही सुपात्र तथा सज्जन कहलाता है

हम दूसरों के साथ जिस प्रकार का आचरण करते हैं, उसकी एक निश्चित प्रतिक्रिया होती है। हमारे आचरण से अगर अन्य व्यक्तियों को कष्ट या दुख प्राप्त होता है तो कौन हमें विनयशील और सज्जन समझेंगे और यदि हमारे आचरण में छल, कपट, द्वेष और स्वार्थ परायणता होती हैं तो वह हमें दुर्जन समझते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे आचरण के स्वरूप पर ही दूसरों का आचरण निर्भर है। एक अच्छा आचरण समाज के हित में होगा और लोगों के हित में होगा। वहीं व्यक्ति सज्जनता की परिधि में आएगा।

परिवार आचरण की पहली पाठशाला है। सत्य बोलना और उचित आचरण का पाठ प्रत्येमाता-पिता को अपनी संतान को देना चाहिएमधुर बोलना, बड़ों का आदर, छोटों से प्यार और मित्रों से सत्य व्यवहार यह सब बच्चों को इसलिए सिखाया जाता है कि वह बड़े होकर समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सके और कोई उनके अनुचित व्यवहार के कारण उन्हें घृणा का पात्र नहीं समझे

श्रेष्ठ आचरण जीवन की उन्नति का आधार तो है ही, साथ ही अनुशासन सिद्ध पुरुष ही संसार में महापुरुष बन सके हैं। जैसे - महात्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, मदर टेरेसा, मार्टिन लूथर, नेल्सन मंडेला, ज्योतिबा फुले, डॉ. बी. आ. अम्बेडकर, डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम दि। इन्होंने अपनी सज्जनता से दूसरों को अनायास ही प्रभावित किया है और आभी इनकी स्तुति की जाती हैयदि इनका आचरण शुद्ध नहीं होता तो वे सज्जन नहीं समझे जाते और समाज उनका यशोगान कभी नहीं करता।

उर्मिला राठौड़ 

The Fabindia School, Bali
ure@fabindiaschools.in

Saturday, May 30, 2020

जिम्मेदारी और सहयोग: सुरेश सिंह नेगी


जिम्मेदारी का वास्तविक अर्थ प्रतिक्रिया करने की क्षमता है। रूसो का कहना है कि ‘मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सदा जंजीरों में जकड़ा रहता है। यह बात काफी हद तक सही भी है, क्योंकि जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं वैसे-वैसे हमारी, समाज और देश के प्रति जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती चली जाती हैं। किसी भी कार्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उस को कितनी जिम्मेदारियों के साथ किया गया है। दूसरों के प्रति जिम्मेदार होने से पहले हमें खुद के लिए जिम्मेदार होना चाहिए। अधिक जिम्मेदार होने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम पहले अपनी सीमाओं के बारे में जानें।

सहयोग, सामाजिक जीवन की सबसे मौलिक और साहचर्य प्रक्रिया में से एक है। इसके बिना कोई भी समाज अस्तित्व में नहीं रह सकता।  यह मानव जीवन की जड़ है।  सहयोग शब्द  का मतलब एक साथ काम करना है। दूसरे शब्दों में, इसका  अर्थ है सामान्य लक्ष्य या लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मिलकर काम करना है।

सहयोग तब होता है, जब लोग अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए एक साथ काम करते हैं, भले ही वे एक साथ काम करने के लिए स्वतंत्र हों। सहयोग के साथ किये गए कार्य में सफलता मिलने की उम्मीद ज्यादा होती है,क्योंकि सहयोग द्वारा किये गए कार्य में काम को आपस में जिम्मेदारियों के साथ बाँट  दिया जाता है।

आज  कोविद -१९ के इस दौर में हम सबका यह कर्तव्य बनता है कि हम सब  अपनी -अपनी जिम्मेदारियों को समझें और एक -दूसरे के सहयोग से उनका निर्वहन करें।
Suresh Singh Negi
The Fabindia School, Bali

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