Like Vs Unlike - Shalini Tiwari

प्रकृति ने सभी को स्वयं में विविधता पूर्ण बनाया है, सबकी अपनी पसंद और नापसंद होती है जिसमें कुछ पसंद तो आपकी व्यक्तिगत होती है और कुछ हम दूसरों के दबाव में आकर पसंद करने लगते हैं तो पसंद और नापसंद पर हम कुछ बिंदुओं द्वारा चर्चा करने का प्रयास करते हैं-

चुनाव (Like) को महत्व देना

हमें अपनी पसंद के साथ दूसरों की पसंद को भी महत्व देना चाहिए| जीवन में हमें क्या पसंद है यह हमारी रुचि और नजरिया तय करता है और आवश्यक नहीं है कि जो हमारी पसंद हो, हमारा नजरिया हो वह सभी का हो | समय के साथ अब हर व्यक्ति की पसंद को महत्व दिया जाने लगा है पहले जो अभिभावक ने कह दिया वही हमारी पसंद बन जाती थी| यदि वह हमारे अनुकूल है तो हम मन से स्वीकार कर लेते थे परंतु प्रतिकूल होने पर पसंद का स्थान आज्ञा ले लेता था| जैसे-जैसे समय बदला, सोच बदलती गई और सबकी पसंद को प्राथमिकता दी जाने लगी। किसी भी परिवार संस्था या समुदाय में जब तक हम दूसरों के पसंद को महत्व नहीं देते हैं वहां सदैव विचारों में मतभेद पनपते रहते हैं

आत्म निर्णय की क्षमता में विस्तार

कई ऐसे लोग हैं जो अपने जीवन में, जिन बातों को नहीं पसंद करते हैं वह अपने बच्चों पर भी लागू करने लगते हैं यह कहकर कि, ऐसा ही होता है। यदि आज के समय में हम बच्चों की पसंद पर सवाल उठाते हैं तो प्रश्नों की बौछार लग जाती है लेकिन यही समय है जब, हम बच्चों के प्रश्न टालने के स्थान पर उससे होने वाले हानि लाभ पर चर्चा करें क्योंकि मन में उठे प्रश्न उन्हें संतुष्ट नहीं होने देते और फिर उन उत्तरों को ढूंढने में कई बार रास्ता भटक जाते हैं।

कई बार हम सोचते हैं कि बच्चों को कोई अनुभव नहीं है तो उनकी पसंद को कैसे उचित समझा जाए? तब हमे यह सोचना चाहिए कि क्या हमने कभी इस तरह के चुनाव का अनुभव किया? यदि हाँ तो आप बहुत आसानी से अपने बच्चों के चुनाव पर चर्चा सकते हैं और उन्हें उनके प्रयोग से अनुभव करने दे। जब आप अपने बच्चों के चुनाव में सहमति जताते हैं तो बच्चे महसूस करते हैं कि उनके भी विचारों को महत्व दिया जा रहा है। ऐसे भी लोग हैं जो अपने अतीत से सबक लेकर आने वाले पीढ़ी को उनके चुनाव के लिए आजादी देते हैं

आत्मविश्वास द्वारा भौतिकवाद में कमी 

आज के समय में भौतिकता इस कदर पाँव पसार रही है कि अधिकतर लोग ‘दिखावे’ को सामाजिक स्तर बना लिये हैं। बच्चे फैशन के होड़ में गलत हो या सही, एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं। मेरा मानना है कि ऐसे में अभिभावक बच्चों को स्पष्ट रूप से मना करने के स्थान पर उनसे उन कामों से भविष्य में पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा करें और स्वयं निर्णय करने के लिए छोड़ दें। 

कई बार हमें बच्चों की प्रतिक्रिया से ऐसा लगता है कि हम व्यर्थ ही उनसे वार्तालाप कर रहे हैं किंतु, बच्चे हमारे प्रश्न  चर्चा से कुछ न कुछ आत्म मंथन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। जब स्वतः विश्लेषण करते है तो उनमें आत्मविश्वास आता है और भौतिकवाद को सही नजरिए से देख पाते हैं।

साथी या सहकर्मी दबाव (Peer Pressure) को नियंत्रित करने में कुशलता प्राप्त करना

स्वाभाविक तौर पर जब हम मित्र बनाते हैं तो हम उनके साथ रहते हुए 'साथ निभाने 'का दबाव महसूस करते हैं। सहकर्मी का दबाव सकारात्मक भी होता है और नकारात्मक भी।  यदि हमारे साथी बुद्धिमान व सकारात्मक सोच वाले हो तो उनका दबाव हमारे उत्साह को बढ़ा सकता है किंतु साथियों का दबाव तब गलत होता है जब वह अपनी पसंद(Like के लिए आप पर दबाव डाल रहे हैं। 

ऐसे में आप सहजता से, कारण के साथ मना करें। जब आप पहली बार उसे ना करेंगे तो अगली बार दबाव डालने की बजाय पहले आपसे राय लेना उचित समझेंगे या आपसे दूरी बना लेंगें।

यदि किसी विषय से संबंधित गतिविधि में सम्मिलित हैं और सहकर्मी का दबाव महसूस हो तो उस समय अपनी क्षमता के अनुसार उसे समझा कर उस कार्य को रचनात्मक तरीके से करने का प्रस्ताव रखें।

धन्यवाद
शालिनी तिवारी
सनबीम स्कूल इंदिरानगर
(वाराणसी)

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