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Sunday, November 29, 2020

कहानियों की जीवन में भूमिका - सुरेश सिंह नेगी

कुछ लोगों के पास नई चीजों को सीखने और नए विचारों का पता लगाने का हुनर होता है। जबकि कुछ अन्य अपने आसपास के सफल व्यक्तियों को देखते हुए सीखने के लिए स्व -प्रेरित होते हैं। 
हालांकि, यह सभी लोगों के लिए संभव नहीं है और उनमें से कई को अत्यधिक परिश्रम करने के साथ -साथ अपने गुरूओं और माता-पिता से  प्रेरणा लेनी  पड़ती है। इनमें से बहुत लोग ऐंसे भी हैं जो कहानियों से सीखते हैं। क्योंकि कहानियां संस्कृति को संरक्षित करती हैं और सांस्कृतिक ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाती हैं। संक्षेप में, कहानियां संस्कृतियों को जीवित रखती हैं।

कहानियों के माध्यम से, हम जुनून, भय, उदासी, कठिनाइयों और खुशियों को साझा करते हैं। कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हैं। कहानियों के माध्यम से हम समृद्ध भावनाओं और खुशी, दुःख, कठिनाइयों और असफलताओं की भावनाओं का अनुभव करते हैं। हम व्यवहार और परिणामों के बारे में सीखते हैं।कहानियां हमें आपसी मतभेदों के बावजूद दूसरों के साथ जुड़ना सीखाती हैं क्योंकि हम समझते हैं कि वे कौन हैं और हम इस दुनिया में कहां खड़े हैं।

कुछ कहानियां रोचक होती हैं तो कुछ मनोरंजक और  सीख  देने वाली होती हैं। सभी कहानियां हमेशा से ही लोगों  की पसंद रही हैं। सदियों से, कहानियों को ज्ञान के रूप में  इस्तेमाल किया जाता रहा  है। कहानियां सीखने को प्रभावी बनाती हैं, और इसीलिए बच्चे कहानी के साथ बहुत अच्छे से जुड़ते हैं। यही एक कारण है कि शिक्षक-गण  इसे बच्चों को कई क्षेत्रों में प्रेरित करने के लिए एक उपकरण के रूप में अपने आस-पास और कक्षा में उपयोग करते हैं।जो छात्रों को कड़ी मेहनत करने और सफल जीवन के लिए अपनी नींव रखने में मदद करती हैं।

सुरेश सिंह नेगी
The Fabindia School
sni@fabindiaschools.in

Monday, August 3, 2020

भारतीय संस्कृति - Krishan Gopal

भारतीय संस्कृति के विविध रूप है। इसके कई कारण है, यहाँ की अलग-अलग ऋतुएँ, इतिहास, धर्म, जाति
संप्रदाय और कृषि। यह सभी मिलकर भारतीय संस्कृति को प्रगाढ़ बनाते हैं। इन सभी में भाषा का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। संस्कृति के अंतर्गत हम रीति-रिवाज, परंपराओं, खानपान, धार्मिक-सामाजिक उत्सव आदि को सम्मिलित करते हैं। भारत में हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख और मुस्लिम धर्म के लोग निवास करते हैं। इन सभी की विविध परम्पराएँ  हैं। इन सभी धर्मों के मिश्रण से भी कई परम्पराएँ पैदा हुई, जिसने न केवल भारत को वरन विश्व को भी प्रभावित किया है। 

 भारत में एक तरफ ईद का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है तो दूसरी तरफ रक्षाबंधन की तैयारियाँ भी  अपने चरम पर है। सामाजिक एकता भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण तथ्य रही है। रमजान के पवित्र महीने में चारों तरफ खुशहाली की धूम मच जाती है तो सावन के महीने में शिवालयों में उत्साह देखा जा सकता है। ऐसा भी कहा जाता है कि भारत में वर्ष के पूरे 365 दिन उत्सव ही होते हैं। हमारे त्योहार और उत्सव इसी बात के द्योतक हैं कि आपस में भाईचारा बना रहे। विवाह भी किसी का एक अंग माना जा सकता है क्योंकि भारत में तयशुदा विवाह का प्रचलन अधिक है। ऐसे विवाह में कई परिवार आपसी रिश्तेदारी में बँध जाते हैं। पाश्चात्य संस्कृति से मेल होने के कारण इस प्रकार के विवाह में कुछ कमी अवश्य देखी जा रही है।

अगर हम सामान्य शब्दों में कहें तो संस्कृति यानी हमारी जीवन शैली। इस जीवन शैली में बालक अपने परिवार में होने वाले क्रिया-कलापों से प्रशिक्षित होता है। संस्कृति को किसी देश की विशेषताओं के अंतर्गत सम्मिलित किया जा सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी संस्कृति को बचाने का प्रयास करें। हमें हमारी परंपराओं, भाषाओं, रीति-रिवाजों, सामाजिक-राष्ट्रीय उत्सवों के बारे में जानकारी बढ़ानी चाहिए तथा इसे दूसरों के साथ भी साझा करना चाहिए। 

हमारी संस्कृति इतनी प्रगाढ़ है कि कई आघातों  के बावजूद सुरक्षित रह गई। आगे इसकी सुरक्षा हमारा दायित्व बन जाता है। हमारी राजभाषा हिंदी है किंतु हमारे यहाँ कई क्षेत्रीय भाषाएँ भी बोली जाती है, हमें इन भाषाओं का सम्मान करना चाहिए तथा इन को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाना चाहिए। नई शिक्षा नीति में भारत सरकार ने भी शिक्षा क्षेत्रीय भाषाओं में प्रदान करने की योजना बनाई है। इससे भी भारतीय भाषाओं का संरक्षण हो सकेगा। 
 सबसे महत्वपूर्ण हमारे राष्ट्रीय त्योहार, जो न किसी धर्म, न जाति संप्रदाय, न क्षेत्र आदि से जुड़े हैं। इन त्योहारों में जनता केवल भारतीय होने के गर्व के कारण भाग लेती है। 

यहाँ देश की एकता तथा सौहार्द ही महत्वपूर्ण होता है। यहाँ एक और बात महत्वपूर्ण है कि जब भी देश पर कोई संकट आता है तब सारे भारतीय बन जाते। फिर किसी प्रकार का मतभेद या मनभेद नहीं रहता। मिलकर सामना करते हैं या प्रोत्साहित करते हैं।  इन त्योहारों, उत्सवों  आदि का ध्यान रखते हुए आपसी एकता को मजबूत बनाना चाहिए। अपनी परम्पराएँ आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाएँ। देश की वस्तु, अपनी भाषा,अपने उत्सव आदि पर हम गर्व करें।  

 Krishan Gopal
The Fabindia School
kde4fab@gmail.com

Thursday, December 26, 2019

Caring Icons: सहानुभूति एक महान कक्षा संस्कृति का दिल है।

सीखना एक कौशल है। एक ऐसा कौशल जो समय के साथ त्रुटियों और प्रयासों से पाया जा सकता है। स्वयं को समय के प्रति समर्पित करके, गल्तियों को स्वीकार करके, ठोकर खाकर, गिरकर और संभलकर आगे बढ़ने पर ही लक्ष्य को पाने में कामयाबी मिलती है। यह बात भाषा शिक्षण की कक्षा में पूरी तरह लागू होती है।  मान लीजिए कि हम एक भाषा सीख रहे हैं, तो इसके लिए चयनित सामग्री का सही तरीके से उपयोग कारगर सिद्ध होता है।

प्रायः छात्र भाषा सीखने में असहज महसूस करते हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि उन्हें भाषा से संबंधित व्यवहारिक ज्ञान देने के बजाय नियम और निर्देश दिए जाते हैं। जो विषय रोचकपूर्ण ढंग से अभ्यास द्वारा आसानी से सीखा जा सकता है। उसे नियमों और सिद्धांतों में बाँधकर जटिल, बोझिल और नीरस बना दिया जाता है। यही बात अन्य विषयों के बारे में भी कही जा सकती है। इससे बच्चे सीखने के लिए अग्रसर न होकर, उकताकर हतोत्साहित और निराश हो जाते हैं और उनमें सीखने से विरक्ति हो जाती है।

याद कीजिए, किस प्रकार एक छोटे बच्चे को उसकी प्रारंभिक कक्षा में सबसे पहले उसके आसपास के लोगों, चीज़ों और दृश्यों से जुड़ी कविताएँ गाकर सिखाई जाती हैं, ताकि वे उनसे जुड़ाव महसूस करें। लय और ताल उनमें एक गति लाता है। अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति से वे उसे प्रभावी बनाते हैं। नन्हें-मुन्ने बच्चे दुनिया की उलझनों से अनजान होते हैं। उनमें सहज ग्राह्यता होती है। जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं, उनका दायरा बढ़ता जाता है। बुरे अनुभव उनकी क्षमता को प्रभावित करने लगते हैं।

आजकल लोग भाषा को स्टेटस सिंबल की तरह प्रयोग करते हैं।  एक भाषा को श्रेष्ठ और अन्य को उससे कम समझना भी सीखने को प्रभावित करता है। यह स्थिति किशोर छात्रों में प्रायः देखी जाती है। ऐसे में शिक्षक की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। एक शिक्षक आकर्षक व्यक्तित्व और बेहतर शिक्षण कौशल के साथ हर प्रकार के छात्र का ध्यान खींचने में सफल हो सकता है। जिस प्रकार एक कुम्हार घड़े को बनाने के लिए मिट्टी को आवश्यकतानुसार गीला करता है। घड़े को बनाते समय अंदर से वह एक हाथ से प्रेमपूर्वक धैर्य और कुशलता से उसे सहारा देता है और दूसरे हाथ से वह धीरे-धीरे लगातार चोट करता रहता है। कच्चे घड़े को वह तब तक संभाले रखता है, जब तक आग की तेज़ आँच में पककर वह इस्तेमाल के लिए तैयार न हो जाए, एक शिक्षक भी कुम्हार की तरह होता है, एक ओर वह प्रेम, धैर्य और सहानुभूति से छात्रों को भावनात्मक संबल देता है तो दूसरी ओर अनुशासन से उसे एक सुयोग्य नागरिक के रूप में स्थापित करता है। कक्षा के प्रतिभाशाली,कमजोर और औसत छात्रों के लिए बनाई गई कार्ययोजनाओं एवं अभ्यास के स्पष्ट उद्देश्यों से वह छात्रों को सीखने के लिए प्रोत्साहित करके  सफल हो सकता है। वास्तव में  “सहानुभूति एक महान कक्षा संस्कृति का दिल है।

- CARING ICONS, The Iconic School Bhopal

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