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Thursday, January 3, 2019

Kalpana Jain: हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी


आपने बचपन में कागज़ के हवाईजहाज़ जरूर बनाए होंगे और उन्हें उड़ाया भी होगा। विद्यालय में भी कुछ शरारती बच्चे कक्षा में कागज़ के हवाईजहाज़ बनाकर उड़ाते हैं। वही शरारती बच्चे अब बड़े हो गए हैं और अब वे संविधान के मंदिर में हवाईजहाज़ उड़ाते हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई एक-दूसरे को चोर ठहराते हैं। उनके पास कई बॉटल हैं और उनमें बंद कई जिन्न!! जिन्हें मौकापरस्त लोग अपना मतलब निकालने के लिए बाहर निकालते हैं। कुछ साल पहले बोफ़ोर्स का जिन्न निकला था और कई लोगों को ले डूबा था। आज-कल राफेल का जिन्न हल्ला मचा रहा है। जो कुछ राज्यों की सरकारों को ले डूबा है। ऐसा लगता है!! कुछ लोगों को ऐसा भ्रम है!
आपने एक गड़रिये की कहानी सुनी है? जिसमें वह रोज अपनी भेड़ों को चराने जंगल जाता था और वहाँ पर शेर आया.........शेर आया- चिल्लाता था। गाँववाले भागकर उसकी मदद करने आते। उन्हें देखकर वह जोर-जोर से हँसता और कहता अच्छा बुद्धू बनाया। एक रोज सचमुच शेर आ गया। वह अपनी जान बचाने के लिए जोर-जोर से चिल्लाया पर कोई भी मदद के लिए नहीं आया। आजकल एक पप्पू रोज राफेल-राफेल चिल्ला रहा है। कुछ भोले-भाले लोग बार-बार दौड़कर उसकी मदद को आ रहे हैं। 
विरोधी पक्ष भी पीछे नहीं है। कभी वह विदेशी मामा को खोज लाते हैं, तो कभी अन्य गड़े मुर्दे उखाड़ने लगते हैं। असल बात तो यह है कि सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। अवसरवादिता इन सब पर इस कदर हावी है कि घात लगते ही नीचा दिखाने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। इनकी तह में जाओ तो सब एक ही डोरी में गुंथे हुए हैं। जिनका एक ही उद्देश्य है, जैसे भी हो अपने छोटे-छोटे व्यक्तिगत हितों के लिए दूसरों के भविष्य को दाँव पर लगा दो। इनके सफेद कपड़ों के अंदर जमाने भर की कालिख छिपी हुई है। सबसे बड़े दुख की बात तो यह है कि ये सारा घालमेल देश के रक्षा सौदों में सालों से हो रहा है। देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिए अमर्यादित, अभद्र भाषा का प्रयोग, संविधान के मंदिर में रोज हंगामा खड़ा करना इनकी आदत हो गई है। 
कभी आपने सोचा है...किन लोगों के हाथ में हमने अपना भविष्य सौंप दिया है? हम सब इनके हाथ की कठपुतली बन गए हैं, जिन्हें वोट की ताल पर नचाया जा रहा है। अंधभक्तों की फ़ौज इनके पीछे है, जो इनके एक इशारे पर मर-मिटने और मरने-मारने को तैयार है। ज़रा सोचिए...किस खतरनाक मोड़ पर ले आये हैं हम, अपने साथ अपने देश को?
आज जब मैं यह लिख रहीं हूँ तो मुझे राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त बहुत याद आ रहे हैं। शायद वे भविष्यदृष्टा रहे होंगे तभी तो कई साल पहले कह गए– "हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी। आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।"

-कल्पना जैन, The Iconic School, Bhopal

Monday, October 15, 2018

Hindi poem - Veer Sainik - Kalpana Jain

जहाँ दिखी थोड़ी-सी हरकत, थोड़ा-सा गुबार उड़ा
भारत माँ की रक्षा करने, भारत माँ का लाल चला।
करके अपना सीना चौड़ा, लगा तिलक स्व भाल चला
बाँध कफन वह घर से निकला, बनकर वह महाकाल चला।       
वीर नहीं कायर होते हैं,  जो दहशत फैलाते हैं
नहीं छोड़ते माँ-बहनों को लहूलुहान कर जाते हैं।
छद्म वेश को धारण करके स्याह रात में आते हैं
पत्थरबाजी की आड़ में छिपकर मासूमों को सताते हैं।
गाय-भैंस और कार बेचकर अपना काम चलाते हो
नहीं सँभलता मुल्क स्वयं का आँख हमें दिखलाते हो।
करके आतंकी हमले,  मत सोये शेर जगाओ तुम
फिर होगी सर्जिकल स्ट्राइक, यह बात समझ अब जाओ तुम।
वीर हमारे कफन ओढ़कर अपने घर से निकलते हैं
करके अपना सीना चौड़ा मातृभूमि पर मरते हैं।
ओढ़ तिरंगा सो ताबूत में जब वह वापस आते हैं
माँ देती है उनको काँधा, वे शहीद कहलाते हैं।               

भारत माँ देती है थपकी, ओढ़ा उन्हें अपना आँचल
ऐसे वीर सपूतों को, शत-शत वंदन, है अभिनन्दन।

-Kalpana Jain
The Iconic School, Bhopal

Tuesday, August 14, 2018

Kalpana Jain ”एक ख्वाब था चरखे पे बुना अपना वतन हिन्दोस्तां”


”एक ख्वाब था चरखे पे बुना अपना वतन हिन्दोस्तां” जब ये धुन मेरे कानों में पड़ी तो विचार आया कि आज का जो भारत हमारे आसपास बिखरा हुआ पड़ा है - जातियों में, अशिक्षा में, भुखमरी में या फिर तथाकथित बुद्धजीवियों में- जो विदेशों में जाकर, विदेशी चैनलों के आलीशान एयरकंडीशन स्टूडियो में बैठकर भारत को जानने का दंभ भरते हुए स्वघोषित सच को उजागर करते हैं या फिर वो दलों के अगुआ जिनके ‘मुँह में राम है और बगल में छुरी’- जो जनता के पैसे से अपनी तिजोरियाँ भरते हैं और पाँच सालों के बाद सरकारी बंगलों से नल और टाइल्स उखाड़कर ले जाते हैं या फिर वे छद्म समाजसेवी जो सेवा का ढोंग करके मासूम बच्चों के सपनों को तार-तार कर देते हैं या फिर वे कट्टरपंथी जो सिर्फ अपने लाभ के लिए जाति का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत राष्ट्र का न लगकर किसी जाति का लगता है, जो संविधान के अनुच्छेदों को अपने हितों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करते हैं।  जहाँ तक नज़र जाती है कचरे का ढेर नज़र आता है । सच में क्या ऐसे ही भारत का ख्वाब हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था? क्या ऐसे ही भारत के लिए उन्होंने अपने घर के सुख को छोड़ा था। अपने व्यक्तिगत जीवन को तिलांजलि दी थी।



जिसे देखो वही अपने छोटे-छोटे हितों के लिए देश का बड़े से बड़ा नुकसान करते समय एक क्षण भर भी नहीं सोचता । बेईमानी और भ्रष्टाचार उनके खून के साथ रगों में दौड़ रहा है। हाँ कभी-कभी एक लहर देशभक्ति की आती है जब तिरंगे में लिपटा हुआ कोई वीर अपने घर लौटता है। कुछ सिसकियाँ उभरती हैं। संवेदना प्रकट करने की औपचारिताएँ निभाई जाती हैं। ऐसे समय में भी कुछ अमानवीय व्यवहार कभी-कभी कैमरे की नज़र में आ जाते हैं। मैंने कुछ दिन पहले टीवी पर एक दृश्य देखा जिसमें एक वीर जब वतन पर अपनी जान कुर्बान कर सदा के लिए आराम करने अपने घर वापस आया तो एक तथाकथित दल के वरिष्ठ नेता उनके पास संवेदना प्रकट करने आए उनका परिचय देते हुए उनके पिछलग्गू ने शहीद के परिवार से उन्हें यह कहकर मिलाया कि इनका आभार व्यक्त कीजिए- नेताजी आए हैं।
ऐसे दलों के अगुवाइयों के लिए शायद मैंने ज्यादा ही आदर पूर्ण शब्द इस्तेमाल कर लिए हैं। ये सब टीवी में देखकर मेरा तो खून ख़ौल उठा। शायद अभी भी मुझमें मेरा देश धड़कता है।
यदि वे सभी शहीद जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलनों में स्वतंत्रता की अलख जगाकर हमें वो आज़ादी दिलाई, जिसमें आज हम सभी चैन की साँस ले रहे हैं । और वे सब भी जो कुछ भी करने के लिए आज़ाद हैं, जो येन केन प्रकारेण अपनी  तिजोरियाँ भर रहे हैं । मैं कहना चाहती हूँ ऐसे तथाकथित समाजसेवियों, नेताओं और बुद्धजीवियों से कि वे अपने ड्रॉइंग रूम से बाहर निकलें । अपने पूर्वाग्रह के चश्मे उतार फेंकें और देखें आम भारतीयों के दिलों में जहाँ पर भारत बसता है।  अभी भी हमारे दिल देश के लिए धड़कते हैं। भारत हमारे खून के साथ रगों में दौड़ता है। हमारी देश भक्ति भी जागती है। जब कहीं से भी एक लहर आती है, तो हमारा दिल भी जोर- जोर से उछालें लेता है । घोटालों से भरे इस भारत में यदि वे सभी महान शहीद  एक दिन के लिए वापस लौट आए तो उन्हें क्या लगेगा ? क्या किसी एक के मन में भी ये विचार आता है ?
ऐसा नहीं है कि सभी भारतीय हृदय संवेदना शून्य हो गए हैं । हमारा देश हमारे अंदर है । हाँ…हम सब अपने भारत पर और अपने भारतीय होने पर गर्व करते हैं और अनायास हमारे ओंठ गाने लगते है।
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ।
हम बुलबुले हैं इसके ये गुलसितां हमारा ।।
🇬🇶 जय हिंद  जय भारत 🇬🇶
- Kalpana Jain, The Iconic School Bhopal
Email jainkalpna17@gmail.com

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