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Saturday, September 26, 2020

Happiness and Tolerance - Triumph DGS

            

       "ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए |
         औरन को सीतल करे, आपहु सीतल होए ||"
जी हाँ ! गहन अध्ययन का विषय है कि खुशी (HAPPINESS) तथा  सहनशीलता (TOLERANCE) एक दूसरे के पूरक हैं | हम यह भी कह  सकते हैं कि यदि आइने के एक ओर खुशी खड़ी है, तो दूसरी ओर सहनशीलता उसके प्रतिबिम्ब के रूप में दिखाई देती है |

एक छोटा सा पौधा उगाया जाए तो उसमें से फल या फूल के उगने तक की प्रतीक्षा, सहनशीलता का प्रतीक है और जिस प्रकार एक माँ अपने नवजात शिशु को देखकर भीगी मीठी आँखों से खुशी का व्याख्यान करती है,उसी प्रकार फल को देखकर हर चेहरे पर खुशी का अनुभव किया जा सकता है |

कक्षा में अध्यापिका सभी को समान रूप से शिक्षित करती है परन्तु हर छात्र प्रथम स्थान अर्जित नहीं कर पाता | जब शिक्षिका उस विद्यार्थी का हाथ थाम कर उसे सबके समान स्थान पर पहुँचाती है, जो शायद पढ़ाई में कुछ कमज़ोर होने के कारण सबसे आँखें चुराता हो,तो थोड़ी सहनशीलता का पालन दोनों ही ओर से करते हुए दोनों के मुख पर जिस खुशी का अनुभव किया जा सकता है, वह खुशी अतुलनीय है।

अपनी खुशी ढूँढना मनुष्य का स्वाभाविक कर्म है,परन्तु अपनी हार्दिक इच्छा के विरुद्ध जाकर भी दूसरे के विचारों को सुनना, समस्याओं को सुलझाना तथा विचारों को सम्मान देना सहनशीलता का सर्वोपरि उदाहरण है और दूसरे की खुशी में जो खुशी ढूँढना शुरू कर दे, वह सृष्टि  का वास्तविक अधिपति कहलाता है |

अध्यापक जीवन की एक सत्य घटना से आपको अवगत कराती हूँ | कक्षा दसवीं की आवासीय विद्यालय की एक छात्रा जो शायद अपने पारिवारिक कारणों से कुछ अनमनी सी विद्यालय में सभी से लड़ लिया करती थी | उसका स्वभाव हमेशा ही चिड़चिड़ा रहता था| कोई भी बच्चा उससे मित्रता करने में कतराता था, यहाँ तक कि विद्यालय के अध्यापक-अध्यापिकाएँ भी उससे बच कर निकलना पसन्द करते थे, यह सोच कर कि वो न जाने कब-किस पर बिगड़ जाए | मुझे उस छात्रा के लिए विशेष अध्यापिका  के रूप में नियुक्त किया गया | कार्य मुश्किल था,परन्तु असंभव नहीं |

उस बच्चे के दिमाग को पढ़ने,समझने तथा उस की मनोस्थिति समझने  में मुझे तकरीबन दो महीने का समय लग गया, परन्तु मेरे द्वारा दिखाए गए सहनशीलता के मार्ग पर जल्द ही वह भी चलने लग गई, और जल्द ही हम दोनों के बीच स्नेह भरा एक प्यारा सा रिश्ता कायम होने लगा जिससे अब मैं उस छात्रा की शिक्षिका कम और मित्र ज़्यादा हो गई |आज वह छात्रा दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में एक सफल मनोचिकित्सक है |

सहनशीलता और खुशी का इससे बेहतर उदाहरण और कहाँ मिलेगा जब आप अपने हाथ से धरती में बीजारोपण करो और आपकी आँखों के सामने उस बीज की बेल निशदिन एक-एक पत्ता, एक-एक फूल के साथ बढ़ती हुई उन्नति की नई सीढ़ियाँ चढ़ती दिखाई दे |
सहनशील धरती जैसा जो हर मन हो जाए, 
                 फल-फूल के रूप में खुशियाँ अपार पाए|  
हर जीवन फलती बेलों सा मंद-मंद मुस्काए, 
                 जो हर प्राणी थोड़ा-थोड़ा सहनशील हो जाए | 

Proudly created by the inspiring team of Triumph DGS @ The Doon Girls' School, Dehradun - Prachi Jain, Mansi Sondhi Arora, Ritika Chandani, Shalu Rawat, Mohini Bohra Chauhan and Prachi Parashar

Sunday, May 17, 2020

साहस और धैर्य: सुरेश सिंह नेगी


डर, दर्द, खतरा, अनिश्चितता का सामना करने की क्षमता को साहस के नाम से जाना जाता है। क्रोध के आने पर एक कायर भी खुद को भूल जाता है और लड़ने लग जाता है। लेकिन क्रोध में वह जो काम करता है वह साहस नहीं होता है।

डर का न होना साहस नहीं है बल्कि डर पर विजय पाना साहस है बहादुर वह नहीं जो भयभीत नहीं होता है, बल्कि वह है जो इस भय को परास्त करता है।

इन्द्रियों को वश में रखना, भावनाओं पर काबू पाना धैर्य को परिभाषित करता है। इंसान को इंसान बनाए रखने में यह मुख्य भूमिका अदा करता है। विवेक, सहनशीलता, सद्विचार, संवेदनशीलता, अनुशासन, संतोष धैर्य के आधार स्तंभ हैं। धैर्य  सफलता की  पहली सीढ़ी हैं।

जहाँ एक ओर सच बोलने के लिए साहस की आवश्यकता होती है, वहीं दूसरी ओर सच सुनने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। अगर हौसला बुलंद हो तो दुनिया का कोई भी काम असंभव नहीं है । यह बात दशरथ मांझी ने बखूबी साबित करके दिखाया है। पर्वत पुरुष दशरथ मांझी ने छेनी हथौड़ी एवं मजबूत इरादे से पहाड़ का सीना चीर कर दिखाया है । 

दशरथ मांझी 18 वर्ष की उम्र से ही पहाड़ काटने में लग गए थे और लगातार 22 वर्षों तक पहाड़ को काटते रहे; उनके दृढ़ विश्वास एवं मजबूत इरादे के आगे पहाड़ भी हार गया और 22 वर्षों की मेहनत के फलस्वरूप 360 फुट लंबा 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता बना दिया । जिसके कारण उनकी गाँव गहलौर से शहर की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर 15 किलोमीटर हो गई ।

इसी तरह से अखरोट का पेड़ लगाने के लिए साहस और धैर्य की आवश्यकता होती है, क्योंकि आमतौर पर अखरोट का पेड़ फल देने में कम से कम दस साल का लम्बा समय लगाता है। दोस्तों हमें इन उदाहरणों से यही सीख मिलती है कि इंसान के लिए कोई भी काम असंभव नहीं है । आप वह सब कुछ कर सकते हैं, जो आप सोच सकते हैं ।

इस के लिए बस शुरू कीजिए और उस काम को निरंतर करते रहिए सफलता एक दिन आपको जरूर मिलेगी
Suresh Singh Negi
The Fabindia School

Monday, March 9, 2020

खेल: कुसुम डांगी


खेल का हर मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। हर मनुष्य के लिए अच्छे स्वास्थ्य का होना आवश्यक है। एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क होता है।

अध्ययन के साथ-साथ व्यायाम भी मनुष्य के सर्वांगिण विकास में सहायक है व्यायाम से मनुष्य तन और मन दोनों रूप से स्वस्थ होता है। खेलों से उनका शारीरिक और मानसिक विकास होता हैं खेलों से उनमें धैर्य, सहनशीलता का विकास होता हैं तथा इससे हमारे अन्दर आज्ञाकारिता और अनुशासन जैसे गुणों का विकास होता हैं

खेल एक अच्छा मनोरंजन है खे खेलने वालों का भी मनोरंजन होता है और देखने वालों का भी। हमारा जीवन भी खेल जैसा ही है जैसे जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं वैसे ही खेल में भी हार-जीत होती है और हम इससे बहुत कुछ सीखते हैं

खेलों के द्वारा इंसान एक दूसरे के साथ सहयोग से रहता है। इससे हम अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों से कैसे लडा जाता है वो सीखते हैं खेल एक व्यायाम है जो हमारे शारीरिक अंगों के साथ-साथ मानसिक विकास भी करता है। इससे दिमाग का संतुलन बना रहता है। प्रत्येक मनुष्य को नियमित रूप खेलना चाहिए जिससे मस्तिष्क तनाव रहित रहता है तथा शरीर में सुस्ती नहीं रहती है।

इसलिए हम कह सकते हैं कि खेलों का हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इससे हमारे अन्दर आत्मविश्वास बढ़ता है एवं प्रगतिशील बनने के गुण उत्पन्न होते हैं
Kusum Dangi
The Fabindia School, Bali <kdi4fab@gmail.com>

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