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Friday, May 14, 2021

Freedom and Peace - Manju Srivastava

         स्वतंत्रता एक ऐसी चीज़ है जो इस सृष्टि पर जन्में हर एक जीव जन्तु , प्राणी और

 यहां तक कि पेड़ पौधों के लिए भी अति आवश्यक है l स्वतंत्रता के बिना उनका पूर्ण

 विकास संभव नहीं  है l

       स्वतंत्रता का अर्थ केवल अपनी ज़जीरों को उतार देना नहीं होता , बल्कि इस तरह

 से जीना है कि औरों का भी सम्मान बढ़े और वे भी स्वतंत्र हो l

       एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक उचित होती है जहां से दूसरे व्यक्ति की शांति भंग

 न हो और वह भी अपने जीवन का विकास कर सके l

      शांति को स्वतंत्रता से अलग किया ही नहीं जा सकता क्योंकि कोई भी तब तक शांति

 से नहीं रह सकता जब तक वह स्वतंत्र न हो l

     स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है जिसे सब को मिलना चाहिए l

     हम बाहरी दुनिया में शांति नहीं पा सकते है l  हमें अपने अंदर ही शांति को तलाशना

 है l मन शांत होगा तो विचार भी सकारात्मक होगें l

Manju Srivastava
The Doon Girls' School, Dehradun 

Wednesday, May 13, 2020

आदर - Rajeshwari Rathore

आदर, यह एक बहुत ही मूलभूत मानवीय गुण हैं लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह गुण जब तक नहीं सीखा जा सकता है जब तक हम दूसरों का आदर करना नहीं सीखते हैं। यह गुण किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण में एक मजबूत स्तंभ का कार्य करता है जैसा कि एक प्रसिद्ध कहावत है " आदर दीजिए आदर पाइए " अर्थात यह एक परस्पर अंतर क्रिया है और एक तरफा नहीं है।

हम किसी से अपने धनबल बाहुबल या अन्य किसी प्रभाव से अपना दिखावटी आदर करवा सकते हैं परंतु सच्चा आदर प्राप्त करने के लिए हमें छोटे बड़े ऊंच-नीच पद को दृष्टिगत नहीं रखते हुए मानव मात्र का सम्मान करना चाहिए। हम किसी का निस्वार्थ भाव से सम्मान करते हैं तो प्रत्युत्तर में हमें भी आंतरिक  ह्रदय से सम्मान प्राप्त होता है यही मानवीय गुण की सच्ची व्याख्या है।

Rajeshwari Rathore
The Fabindia School

Wednesday, May 6, 2020

ईमानदारी और सम्मान: आयशा टॉक


ईमानदार व्यक्ति सभी का सम्मान करता है एवं बदले में सम्मान पाता भी है। ईमानदारी का गुण किसी व्यक्ति के नैतिक चरित्र को पहचान देता है। ईमानदार व्यक्ति अपनी ईमानदारी के बल पर जीवन में सफलता जरूर प्राप्त करता है। परिवार, समाज, दोस्तों  और दुनिया भर में ईमानदारी हमेशा सराहनीय है। ईमानदारी और सम्मान एक ऐसा अभ्यास है जो धीरे - धीरे और धैर्यपूर्वक पहले घर और फिर विद्यालय में सिखाया जाता है। इसलिए घर और विद्यालय एक बच्चे के लिए उसके बढ़ते समय से ईमानदारी एवं सम्मान की भावना को विकसित करने के लिए सबसे अच्छी जगह है। 

हमें हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए। सर्वप्रथम हमारे माता - पिता , परिवार के लोग एवं गुरुजन उनका सम्मान करना चाहिए। क्योंकि वे हमसे बहुत प्रेम करते हैं एवं हमारा बहुत ख्याल रखते हैं। अनजाने में भी हमारे द्वारा बोले गए कटु शब्द उन्हें आघात पहुँचा सकते हैं, दुखी कर सकते हैं। अतः हमें मधुर वाणी द्वारा उन्हें सम्मान देना चाहिए। जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने  लिए  चाहते है, वैसा ही व्यवहार  हमें उनके लिए रखना चाहिए। अगर हमारे परिवार में कोई छोटे बच्चे, बीमार या बूढ़े व्यक्ति होते हैं, अगर हम उनकी सही ढंग से देखभाल करके एवं उनके किसी काम में मदद करके भी उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित कर सकते है। 

Ayasha Tak
The Fabindia School, Bali.

Tuesday, March 3, 2020

सम्मान और ईमानदारी - Transformers SHS

सम्मान या आदर के सम्बन्ध में यदि हम विचार करें तो हम पाते हैं कि यह भाव अथवा भावना मानव मन के अंदर अन्तर्निहित होता है | कुछ बच्चों में दूसरे व्यक्ति या अपनों से बड़े के लिए सम्मान व आदर भाव खुद खुद परिलक्षित होते हैं | यह भाव उनमें जन्मजात नहीं होती बल्कि उनके संस्कारसमाज, परिवेश एवं संगत का असर होता है | इसका अर्थ यह बिलकुल ही नहीं है कि इसके विपरीत परिस्थिति में पलने वाले बच्चे बिलकुल असभ्य ही होते हैं |

मुझे इस सन्दर्भ में एक कहानी याद आती हैं | बात सन 1997-98 की हैंउस समय में अपनी घर दार्जीलिंग मोड स्थित पैतृक निवास स्थान पर ही ट्यूशन पढ़ाया करता था एवं स्वयं एक प्राइवेट स्कूल का
संचालन किया करता था |

उस वक्त मैं लेखाशास्त्र और हिन्दी एबं वाणिज्य बिषय से वर्ग एकादस एवं बी कॉम के छात्र-छात्राओं को पढ़ाया करता थाउन दिनों जाने कितने छात्र-छात्रायें पढ़ा करते थे | यदि सत्य कहूँ तो समय के ढलते क्रम में वे सब
बातें एवं घटनाएं सिर्फ यादें बनकर रह गईमैं भी समय के अंतराल के साथ भूलता चला गयामैं बर्ष 2005 मैं सेक्रेड हार्ट स्कूल कर्सियांग और अब सिलीगुड़ी में केवल हिन्दी पढ़ाने में लीन हो गयापिछली सारी यादेंसिर्फ यादें ही रहे गईजो धीरे-धीरे मिटती चली गईमुझे उन दिनों की घटनाओं मे से एक लड़के की छवि याद आती है जो बर्ष 1997 से 2000 तक ही मेरे पास अध्ययन करने आया करता थावह स्वाभाव से बड़ा उद्दण्ड, बेपरवाह एवं कर्तव्यहीन होने के साथ -साथ बड़ा बद्तमीज़ था और मैं उसके व्यवहार से उन दिनों उदाशीन रहा करता था |

समय समय पर मैं अपने घर सिलीगुड़ी अक्सर आया जाया करता थाएक दिन शाम के समय लगभग 4:30 बजे सेठ श्रीलाल मार्केट के समीप मैं किसी कार्यवश खड़ा था, कि अचानक एक युवक और एक युवती पीछे सेसरकहता हुआ आया और मेरे चरण छूने के पश्च्यात अपनी पत्नी और बच्चे से भी चरण छूकर प्रणाम करने को कहा | इसके उपरांत मुझसे आशीर्वाद देनेको कहामैं भौचक्का सा रह गया | मुझे उस युवक कि छवि बिलकुल याद नहीं थीमुझे आश्चर्य चकित होता देख उसे लगा कि मैं पहचान नहीं रहा हूँफिर उसने बड़ी सभ्यता और शालीनता के साथ अपना
और अपनी पत्नी और बच्चे का परिचय करवाया और कहासर आज से लगभग 22-23 वर्ष पहले मैं आपके घर लेखाशास्त्र पढ़ने आया करता थाऔर फिर मेरे मानस पटल पर उसके चेहरे की धुंधली सी छवि मानस पटल पर उभरने लगीमै सोचने लगा यह वही गोपाल है जो उद्दण्ड, लापरवाह, बेपरवाह और शरारती के साथ बद्तमीज भी थाकितना.. बदल.. गयायदि सच कहूँ तो मै इस घटना के बाद सोचने के लिए विवश हूँ कि कैसे लोग कहते है - कि आज कल के बच्चे बड़ो का सम्मान नहीं करतेसमय के सब कुछ बदलता है बच्चों का व्यवहार भी समय के साथ परिवर्तन होता हैजो सकारात्मक और समाजोपयोगी..शाबित होता है...|
- Sangharsh Chettri <sangharsh.chettri88@gmail.com> for Transformers at Sacred Heart School, Siliguri

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