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Sunday, June 7, 2020

अपरिपक्व मस्तिष्क के फैसले (किशोर मन के फैसले के दुष्परिणाम) - धर्मेन्द्र पोद्दार


[ यह कहानी संकट कालीन परिस्थिति में मनुष्य किस हद तक लाचार और बेबस हो जाता है की समय और  परिस्थिति के आगे सुध-बुध खो कर उन कर्मों को करने को बेबस हो जाता है, जिसे करने की कल्पना वह स्वप्न में भी नहीं करता ]



यह कहानी एक पहाड़ी बेबस और लाचार हालात की मारी लड़की की है जो “करोना महामारी” के लगभग ढ़ाई मास बीत जाने के बाद सड़कों पर 

भीख माँगती हुईं आज मिली थी | वैसे तो सड़कों पर, बाजारों में भीख माँगने वालों की कोई कमी नहीं, वे अक्सर अपने अंदाज में खाना, पैसा, आदि माँगते रहते हैं, यदि कोई व्यक्ति उस याचक को कुछ दे देता है, तो वे उसे धन्यवाद देते हुए अन्य किसी दूसरे दाता की तलाश करते हैं, किन्तु इस याचिका (भिखारिन) की भीख माँगने की अंदाज़ बरी निराली थी | जो दिल को छू गई | 

आज रविवार का दिन है,  “करोना संकट” के कारण आज कल विद्यालय बन्द है | सोमवार से शनिवार तक आजकल “ऑनलाइन” कक्षा लगती है, इसलिए वक़्त नहीं मिलता, रविवार को घर के लिए साग-सब्जी लाने का मौका मिलता है | इसलिए मैंने निश्चय किया की, आज योग, स्नान, पूजा आदि से निवृत होने के पश्च्यात घर के  पास के बाज़ार चंपासारी बाज़ार से ही आवश्यक सामग्री खरीद लाऊँगा |

करीब नौ-दस बजे के आस-पास मै बाज़ार पहुँचा और अपनी आवश्यक सामग्री खरीद रहा था | तभी लगभग 18-20 वर्ष की युवती मेरे करीब आकर खड़ी हो गई और लगभग साहस बटोर कर बोली | कृपा कर मुझे कुछ खाने के लिए रुपये देंगे | मैंने तीन दिनों से कुछ भी नहीं खाया | इतना कह कर वह मूर्तिवत यों ही खड़ी रही |

 मैं  दुकानदार को पैसा चुका कर जब मुड़ा, तब तक वह वहीं खड़ी थी | उसने फिर पैसे  माँगें और इस बार उसके आवाज़ में कम्पन थी, पीड़ा थी और एक अव्यक्त अभिव्यक्ति जो उसके मन के करुण दशा को परिलक्षित कर रहे थे | उसकी आवाज़ और बोलने के अंदाज़ से स्पष्ट पता चलता था की वह एक पढ़ी लिखी कन्या है, जो परिस्थिति वस लाचार और मजबूर है | उसने बताया की उसके पति मर चुके हैं | वह बेघर हो चुकी है | उनका एक छोटा बच्चा भी है जो दूध के लिए  तड़प (विलख) रहा है | “करोना संकट” से पहले वह पहाड़ के किसी घाटी के किसी बस्ती में रहती थी |

उसकी “आत्मकथा” ने मेरी जिज्ञासा और  बढा दी ,  मैं कुछ और भी उसके बारें   में जानने को उत्सुक हुआ | उसने बताया की वह एक पढ़ी लिखी कन्या है | जिसने अपने मर्जी से विवाह किया था | शुरुआत में  सब,  कुछ वषों तक ठीक चला | उसका पति किसी कारखाने में काम करते थे | इसी दौरान उसे एक बच्चा पैदा हुआ | अचानक एक दुर्घटना में उसके पति की मृत्यु हो गई | फिर धीरे-धीरे आर्थिक संकट उत्पन्न होने लगी | घर चलाने के लिए उसे नौकरी करनी पड़ी | किन्तु बीमारी के कारण वह भी छूट गया | करोना संकट और बंदी के कारण कोई भी उसे घरेलु काम भी देने से कतराने लगे | पैसे तो पहले ही ख़त्म हो चुके थे | काम भी बन्द हो गया | पहले से कर्ज़ का भारी बोझ उसकी परेशानी और बढ़ाने लगे थे | मकान का किराया कई महीनों से न चुका पाने के कारण उसे घर छोड़ शहर में रोजी-रोटी की तलाश में  आना पड़ा |  

सिलीगुड़ी शहर आने के बाद एक समाज सेवी संस्था कुछ दिनों तक भोजन की व्यवस्था की, किन्तु अब वहाँ भी भोजन की व्यवस्था बन्द हो गई | 

 उसने कहा, अब मेरे पास भीख माँगने के सिवा  कोई चारा नहीं, साहब ! कुछ रूपए देंगें तो मैं और मेरा बच्चा कुछ खा सकेंगे… तीन दिनों से.. कुछ नहीं खाया..  मैंने तत्काल उसे दस रूपये दिए.. वह.. रूपए इस प्रकार लिए जैसे उसे कोई खजाना मिल गया हो.. 

मैं घर वापस आकर सोच में पर गया आखिर इस तरह वह लोगों से दस-पाँच रूपये लेकर कब तक गुजर बसर करेंगी | और वह मासूम बच्चा बड़ा होकर क्या बनेगा…?? 

बहुत आत्म मंथन करने के पश्च्यात मैं इसलिए निष्कर्ष पर पहुँचा दूसरे शब्दों में मेरे विचार से इस भीषण दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कहीं न कहीं मानव मन के उस वृत्ति से  है जो जीवनगत दूसरे शब्दों में  जीवन से सम्बन्धित फैसला बिना विचारे करते हैं और उसका परिणाम स्वयं तो भोगते ही हैं और उनकी संतान भी दुष्परिणाम भोगने को विवश होते हैं | जहाँ तक उनसे बातचीत कर ऐसा प्रतीत हुआ की उनकी एक विवेकहीन फैसला उसके जीवन को नर्क के समान बना दिया |

इसलिए मेरे विचार से जीवन गत फैसला चाहे किसी भी प्रकार के हो सोच समझ कर सद् परिणाम और दुष्परिणाम को ध्यान में रखकर विवेक पूर्ण ले | तभी जीवन में सफ़ल व्यक्तित्व के रूप में पहचान हासिल कर सकेंगे |

- धर्मेन्द्र पोद्दार (भाषा विभाग प्रमुख) सेक्रेड हार्ट स्कूल सिलीगुड़ी 

Sunday, May 17, 2020

वर्तमान संकटकालीन परिस्थिति (करोना) एक विचार: धर्मेंद्र पोद्दार

आज सम्पूर्ण विश्व “करोना वाइरस” के संक्रमण के संकट से जूझ रहा है | चीन के वुहान शहर से उत्पन्न यह समस्या आज लगभग सम्पूर्ण विश्व में संक्रमण फ़ैल चुका है, और सम्पूर्ण विश्व में लाखों लोगों की जान ले चुका है… और लाखों की  संख्या में लोग संक्रमित हैं |

जहाँ तक अपने देश भारत की बात है, ---अपना देश भारत भी इस संक्रमण से बुड़ी तरह प्रभावित हो रहा है | किन्तु राहत की बात यह है कि – यहाँ रोगी में सुधार की गति काफ़ी तेज़ है, और मृत्यु दर कम है | यदि भारत में इसके संक्रमण के प्रसार पर दृष्टिपात करें तो हमें स्पष्ट परिलक्षित होता है की कुछ लोगों की नासमझी और धृष्टता और लापरवाही इस रोग को फ़ैलाने में सहायक रहे है |

हलांकि हमारी केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों इस समस्या से निपटने के लिए जी-जान से कोशिश कर रही है, किन्तु इनकी कोशिश तभी सफ़ल हो सकती है --- जब हम सभी सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों का अक्षरशः पालन करेंगे |  इस रोग से आतंकित होने की सबसे बड़ी वजह यह है की इस रोग का सम्पूर्ण विश्व में कोई कारगर इलाज़ नहीं है, और ना ही कोई दवा |

यदि हमें इस रोग से लड़ना है और इस रोग को हराना है तो हमें सरकारी नियमों का पालन करते हुए, सुरक्षा नियमों का समुचित पालन करना होगा तभी हमें “करोना वाइरस” या करोना संकट से मुक्ति मिलेगी अथवा हम करोना को हरा पायेंगे…. |

---धर्मेंद्र पोद्दार , भाषा विभाग प्रमुख, सेक्रेड हार्ट स्कूल, सिलीगुड़ी

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